1
सालगिरह के खाने पर जाने से पहले इकबाल ने गैराज के पीछे कमीज़ बदली थी। दो बार हाथ धोए थे। पुराने टूथब्रश से नाखूनों के किनारों पर साबुन रगड़ा था।
होटल के निजी हॉल के बाहर खड़े आदमी ने पहले उसके जूते देखे।
“डिलीवरी नीचे देनी है।”
“मैं सदस्य हूँ।”
आदमी ने सूची देखी। समिति के नामों के नीचे इकबाल का नाम था। उसके आगे नीली स्याही में किसी ने लिखा था, सहयोग।
भीतर गरम रोशनी में काँच के बर्तन चमक रहे थे। दीवार पर रिवरसाइड सपोर्टर्स क्लब के पहले बाहरी मैच की बड़ी तस्वीर थी। किनारे इकबाल अपना जवान चेहरा देख सकता था। उसने बैनर का एक सिरा पकड़ रखा था।
अध्यक्ष अश्विन को बुलाया गया। वह गिलास लेकर बाहर आया। “इकबाल भाई, दस मिनट देना। कुछ खास लोग आए हैं।”
उसने सर्विस लिफ्ट के पास प्लास्टिक की कुर्सी खींच दी। “यहाँ बैठो। किसी को भेजता हूँ।”
इकबाल बैठ गया। कमीज़ के नीचे वाली सिलवट सीधी की। उसे लगा, सच में दस मिनट ही होंगे।
2
आठ महीने पहले अश्विन गैराज आया था। चेहरा परेशान था। कार में कोई खराबी नहीं थी।
क्लब की बाहर मैच देखने जाने वाली बस रद्द हो गई थी। बस वाले से दिया एडवांस लौटने में देर थी। चालीस सदस्यों ने पैसे जमा किए थे। कई ने छुट्टी भी ले ली थी। दूसरी बस के लिए कुछ समय का इंतज़ाम चाहिए था।
इकबाल ने दूसरी हाइड्रोलिक लिफ्ट के लिए बचत की थी। छोटा मैकेनिक दीपु कार के नीचे स्टैंड लगाकर काम करने की परेशानी बताने लगा था।
उस बचत से इकबाल ने क्लब को एक लाख बीस हज़ार रुपये उधार दिए। लिखित रसीद बनी। क्लब का नाम, जरूरत, रकम और तीन महीने बाद लौटाने की तारीख लिखी गई। अध्यक्ष के रूप में अश्विन और कोषाध्यक्ष ने दस्तखत किए।
“तुमने बचा लिया,” अश्विन बोला।
घुटने की वजह से इकबाल ने बस के दरवाज़े के पास सीट माँगी। पहली पंक्ति का वादा हुआ। यात्रा के दिन वहाँ अध्यक्ष का मेहमान बैठा था। इकबाल पीछे चला गया। उसने खुद को समझाया, एक सीट की ही तो बात है।
3
एडवांस की वापसी दो हिस्सों में हुई। इकबाल को चाय की दुकान पर कोषाध्यक्ष से पता चला। पैसे माँगे तो अश्विन ने कहा, दूसरी जरूरी चीज़ों में लगा दिए। सालगिरह पर रकम जुटेगी, फिर दे देंगे।
“तुम जानते हो ऐसे काम कैसे चलते हैं।”
शायद इकबाल नहीं जानता था। उसे गियरबॉक्स का काम पता था। वह जानता था कि सस्ती मरम्मत चाहने वाले ग्राहक को भी खराब टायर का खतरा बताना चाहिए। कम काम वाले हफ्ते में भी शनिवार की मजदूरी तैयार रखनी चाहिए।
घर पर बेटी सना ने पूछा, नई लिफ्ट क्यों नहीं आई?
“देर हो रही है।”
“मशीन में या पैसे में?”
वह मुस्कराया। सना नहीं मुस्कराई। चौबीस साल की थी। कॉलेज के बीच गैराज की बुकिंग देखने लगी थी। पिता का चेहरा ऐसे पढ़ लेती जैसे कोई बकाया बिल।
इकबाल ने खाने की बात छेड़ दी। सना ने उस दिन दोबारा नहीं पूछा। मगर अगले हफ्ते मशीन वाले का फोन आया तो उसने अपने पिता को फोन दिया और वहीं खड़ी रही।
4
होटल में दस मिनट चालीस हो गए। एक वेटर पानी लाया। पूछा, खाना खाया? अधखुले दरवाज़े से अश्विन की आवाज़ आई।
“जब हमारी यात्रा खतरे में थी, मैं खुद आगे आया। जिम्मेदारी इसी को कहते हैं।”
तालियाँ बजीं।
इकबाल उठ खड़ा हुआ। दरवाज़े वाले लड़के ने हाथ आगे किया। “सर ने रुकने को कहा है।”
“मेरे पैसे की बात कर रहा है।”
लड़का असहज हो गया। दीपु की उम्र का होगा। न भाषण उसने लिखा था, न सूची बनाई थी। इकबाल फिर बैठ गया। क्लब को अपनी बचत दी थी। अब उसी के खाने में जाने के लिए इस लड़के से बहस करनी पड़ती। दरवाज़े से अंदर एक खाली कुर्सी दिख रही थी। उसकी पीठ पर किसी की जैकेट पड़ी थी।
नौ बजकर बीस मिनट पर अश्विन दो मेहमानों के साथ निकला। “हमारे गैराज वाले हैं,” उसने परिचय दिया। एक मेहमान ने पूछा, ड्राइवर का इंतज़ाम कर सकते हैं?
अश्विन हँस पड़ा।
इकबाल ने सदस्यता दोबारा लेने का चेक वाला लिफाफा उसकी ओर बढ़ाया। फिर खोलने से पहले वापस ले लिया।
“अब इसकी जरूरत नहीं है।”
उसने लिफाफा जेब में रखा और सीढ़ियों की ओर चल दिया। पीछे से किसी ने खाने के लिए नहीं रोका।
5
सना ने उसे रसोई की मेज़ पर उसी साफ कमीज़ में बैठे पाया।
“खाना खराब था?”
इकबाल ने बताया कि खाया नहीं। उसने बचे चावल चढ़ा दिए और इंतज़ार किया। बात सुनकर यह नहीं कहा कि वहीं सुना देना चाहिए था। इकबाल को अच्छा लगा। सारे तेज़ जवाब घर लौटते समय सूझे थे। तब सुनने वाला कोई नहीं था।
“उनके भाषण में अपना नाम चाहिए?” सना ने पूछा।
“नहीं।”
“तो क्या चाहिए?”
उसने नाखून के पास दरार में बचा साबुन देखा।
“अपने पैसे। और दोबारा वहाँ नहीं जाना।”
सुबह दोनों ने उधार की रसीद, बैंक का रिकॉर्ड और रकम लौटाने के संदेश निकाले। स्थानीय सलाहकार की मदद से अध्यक्ष और कोषाध्यक्ष को स्पष्ट माँग भेजी।
उसमें लिफ्ट के पास वाली कुर्सी नहीं लिखी। होटल में उसे सबसे अच्छी जगह बैठाया होता, तब भी पैसा वापस मिलना चाहिए था। वह अपमान की कीमत नहीं माँग रहा था। अपना बकाया माँग रहा था। यह फर्क सना ने चिट्ठी दोबारा पढ़ते समय भी रहने दिया।
6
दोपहर से पहले अश्विन का फोन आ गया।
“दोस्तों के बीच अब इतना कागज़ी काम?”
इकबाल टैक्सी का बोनट खोले खड़ा था। फोन स्पीकर पर रखा, आवाज़ धीमी की ताकि दीपु को सब न सुनना पड़े।
“तारीख निकल गई।”
“इज़्ज़त से बुलाया था तुम्हें।”
इकबाल ने एक पल आँखें बंद कीं। अब कहानी ऐसी थी जिसमें बुलावा कर्ज मिटा देता था। बाहर बैठाना इज़्ज़त देना था। उसने फिर भुगतान की बात कही।
अश्विन ने खर्च गिनाए। सालगिरह महँगी पड़ी। एक प्रायोजक ने पैसे नहीं दिए। कारोबार करते हो, रकम फँसना समझते होगे।
“समझता हूँ। इसलिए अपने पैसे चाहिए।”
कोषाध्यक्ष ने बैठक रखी। क्लब ने बकाया रकम मानी। तीन किस्तों का प्रस्ताव दिया। इकबाल ने शर्तें जँचवाईं और स्वीकार कर लीं।
उसे पैसे चाहिए थे। होटल के गलियारे में किसने किस तरह देखा, उस पर महीनों की बहस नहीं चाहिए थी। घर लौटकर उसने सना को तारीखें दीं। उसने कैलेंडर में लिखीं, मगर मशीन वाले को अभी कोई नया वादा नहीं किया।
7
पहली किस्त आई। दूसरी के लिए याद दिलाना पड़ा। तीसरी ग्यारह दिन देर से आई। पूरे एक लाख बीस हज़ार लौटे, तब इकबाल ने लिफ्ट मँगवाई।
लगाने में आधा दिन काम रुका। ड्रिल की धूल पूरे गैराज में फैल गई। इस्तेमाल समझाए जाने के बाद दीपु उसके नीचे खड़ा ऊपर देखता रहा।
“यह बहुत पहले करना चाहिए था।”
“हाँ,” इकबाल ने कहा।
जवाब में कोई सफाई नहीं थी। अपने कर्मचारियों की जरूरत उसने टाली थी। समिति के काम आना उसे अच्छा लगता था। लगता था कि वह उनका अपना है।
शाम को मैकेनिकों के लिए समोसे आए। सना ने अगली देखभाल की तारीख दीवार के कैलेंडर में लिखी। उदारता पर भाषण नहीं हुआ। मशीन काम के लिए थी। जिस काम के लिए बचत हुई थी, पैसा आखिर वहाँ लगा था।
इकबाल क्रिकेट अब भी देखता था। घर में देखता। सना पढ़ रही हो तो आवाज़ कम कर देता। कुछ समय के लिए इतना काफी था। स्क्रीन पर मैच चलता रहता और उसे किसी कमरे में अपनी जगह माँगने की जरूरत नहीं पड़ती थी।
8
दूसरे समूह की शुरुआत सीढ़ियों की परेशानी से हुई।
स्टेशनरी की दुकान चलाने वाली फरीदा अपने पिता को क्षेत्रीय फाइनल का सार्वजनिक प्रसारण दिखाने ले जाना चाहती थी। उनकी व्हीलचेयर उस जगह की लिफ्ट में नहीं आती थी। आयोजक ने कहा, दो आदमी उठाकर पहुँचा देंगे।
पिता ने कहा, रेडियो सुन लूँगा।
गैराज में स्कूटर की ब्रेक लाइट ठीक होते समय फरीदा ने इकबाल से नीचे वाला हॉल पूछा। उसे नगरपालिका के वाचनालय का आँगन याद आया। शाम के कार्यक्रमों के लिए किराए पर मिलता था।
वे सना और फरीदा के पिता, मिस्टर डिसूज़ा, के साथ देखने गए। उन्होंने सबसे पहले बताया कि व्हीलचेयर वाला प्रवेश द्वार जंजीर से बंद है।
“सब रैंप दिखाते हैं। फिर उसके सामने मोटरसाइकिल खड़ी कर देते हैं।”
देखभाल करने वाले ने दरवाज़ा खोला। रास्ते की चौड़ाई देखी गई। शौचालय जाँचा। सार्वजनिक प्रसारण के लिए क्या अनुमति चाहिए, पूछा। जवाब जुटाने में दो हफ्ते लगे। वे पूछते रहे। केवल अच्छा इरादा लेकर तारीख घोषित नहीं की।
9
पहले कार्यक्रम में बावन लोग आए। उपकरण किराए के थे। प्रसारण की आवश्यक अनुमति का इंतज़ाम किया गया था। पास की दुकान वाला चाय बेच रहा था। किसी के नाम के आगे बड़ा पद नहीं था।
इकबाल ने आठ हज़ार दिए। इतनी रकम वह खर्च हो जाने पर सह सकता था। फरीदा ने हिसाब रखा। दरवाज़े के पास असली खर्च लगाया गया। थोड़ा पैसा बचा तो योगदान देने वालों की सहमति से अगले कार्यक्रम के लिए रखा।
गलतियाँ हुईं। पीछे वालों को स्क्रीन नीची लग रही थी। चाय की लाइन से शौचालय का रास्ता रुक गया। किसी ने स्पीकर मिस्टर डिसूज़ा की कुर्सी के पास रखा था।
उन्होंने तीनों की शिकायत की। दूसरे ओवर से पहले इकबाल ने स्पीकर हटाया। कार्यक्रम के बाद उन्होंने आने देने के लिए धन्यवाद नहीं कहा।
“अगली बार स्क्रीन ऊँची,” कहा।
इकबाल को वह बात अच्छी लगी। उसमें दोबारा आने का इरादा था। और यह उम्मीद भी कि वे अगली बार काम बेहतर करेंगे। उनके आने को एहसान मानने की जरूरत किसी को नहीं थी।
10
मैकेनिकों, दुकानदारों, अध्यापकों और बस चालकों के जरिए बात फैली। सब एक-दूसरे को नहीं जानते थे। यही मज़ा भी था।
मैच पर ऊँची आवाज़ में चर्चा होती। कभी बात लगाए गए पैसों और किसी अनजान आदमी की पक्की खबर तक पहुँचती। स्क्रीन के सामने भीड़ लगती तो फरीदा हटने को कहती। शाम केवल सबसे जोर से बोलने वाले की नहीं थी।
बुकिंग फॉर्म में नाम चाहिए था, इसलिए समूह का नाम कोर्टयार्ड क्रिकेट रखा गया। सना ने सीटों की साधारण सूची बनाई। उसमें आने-जाने की विशेष जरूरत लिखने की जगह थी, पेशा या पहचान लिखने की नहीं।
इकबाल ने योगदान देने वालों के लिए आगे दो सीटें रखने को कहा। मिस्टर डिसूज़ा ने पूछा, क्यों?
“उन्होंने पैसे दिए हैं।”
“टिकट लेने वालों ने भी दिए हैं।”
इकबाल जवाब देने लगा, फिर रुक गया। होटल का वही तरीका वह लगभग यहाँ ले आया था।
आगे का हिस्सा उन लोगों के लिए रखा गया जिन्हें साफ दिखाई देने या आसानी से आने-जाने की जरूरत थी। बाकी पहले आने के हिसाब से बैठे। इकबाल ने उस दिन पीछे से मैच देखा।
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होटल वाले खाने के छह महीने बाद अश्विन आया। गरमी में भी रिवरसाइड का ब्लेज़र पहने था। उसने सना से पूछा, प्रायोजक कहाँ बैठे हैं?
“जहाँ कुर्सी मिल गई।”
अश्विन हँसा। उसे लगा मज़ाक है।
ब्रेक में वह इकबाल को अलग ले गया। रिवरसाइड ने समय पर जमा रकम की पुष्टि नहीं की थी, इसलिए पुरानी जगह नहीं मिली। अगला प्रसारण दोनों समूह मिलकर कर सकते हैं? पुराना क्लब नाम और संपर्क लाएगा। आँगन वाले इंतज़ाम कर दें।
“अच्छा काम खड़ा कर लिया तुम लोगों ने।”
इकबाल ने देखा, दीपु कुर्सियों के नीचे से बच्चे की चप्पल निकाल रहा था।
“बैठक में प्रस्ताव लाओ।”
अश्विन का चेहरा कसा। “तुमसे बात कर रहा हूँ।”
“पता है। यह मेरा अकेले का नहीं है।”
यह सच था। पैसा और समय फरीदा ने भी दिया था, सना ने भी, उन लोगों ने भी जिनका नाम अश्विन नहीं जानता था। अपने पास अनुरोध आने की खुशी में इकबाल उनका काम किसी को नहीं सौंप सकता था। उसने अगली बैठक का समय बता दिया।
12
बैठक में अश्विन बैनर का नमूना लाया। बीच में रिवरसाइड का बड़ा चिह्न था। नीचे छोटे अक्षरों में कोर्टयार्ड क्रिकेट।
फरीदा ने बैनर अलग रखा। खर्च पूछा। रकम ऐसे प्रायोजक पर टिकी थी जिसका भुगतान तय नहीं था। अश्विन ने कहा, बीच का अंतर इकबाल कुछ समय के लिए भर दे।
एक पल को गैराज वाला पुराना दिन लौट आया। ठीक कार के पास परेशान खड़ा अश्विन। जरूरी होने की खुशी।
“मैं निजी उधार नहीं दूँगा,” इकबाल ने कहा।
अश्विन ने सबकी ओर देखा। “दोस्ती कारोबार बन जाए तो यही होता है।”
सना ने नोट्स खोले। शर्तें साधारण थीं। प्रस्तावित कार्यक्रम के हिसाब की स्वतंत्र जाँच होगी। खर्च का वादा करने से पहले रकम उपलब्ध होगी। टिकट वापसी की जिम्मेदारी साफ होगी। प्रवेश के नियम सबके लिए एक होंगे। अध्यक्ष किसी को पहचानता है या नहीं, उससे जगह तय नहीं होगी।
“मेरी जाँच करोगे?”
“कार्यक्रम की,” फरीदा बोली। “हमारी भी। हमारा हिसाब सामने है।”
इकबाल ने मेज़ पर रखे कागज़ देखे। किसी को खुश करने के लिए उस पर अपना नाम जोड़ने की जल्दी नहीं थी।
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अगले हफ्ते कोषाध्यक्ष मेहुल अकेला आया। क्लब इतना बड़ा खर्च नहीं उठा सकता था। मेहमाननवाज़ी कम करके, आँगन के मौजूदा इंतज़ाम में छोटा संयुक्त कार्यक्रम संभव था। वह कागज़ और साफ सवाल लाया था।
इकबाल को वह तुरंत अच्छा लगा। फिर खुद को याद दिलाया, आदमी अच्छा लगना और प्रस्ताव जाँचना अलग बातें हैं।
स्वतंत्र अकाउंटेंट ने कार्यक्रम का हिसाब देखा। दोनों समूहों ने उतना योगदान तय किया जितना उनके पास था। जरूरी रकम जमा हुई। किसका कौन सा काम होगा, लिखा गया। रिवरसाइड ने प्रवेश नियम स्वीकार किए। अंतिम बैनर पर दोनों नाम बराबर आकार में थे।
अश्विन अध्यक्ष बना रहा। न कोई नाटकीय निष्कासन हुआ, न उसकी दुनिया अचानक खत्म हुई। बस उसकी बात से अब अलग दरवाज़ा नहीं खुलता था।
प्रसारण की सुबह उसने चार अतिरिक्त मेहमानों के लिए इकबाल को फोन किया।
“बुकिंग वालों से पूछो। उन्हें पता है जगह कितनी बची है।”
फोन रखकर इकबाल गैराज की मजदूरी बाँटने लगा। शाम का कार्यक्रम जरूरी था। शनिवार का यह काम उससे पहले जरूरी था।
14
मैच से आधा घंटा पहले बारिश शुरू हो गई। पहले हल्की थी। फिर छज्जे से पानी आसान प्रवेश वाले रास्ते में बहने लगा। तार ढकने वाला किराए का कवर एक तरफ से उठ गया। बिजली वाले ने जाँच तक उपकरण बंद रखे।
लोग शिकायत करने लगे। अश्विन ने कहा, खास मेहमान अंदर बैठा दो, बाकी अपनी सुविधा से रुकें या जाएँ।
इकबाल के पास साथ वाले वाचनालय की चाबी थी। खराब मौसम के लिए वह पहले से तय था। उसमें आँगन से कम लोग आ सकते थे। सबको ठूँसना ठीक नहीं होता।
सना ने अंदर की क्षमता, जगह बदलने और पैसे वापस लेने का विकल्प बताया। कुछ लोग नाराज़ होकर चले गए। एक आदमी ने आयोजकों को निकम्मा कहा। इकबाल ने माफी माँगी और फरीदा के पास भेजा। वह वापसी दर्ज कर रही थी।
ठीक काम करने से हर कोई खुश नहीं होता।
मिस्टर डिसूज़ा छज्जे के नीचे रुके रहे। इकबाल ने कुर्सी छूने से पहले पूछा। रास्ता साफ होने पर वे सूखी ओर से अंदर गए। किसी को उन्हें उठाना नहीं पड़ा।
15
अश्विन के मेहमान आए तब कमरा लगभग भर गया था। उसने एक किशोर स्वयंसेवक से आगे की कुर्सी का बैग हटाने को कहा। बैग उस महिला का था जो बुजुर्ग माँ को शौचालय ले गई थी।
“ये सीट चाहिए,” अश्विन बोला।
लड़के ने इकबाल की ओर देखा।
इकबाल ने बताया कि लोग लौटने वाले हैं। पीछे तीन जगह थीं। एक अलग कुर्सी दीवार के पास थी। मेहमान वहाँ बैठ सकते थे। ठीक न लगे तो पैसे वापस मिलेंगे।
अश्विन ने उसकी कोहनी पकड़ी। “सबके सामने मत करो।”
इकबाल ने धीरे से हाथ छुड़ाया।
पास खड़े मेहमान ने कहा, पीछे ठीक है। दूसरे ने शौचालय पूछा। उन्होंने विशेष स्वागत नहीं माँगा था। अश्विन उनकी तरफ से माँग रहा था।
वह उनके पीछे आखिरी पंक्ति में चला गया। इकबाल ने महिला का बैग वापस ठीक जगह रखा। बीच का रास्ता देखा। माँ-बेटी लौटीं तो उन्हें अपनी कुर्सियाँ मिल गईं। उनके लिए कोई घोषणा नहीं हुई। बस उठने से पहले जो जगह थी, लौटने पर भी उनकी ही रही।
16
ब्रेक में अश्विन दरवाज़े पर आया। इकबाल रुके लोगों की गिनती में मदद कर रहा था।
“होटल वाली बात... तुम जानते हो मेरा वैसा मतलब नहीं था।”
इकबाल ने गिनती का पन्ना सना को दिया।
“बाहर छोड़ा था मुझे।”
“भीड़ थी।”
“माइक मिल गया था तुम्हें। एक कुर्सी भी मिल सकती थी।”
अश्विन ने अंदर देखा। स्क्रीन पर छूटे कैच की चर्चा थी। किसी ने आवाज़ बढ़ाने को कहा।
“क्या सुनना चाहते हो?”
इकबाल ने सोचा। महीनों पहले वह भाषण तैयार करता। अब चाय आ रही थी। दरवाज़े के पास फर्श पोंछना था। फरीदा को लौटाए टिकटों की आखिरी संख्या चाहिए थी।
“अगली बार कोई तुम्हारे दरवाज़े पर आए तो ठीक बात कहना।”
उसने कागज़ के कपों की गड्डी अश्विन को दी। वह झिझका, फिर अंदर ले गया।
यह काम की शुरुआत थी। इकबाल ने इसे माफी नहीं मान लिया। कप बाँटने से पुरानी रात बदल नहीं जाती थी। लेकिन उस समय सामने बैठे लोगों को चाय चाहिए थी, और अश्विन पहली बार बिना भाषण दिए कुछ काम कर रहा था।
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मैच के बाद पैसे दो बार गिने गए। कुर्सियाँ एक बार। बारिश के कारण रकम लौटाने से उम्मीद से कम बचा। तय सुरक्षित रकम से अंतर पूरा हो गया। आधी रात किसी को सबकी इज़्ज़त बचाने के लिए फोन नहीं करना पड़ा।
फरीदा कार लेने गई तो मिस्टर डिसूज़ा दरवाज़े के पास रुके। उन्होंने इकबाल के हाथ देखे। सुबह धोने के बाद भी नाखूनों के नीचे ग्रीस था।
“गैराज में काम है?”
“ठीक है।”
“अच्छा। हमारे चक्कर में उसे मत छोड़ना।”
आँगन खाली हुआ तो इकबाल को गेट के पास एक कुर्सी मिली। घुटने को आराम देने बैठ गया। अंदर सना और मेहुल उपकरणों की सूची देख रहे थे। दीपु आखिरी बैनर तह कर रहा था।
“अंदर आओ, पापा,” सना ने पुकारा। “खाना बचा है।”
“एक मिनट।”
वह उठा तो किसी ने रोका नहीं। किसी को उसके जूते पहचानने या नाम के आगे टिप्पणी पढ़ने की जरूरत नहीं थी। वह कुर्सी उठाकर अंदर ले गया। बाकी कुर्सियों के पास रखी। फिर बैठकर खाना खाने लगा।