1. 8IPL: उसकी कुर्सी पर रखा लिफाफा
लिफाफे में घर की अतिरिक्त चाबी, तीन तस्वीरें और उन अभ्यास शामों की सूची थी जिनमें अब देविका के आने की जरूरत नहीं समझी गई थी।
माधवी ने वह लिफाफा उसी कुर्सी पर रखा था जहाँ देविका हमेशा बैठती थी। कैरम बोर्ड के आसपास उनके दोस्त अगले सीजन की चर्चा कर रहे थे। देविका ने लिफाफा खोला तो एक महिला बोलते-बोलते रुक गई। बाकी लोग मेज पर रखी चीजें ठीक करने लगे।
बीस साल से माधवी उस चाबी से देविका का दरवाजा खोलती आई थी। उसके घर खाना खाया था, किताबें माँगी थीं, झगड़ों के बाद वहीं बैठकर रोई थी। अब वह देविका को उँगलियों के बीच चाबी घुमाते देख रही थी।
“तुमने कहा था कि मेरे भाई की मदद नहीं कर सकती,” माधवी बोली। “हम भी तुम्हारी मदद के बिना काम चला लेंगे।”
देविका ने उसके भाई को अपनी बचत उधार देने से मना किया था। पति की लंबी बीमारी और मृत्यु के बाद यही बचत बची थी। वह पचास की थी, सामुदायिक नर्स का काम करती थी और अपने वयस्क बेटे रोहन के साथ किराए के दो कमरों में रहती थी। माधवी का भाई कारोबार बढ़ाने के लिए पैसा चाहता था। देविका ने अकेले में मना किया था।
माधवी ने उसका जवाब सबके सामने रख दिया था।
किसी ने कहा कि अब अभ्यास शुरू करना चाहिए। देविका के लिए जगह बनाने को कोई नहीं हिला।
उसने तस्वीरें वापस रख दीं। एक में उसके पति इसी बोर्ड के पास हँस रहे थे। माधवी ने वह भी लौटा दी थी।
देविका बैग उठाकर चली गई।
घर पर रोहन ने पूछा कि खेल कैसा रहा। उसने लिफाफा मेज पर रखा। जवाब नहीं दे सकी।
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2. 8IPL की कहानी: अधूरा छोड़ा गया संदेश
अगले हफ्ते क्लब के समूह में देविका के संदेश का छोटा किया हुआ हिस्सा घूमने लगा। वह ठीक उस वाक्य के बाद खत्म हो जाता था जिसमें उसने कर्ज देने से मना किया था। घर की बचत के बारे में लिखी वजह गायब थी।
माधवी ने साथ लिखा कि जरूरत के समय कौन साथ खड़ा रहता है, यह याद रखना चाहिए।
काम के बीच मिले विराम में देविका ने संदेश पढ़ा। फिर उसके नीचे के जवाब देखे। कुछ में सिर्फ समर्थन के निशान थे। कुछ लोगों ने क्लब पर माधवी के किए उपकार गिनाए थे। देविका का मना करना ही पूरी बातचीत बन गया था।
उसने लंबा जवाब लिखा और मिटा दिया। फिर छोटा जवाब लिखा। जिन समिति सदस्यों को अधूरा संदेश दिखाया गया था, उन्हें मूल माँग सहित पूरी बातचीत भेज दी।
दो सदस्यों ने माना कि उन्होंने पूरा संवाद नहीं देखा था। अध्यक्ष ने साफ किया कि निजी उधार का प्रतियोगिता में प्रवेश से संबंध नहीं है। देविका खुली प्रतियोगिताओं में खेलने की पात्र थी।
खेलने का अधिकार स्पष्ट हो गया। परिचित अभ्यास बोर्ड के पास उसकी सहज जगह वापस नहीं आई।
अगली मुलाकात में माधवी ने मुस्कराकर कहा कि किसी ने उसे खेलने से रोका ही कब था। वह मुस्कान जैसे सबको कुर्सी पर रखा लिफाफा भूलने का निमंत्रण दे रही थी।
देविका ने उस कुर्सी को देखा जिस पर अब किसी और का बैग रखा था। सचिव से सीजन की तारीखें पूछीं, लिखीं और बाहर आ गई।
बाहर दीवार पर शहर के दूसरे हिस्से के हॉल में शाम को खेलने की सूचना लगी थी। बस से आने-जाने में चालीस-चालीस मिनट लगते। हवा ने कागज मोड़ दिया। उसने उसे सीधा करके तस्वीर ले ली।
3. ऐसा बोर्ड जहाँ कोई उसका इंतजार नहीं कर रहा था
दूसरे हॉल में कैरम बोर्ड था, अलग-अलग ऊँचाई की कुर्सियाँ थीं और ऐसे खिलाड़ी थे जिनका पहला सवाल था कि देविका दूसरा गेम खेलने तक रुक सकती है या नहीं।
उस शाम वह नहीं रुक सकती थी। अगली सुबह काम जल्दी शुरू होता था। उसने एक गेम खेला, हारी और अगले सत्र की तारीख लिख ली।
कई हफ्तों तक अभ्यास काम के बीच बची जगह में समाता रहा। एक दिन पहुँची तो बोर्ड रखा जा रहा था। दूसरी बार यात्रा से पहले खाना भूल गई। आखिरी बोर्डों में ध्यान गोटियों की जगह खाने पर जा रहा था। उसने भोजन साथ रखना और घर से निकलने से पहले समय जाँचना शुरू किया।
उसका खेल परिचित सतह पर बहुत निर्भर था। पुराने क्लब के बोर्ड पर उसे मालूम था कि हल्का स्ट्रोक कितनी दूर जाएगा। दूसरे बोर्ड पर वही हरकत गोटी को जरूरी संपर्क से आगे निकाल देती या उससे पहले रोक देती।
उसने गलत स्ट्रोक के बाद की बारी पर ध्यान देना शुरू किया। पहले वह अगला मौका जल्दी खेलती, जैसे दो तेज सफलताएँ पिछली गलती मिटा देंगी। सैंतीस साल की तारा ने उसी जल्दबाजी का इंतजार करके उसे दो बार हराया।
दूसरे गेम के बाद तारा ने कहा, “तुम उस बोर्ड को खेलती रहती हो जो चाहती थीं। सामने अब यह वाला है।”
उन्होंने गोटियाँ फिर लगाईं और उपलब्ध रास्ते देखे। तारा ने उसे आसान जीत नहीं दी। दोबारा खेले तो वह गेम भी तारा ने जीता।
अगले हफ्ते देविका खाना लेकर आई। सही समय उसके पास था। नोटबुक में उन स्थितियों का अलग पन्ना था जिन्हें उसने पिछली बार गलत पढ़ा था।
4. एक नहीं, चार स्ट्रोक
घर पर देविका उधार लिए बोर्ड पर अभ्यास करती थी। रोहन उसे बराबर टिकाने में मदद करता। रात के खाने के बाद बोर्ड लगाया जाता। सुबह दोनों में से किसी के काम पर जाने से पहले रख दिया जाता।
उसने अभ्यासों को काम के अनुसार बाँटा। एक में कुशन के पास पतला संपर्क चाहिए था। दूसरे में क्वीन की उपयोगी दिशा एक गोटी से बंद थी। तीसरे में कवर की गोटी निकालनी थी, लेकिन स्ट्राइकर को खतरनाक पॉकेट की तरफ नहीं भेजना था।
रोहन खाली होता तो कुछ सत्र रिकॉर्ड कर देता। वह उनतीस का था। नियम समझता था, लेकिन खुद को उसका प्रशिक्षक नहीं बताता था। कभी बस इतना कहता कि स्ट्राइकर पिछली कोशिश से ज्यादा दूर रुका है।
देविका ने वह फर्क खुद लिखना शुरू किया।
पहला स्ट्रोक सफल होने पर अभ्यास खत्म नहीं होता था। बची गोटियों को उनकी जगह रहने देती और अगला रास्ता खेलती। क्वीन निकालने के लिए बाद के कवर का मौका बिगड़ता, तो पूरी स्थिति फिर लगाकर दूसरा क्रम चुनती।
काम की रफ्तार इतनी धीमी थी कि झुँझलाहट होती। मंगलवार को सफल हुआ क्रम गुरुवार को विफल हो जाता, क्योंकि ताकत थोड़ी बढ़ गई थी। हॉल के तेज बोर्ड पर वही अभ्यास दोहराती तो फिर बदलाव करना पड़ता।
एक रात कई सही स्ट्रोकों के बाद आखिरी आसान सफेद चूक गई। रोहन ने गोटियाँ समेटने के लिए हाथ बढ़ाया।
“रहने दो,” उसने कहा।
उसे देखना था कि उस साधारण आखिरी स्ट्रोक में क्या हुआ था। बाकी सफलताओं के बीच छिपाने के बजाय उन्होंने पहले उस चूक को देखा। फिर बोर्ड रखा।
5. पहली वापसी
देविका क्वालिफाइंग प्रतियोगिता खेलने पुराने हॉल लौटी। जिस कुर्सी पर लिफाफा रखा गया था, वह अब पंजीकरण की मेज के पीछे थी। उसने हस्ताक्षर किए। परिचित अभ्यास बोर्ड के आसपास दूसरी जगह खोजने नहीं गई।
माधवी ने इतनी ऊँची आवाज में अभिवादन किया कि पास के लोग सुन सकें। बोली कि अच्छा हुआ देविका ने आखिर गलतफहमी पीछे छोड़ दी।
देविका ने अधिकारी को प्रवेश की पुष्टि दिखाई। “मेरा पहला मैच कितने बजे है?”
ड्रॉ में तुरंत माधवी से मुकाबला नहीं था। उनके रास्ते मिलने से पहले तीन दूसरे खिलाड़ियों को खेलना था। देविका अपना दूसरा मैच हार गई। घर लौटती बस में वह ऐसी गलती देख रही थी जिसका माधवी से कोई संबंध नहीं था।
कुछ देर के लिए यह सार्वजनिक मुस्कान से भी ज्यादा चुभा। उसने कल्पना की थी कि लौटकर इतनी बड़ी जीत हासिल करेगी कि पूरा कमरा उसकी ओर मुड़ जाएगा। सामने दूसरे खिलाड़ी ने बेहतर खेला था। नतीजे की शीट पर वही लिखा था।
वह फिर अभ्यास में गई। तारा ने कहा कि पहले गोटियाँ लगाओ, फिर बताना कि क्या करना चाहती थीं। उन्होंने वह बिंदु खोज लिया जहाँ उपयोगी सफेद गोटी को बाद के लिए बचाना चाहिए था।
अगली प्रतियोगिताओं में देविका की स्थिति सुधरी। शहर के कप में जगह पाने के लिए जरूरी क्वालिफाइंग अंक उसने जुटा लिए। प्रकाशित मुकाबला सूची में माधवी उसके हिस्से में थी। तारा दूसरी तरफ थी।
देविका ने काम वाले कैलेंडर में तारीखें लिखीं और पहले से ड्यूटी का इंतजाम किया। इस बार क्लब के संदेश देखने से पहले खेलने का सामान पैक किया।
6. सामने बैठी महिला
सेमीफाइनल में माधवी ने स्ट्राइकर रखते हुए पूछा कि क्या देविका को अब भी पुराने क्लब का बोर्ड ही अच्छा लगता है।
“दोनों के लिए एक ही बोर्ड है,” देविका ने कहा।
अंपायर ने खेल शुरू कराया।
माधवी अच्छी खिलाड़ी थी। वह देविका की पुरानी आदतें जानती थी। शुरुआती दौर में एक का फायदा भी लिया। देविका ने परिचित कोण छोड़ा और माधवी ने वह रास्ता पूरा किया जिसकी तैयारी साथ खेले बरसों में हुई थी।
देविका ने उस बोर्ड का स्कोर दर्ज होने दिया। अगले बोर्ड में दूसरा क्रम चुना। भीड़ वाला हिस्सा खोलने से पहले उपलब्ध सफेद गोटी ली। उससे बना रास्ता कम दिखावटी और ज्यादा उपयोगी था।
पहला गेम देविका ने पच्चीस-उन्नीस से जीता।
दूसरे गेम में माधवी ने पलटकर दबाव डाला। दो बार खराब स्थिति से अच्छी वापसी की। दर्शक इतने करीब आए कि अंपायर को खेलने की जगह खाली कराने को कहना पड़ा।
देविका को पुराने दोस्तों में से किसी की फुसफुसाहट सुनाई दे रही थी। उसने स्ट्राइकर रख दिया और कमरा शांत होने का इंतजार किया। फिर आवाज की तरफ मुड़ने के बजाय अगला संपर्क देखा।
दूसरा गेम उसने पच्चीस-तेईस से जीता। मैच दो गेम में खत्म हो गया।
अंक जाँचे जा रहे थे तब माधवी बैठी रही। देविका ने हस्ताक्षर किए, हाथ मिलाया और स्ट्राइकर रखा।
किसी ने पूछा कि पुराने समूह के साथ तस्वीर खिंचवाना चाहती है क्या।
“मेरा फाइनल बाकी है,” उसने कहा।
हॉल के दूसरे हिस्से में तारा भी अपना सेमीफाइनल जीत चुकी थी।
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7. वह प्रतिद्वंद्वी जो अभ्यास जानती थी
पुराने क्लब के किसी भी व्यक्ति से ज्यादा तारा देविका का बदला हुआ खेल जानती थी। उसने स्ट्रोक का नया क्रम बनते देखा था। अभ्यास में उसे कई बार हराया भी था।
फाइनल का पहला गेम तारा ने पच्चीस-अठारह से जीता।
देविका को उससे कोई निजी अपमान चुकाना नहीं था। सामने मुश्किल खिलाड़ी थी, एक गेम जा चुका था और अगले गेम को बेहतर बनाने का मौका था।
अंतराल में देविका ने साथ लाए खाने में से थोड़ा खाया। रोहन अपना काम समाप्त करके पहुँच चुका था। उसने पानी के लिए पूछा और बाकी समय देखती माँ के पास इंतजार किया।
दूसरे गेम में देविका ने सिर्फ इसलिए स्थिति खोलना बंद किया कि उसे कोई हमलावर रास्ता दिखाई दे रहा था। पहले देखती कि स्ट्रोक विफल हुआ तो तारा की कौन-सी गोटियाँ उपलब्ध हो जाएँगी। कई बार छोटा विकल्प चुना और नया रास्ता बनाने की मेहनत तारा पर छोड़ी।
देविका पच्चीस-इक्कीस से जीती।
निर्णायक गेम नजदीक रहा। दोनों ने बोर्ड जीते। तारा की अच्छी वापसी ने देविका की शुरुआती बढ़त मिटा दी। देविका ने साफ तरीके से एक बोर्ड समाप्त करके जवाब दिया। कमरे की दोनों तरफ से तालियाँ आईं।
छह बोर्डों के बाद तारा इक्कीस-बीस से आगे थी। गेम पच्चीस अंक या आठ बोर्ड की सीमा पर समाप्त होना था।
सातवें बोर्ड में तारा ने क्वीन पॉकेट की। अगले स्ट्रोक में कवर की कोशिश काली गोटी के किनारे से लगी, लेकिन गोटी अंदर नहीं गई।
क्वीन वापस रखी जानी थी। देविका ने अंपायर को उसे सही जगह रखते देखा और अपनी बारी शुरू होने का इंतजार किया।
8. उसने क्वीन को इंतजार करने दिया
देविका की तीन सफेद गोटियाँ बची थीं। तारा की दो काली। देविका इसी बोर्ड में पहले अपनी गोटियाँ निकाल चुकी थी, इसलिए लौटी हुई क्वीन लेने की पात्र थी।
क्वीन साफ दिख रही थी। आकर्षक भी थी और कठिन भी। उसकी उपयोगी दिशा के पास एक सफेद गोटी थी जो जरूरी संपर्क सीमित कर रही थी। क्वीन को अभी जबरदस्ती लेने पर स्ट्राइकर उस गोटी को बिगाड़ सकता था जिसकी बाद में कवर के लिए जरूरत पड़ती।
पहला स्ट्रोक तैयार करते हुए देविका ने पीछे किसी की साँस रुकती सुनी। दर्शक क्वीन की उम्मीद कर रहे थे।
उसने सफेद गोटी खेली।
वह पास के कोने वाले पॉकेट में गई। स्ट्राइकर सुरक्षित बोर्ड पर रहा। अब दो सफेद बची थीं और जरूरी दिशा खुल गई थी।
अभ्यास में कई बार वह यहीं पहली सफलता देखकर संतुष्ट हो जाती थी। इस बार उसने गोटियों की वास्तविक नई जगह देखी। यह बोर्ड घर के बोर्ड से थोड़ा तेज था।
उसने ताकत घटाई और क्वीन को कट से पॉकेट की ओर भेजा। क्वीन साफ अंदर गई।
बारी जारी थी, लेकिन क्वीन को अभी कवर चाहिए था। एक सफेद सीधी और नियंत्रित दिशा दे रही थी। दूसरी लेने के लिए ज्यादा गोटियाँ हिलानी पड़तीं। उसने सीधा विकल्प चुना, स्ट्राइकर की जगह जाँची और स्ट्रोक लिया।
सफेद गिर गई। क्वीन कवर हो गई।
अब एक सफेद बची थी। तारा की दोनों काली गोटियाँ बोर्ड पर थीं।
देविका ने एक पल हाथ हटाया, फिर स्ट्राइकर रखा। आखिरी स्ट्रोक की अपनी तैयारी जरूरी थी। घर पर ऐसे ही स्ट्रोक को वह तब चूकी थी जब मन में पूरा अभ्यास पहले ही समाप्त मान लिया था।
9. पाँच अंक
आखिरी सफेद पॉकेट की ओर गई और गायब हो गई। स्ट्राइकर बोर्ड पर धीमा हुआ, फिर सुरक्षित रुक गया।
तारा ने बची दो काली गोटियाँ देखीं। फिर स्कोर शीट की तरफ देखा। हिसाब उसे मालूम था।
देविका ने बोर्ड बीस अंक पर शुरू किया था। तारा की दो काली बचने पर बोर्ड जीतने के दो अंक थे। क्वीन देविका ने खुद निकाली और कवर की थी। बोर्ड से पहले उसके बाईस अंक नहीं हुए थे, इसलिए क्वीन के तीन अंक भी जुड़ते।
कुल पाँच। पच्चीस-इक्कीस।
निर्णायक गेम देविका का था। फाइनल भी दो-एक से उसका।
कुछ सेकंड तक तालियों से ज्यादा साफ उसे अंपायर की आवाज सुनाई दी। स्कोर लिखते समय उन्होंने नतीजा दोहराया। तारा खड़ी हुई, हाथ बढ़ाया और बोली, “वह पहली सफेद।”
देविका ने सिर हिलाया। दोनों को याद था कि गलत क्रम ने वह अभ्यास कितनी बार बिगाड़ा था।
पुरस्कार के समय माधवी उन्हीं दोस्तों के पास खड़ी थी जिन्होंने देविका को लिफाफा खोलते देखा था। इस बार देविका का नाम पुकारा गया तो पूरे समूह को हटकर उसके लिए रास्ता देना पड़ा।
उसने कप और हस्ताक्षर वाली नतीजे की शीट ली। अभ्यास के गेमों के लिए तारा को धन्यवाद कहते समय आवाज स्थिर थी। उसने उस हॉल का नाम भी लिया जहाँ लोगों ने पूछा था कि क्या वह दूसरा गेम खेलने तक रुक सकती है।
रोहन भीड़ के पार इंतजार कर रहा था। उसने खेलने का बैग रोहन को दिया। कप अपने हाथों में रखा।
10. लिफाफा वापस गया
निकास पर माधवी ने देविका को रोका। पुरानी शामें फिर शुरू हो सकती थीं। पैसों से लंबी दोस्ती खराब नहीं होनी चाहिए, उसने कहा।
देविका ने कप सँभालकर बैग खोला। मैच के कागजों के नीचे दबा लिफाफा अब भी था। घर से निकलने से पहले तस्वीरें निकाल ली थीं। अब लिफाफा आगे कर दिया।
माधवी ने भीतर देखा। खाली था।
“तुमने सबके सामने चाबी और तस्वीरें लौटाई थीं,” देविका ने कहा। “लिफाफा वापस लो।”
दोनों तरफ लोग निकल रहे थे। माधवी की आवाज़ धीमी हुई। “यह जगह ठीक नहीं है।”
“पहली बार सार्वजनिक जगह तुमने चुनी थी।”
माधवी ने लिफाफा लिया। पीछे अधिकारी चैंपियन की अंतिम तस्वीर के लिए बुला रहा था। देविका उसके पास से निकली और रोहन को बैग दिया।
तारा उपविजेता पुरस्कार लिए इंतज़ार कर रही थी। बीच की जगह छोड़कर हटी। फोटोग्राफर ने दोनों फाइनलिस्ट से पुरस्कार ऐसे पकड़ने को कहा कि पीछे स्कोर दिखे।
माधवी निकास पर रही। हाथ में खाली लिफाफा मुड़ रहा था।
घर में रोहन ने नई तस्वीर उन तस्वीरों के पास रखने में मदद की जिन्हें देविका ने उस लिफाफे से बचाया था। अतिरिक्त चाबी अपने छल्ले पर लौट गई।
फोन पर पुराने समूह का अगला निमंत्रण चमका। फ्रेम चुनते समय उसने फोन अलग रखा। अंतिम स्कोर के नीचे तारा और उसका नाम छपा था। उसमें किसी और का नाम जोड़ना बाकी नहीं था।
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