1. 360INR: कप्तान ने अपना नाम काटा
रवि ने वापसी के चरण की टीम शीट पर अपना नाम काटा। नीचे यश का लिखा और कप्तान की जगह हस्ताक्षर किए।
नियम में दोनों चरणों के बीच पंजीकृत रिजर्व को बदलने की अनुमति थी। छह डील के बीच नहीं। पहले चरण के टीम दंड कुल में रहते। खिलाड़ी बदलने से पहले दिए अंक नहीं मिटते।
रवि यह सबसे अच्छी तरह जानता था। उनमें छिहत्तर अंक उसके पहले चरण के थे।
वह तीस का था। यश इकतीस का। आठ साल दोस्त रहे, फिर रवि ने तय कर लिया कि कप्तानी उसे दूसरे के परिवार का समय आँकने का अधिकार देती है।
यश मेज के पास साधारण सफेद कमीज में खड़ा था। दादा के अंतिम संस्कार के बाद के दिनों में वही पहनी थी।
“खेलूँगा,” उसने कहा। “इससे तुम्हारी कही बात खत्म नहीं होती।”
“जानता हूँ।”
“तो ऐसे मत परिचय देना कि दोस्त तुम्हारे लिए वापस आया।”
रवि ने पेन रख दिया। ऐसा वाक्य चाहता था जिससे बदलाव दोनों तरफ उदार लगे। यश ने व्यावहारिक समझौता दिया। टीम जमा करने के लिए पर्याप्त था। आगे के लिए भी उसी से काम करना होगा।
दूसरे सिरे पर रतन ने बदली सूची देखी। पहले चरण में रवि को हराया था। दूसरे में वही टीम बढ़त और अलग विरोधी होगा।
यश कुर्सी पर बैठा। रवि दर्शक सीमा के पीछे गया, जहाँ कप्तान बात करके हाथ बेहतर नहीं कर सकता था। क्लिपबोर्ड उसके हाथ में रहा। तेरह पत्तों का अगला फैसला अब किसी और का था।
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2. आधी रात के बाद संदेश
दादा की देखभाल में यश तीन अभ्यास नहीं आ पाया था। हर बार पहले बताया। तीसरी रात रवि ने समूह में लिखा कि कुछ लोगों को चयन का सम्मान चाहिए, उपस्थिति का अनुशासन नहीं। सब जानते थे किसके लिए है।
यश ने बताया कि दादा उस शाम अकेले नहीं छोड़े जा सकते। रवि ने लिखा, “तो खिलाड़ी की जगह गरम रखना बंद करो।”
मीरा ने विरोध किया। कबीर ने निजी बात करने को कहा। रवि ने नरमी कहा और यश को शुरुआती सूची से हटा दिया। तीन दिन बाद दादा की मृत्यु हो गई।
रवि चाय का पैकेट लेकर घर गया क्योंकि और क्या ले जाए समझ नहीं आया। यश ने लेकर रसोई के सामान के साथ रखा। परिवार के पास बैठने नहीं बुलाया।
रवि ने मुड़े अखबार पर बूढ़े का चश्मा देखा। याद आया कि अभ्यास पत्तों के लिए न आने की शिकायत कर रहा था, जबकि यश उसी कमरे में जरूरत पड़ने की आवाज सुनता बैठा था।
दरवाजे पर माफी चाही। यश ने कहा कि वहाँ टीम की बात नहीं करनी।
अगले हफ्ते पहला चरण था। रवि खराब खेला। बड़ी जोड़ियाँ देर तक रखीं। पीछे होने पर तेज घोषणाओं का पीछा किया। छिहत्तर दंड लेकर उठा।
टीम कुल में सैंतीस अंक पीछे रही। इस बार दोष देने को अनुपस्थित खिलाड़ी नहीं था। कुर्सी पर वह खुद बैठा था। परिणाम शीट पर नाम के साथ अंक साफ थे। उन्हें खराब कहने के लिए किसी निजी कहानी की जरूरत नहीं थी।
3. फैसला जो अकेला नहीं कर सकता था
दो चरणों के आयोजन में तीन स्वतंत्र आमने-सामने की मेजें थीं। हर मेज प्रत्येक चरण में छह डील खेलती। सही घोषणा पर शून्य, विरोधी का दंड लिखित नियम अनुसार। तीन खिलाड़ियों के अंक टीम में जुड़ते। दोनों चरणों का कम कुल विजेता।
पहले में रवि 76, मीरा 48 और कबीर 64 थे। कुल 188। विरोधियों के 151। सैंतीस की कमी चयन बदलने पर भी अगले चरण में जाती।
मीरा ने यश को उतारने का प्रस्ताव रखा। कम सत्रों के बाद भी हाल के अभ्यास निर्णय रवि से स्थिर थे। कबीर सहमत हुआ।
रवि पहली प्रतिक्रिया में समझाने लगा कि कप्तान को अपना प्रदर्शन ठीक करने का अवसर चाहिए। मीरा ने पूछा कि आयोजन टीम के सबसे अच्छे मौके के लिए है या उसके पसंदीदा अंत के लिए। टीम सुधारने वाला उत्तर नहीं था।
शोक की रस्मों के बाद यश के चुने समय पर तीनों मिले। घर पहुँचकर यह माँग नहीं की कि मैच उसे दुख भूलने दे।
यश ने स्कोर प्रारूप, पहले चरण की शीट और तैयारी की उपलब्ध तारीखें माँगीं। फिर पूछा कि न खेलने पर भी रवि कप्तान रहेगा क्या।
“हाँ,” मीरा ने कहा। “वह वह काम कर सकता है जिसके लिए तुम्हारी कुर्सी नहीं चाहिए।”
रवि ने यात्रा, कागज और परिणाम जिम्मेदारियाँ लिखीं। यश ने देखा और तीन तैयारी सत्र स्वीकार किए।
समझौता टीम की जगह का था। किसी ने माफी का नाम नहीं दिया। यश ने पहली तारीख अपने कैलेंडर में डाली और स्पष्ट किया कि किस समय तक रुक सकता है।
4. तीन सत्र
पहले सत्र में यश ने कल्पना के एक हाथ में सैंतीस अंक मिटाने की कोशिश नहीं की। वे निर्णय देखे जिनसे कमी बड़ी हुई थी।
रवि ने पहले चरण की कठिन स्थितियाँ लगाईं। एक में दो बड़े अकेले पत्ते रखे थे क्योंकि अलग खास ड्रॉ से प्रत्येक उपयोगी हो सकता था। साथ में वे दूसरे क्रम की जरूरी जगह घेर रहे थे।
यश ने पहले से मौजूद वैध समूह गिनने को कहा। रवि बताने लगा कि क्या आने की उम्मीद थी।
“पहले इन्हें गिनो,” यश ने कहा। गिने।
दूसरे सत्र में अलग तेरह-पत्तों के हाथ थे। मीरा संभावित ड्रॉ क्रम बदलती। कबीर उस व्याख्या को चुनौती देता जो विरोधी के छिपे पत्ते जानने पर निर्भर हो। यश शुद्ध क्रम बचाते हुए बाकी पत्तों के वैकल्पिक रास्ते तुलना करता।
गलती हुई तो रवि ने ध्यान से बताई। यश ने जाँचकर मानी। चयन सही ठहराने के लिए रिजर्व को त्रुटिहीन बताना जरूरी नहीं था।
तीसरे सत्र में प्रकाशित टीम कुल पर काम किया। हारी डील में छोटा दंड अवसर बचा सकता है। व्यक्तिगत खिलाड़ी की जीत के बाद भी दूसरी मेजों पर काम बाकी रह सकता है।
लाइव खेल में सलाह नहीं होगी। डील शुरू होने के बाद हर व्यक्ति अकेला निर्णय लेगा।
अंत में यश का फोन बजा। दादी को उत्तर दिया, बाजार से जरूरी सामान पूछा और तय समय पर चला गया। रवि ने प्राथमिकताओं का मजाक बनाए बिना पत्ते समेटे। अगली तैयारी का समय पहले से दोनों के पास था। किसी को चुप रहने के लिए शर्मिंदा करना नहीं पड़ा।
5. वापसी की पहली तीन डील
रतन ने सही घोषणा से शुरुआत की। यश को बारह अंक मिले। सीमा के पीछे रवि आगे झुकना चाहता था, जैसे शरीर की स्थिति से गिनती बदल जाएगी। फिर पीछे हुआ।
दूसरी में यश के क्रम पहले बने और उसने घोषणा की। रतन को बीस मिले। दर्शक तेज वापसी चाहते थे, इसलिए यश ने जाँच जल्दी नहीं की।
तीसरी में परिणाम उलटा। रतन समाप्त हुआ। यश को अठारह लगे। वापसी की उस मेज पर यश 30, रतन 20 था।
खाली की कुर्सी पर फिर अंतर खुलता देख रवि को बुरा लगा। फिर विचार पहचाना। अब भी सीट को अपनी संपत्ति की तरह देख रहा था।
यश रतन से खेल रहा था। चयन करने वाले कप्तान के लिए प्रदर्शन नहीं दे रहा था।
दूसरी तरफ मीरा और कबीर छह डील के अपने मुकाबले जारी रखे थे। आधिकारिक प्रदर्शन केवल सत्यापित डील के बाद बदलता। टीम प्रतियोगिता कई स्वतंत्र फैसलों से बदल रही थी।
निर्धारित विराम में रवि आयोजक के माँगे कागज लाया और पूरी टीम के साथ यात्रा की पुष्टि की। पानी देते समय छिपी रणनीतिक सलाह नहीं दी। यश ने अगला आरंभ समय पूछा। रवि ने वही बताया।
खिलाड़ी लौटे तो रतन पहले से बैठा था। मेज पर बढ़त और उसे बचाने की क्षमता थी। यश को सामने का हाथ लगातार हल करना था। उसने नई गड्डी की व्यवस्था देखी और अपने पत्ते उठाए। दर्शक सीमा तक उसकी नजर नहीं गई।
6. आठ अंक छोटे रहे
चौथी डील भी रतन जीता। यश का दंड आठ था। वापसी में यश 38, रतन 20।
गिनती के लिए खुले हाथ से पता चला कि नुकसान छोटा क्यों रहा। जरूरी क्रम बना लिए थे। दूसरी आकर्षक संभावना इंतजार में फँसाती, उससे पहले बेकार बड़ा पत्ता छोड़ा। डील हारी थी। बस जितनी महँगी हो सकती थी, उतनी नहीं हुई।
पाँचवीं में यश ने सही घोषणा की। रतन के अधूरे पत्ते पच्चीस के थे। यश अड़तीस पर रहा। रतन पैंतालीस पहुँचा।
वापसी में अपनी मेज पर यश सात अंक आगे था। पूरी टीम कहानी अलग थी। पहले चरण की कमी सैंतीस थी। बाकी दोनों मेजें बराबर महत्वपूर्ण थीं।
मीरा की छह डील चवालीस पर समाप्त हुईं। कीर्ति अड़तालीस पर। कबीर उनचास, गीता सैंतालीस।
यश और रतन की आखिरी डील से पहले परिणाम सत्यापित हुए। घोषित प्रक्रिया के अनुसार आधिकारिक कुल सभी खिलाड़ियों को समान रूप से उपलब्ध था।
रवि ने स्कोरर के साथ जोड़ा। पहले के 188, मीरा के 44, कबीर के 49 और यश के मौजूदा 38 से 319। विरोधियों के पहले 151, कीर्ति के 48, गीता के 47 और रतन के 45 से 291।
एक मेज की एक डील बाकी थी। रवि की टीम अब भी अट्ठाईस अंक पीछे थी। उसने जोड़ दोबारा देखा और शीट वापस रखी। सही संख्या जानना उसका काम था। उससे किसी खिलाड़ी को अगला पत्ता नहीं दिलाया जा सकता था।
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7. पत्तों को कोई आदेश नहीं दे सकता था
आखिरी डील से पहले यश ने आधिकारिक कुल पढ़ा। वह घोषणा करे और रतन को अट्ठाईस से अधिक दंड मिले तो टीम आगे होती। कम दंड पर विरोधी आगे रहते। बराबर अंक पर घोषित टाई प्रक्रिया आती।
वह रतन के अधूरे पत्ते चुन नहीं सकता था। अपना हाथ बनाने का तरीका और मौका मिलने पर वैध घोषणा चुन सकता था।
रतन भी गणित जानता था। जोखिम घटाने का कारण था, लेकिन हर बड़ा पत्ता फेंकने से अपने आप बेहतर हाथ नहीं बनता। सही फिनिश और यश के पहले खत्म होने पर बचे अधूरे मूल्य में संतुलन करना था।
शुरुआती बारियों में किसी के लिए साफ अंत नहीं था। यश ने प्राकृतिक डायमंड क्रम रखा और बाकी के दो रास्ते देखे। एक बड़े अकेले पत्ते को संभावित सेट के लिए रोकता। दूसरा जुड़े स्पेड रखता। उसने जुड़ा रास्ता चुना।
रवि केवल खुली कार्रवाई देख सकता था। हाथ नहीं जानता था, चुनाव नहीं कर सकता था। उँगलियाँ क्लिपबोर्ड पर कस गईं। मीरा ने किनारा छूकर पूछा कि यात्रा फॉर्म पूरा है क्या। था। उसने रख दिया।
अगली कई बारियों में कप्तान का सबसे उपयोगी काम चुप रहना था। यश ने आश्वासन के लिए नहीं देखा। ड्रॉ, खुले ढेर और अपने समूह देखे। रतन अंतिम हाथ जितना कठिन बना सकता था बनाता रहा।
दोनों के बीच कोई नाटकीय घोषणा नहीं हुई। पत्ता उठता, जाँच होती, दूसरा छूटता। पूरा मैच इन्हीं छोटे कामों में सिमट गया था।
8. हार्ट की रानी
डील के अंत में यश के पास डायमंड के 2, 3, 4, 5; हार्ट के 8, 9, 10; स्पेड के 6, 7, 8; क्लब और डायमंड की रानियाँ; और क्लब का बादशाह था।
तेरह पत्ते। तीन प्राकृतिक क्रम पूरे। दो रानियों को दूसरे सूट की उसी अंक वाली तीसरी चाहिए थी। क्लब का बादशाह योजना के बाहर था।
रतन ने अनुपयोगी पत्ता छोड़ा। यश ने नहीं उठाया। बंद ढेर से लिया। हार्ट की रानी आई।
टीम की तरफ नहीं मुड़ा। चार डायमंड, तीन हार्ट, तीन स्पेड और तीन रानियाँ गिनीं। क्लब बादशाह छोड़ा और घोषणा की।
समूह सही थे। जरूरी क्रम मौजूद। रानियों में अलग सूट थे। अंपायर ने तेरह पत्तों का हाथ स्वीकार किया।
रतन पूरे समूहों से अधूरे पत्ते अलग करने लगा। अब यश देख सकता था कि अंतिम फैसलों ने क्या छोड़ा। दंड इकतीस था।
परिणाम समझने से पहले रवि ने संख्या सुनी। शीट देखी, फिर मीरा। वह पहले से जोड़ रही थी।
रतन का वापसी कुल पैंतालीस से छिहत्तर हुआ। विरोधी टीम 291 से 322 पहुँची। रवि की टीम 319 पर रही।
तीन अंक।
स्कोरर ने दोहराया तभी यश पीछे बैठा। अंतिम डील जीती थी। हर दूसरी मेज के काम ने उस इकतीस को पर्याप्त बड़ा बनाया था।
मीरा ने कबीर की तरफ हाथ बढ़ाया। कबीर ने पहले परिणाम पर नजर रखी, फिर पकड़ लिया। सीमा के भीतर अभी हस्ताक्षर बाकी थे। बाहर खुशी अब किसी एक चेहरे में नहीं समा रही थी।
9. सीमा के पीछे कप्तान
अंतिम तुलना 319-322 थी। कप्तान के हस्ताक्षर से पहले रवि ने हर हिस्सा देखा। पहला चरण 188 बनाम 151। दूसरा 131 बनाम 171। दोनों मिलाकर तीन अंक की टीम जीत।
विजेता वापसी कुल में यश के 38, मीरा के 44 और कबीर के 49 थे। उसमें हारी डीलें थीं, अपनी प्रतिद्वंद्वी से पीछे समाप्त हुई मेज थी और पुराने अंक थे जिन्हें मिटाने की अनुमति नहीं मिली थी।
पुराने कॉलम में अपने छिहत्तर देखे। अब बहाना नहीं माँग रहे थे। नया परिणाम सही बताने की जिम्मेदारी माँग रहे थे।
पुरस्कार पर तीनों को धन्यवाद दिया और योगदान बताया। यश को कप्तान बचाने वाला विकल्प नहीं कहा।
रतन ने बधाई के बाद जुड़े स्पेड रखने का निर्णय पूछा। हस्ताक्षर के बाद हाथ का वह हिस्सा लगाया। रतन ने दिखाया कि आखिरी दंड घटाने की अपनी योजना कितनी पास थी। यश ने सुना और रास्ता स्वीकार किया।
विकल्प सामने आए तो तीन अंक का अंतर और छोटा लगा।
रवि ने समीक्षा समाप्त होने तक इंतजार किया। फिर बाहर बात करने को पूछा। यश ने पाँच मिनट दिए।
इस बार रवि ने कप्तानी का दबाव नहीं समझाया। ट्रॉफी से पुराना विवाद छोटा नहीं बताया।
“दादा की देखभाल को बहाना कहा,” उसने कहा। “तुमने क्या बताया था, जानता था। फिर भी शर्मिंदा करने का फैसला किया।”
यश ने वाक्य को रहने दिया। बेहतर बनाने में मदद नहीं की। कुछ क्षण रवि को पहली बार अपनी ही बात बिना बचाव के सुननी पड़ी।
10. वह मुलाकात जिसके लिए बुलाया गया
“अगला सत्र बाद में तय करूँगा,” यश ने कहा। रवि ने सिर हिलाया।
“समय भेज सकते हो। तस्वीर भेजकर उत्तर हाँ मत मान लेना।”
“नहीं मानूँगा।”
दादी ने पूछा था कि मैच के बाद टीम कप लेकर चाय पर आएगी क्या। यश ने फोन करके पुष्टि की कि समय ठीक है। फिर मीरा, कबीर और रवि को बुलाया।
साथ गए। रवि ने कप उठाया क्योंकि यश वादा किया बाजार का सामान ले रहा था। दरवाजे पर यश ने अंदर कहा, तभी रवि गया।
दादी ने कप उस मुड़े अखबार के पास रखा जहाँ पति का चश्मा था। पूछा अंतिम हाथ किसने जीता। यश ने बताया। फिर पूछा बाकी दोनों ने क्या किया।
मीरा और कबीर ने अपनी मेज समझाई। रवि ने आधिकारिक तुलना निकालकर तीन स्कोर जुड़ना दिखाया। दादी ने पूछा कम संख्या कैसे जीतती है। उसने दंड वाला प्रारूप सरल समझाया।
चाय के बाद यश ने कप टीम कमरे के लिए केस में रखा। अंतिम शीट की प्रति मेज पर रहने दी।
रवि ने अगले तय अभ्यास के लिए सबको लेने की पेशकश की। यश ने उत्तर से पहले कैलेंडर देखा।
“बुधवार। आठ बजे तक रुक सकता हूँ।”
रवि ने समय के पास आठ लिखा। सवाल का निशान नहीं लगाया।
जाते समय खाली कप रसोई में ले गया। यश दादी के पास बैठकर जीत वाले हाथ की तीन रानियाँ दिखा रहा था। दादी ने सूट फिर गिने। यश ने पत्ते पास सरकाए और जाँच पूरी होने तक इंतजार किया।
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