मेरे शोक-संदेश में लिखा था कि मेरी कोई संतान नहीं थी।
मैंने वह पंक्ति दो बार पढ़ी। उसी समय मेरी बेटी अपनी टपकती पानी की बोतल के बारे में बता रही थी। बिस्तर पर रखे फोन से उसकी आवाज आ रही थी। लैपटॉप पर मेरी मौत की खबर खुली थी। कुछ सेकंड समझ नहीं आया कि ये दोनों चीजें एक ही कमरे में कैसे हो सकती हैं।
“पापा? सुन रहे हो?”
मैंने लैपटॉप बंद कर दिया।
“नीली बोतल या स्टील वाली?”
“बताया तो था।”
उसने बताया था। मैंने दोबारा बताने को कहा। बात पूरी होने के बाद भी फोन पर बना रहा। आखिर उसने पूछा, मम्मी से बात करनी है? मैंने हाँ कहा। लीला आई तो मैंने उससे कहा कि आज शाम अनु को मेरे नाम वाली कोई खबर मत देखने देना।
“अब क्या किया तुमने?”
कई बातों के लिए यह सवाल मुझसे बनता था। इस बात के लिए नहीं।
* * *
तीन हफ्ते पहले नागपुर में एक काँच के दरवाजे पर मेरा नाम लगा था। अजय देशमुख, मैच डेस्क। अक्षर मेरे साझेदार वीरेन ने लगवाए थे। आने वालों से कहता, अच्छी आवाज का अपना ठिकाना होना चाहिए।
मैं बारह साल से छोटे प्रसारकों के लिए क्रिकेट की कमेंट्री करता था। बारिश रुकी न हो तब भी समय कैसे भरना है, जानता था। मैदान के उस कर्मचारी को जानता था जो बाकी कैमरे चले जाने के बाद बात करता था। अपना काँच का दरवाजा खरीदने लायक कभी नहीं कमाया।
वीरेन ने खरीद दिया। पैसा कहाँ से आया, मैंने उतने सवाल नहीं पूछे जितने पूछने चाहिए थे।
हम पैसे लेकर मैच की चर्चाएँ और पहले से रिकॉर्ड किए कार्यक्रम बनाते थे। सट्टे की बातें हर जगह पीछा करतीं—टिप्पणियों में, चाय की दुकानों पर, उन संदेशों में जिनमें मेरी राय को गारंटी बनवाने की कोशिश होती। गारंटी देने से मना कर देता था। मेरी तस्वीर लगाकर सदस्यता बेचने वाली कंपनी के बारे में उतना सावधान नहीं रहा।
मैं बोलता था। वीरेन हिसाब देखता था। लीला को समझाते समय यह बँटवारा बहुत सुविधाजनक लगता था।
फिर हमारे दफ्तर में अनजान लोग भुगतान के कागज लेकर आने लगे। उन्होंने जिस चीज के लिए पैसे दिए थे, वह हम बेचते ही नहीं थे।
* * *
उनकी रकम सट्टे से जुड़े एक इंतजाम में गई थी। उसे चलाने वाले आदमी को वीरेन हमारा वितरण सहयोगी कहता था। प्रचार सामग्री में मेरी तस्वीर थी। एक दस्तावेज में ग्राहकों की बाकी रकम की जिम्मेदारी स्वीकार करने वाले बयान के नीचे मेरा नाम था।
मैंने उस पर हस्ताक्षर नहीं किए थे।
वीरेन ने कहा, वह बात बाद में देखेंगे। नीचे खड़े लोगों को पैसा चाहिए। कागजी बहस से और गुस्सा आएगा।
“उनसे बात करो। तुम्हें जानते हैं।”
मैंने बचत गँवा चुके लोगों के सामने कहा कि पता लगाऊँगा क्या हुआ है। एक आदमी ने पूछा, मेरी बेटी उन्हीं के पैसे से खाती है क्या? मैंने बेटी को बीच में न लाने को कहा। किसी ने सवाल के बिना मेरा जवाब रिकॉर्ड कर लिया।
शाम तक वह वीडियो हर जगह था जहाँ हमारे कार्यक्रम देखे जाते थे।
वीरेन ने मेरे निजी कारोबार के बारे में बयान जारी किया। दफ्तर में मेरा प्रवेश बंद हो गया। जाँच होने तक दो जगह से कमेंट्री का काम रद्द कर दिया गया। काँच का दरवाजा वहीं रहा। मेरे नाम पर कागज चिपक गया।
* * *
लीला एक वीडियो देखकर घर से नहीं गई थी। वह तब गई जब मैंने बताया कि दो महीने पहले उसे बिना बताए घर की बचत स्टूडियो चलाने में लगा दी थी।
“कितने?”
मैंने सही रकम बताई। बासठ हजार रुपये।
उसने पूछा, बताने का इरादा कब था? मैं अटके हुए बिल की बात समझाने लगा। मेरी सफाई खत्म होने से पहले उसने कपड़े बैग में रख लिए।
वह अनु को लेकर अपनी बहन के घर गई। मैं स्टेशनरी की दुकान के ऊपर वाले कमरे में रहने लगा, ताकि पुराने घर का मालिक रोज अनजान लोगों को जवाब न देता रहे। वर्धा से माँ का फोन आया। पूछा, चूड़ियाँ बेच दें क्या?
मैंने जरूरत से ज्यादा तीखी आवाज में मना किया। फिर माफी माँगी। फिर उन्होंने पूछने के लिए माफी माँगी।
वही सबसे बुरा लगा। जिन्हें मैंने दुख दिया था, उनकी आवाज से लगने लगा था कि उन्होंने मुझे तकलीफ पहुँचा दी है।
* * *
पहला विदाई संदेश मंगलवार को आया।
पुराने सहकर्मी ने भेजा था। उसके पहले की सोलह कॉल छूटी हुई थीं। संदेश ऐसा लिखा था जैसे मैं आखिरी बयान दे रहा हूँ। कर्ज अपने ऊपर ले रहा हूँ और लोगों से वीरेन को दोष न देने को कह रहा हूँ।
उस समय मैं बेसिन के ऊपर झुककर केला खा रहा था। कमरे में चींटियाँ थीं।
कई वाक्य मैंने कभी लिखे ही नहीं थे। एक में परिवार से संपर्क न करने की विनती थी। खाते का नाम मेरे नाम जैसा था। तस्वीर उस प्रसारण की थी जिसमें काम करके मुझे सच में अच्छा लगा था।
मैंने सहकर्मी को फोन किया। फिर माँ को। फिर लीला को। दोपहर यह साबित करने में गई कि मैं फोन उठाने के लिए मौजूद हूँ।
वीरेन ने एक बार फोन किया।
“बात शांत होने तक तुम्हें चुप रहना चाहिए।”
“कोई मेरे नाम से संदेश लिख रहा है।”
“लोग तुम्हारी चिंता कर रहे हैं। उन्हें और परेशान मत करो।”
मैंने कॉल बंद की और संदेश सुरक्षित कर लिया। उस रात अकेले कमरे में लौटने के बजाय पुराने साउंड इंजीनियर के यहाँ रुका। पास ऐसा कोई चाहिए था जो सीधे सवाल का सीधा जवाब दे।
* * *
शोक-संदेश गुरुवार सुबह मिला। भेजने वाली कॉपी संपादक फरजाना थीं। वह कई प्रकाशनों के लिए स्वतंत्र रूप से काम करती थीं। वीरेन का मैच समाचारपत्र भी उनमें था।
उन्हें गोपनीय बताए गए निर्देशों के साथ घोषणा तैयार करने को कहा गया था। लौटाने से पहले उन्होंने मेरा नाम खोजा। मेरा हाल का सार्वजनिक बयान मिला, जिसमें मैंने जिंदा होने और आरोपों का विरोध करने की बात कही थी।
उनका छोटा-सा संदेश आया—अभी बात कर सकते हैं?
मैंने फोन उठाया तो वह इतनी देर चुप रहीं कि मुझे उनकी रसोई के कुकर की आवाज सुनाई दी। फिर उन्होंने मसौदा भेज दिया।
उसमें मैं परेशान आदमी था। वीरेन ने हर संभव सहायता दी थी। पैसों की पूरी जिम्मेदारी स्वीकार करने वाला मेरा कथित बयान फिर लिखा था। कंपनी परिवार की निजता का सम्मान करने वाली थी।
नीचे निर्देश था कि रविवार के अंतिम मैच के प्रसारण के लिए सामग्री तैयार रखी जाए।
कोई संतान नहीं।
वीरेन अनु के सातवें जन्मदिन पर आया था। केक के दो टुकड़े खाए थे।
* * *
मैं दस्तावेज हर जगह डाल देना चाहता था। फरजाना ने कहा, पहले कोई जाँच ले कि उनके पास किस तरह आया है।
“वे कहें आपने खुद बनाया, तब क्या दिखाएँगे?”
सवाल बुरा लगा क्योंकि सही था।
एक पत्रकार पर भरोसा था कि वह मेरी बातों पर भी इतनी सख्ती करेगी कि कुछ छूटेगा नहीं। कविता राव। छह महीने पहले उसने हमारे अनाम कारोबारी साझेदारों पर सवाल उठाए थे। मैंने प्रसारण में उसकी रिपोर्ट को सस्ती चर्चा पाने की कोशिश कहा था।
फोन उठाते ही उसने पूछा, “माफी माँगनी है या खबर देनी है?”
“दोनों।”
“एक का इस्तेमाल दूसरे के लिए कर रहे हो?”
मैं बिस्तर के किनारे बैठ गया।
“अभी पता नहीं।”
उसने कहा, फाइलें लेकर आओ। अभिनय घर छोड़ आना।
* * *
उसका दफ्तर छपाई के कारोबार के पीछे दो कमरों में था। पंखा हर चक्कर पर एक बार खटखटाता था। महँगे स्टूडियो में जाते समय भी मुझे इतना डर नहीं लगा था।
कविता ने घर के पैसों से शुरुआत की। कहा, अपनी करतूत छिपाई तो वह काम रोक देगी। मैंने बासठ हजार बताए। उसने लिखा। फिर पूछा कि कौन-से कागज को गलत कह रहा हूँ और कौन-से भुगतान मुझे खुद मिले हैं।
चार घंटे रिकॉर्ड देखते रहे। कार्यक्रमों में मेरी आवाज थी। कंपनी के कागजों में मेरा नाम था। यह सच था। ग्राहकों को दी गई गारंटी मेरी नहीं थी। सट्टे की रकम इकट्ठी करने वाला खाता मेरे नियंत्रण में नहीं था।
कविता ने मुझे निर्दोष घोषित नहीं किया। फरजाना, कंपनी के हिसाब रखने वाले व्यक्ति और मूल भुगतान संबंधी बातचीत सुरक्षित रख चुके दो ग्राहकों से संपर्क किया।
मैं बताने लगा कि वीरेन की नीयत जरूर क्या रही होगी। कविता ने हाथ उठाया।
“जो हुआ है वह बताओ। अंदाजे बाद में सुन लूँगी।”
* * *
हिसाब देखने वाले सुरेश पिछले महीने नौकरी छोड़ चुके थे। मेरी याद में वह रसीदों पर परेशान करने वाले सवाल पूछने वाले आदमी थे। कपड़े का थैला लेकर आए और चाय से मना कर दिया।
एक बार मैंने उनसे कहा था कि गायब बिल को लेकर प्रायोजक की बैठक खराब न करें। अब वही मेरे सामने बैठकर अपने काम से संबंधित सुरक्षित रिकॉर्ड निकाल रहे थे।
भुगतान का क्रम वीरेन की बात से मेल नहीं खाता था कि मैंने पूरी तरह अलग धंधा चलाया। निर्देश दफ्तर से गए थे। कई ग्राहकों के सवाल वीरेन तक पहुँचे थे। जवाब भी उसने दिए थे। विवाद सार्वजनिक होने से पहले सुरेश लिखकर आपत्ति कर चुके थे।
इससे हर ग्राहक का दावा सही नहीं हो गया। हर कानूनी सवाल का उत्तर भी नहीं मिला। लेकिन जाँच के लिए ऐसी जगहें मिलीं जो मेरी बेटी का स्कूल या माँ का दरवाजा नहीं थीं।
सुरेश ने आखिर चाय ले ली। मैंने उनके हिसाब रखने के स्वभाव को मजेदार किस्से में बदलना चाहा। वह नहीं हँसे।
“मेरा काम था,” उन्होंने कहा।
* * *
शुक्रवार को कविता मुझे वकील के पास ले गई। फिर शिकायत की प्रक्रिया के अनुसार सामग्री जमा करते समय साथ रही। मैंने बयान दिया, प्राप्ति के कागज सँभाले और मूल रिकॉर्ड दे सकने वालों के नाम बताए।
अधिकारी ने दोपहर से पहले गिरफ्तारी का वादा नहीं किया। मैंने माँगा भी नहीं।
पुराने नियोक्ताओं को भी इतनी जानकारी दी कि विदाई संदेश के झूठे होने की पुष्टि कर सकें। एक ने सार्वजनिक निलंबन सूचना हटा ली, लेकिन काम अभी रोके रखा। दूसरे ने समय माँगा।
उसी दोपहर साझा मित्र के जरिए वीरेन का प्रस्ताव आया। तत्काल खर्च के लिए कुछ पैसे मिल सकते थे। बदले में निजी जिम्मेदारी स्वीकार करनी थी और सार्वजनिक रूप से बोलना बंद करना था।
मित्र ने अनु के बारे में सोचने को कहा। मैंने प्रस्ताव लिखकर भेजने को कहा। बोला, पुराने दोस्तों में औपचारिकता की क्या जरूरत है?
मैंने कहा, अब काफी जरूरत है।
* * *
अंतिम मैच रविवार को था। एक स्वतंत्र प्रसारक की मैच कवरेज के आसपास वीरेन ने स्टूडियो का कार्यक्रम प्रायोजित किया था। उसमें आर्थिक विवाद पर कंपनी का पक्ष समझाने वाला था।
कविता ने प्रसारक के संपादक से संपर्क किया। मुझे मंच पर धावा बोलने देने को नहीं कहा। अपनी संस्था से जाँचे गए प्रमाण और वीरेन से पूछे जाने वाले सवाल दिए।
संपादक ने कार्यक्रम बदला। प्रायोजित हिस्से से पहले विवाद पर छोटा साक्षात्कार रखा गया। वीरेन को आरोप और उत्तर देने का अवसर मिला। उसने हामी भरी और जोर देकर कहा कि मैं नहीं आऊँगा। बीमार हूँ, संपर्क नहीं हो सकता।
वह जवाब आया तो मैं कविता के पास बैठा था।
उसने पूछा, शामिल होना चाहता हूँ? संपादकीय नियंत्रण के लिए प्रसारण में थोड़ा विलंब रहेगा। दस्तावेजों की निजी जानकारी छिपाई जाएगी। इंतजार के समय साथ रहने के लिए किसी को ला सकता हूँ।
मैंने लीला से पूछा। उसने कहा, आएगी, लेकिन टेलीविजन की इमारत में शादी के बारे में बात नहीं करेगी।
मैंने कहा, नहीं करेंगे।
* * *
रविवार चार बजकर चालीस मिनट पर स्वागत कक्ष में बताया गया कि मेहमानों की पहली सूची में मेरा नाम नहीं है।
मुझे हँसी आने लगी। पूरा हफ्ता उन कागजों में मौजूद रहा जहाँ होना नहीं चाहिए था। अब तय मुलाकात पर पहुँचा तो गायब था।
निर्माता नीचे आईं। पहचान देखी। आगंतुक का बैज दिया। पानी चाहिए क्या, पूछा।
स्टूडियो के बंद दरवाजे के पीछे से वीरेन की आवाज आई। जवाब का अभ्यास कर रहा था। चिंता जताने वाली उसकी आवाज कमाल की थी। उसी आवाज के भरोसे पहले मैंने अपना माइक दिया था, फिर नाम, फिर जरूरत से ज्यादा चुप्पी।
लीला ने आस्तीन छुई।
“कॉलर मुड़ा है।”
उसने मेरे लिए सीधा नहीं किया। मैंने खुद किया। निर्माता ने दरवाजा खोल दिया।
* * *
मुझे देखकर वीरेन बीच वाक्य में रुक गया।
संचालक नंदिता ने दोनों का परिचय दिया। साफ किया कि चर्चा विवादित आर्थिक दावों, झूठे विदाई बयान और तैयार घोषणा पर है। अदालत का कोई फैसला नहीं सुनाया जा रहा।
वीरेन आगे झुका।
“सबसे पहले, खुशी है कि अजय को जरूरी मदद मिल रही है।”
“मैं सवालों के जवाब देने आया हूँ,” मैंने कहा।
नंदिता ने पूछा, कर्ज स्वीकार करने वाला कथित बयान उसने फैलाया था? बोला, दफ्तर को मिला था और सच समझ लिया गया।
मुझसे पुष्टि कब की?
बोला, मुझसे संपर्क मुश्किल था।
मॉनिटर पर उस कॉल का रिकॉर्ड आया जो झूठा बयान फैलने के बाद उसने मुझे किया था। बातचीत में क्या कहा गया, उस पर विवाद था। बातचीत हुई थी, इस पर नहीं।
नंदिता ने इंतजार किया।
“कठिन बातचीत थी,” उसने कहा।
“किसी जिंदा व्यक्ति से हुई थी?”
“जाहिर है।”
वह अगले सवाल पर गईं।
* * *
फरजाना ने अपने काम के बारे में नाम के साथ बताने की अनुमति दी थी। उनका बयान चलाया गया। फिर मिले हुए निर्देशों के जाँचे गए हिस्से दिखाए गए।
वीरेन ने शोक-संदेश को एहतियातन तैयार मसौदा कहा।
नंदिता ने पूरी जिम्मेदारी मेरे स्वीकार कर लेने वाला वाक्य पढ़ा। पूछा, इसकी पुष्टि किस स्रोत से हुई थी?
वह दबाव और अनिश्चितता की बात करने लगा। नंदिता ने फिर पूछा।
उसने कहा, लिखने वाली से गलतफहमी हुई होगी।
फरजाना का मसौदा और उन्हें दिए निर्देश अलग-अलग रिकॉर्ड थे। विवादित दावा निर्देशों में पहले से था। नंदिता ने आवाज ऊँची किए बिना यह बात रख दी।
परिचय के बाद पहली बार वीरेन ने मुझे देखा। प्रायोजकों की बैठकों वाला पुराना इशारा था—चुप्पी भर दो, असुविधाजनक हिस्सा निकाल दो।
मैंने पानी का गिलास उठा लिया।
उसे अपना जवाब खुद देना पड़ा।
* * *
“यह जानता है कि मैं इसे बचा रहा था,” वीरेन बोला।
नंदिता ने पूछा, मेरी मौत की घोषणा से मैं कैसे बचता?
उसने सुधार किया। घोषणा की नहीं थी। तैयार की थी। फिर बोला कि किसी ने दफ्तर को बुरी खबर के लिए तैयार रहने को कहा था।
“किसने?”
वह कैमरे से बाहर जवाब देना चाहता था। संपादक ने अतिरिक्त प्रमाण अलग से लेने की सहमति दी। नंदिता ने स्पष्ट किया कि मसौदे के दावों की पुष्टि करने वाला कोई स्रोत अभी नहीं दिया गया है।
फिर ग्राहकों के पैसे पर बात हुई। रिकॉर्ड में निर्देश कंपनी के रास्ते जाते दिखे। सुरेश की पहले की आपत्तियाँ सामने रखी गईं। वीरेन अब यह नहीं कह सकता था कि मेरे गायब होने के बाद ही उसे कारोबार का पता चला।
“मैं गायब नहीं हुआ हूँ,” मैंने कहा।
इस बार मेरे वाक्य के आखिरी शब्द पर कोई और नहीं बोला।
* * *
साक्षात्कार के बाद कंपनी का तय प्रचार प्रसारित नहीं किया गया। संपादक ने समीक्षा पूरी होने तक कारोबारी समझौता रोकने की घोषणा की।
स्टूडियो के बाहर वीरेन मुझे खाली कमरे में ले जाना चाहता था।
“अभी भी आपस में निपटा सकते हैं।”
कविता रिकॉर्डर रख रही थी। लीला लिफ्ट के पास थी।
“अपना जवाब जाँच करने वालों को भेज सकते हो,” मैंने कहा।
उसने आवाज नीची की।
“लगता है वे तुम्हारी जिंदगी वापस कर देंगे?”
मेरा बैज उलट गया था। जवाब देने से पहले उसे सीधा किया।
“तुम्हें उसे लिखने का हक नहीं मिलेगा।”
लिफ्ट खुली। क्लिप से उलझते देखकर लीला ने दरवाजा रोके रखा।
* * *
प्रसारण से घर की बचत में बासठ हजार वापस नहीं आ गए। हर अनजान आदमी ने माफी भी नहीं माँगी। कुछ लोगों के लिए पूरा झगड़ा मनोरंजन था। पूछते थे, दूसरा भाग कब आएगा?
लेकिन इस बार मेरे चेहरे के साथ सुधार भी पहुँचा। प्रसारक ने साक्षात्कार और साफ सूचना प्रकाशित की कि विदाई बयान झूठा था और किसी सत्यापित मृत्यु समाचार का अस्तित्व नहीं था। पुराने नियोक्ताओं को नाटकीय टुकड़े के बजाय मूल सामग्री मिली।
एक ने अगले महीने छोटे घरेलू मैच के लिए मुझे फिर काम दिया। फीस सामान्य थी। समझौते पर खुद हस्ताक्षर किए। घर का पैसा लौटाने के लिए बनाई योजना की प्रति लीला को भेजी।
उसने दो तारीखें बदलने को कहा। दोनों मान लीं।
कविता की अगली रिपोर्ट में साबित बातें और जाँच में बाकी सवाल अलग थे। फरजाना के रिकॉर्ड झूठा विवरण पहले से तैयार किए जाने के प्रमाण थे, इंटरनेट पर लोगों की हर कल्पना के नहीं। आर्थिक मामले की जाँच जारी रही।
अपनी समीक्षा के बाद प्रसारक ने वीरेन का कारोबारी अनुबंध खत्म कर दिया। आर्थिक मामले का परिणाम आने से पहले मुझे भुगतान वाला काम वापस मिल गया।
* * *
अगले मैदान पर साउंड तकनीशियन ने दस तक गिनने को कहा। मैंने गिना। उसने तार ठीक किया और फिर गिनने को कहा। कई हफ्तों में पहली बार किसी का टोकना इतना अच्छा लगा।
बीच के समय में अनु को फोन किया। मौसी की मदद से टपकती बोतल का वॉशर बदल लिया था। पूछ रही थी, शनिवार आ सकता हूँ? दिखाएगी कि ठीक कैसे की।
वादा करने से पहले काम की सूची देखी।
“दोपहर के खाने के बाद।”
“भूलना मत।”
मैच के समय के नीचे लिख लिया। तकनीशियन ने वापस आने का इशारा किया। हेडसेट लगाया। जानी-पहचानी हल्की खरखराहट सुनी। संकेत का इंतजार किया।
फिर सुनने वालों को बताया कि माइक पर कौन है।