1. 91.game: आखिरी मेज़ पर बाज़ी बाकी थी
तीन मेज़ों के मुकाबले खत्म हो चुके थे। चौथी पर ज़ोया उस आदमी से छप्पन अंक पीछे थी जिसने उसकी नई टीम को सांत्वना पुरस्कार कहा था।
राघव ने परिणामों वाले बोर्ड की ओर देखा। “तुम्हारे दोस्तों को पुरस्कार वितरण तक रुकना चाहिए था।”
वे अभी हॉल में ही थे। हरीश बाहर गलियारे में मुँह धो रहा था। लता पानी की मशीन के पास खाली कप दोनों हाथों से पकड़े खड़ी थी। नितिन अपने सुपरवाइज़र का फोन सुनने बाहर गया था। चलती बाज़ी में उनमें से कोई ज़ोया के पास बैठकर सलाह नहीं दे सकता था।
अधिकारी ने राघव से बातचीत खेल तक सीमित रखने को कहा।
पैंतीस साल की ज़ोया ने नया पत्ता उठाया। उससे कोई अधूरा हिस्सा पूरा नहीं हुआ। उसने डिस्कार्ड चुनने से पहले फिर तेरह पत्ते गिने।
चार महीने पहले उन चारों के पास मिलाकर भी अपनी एक मेज़ नहीं थी। अब पूरे सीज़न की मेहनत आखिरी बाज़ी में सिमट गई थी। राघव के कंधे के ऊपर लिखे अंक देखें तो स्थिति लगभग निराशाजनक थी।
मगर वह पूरा हिसाब नहीं था।
बाज़ी शुरू होने से पहले ज़ोया बाकी नतीजे देख चुकी थी। उसे पता था कि हरीश ने क्या बचाया, नितिन ने क्या फेंकने से इनकार किया और लता ने अपनी मेज़ पर क्या हासिल किया। उनकी मेहनत उसके पत्ते नहीं बदल सकती थी। उसने जीत तक पहुँचने का एक रास्ता बाकी रखा था।
राघव ने बंद गड्डी से पत्ता उठाया। ज़ोया ने उसका डिस्कार्ड देखा और फिर अपने हाथ पर ध्यान लौटाया।
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2. 91.game कहानी: धूल भरे नोटिस पर चार नाम
पुराना मनोरंजन कक्ष मंगलवार को बंद हुआ। इमारत गिराई जानी थी और दूसरी जगह का इंतज़ाम आखिरी समय पर टूट गया था। सदस्य उखड़े पलस्तर वाली सीढ़ियों से सामान नीचे ला रहे थे।
ज़ोया स्कोरबुक का गत्ते वाला डिब्बा लाई। हरीश ने केतली उठाई। लता ने वह कपड़ा तह किया जिसे छह साल से खराब मेज़ पर बिछाते थे। नितिन दो कुर्सियाँ लेकर सड़क पर पहुँचा तो सामान ढोने वाली गाड़ी भर चुकी थी।
अच्छी सुविधाओं वाले क्रेसेंट क्लब ने कुछ विस्थापित खिलाड़ियों को जगह देने की पेशकश की। चयन की शाम राघव ने स्वीकार किए गए नाम पढ़े। चारों में से किसी का नाम नहीं था।
ज़ोया कभी ऐसी टीम की कप्तान थी जिसने उसकी टीम को हराया था। अब उसने जाते हुए उसे चाय के कप उठाने को कहा। ज़ोया ने मना किया तो उसने स्कोरबुक का डिब्बा कुर्सी से उठाकर कूड़े की बोरियों के पास रख दिया।
“इतिहास को खेलने की जगह नहीं चाहिए,” उसने कहा।
किसी ने सुझाव दिया कि चारों कहीं और अपनी टीम बना लें। राघव हँसा।
“सांत्वना क्लब बना देना। आने भर का सर्टिफिकेट दे देंगे।”
लता डिब्बे से अपनी तस्वीर निकाल चुकी थी। फटा कोना किसी को दिखे, उससे पहले उसने तस्वीर ब्लाउज़ में रख ली।
बाहर बारिश गत्ते को भिगो रही थी। हरीश ने पूछा कि अब कहाँ जाएँ। ज़ोया के घर में चारों को बुलाने जितनी जगह नहीं थी। बिना झूठ बोले देने लायक जवाब भी नहीं था।
बारिश हल्की होने तक वे बंद दुकान के छज्जे के नीचे खड़े रहे। नितिन कुर्सियाँ सीधी पकड़े रहा ताकि उनके पाँव नाली में न धँसें।
3. घंटों के हिसाब से मिली जगह
एक मोहल्ला समिति के दफ्तर के पीछे कमरा मिल गया। मंगलवार शाम और रविवार सुबह वहाँ अभ्यास कर सकते थे। शर्त थी कि अगला समूह आने से पहले सारा सामान हटा दें।
पहली बैठक में कोई महान शुरुआत नहीं हुई। बस की ड्यूटी बदलने से हरीश देर से आया। गोदाम से फोन आया तो नितिन जल्दी चला गया। लता दो अभ्यास बाज़ियाँ हारी और इतनी बार माफी माँगी कि ज़ोया उस पर झुँझला पड़ी।
लता ने पत्ते रख दिए। “अगर यहाँ भी बोलने की जगह कमानी पड़ेगी तो अभी बता दो।”
कई मिनट किसी ने नहीं खेला।
चारों अलग चोट लेकर आए थे। पचास साल का हरीश पिछले सीज़न में युवा साथी की जोखिम भरी चाल गलत पड़ने पर भी दोष अपने सिर लेता रहा था। अट्ठाईस साल के नितिन की फैक्टरी बंद हुई। नई नौकरी में दोपहर का अभ्यास छूटा तो टीम से निकाल दिया गया। छियालीस साल की लता की एक गलत घोषणा को सदस्य महीनों तक मज़ाक की तरह दोहराते रहे।
ज़ोया इतने समय से कप्तान थी कि भूल गई थी, मदद कितनी जल्दी आदेश बन जाती है।
उन्होंने पुराने कैलेंडर के पीछे अपने असली खाली घंटे लिखे। हरीश सुबह की ड्यूटी के बाद आ सकता था। नितिन को खत्म होने का निश्चित समय चाहिए था। लता अपनी बड़ी, वयस्क बेटी को घर साथ चलने के लिए बुला सकती थी। मेज़ पर फैसले वह खुद करेगी।
ज़ोया ने अकेले बनाया कार्यक्रम काट दिया। नए पन्ने पर सबसे ऊपर चारों के नाम लिखे गए। फिर अभ्यास शुरू हुआ।
4. हर हाथ में अलग गलती
उनकी प्रतियोगिता तेरह पत्तों की रमी थी। सही घोषणा के लिए कम से कम दो सीक्वेंस चाहिए थे, जिनमें एक प्योर हो। बाकी सभी पत्ते भी मान्य समूहों में होने जरूरी थे। शुरू में ड्रॉप करने पर बीस और बाद में चालीस पेनल्टी अंक लगते थे। कम कुल पेनल्टी वाला जीतता था।
लता की पुरानी गलती थी कि उसने खाली जगह भरने वाले जोकर को प्योर सीक्वेंस का हिस्सा मान लिया था। अब अभ्यास में पहले प्योर सीक्वेंस पहचानती। फिर हर दूसरा समूह जाँचती। एक ही पत्ते को दो जगह मानकर संतोष नहीं करती।
नितिन की कमजोरी लगाव था। वह अलग पड़े बड़े पत्ते बचाए रखता क्योंकि याद आता था कि उनसे कितना शानदार हाथ बन सकता है। वे फैसले से पहले और बाद की तस्वीर लेते। तस्वीरें दिखातीं कि एक सुंदर संभावना के लिए उसने कितनी बार काम के संबंध तोड़े थे।
हरीश खराब शुरुआती हाथ सही पहचान लेता, फिर कोई डरपोक कह देता तो खेलता रहता। अभ्यास में ज़ोया सामने बैठकर वे शब्द दोहराती जिनसे उसे सबसे ज्यादा चोट लगती। बाद में फैसला पत्तों के आधार पर परखते, उस समय वह कितना बहादुर दिखा, इससे नहीं।
ज़ोया का अभ्यास और कठिन था। उसकी बाज़ी से पहले किसी साथी का खराब स्कोर घोषित किया जाता। वह बार-बार पूरा घाटा एक ही हाथ में भरने दौड़ पड़ती।
समीक्षा में बाकी तीन उसे रोकते। पूछते कि अपने पत्तों ने उस फैसले का कितना समर्थन किया था।
पहला महीना खत्म होने तक कॉपी में गलतियों की चार अलग सूचियाँ थीं। कोई कप्तान की सूची के पीछे छिप नहीं सकता था।
5. गलियारे में लगभग खत्म हुआ सीज़न
पहला मुकाबला वे हार गए। नितिन ने बैग दीवार पर मारा। ज़िप खुली और पत्ते फर्श पर बिखर गए तो वह उन्हें उठाने झुका।
ज़ोया कहना चाहती थी कि बचपना बंद करो। वह भी पत्ते समेटने बैठ गई। समीक्षा में उसने माना कि उसके देर से किए ड्रॉप का नुकसान नितिन की हार से बड़ा था।
टीम साथ रही।
अगला मुकाबला थोड़े अंतर से जीते। तीसरे में ज़ोया खराब खेली, मगर लता की सही घोषणा ने दौर बचा लिया। हरीश हर मैच से दो अभ्यास हाथ लाने लगा। एक जिसे उसने ठीक सँभाला था और दूसरा जिसे अब भी समझ नहीं पाया था।
वे सेमीफाइनल पहुँचे, मगर अजेय रिकॉर्ड लेकर नहीं। ऐसा खिलाड़ी भी नहीं था जो हर हफ्ते सबको बचा ले। अलग शामों में अलग लोगों की जरूरत पड़ी थी।
सेमीफाइनल के आखिरी हिस्से में नितिन ने आकर्षक खुला पत्ता नहीं उठाया। उसे लेने से दूसरा सीक्वेंस टूटता। वह उस बाज़ी में हारा, लेकिन पेनल्टी कम रही। उसी कम नुकसान ने टीम की कुल बढ़त बचाई। साथियों ने उसके निर्णय की खुशी उतनी ही मनाई जितनी पहले लता की घोषणा पर मनाई थी।
हॉल के दूसरी तरफ क्रेसेंट ने अपना सेमीफाइनल जीता। राघव उनका नतीजा देखने आया।
“तो सांत्वना क्लब को असली फाइनल मिल गया।”
वह शीट उठाता, उससे पहले लता ने अपनी प्रति तह कर ली। “क्वालिफाइंग में जितने मुकाबले आपने जीते, उतने ही हमने जीते हैं।”
इस बार ज़ोया ने किसी और की ओर से जवाब नहीं दिया। लता के साथ खड़ी रही, जबकि राघव अंक दोबारा पढ़ रहा था।
6. चार मेज़ें, चार फैसले
फाइनल में दोनों टीमों के एक-एक खिलाड़ी चार अलग मेज़ों पर आमने-सामने थे। हर जोड़ी को चार बाज़ियाँ खेलनी थीं। चारों खिलाड़ियों की पेनल्टी जोड़कर कम कुल वाली टीम जीतती। चलती बाज़ी में साथियों से सलाह लेना मना था।
हरीश का आखिरी शुरुआती हाथ खराब था। पत्ता उठाने से पहले उसने बीस अंक वाला प्रारंभिक ड्रॉप लिया। सामने वाला हँसा और हाथ ऐसे उठाए जैसे हरीश ने पूरा फाइनल छोड़ दिया हो।
हरीश बहत्तर पर खत्म हुआ। विरोधी चौंसठ पर था। अपनी मेज़ का हिसाब वह आठ अंक से हारा था। उसने बिना किसी से माफी माँगे परिणाम पर हस्ताक्षर किए।
दूसरी मेज़ पर नितिन के सामने ऐसा फैसला आया जिसे पहले वह कायरता कहता। किसी संकरे बचाव की उम्मीद में अलग पड़ा बड़ा पत्ता पकड़े रहने के बजाय उसने उसे छोड़ दिया। विरोधी ने पहले हाथ पूरा किया। नितिन के बचे पत्तों से बारह अंक जुड़े। चौवन से वह छियासठ पर गया। सामने वाले के पचास थे।
सोलह अंक का घाटा देखकर उसका चेहरा उतर गया। फिर वे हाथ याद आए जिनमें अधीरता ने बहुत बड़ा नुकसान कराया था। उसने उपलब्ध विकल्पों में फैसला किया था और उसकी कीमत स्वीकार की थी।
दोनों पुरुषों ने विजयी घोषणा नहीं की थी। दोनों ने टीम के लिए कुछ उपयोगी बचाया था।
लता अभी खेल रही थी। क्रेसेंट का खिलाड़ी डिस्कार्ड के पास उँगलियाँ बजा रहा था। वह तय समय के भीतर अपनी गति से समूह जाँचती रही। उँगलियों की आवाज़ नियमों का हिस्सा नहीं बन गई थी।
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7. लता ने जो तस्वीर बचा रखी थी
आखिरी बाज़ी से पहले लता के इकतालीस पेनल्टी अंक थे। विरोधी के चालीस। अंतर केवल एक था। उसे लग रहा था कि पुरानी गलत घोषणा उससे पहले कमरे में घुसना चाहती है।
उसने बैग में तस्वीर का किनारा छुआ। फिर बैग कुर्सी के नीचे रख दिया। तस्वीर इंतज़ार कर सकती थी। पत्ते नहीं।
हाथ दो अलग रास्तों से बन सकता था। नई ड्रॉ ने एक पत्ते को लंबे सीक्वेंस में उसकी सामान्य जगह इस्तेमाल करने का अवसर दिया। जोकर दूसरे मान्य समूह में जा सका। घोषणा से पहले उसने प्योर सीक्वेंस, दूसरा सीक्वेंस और बाकी सेट जाँचे।
अधिकारी ने पूरे तेरह पत्ते सही पाए।
विरोधी के अधूरे हाथ से सत्तावन अंक जुड़े। उसके चालीस अब सत्तानवे थे। लता इकतालीस पर रही।
हरीश ने बोर्ड पर लगे अंक देखे। उसका, नितिन का और लता का परिणाम जोड़ने पर टीम के एक सौ उन्नासी हुए। क्रेसेंट के दो सौ ग्यारह थे। तीन पूरी मेज़ों ने ज़ोया के लिए बत्तीस अंक की मदद बनाई थी।
उसका अपना घाटा इससे पूरा नहीं मिटता था।
तीन बाज़ियों के बाद ज़ोया अट्ठानवे पर थी। राघव बयालीस पर। इन्हें जोड़ने से टीमों का कुल दो सौ सतहत्तर और दो सौ तिरपन हुआ। आखिरी बाज़ी से पहले वे चौबीस अंक पीछे थे।
लता ने अपनी पुरानी तस्वीर नए हस्ताक्षर वाले स्कोर के पास रखी। फिर खेलने की जगह से हट गई। ज़ोया को अपना हाथ खुद पूरा करना था।
8. वह पत्ता जिसे माँगकर नहीं पाया जा सकता
ज़ोया का प्योर सीक्वेंस पान का पाँच, छह और सात था। चिड़ी का नौ, दस और गुलाम दूसरा मान्य सीक्वेंस बना रहे थे। उसमें एक पत्ता और जुड़ जाए तो बाकी काम के समूह तोड़े बिना पूरा हाथ बनाया जा सकता था।
ईंट का चार, हुकुम का चार और प्रिंटेड जोकर एक मान्य सेट थे। अलग सूट के तीन बादशाह दूसरा सेट थे। अलग पड़ी पान की बेगम तेरहवीं जगह घेरे थी।
हाथ आशाजनक था। पूरा नहीं था।
राघव ने खुला पत्ता लिया। ज़ोया ने उसे याद रखा। उसके छिपे हुए पत्ते मन से गढ़ने नहीं लगी। टीम को चौबीस से ज्यादा अंक का फर्क चाहिए था। वह यह भी जानती थी कि सामने वाले के पत्ते चुन नहीं सकती और गड्डी को मनचाहा अंत देने का आदेश नहीं दे सकती।
एक ड्रॉ में बड़ा पत्ता आया जिससे दूसरी व्यवस्था का विचार बना। उसने जाँचा। नया रास्ता पूरे हाथ को तैयार किए बिना एक उपयोगी समूह तोड़ रहा था। उसने वह पत्ता छोड़ दिया और काम कर सकने वाली जमावट बचाई।
पानी की मशीन के पास लता ने खाली कप रख दिया। हरीश गलियारे से लौट आया। नितिन फोन खत्म करके चुपचाप भीतर आया।
ज़ोया की अगली बारी में चिड़ी की बेगम आई।
उसने उसे चिड़ी वाले सीक्वेंस में जोड़ा। पान की बेगम अंतिम डिस्कार्ड के लिए अलग रखी। कुछ बोलने से पहले हर असली पत्ते को एक बार गिना। इस गिनती में कोई पत्ता दो उम्मीदों के बीच साझा नहीं था। हर एक की अपनी तय जगह थी।
9. उसकी भविष्यवाणी से सात अंक आगे
पान का पाँच, छह, सात। तीन पत्ते।
चिड़ी का नौ, दस, गुलाम, बेगम। चार पत्ते।
ईंट का चार, हुकुम का चार और प्रिंटेड जोकर। तीन पत्ते।
पान, ईंट और हुकुम के बादशाह। तीन पत्ते।
कुल तेरह। दो प्राकृतिक सीक्वेंस, जिनमें एक चार पत्तों का था। दो सही सेट। ज़ोया ने डिस्कार्ड पूरा किया और घोषणा की।
राघव ने अधिकारी से जोकर जाँचने को कहा। अधिकारी ने उसे और हर दूसरे समूह को जाँचा। घोषणा सही थी।
उसकी बची पेनल्टी इकतीस थी। चार बिना समूह वाले पत्तों का मूल्य: एक दस, एक नौ, एक सात और एक पाँच। उसके दो पूरे सीक्वेंस, जिनमें एक प्योर था, और तीन पत्तों का मान्य सेट अलग जाँचे गए। उसके बयालीस अब तिहत्तर थे।
अधिकारी ने चारों मेज़ फिर जोड़ीं। ज़ोया की टीम दो सौ सतहत्तर पर खत्म हुई। क्रेसेंट दो सौ चौरासी पर।
सात अंक।
राघव अपनी व्यक्तिगत तुलना में ज़ोया से आगे था। उसके तिहत्तर, ज़ोया के अट्ठानवे। फिर भी टीम फाइनल वह हार गया था।
उसने दूसरी शीटों पर हरीश का बीस अंक वाला ड्रॉप, नितिन का बारह अंक का नुकसान और लता की घोषणा देखी। जिस नतीजे पर वह हँस रहा था, वह उन जगहों पर बना था जहाँ उसने देखना बंद कर दिया था।
लता सबसे पहले ज़ोया तक पहुँची। हरीश ने दोनों के कंधे घेर लिए। नितिन इतना हँसा कि बैठना पड़ा। उद्घोषक ने चारों को आगे बुलाया। राघव परिणाम बोर्ड के पास उसी पेन को पकड़े खड़ा रहा जिससे उसने हार पर हस्ताक्षर किए थे।
10. घर लौटने के चार समय
पुरस्कार वितरण में आयोजक ने पूछा कि सांत्वना क्लब कहे जाने पर वे कुछ कहना चाहेंगे।
ज़ोया ने माइक्रोफोन हरीश की ओर बढ़ाया। उसने खराब शुरुआती हाथ छोड़ने का निर्णय समझाया। नितिन ने बताया कि अलग पड़ा पत्ता क्यों छोड़ा। लता ने अपनी मेज़ की आखिरी जमावट दिखाई। ज़ोया ने अंत में कुल हिसाब रखा।
उपविजेता पदक का इंतज़ार करते राघव को इतनी पास खड़े रहना पड़ा कि चारों की बात सुन सके। उसका मज़ाक दोहराने की जरूरत किसी को नहीं पड़ी। जवाब चार हस्ताक्षर वाली शीटों पर फैला था।
बाद में वे बस अड्डे के पास छोटी जगह पर खाना खाने गए। सुबह जल्दी ड्यूटी थी, इसलिए हरीश पहले निकला। नितिन ने आधा खाना पैक कराया। सुपरवाइज़र ने देर से आने की छूट दी थी, पूरी रात की छुट्टी नहीं। लता की बेटी उसे लेने आई। दोनों हँसते हुए बहस करने लगीं कि कप कौन उठाएगा।
ज़ोया बिल चुकाने और अगले सप्ताह के खाली घंटे लिखने रुकी। चार खिलाड़ी, लौटने के चार अलग समय। उसने हर नाम के आगे जगह छोड़ी। सबकी तरफ से पन्ना खुद नहीं भरा।
राघव का संदेश आया। क्रेसेंट में दोबारा मुकाबला खेलना चाहता था।
उसने जवाब दिया कि मंगलवार के अभ्यास में टीम तारीखों पर बात करेगी। वापसी का मुकाबला मोहल्ले के कमरे में हो सकता है। अब वहाँ सबके लिए पर्याप्त मोड़कर रखी जाने वाली मेज़ें थीं।
फिर फोन बंद किया और बगल की कुर्सी से स्कोरबुक का गत्ते वाला डिब्बा उठाया। बारिश के दाग अब भी थे। अंदर फाइनल की चारों शीटें साथ रखी थीं, उसी क्रम में जिसमें उनके मुकाबले पूरे हुए थे।
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