1. 44 Game कहानी: जिस गेम का इंतजार कोई नहीं करना चाहता था
ललिता चालीसवीं चाल पर पहुँची तो कमेंट्री वाले कमरे में ट्रॉफी की चर्चा शुरू हो चुकी थी। स्क्रीन पर अंतिम चरण में उसका ऊँट विरोधी घोड़े के सामने था। कोई तुरंत चमकदार संयोजन नहीं दिख रहा था। दूसरा अग्रणी खिलाड़ी गेम पूरा कर चुका था। चाय आ रही थी। किसी ने पूछा कि बराबरी की तैयारी कर लेनी चाहिए क्या।
रेडियो संग्रह विभाग में ललिता को बारह वर्षों से जानने वाला भैरव माइक्रोफोन में मुसकराया। “अंतिम चरण समझाती बहुत सुंदर हैं। उसे जीतकर पूरा करना दूसरी बात रही है।”
कमेंट्री का कमरा खेल हॉल से अलग था। ललिता सुन नहीं सकती थी। उसे विरोधी की आस्तीन मेज से लगने की आवाज सुनाई देती थी और चाल के बाद घड़ी में जुड़ते सेकंड दिखते थे। वह उनचास की थी। इकतालीस साल का राघव कठिन स्थितियाँ बचा चुका था। दोनों को खेल रोचक लगने के लिए बाहर की राय नहीं चाहिए थी।
काल्पनिक छह दौर के कर्मचारी ओपन का आखिरी दौर था। पाँच गेम के बाद ललिता और अरविंद के साढ़े चार-साढ़े चार अंक थे। अरविंद का जल्दी हुआ ड्रॉ उसे पाँच पर पहुँचा चुका था। ललिता जीतती तो सीधे खिताब मिलता। ड्रॉ पर घोषित टाईब्रेक प्रक्रिया होती।
राघव ने ड्रॉ की पेशकश की। ललिता ने जवाब से पहले स्थिति फिर देखी।
“नहीं, धन्यवाद।”
बाहर भैरव ने चाय हिलाना रोक दिया। बोर्ड पर ललिता ने राजा को केंद्र के एक खाने और करीब किया।
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2. वह रिकॉर्डिंग जो दिमाग में रह गई
तीन महीने पहले भैरव ने अनौपचारिक विश्लेषण कार्यक्रम में ललिता की एक हार की रिकॉर्डिंग दिखाई थी। हारा गेम दिखाना सामान्य था। उसका परिचय सामान्य नहीं था। उसने मजाक किया कि ललिता दूसरों की उपलब्धियाँ संग्रह में इसलिए बचा सकती है क्योंकि खुद शायद ही कोई बचाने योग्य अंतिम चरण खेलती है।
ललिता ने सहकर्मी के फोन पर वह अंश सुना। वह स्टील के डिब्बे से खाना खा रही थी। सहकर्मी हँसा, फिर देखा कि उसका खाना रुक गया है। छोटी स्क्रीन की स्थिति सचमुच हारी हुई थी। उसने अच्छे ऊँट वाले अंतिम चरण को गलत खेला था, जल्दी प्यादा बढ़ाया और विरोधी घोड़े को सक्रिय रास्ता दे दिया था।
एक सप्ताह वह क्लब के अंतिम चरण अभ्यास से बचती रही। फिर वास्तविक गेम खाली बोर्ड पर रखा। अपमान एक सचमुच की कमजोरी से जुड़ गया था, इसलिए उसे अनदेखा करना कठिन था। योजनाओं के नाम और प्रसिद्ध उदाहरण समझा सकती थी। दबाव में यह तय करने से पहले चल देती कि किस प्यादे को रोकना है और किस प्रवेश खाने को बचाना है।
उसने कॉपी शुरू की: प्यादा बढ़ाने से पहले क्या बदलना जरूरी है? सवाल सही जगह उसे रोकता था। प्यादे की चाल जगह ले सकती थी, कोई खाना छोड़ सकती थी, लाइन खोल सकती थी या इंतजार की चाल खत्म कर सकती थी। केवल आगे जाने से वह उपयोगी नहीं होती।
सहकर्मी के फोन में रिकॉर्डिंग रही। ललिता ने पूछना बंद किया कि और किसने सुनी है। उसने अपनी गलती से पहले की स्थिति सजानी शुरू की।
3. घोड़े का भी जवाब था
नए अभ्यास में उसने पहले घोड़े वाली तरफ से बचाव किया। उम्मीद थी कि इससे ऊँट की श्रेष्ठता स्पष्ट होगी। इसके बजाय पता चला कि हमलावर लापरवाही से प्यादा बढ़ाए तो घोड़ा सुंदर दिखती घेराबंदी से कितनी आसानी से निकल सकता है।
घोड़े को खाने चाहिए थे। यदि वह प्यादे से सुरक्षित केंद्रीय ठिकाने पर पहुँचता, तो ऊँट की लंबी विकर्ण लाइन बहुत कम कर पाती। बचाव वाला राजा ऊँट पक्ष के प्यादों पर हमला कर पाता, तो मजबूत समझी जा रही तरफ ड्रॉ माँग सकती थी।
ललिता अरविंद के साथ अभ्यास करती थी। वही बाद में प्रतियोगिता की बढ़त में उसके बराबर हुआ। हर पूरी स्थिति के बाद वे पक्ष बदलते। एक सत्र में ललिता घोड़े के साथ जीती, क्योंकि अरविंद प्यादे के पीछे गया और उसका राजा सक्रिय हो गया। दूसरे में ऊँट के साथ हारी, क्योंकि जिस प्यादे से दुश्मन घोड़ा रुका था, वही बदल दिया।
वे नारे नहीं, योजनाएँ लिखते। ऐसी कमजोरी रोको जहाँ ऊँट पहुँच सकता हो। घोड़े को सीमित करते समय अपने राजा का रास्ता मत बंद करो। पहले लक्ष्य पर राजा लगाने से पहले दूसरा लक्ष्य बनाओ। स्थिति बदलने पर बचाव वाले की मुक्त होने की चाल फिर जाँचो।
सत्र शांत नहीं थे। बहस होती, मोहरे फिर सजते और दोनों की पसंद की लाइन में गलती निकलती। ललिता देर से घर पहुँचने लगी। कॉपी में काटे हुए आत्मविश्वासी निष्कर्ष भरे थे। एक बुरी हार के बाद अरविंद ने रुकने को पूछा। उसने बोर्ड घुमाया। “अब तुम बचाओ।”
4. पाँच में साढ़े चार
शुरुआती चार दौर में ललिता ने तीन जीत और एक ड्रॉ लिया। ड्रॉ अरविंद से था। दोनों एक-दूसरे की अंतिम चरण की आदतें खूब जानते थे। वह सहयोगी समाप्ति नहीं होने वाली थी। अरविंद ने प्यादों की बनावट पर सवाल उठाए। ललिता ने वजीर बदलने से बचने के लिए कमजोर अंतिम चरण स्वीकार नहीं किया। दोनों ने सही आधे अंक पर हस्ताक्षर किए।
पाँचवें दौर में तेज हमलावर मिला। उसने राजा की तरफ लाइन खोलने के लिए प्यादा दिया। ललिता ने पहला प्रस्ताव नहीं लिया। दूसरा तभी लिया जब सबसे खतरनाक हमलावर मोहरा बदल गया। आगे अतिरिक्त प्यादा बचा सकने वाली स्थिति मिली। लंबे हाथी वाले अंतिम चरण के बाद वह जीती।
अरविंद ने भी पाँचवाँ गेम जीता। दोनों साढ़े चार पर बराबर रहे। अंतिम दौर में अलग प्रतिद्वंद्वी मिले। दोनों को अपना बोर्ड खेलना था।
भैरव को अलग कमरे से आखिरी दौर की कमेंट्री के लिए बुलाया गया। खेल से पहले ललिता ने उसे उपकरण लगाते देखा। उसने बाद में “अच्छी साफ व्याख्या” मिलने की बढ़ा-चढ़ाकर शुभकामना दी।
ललिता ने पूछा कि पूरा गेम स्कोर रखा जाएगा क्या।
“बिलकुल।”
“पूरा?”
वह ऐसे हँसा जैसे मजाक हुआ हो। ललिता मेज पर गई, सफेद मोहरे सजाए और घड़ी जाँची। राघव पानी की बोतल के साथ आया। अच्छे खिलाड़ियों से लंबी मेहनत करवाने की उसकी प्रतिष्ठा थी। ललिता ऐसे ही प्रतिरोध के सामने खिताब कमाना चाहती थी।
5. पहली घड़ी रुक गई
ललिता और राघव का मध्य खेल पूरा होने से पहले अरविंद का गेम ड्रॉ हो गया। हॉल के स्कोर पर नतीजा आया। अपनी बारी के समय ललिता ने देखा, नया कुल याद किया और बोर्ड पर लौट आई।
राघव का घोड़ा केंद्र के करीब जमा था और उसके पास प्यादे खोलने के विकल्प थे। ललिता तुरंत कुछ मोहरे बदलकर आसान दिखते अंतिम चरण में जा सकती थी। लेकिन उससे घोड़े को ऐसा खाना मिलता जहाँ कोई चुनौती नहीं रहती। उसने पहले उसके सहारे पर सवाल उठाने तक तनाव बनाए रखा।
घोड़े के ठिकाने पर प्यादा बढ़ाकर हमला किया तो राघव ने खराब अदला-बदली के बजाय d7 पर लौटना चुना। मिली जगह से ललिता वजीर बदलने के बाद राजा को केंद्र में लाई। फिर एक जोड़ी हाथी बदले। आखिरी हाथियों की अदला-बदली पर अधिक सोचना था। उसके बाद किनारे से शह की संभावना हटती और ऊँट-घोड़े का संतुलन निर्णायक होता।
उसने घोड़े के रास्ते और अपने ऊँट की दोनों तरफ पहुँच जाँचकर ही स्वीकार किया।
बाहर अरविंद अपनी हस्ताक्षर वाली ड्रॉ शीट लेकर दर्शकों में बैठा। भैरव ने पूछा कि टाईब्रेक की उम्मीद है क्या। अरविंद ने पहले स्क्रीन देखी। “राघव को अभी बहुत कुछ बचाना है।”
बोर्ड पर ललिता ने ऊँट ऐसी विकर्ण लाइन पर रखा जो एक प्यादे की बढ़त रोकती थी। दूसरी घड़ी चलती रही। अरविंद का समाप्त गेम उसके अधूरे गेम का उत्तर नहीं बन सकता था।
6. वह प्यादा जिसे उसने नहीं छुआ
पहली आकर्षक चाल वजीर की तरफ प्यादा बढ़ाना थी। वह सक्रिय दिखती। कमेंट्री बोर्ड पर उसे स्पष्ट आगे बढ़ने का रास्ता बताया गया। ललिता ने जवाब गणना किया और घोड़े का निकलना देखा। प्यादा हटा तो अभी बंद खाना उपलब्ध हो जाता। राघव का राजा भी सक्रिय हो सकता था।
उसने प्यादा वहीं छोड़ा।
इसके बजाय राजा की स्थिति सुधारी और ऊँट का स्थान बदला। राघव ने इंतजार किया, फिर दूसरी तरफ प्यादा बदलना चाहा। ललिता ने देखा कि अदला-बदली लक्ष्य मिटाएगी या बनाएगी। उसने ऐसा वापस मारना चुना जिससे विरोधी प्यादा उस खाने पर रुक गया जहाँ बाद में ऊँट हमला कर सकता था।
स्थिति धीरे मगर दिखाई देने योग्य बदली। घोड़ा चल सकता था, लेकिन हर उपयोगी दिखता रास्ता दूसरी जगह कुछ छोड़ता। राजा को रुकी कमजोरी की रक्षा के लिए पास रहना पड़ता। ललिता का राजा अधिक स्वतंत्र था। ऊँट दोनों तरफ लंबी यात्रा किए बिना विकर्ण बदल सकता था।
पुरानी हार लगभग इसी तरह के पल में अधीरता से शुरू हुई थी। उसे वही इच्छा अपने हाथ में महसूस हुई। प्यादा छूने से पहले हाथ वापस खींच लिया।
राघव ने रुकना देखा। अपनी चाल के बाद पूछा, “अभी भी कोशिश?”
जवाब चलकर ललिता ने घड़ी दबाई। “अभी खेल रही हूँ।”
वह फिर घोड़े को देखने लगा। बातचीत खत्म थी। स्थिति सवाल पूछती रही। बाहर आसान लगने वाली प्यादे की चाल बोर्ड पर अब भी नहीं आई थी।
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7. दूसरी कमजोरी
स्थिति सही होने पर ललिता ने h-प्यादा बढ़ाया। राघव ने पास की g-फाइल से उसे मारा। ललिता के g-प्यादे ने वापस h5 पर मारा। अब राघव का h6-प्यादा सीधे उसके सामने स्थिर हो गया। यह प्यादों की बनावट बदलने का फैसला था।
हल्के खानों पर चलने वाला उसका ऊँट बाद में उचित विकर्ण से h6 पहुँच सकता था। राघव के राजा को अब वजीर की तरफ की रोक के साथ इस तरफ भी ध्यान देना था। घोड़ा एक चाल में सब कुछ नहीं बचा सकता था।
ललिता ने तुरंत ऊँट को उस प्यादे के पीछे नहीं भेजा। पहले राजा का रास्ता सुधारा। राघव ने इस बीच घोड़े को मुक्त करने की योजना खोजी। ललिता ने संभावित दोहरा हमला जाँचा, राजा उसकी पहुँच से हटाया और लापरवाह प्यादा बढ़ाने के बजाय ऊँट से रोक बनाए रखी।
कमेंट्री कमरे में भैरव की व्याख्या की गति बदली। अब वह नहीं कह सकता था कि कुछ हुआ ही नहीं। स्क्रीन पर रुका h-प्यादा था। केंद्र में राजा था। देखने की इच्छा रखने वालों को घोड़े के कठिन रास्ते दिखाई दे रहे थे।
अरविंद ने बचाव का एक उपाय दिखाया जिसकी गणना अभी जरूरी थी। भैरव ने उसे बोर्ड पर रखा। हॉल में राघव ने वही विचार खुद खोजा।
ललिता ने उत्तर पर कई मिनट लगाए। उसकी चुनी चाल से घोड़े को कुछ समय के लिए एक खाना मिला, लेकिन स्थायी ठिकाना नहीं। राघव को साँस मिली थी। स्थिति से पूरी मुक्ति नहीं।
8. लंबा रास्ता छोटा बन गया
ऊँट ने विकर्ण बदला और ललिता का राजा दूसरी तरफ से पहुँचा। राघव को चुनना पड़ा कि कौन-सी कमजोरी राजा से बचाए और कौन-सी घोड़े को सौंपे। कोई भी विकल्प तुरंत नहीं हारता था। दोनों में समय घटते हुए लगातार सही जवाब खोजने थे।
ललिता ने अभ्यास की प्रक्रिया से अपनी घड़ी खतरे से ऊपर रखी। पहले बचाव वाले का सक्रिय उपाय पहचाना, दो गंभीर विकल्पों की तुलना की और मजबूर जवाबों की गणना करके चली। अब अच्छा ऊँट होने की सामान्य सुंदरता सोचने में समय नहीं लगाती थी। पूछती थी कि घोड़ा अगली बार कहाँ जाएगा।
अंत में राघव ने वजीर की तरफ रास्ता पाने के बदले रुका हुआ राजापक्ष का प्यादा जाने दिया। ललिता ने उसे तभी लिया जब जाँच लिया कि अगली चाल घोड़ा राजा और ऊँट पर दोहरा हमला नहीं कर सकता। उसे ठोस बढ़त मिली, लेकिन राघव को सक्रियता भी मिली थी। उसने राजा से उस सक्रियता का सामना किया और बाकी प्यादे बचाने में उसकी एक और चाल लगवाई।
ऊँट बोर्ड के पार लौटा। राजा भीतर आया। दूसरे प्यादे को बचाना घोड़ा छोड़े बिना असंभव होने लगा। राघव ने मोहरा बचाया और ललिता ने जुड़े हुए स्वतंत्र प्यादे बना लिए।
भैरव स्क्रीन की ओर झुका। वह परिणाम समझाने के लिए साफ दिखती बड़ी भूल का इंतजार कर रहा था। सामने लगातार रोक, एक जरूरी रियायत और फिर दूसरी थी। ललिता ने वही लंबा रास्ता चुना था जिसमें उसकी स्थिति लगातार बेहतर होती रही।
9. दूसरी घड़ी रुकी
राघव तब तक खेलता रहा जब तक स्वतंत्र प्यादे ललिता के राजा और ऊँट की रक्षा में आगे नहीं आ गए। घोड़ा कुछ समय एक खाना रोक सकता था, लेकिन दूसरे प्यादे तक जाने की कोशिश में पहला सहारे के साथ बढ़ता। ललिता ने अगली बढ़त से पहले दोनों प्यादों के बदले घोड़ा देने की संभावना भी जाँची।
राघव ने लगभग एक मिनट स्थिति देखी। फिर घड़ी रोकी और हाथ बढ़ाया।
ललिता गेम जीत गई। छह दौर में साढ़े पाँच अंक। अरविंद पाँच पर रहा। टाईब्रेक नहीं चाहिए था।
पहले उसे राघव की कुर्सी पीछे होने की आवाज सुनाई दी। फिर दूसरे कमरे से तालियाँ आईं। उसने स्कोर पर हस्ताक्षर किए और उस प्यादे की ओर इशारा किया जिसे ललिता पहले नहीं बढ़ा रही थी।
“मैं उसी का इंतजार कर रहा था।”
“जानती हूँ।”
वह थकी, निराश मुसकान के साथ बोला। “तुमने पूरा बोर्ड बचाने पर मजबूर किया।”
ललिता यही वाक्य पुरस्कार तक साथ ले गई। भैरव माइक्रोफोन और किसी गलती को पहचान लेने का तैयार सवाल लिए था। उसने प्रदर्शन वाले बोर्ड के पास स्कोर शीट रखी।
“कौन-सी चाल?”
भैरव ने लिखी चालें देखीं। पीछे अरविंद बाँहें मोड़े इंतजार कर रहा था। कमरे को जवाब चाहिए था। भैरव पहली रोक से शुरू हुआ और आगे बढ़ता गया। उसे वास्तव में खेल बदलने वाले निर्णयों के नाम लेने पड़े।
10. पूरी रिकॉर्डिंग
प्रस्तुति में ललिता के एक हाथ में ट्रॉफी और दूसरे में गेम का स्कोर था। राघव विश्लेषण में शामिल हुआ। उसने वह रास्ता दिखाया जिस पर घोड़ा ले जाना चाहता था। अरविंद ने समझाया कि आकर्षक प्यादा बढ़ाने से बचाव को मदद क्यों मिलती। दर्शकों ने वह गेम समझा जो पहले केवल धीमा लग रहा था।
भैरव ने पूछा कि छोटा प्रमुख अंश वाला वीडियो चाहिए क्या। ललिता ने पूरा स्कोर और पूरा विश्लेषण रखने को कहा। उसने सहमति दी, फिर पूछा कि टिप्पणियाँ तैयार करने में मदद करेगी क्या।
“राघव के बचाव भी रखिए,” उसने कहा। “लोग देखें कि किन जवाबों का सामना करना पड़ा।”
अगली दोपहर वह संग्रह विभाग लौटी। पुराने मजाक वाला वीडियो दिखाने वाला सहकर्मी मेज पर आया। इस बार बोर्ड का चित्र था और सवाल कि h-प्यादे की बनावट इतनी जरूरी क्यों थी। ललिता ने जाँच रही सूची प्रविष्टि पूरी की, फिर अपनी कुर्सी के पास दूसरी खींची।
अगली सुबह सुधरी कमेंट्री संग्रह में पहुँची। ललिता ने निर्णायक हिस्सा सुना। इस बार आवाज़ ने घिरे राजा, घोड़े और धैर्य की योजना समझाई। नतीजे को भाग्य वाली जीत नहीं कहा।
सहकर्मी ने पूछा कि सार्वजनिक रिकॉर्ड में कौन-सा संस्करण रखें। उसने पूरे फाइनल की रिकॉर्डिंग और तारीख दी। सूची में उसका नाम विजेता के नीचे था। कमेंटेटर का कमेंट्री के नीचे। पुराने मज़ाक ने दोनों भूमिकाएँ बदलनी चाही थीं। रिकॉर्ड ने उन्हें वहीं रखा जहाँ खेल छोड़कर गया था।
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