वेटर ने बिल निखिल की प्लेट के पास रखा तो काव्या ने फूलदान दूसरी तरफ सरका दिया।
“फूलों के पीछे मत छिपाओ,” उसने कहा।
निखिल ने फूलदान को छुआ तक नहीं था।
मेज के दूसरे सिरे पर काव्या का चचेरा भाई रितेश हँसा। किसी ने पूछा कि आज के मेजबान को कैलकुलेटर चाहिए क्या।
निखिल ने कुल रकम देखी।
छियासी हजार चार सौ रुपये।
नीचे छोटे अक्षरों में उसका नाम था।
नौ दिन पहले उसकी नौकरी चली गई थी। काव्या यह जानती थी। जब उसके हाथ इतने काँप रहे थे कि नौकरी खत्म होने वाला पत्र लिफाफे में नहीं रख पा रहा था, तब उसी ने उसे मोड़कर रखा था।
अब वह उसकी तरफ झुकी और दोनों मेजों तक पहुँचने वाली आवाज में बोली, “आने की हैसियत नहीं थी तो आए क्यों?”
वेटर ट्रे को देखता रहा।
एक बुरे पल के लिए निखिल ने चाहा कि वह आदमी उसकी तरफ देखे। इस कमरे में कम से कम एक व्यक्ति तो उसका चेहरा ठीक से देखे।
* * *
दावत की शुरुआत परिवार की एक छोटी शाम के रूप में हुई थी।
वयस्क लोग तीन पत्ती खेलते, फिर खाना खाते। न कोई प्रवेश शुल्क, न पैसों का दाँव। जीतने वाले के लिए पीतल का एक सस्ता कप रखा था।
निखिल ने तय मेन्यू वाले खाने का खर्च देने की बात कही थी।
चौदह लोग। बारह सौ रुपये प्रति व्यक्ति। कुल सोलह हजार आठ सौ।
पाँच हजार रुपये अग्रिम दे दिए थे।
उसके बाद गोदाम की एक पाली बंद हुई और उसके साथ बाईस अन्य लोगों की नौकरी चली गई। निखिल वहाँ माल भेजने का काम सँभालता था। नौकरी जाने पर उसने शाम रद्द करने की बात की।
काव्या ने कहा, लोग सवाल पूछेंगे।
“पापा सबको बता चुके हैं।”
उसने पूछा, क्या घर पर चाय रख सकते हैं?
“तुमने खाने का वादा किया था।”
वादा किया था। बचत से बाकी खाना चुकाकर कुछ सप्ताह नौकरी खोजते हुए काट सकता था। मुश्किल होती, लेकिन संभव था।
उसने पास वाले निजी कमरे का वादा नहीं किया था। महँगी शराब का नहीं। आधी रात किसी अनजान पते पर भेजे गए खाने का नहीं। किसी दूसरे आदमी की कंपनी के निशान वाले केक का भी नहीं।
बिल आने तक उसे इन चीजों का पता ही नहीं था।
* * *
खेल के दौरान रितेश बार-बार उसे “मैनेजर साहब” कहता रहा।
निखिल ने एक छोटा दौर जीता तो उसने पीतल का कप सामने रख दिया।
“सँभालकर। इस साल शायद यही प्रमोशन मिले।”
काव्या बिना दाँत दिखाए मुस्कुराई।
निखिल ने खुद को समझाया कि वह असहज होगी।
बाद में उसके चाचा ने काम के बारे में पूछा। निखिल के बोलने से पहले काव्या ने कह दिया कि वह बेहतर अवसर देख रहा है।
रितेश ने गिलास उठाया।
“बेहतर अवसरों के नाम।”
दो आदमी हँसे।
निखिल नहीं जानता था कि नौकरी की बात किस-किस को बताई गई है। कोई सीधा सवाल पूछ लेता तो शायद आसान होता। अब हर चेहरे में देखना पड़ रहा था कि उसकी परेशानी कहाँ तक मजाक बन चुकी है।
खाना आया तो उसने काव्या की माँ को पहले परोसा। रोटियों की टोकरी आगे बढ़ाई। ध्यान रखा कि शाकाहारी खाना सही लोगों तक पहुँचे।
लगभग एक घंटे तक काम में लगे रहने से हाथों की बेचैनी छिपी रही।
फिर बिल आ गया।
* * *
“इसमें गलती है,” उसने कहा।
रितेश ने कुल रकम पर उँगली मारी।
“रेस्तराँ वाले हिसाब में गलती नहीं करते।”
निखिल ने वेटर से पूरा ब्योरा माँगा।
काव्या ने उसकी कलाई पर हाथ रखा। एक पल को उसे लगा, वह साथ देने वाली है।
“प्लीज, तमाशा मत करो।”
उसने अपनी कलाई छुड़ा ली।
“मुझे देखना है कि पैसे किस चीज के दे रहा हूँ।”
काव्या के पिता ने साँस छोड़ी। “अभी चुका दो। बातें कल कर लेना।”
कल का मतलब था अकेले। कल तक हर व्यक्ति इस शाम को अपने हिसाब से याद कर सकता था।
निखिल ने दोबारा ब्योरा माँगा।
वेटर तीन पन्ने लाया।
दूसरे पन्ने पर निजी कमरा छह घंटे के लिए दर्ज था। तीसरे पर रात दस बजकर पैंतालीस मिनट पर भेजे गए अट्ठाईस पैक भोजन थे।
उस समय निखिल इसी मेज पर बैठा था।
रितेश बोला, “एक ही मौके का सब था।”
“कौन सा मौका?”
“हमारे लोग भी आए थे।”
“कौन लोग?”
रितेश के जवाब से पहले काव्या बोली, “एक खाने के लिए मेरी बेइज्जती कर रहे हो।”
उसका हाथ अब भी मेज पर वहीं था जहाँ निखिल की कलाई थी।
नौ दिन पहले उसी हाथ ने उसका लिफाफा थाम रखा था।
* * *
निखिल ने कोई भाषण नहीं दिया।
उसने प्रबंधक को बुलाकर अपने मँगाए भोजन और अतिरिक्त खर्च अलग करने को कहा।
मीरा नाम की प्रबंधक कुर्सी खींचकर बैठी। उसने तुरंत निखिल को सही नहीं मान लिया। उसने पूछा कि कमरा किसने बुक किया, अतिरिक्त चीजें किसने मंजूर कीं और कोई लिखित संदेश है क्या।
निखिल ने बुकिंग की पुष्टि दिखाई।
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चौदह तय भोजन। शराब का कोई पैकेज नहीं। निजी कमरा नहीं।
मीरा ने दो बार पढ़ा।
रितेश बोला कि उसने कर्मचारी से बात की थी।
“किस बारे में?” मीरा ने पूछा।
“सब एक साथ जोड़ने की।”
“पैसे देने की सहमति किसने दी?”
रितेश ने निखिल की तरफ इशारा किया।
मीरा ने उसे देखा।
“मैंने तय खाने की सहमति दी थी,” निखिल ने कहा। “उससे ज्यादा का जो भी वादा मेरे नाम पर कहा जा रहा है, वह मैं वापस लेता हूँ। उन चीजों का भुगतान मुझसे मत लीजिए।”
आखिरी शब्द पर उसकी आवाज हल्की काँपी।
काव्या कुर्सी पीछे करके उठी।
“हमें यहाँ ऐसे छोड़कर गए तो कल फोन मत करना।”
निखिल कहना चाहता था कि पूरी शाम वह उसे अकेला न पड़ने देने की कोशिश कर रहा था।
उसने मीरा को अपना नंबर दिया और पूछा कि जाँच के लिए क्या चाहिए।
* * *
आधी रात को पूरा विवाद नहीं सुलझा।
मीरा ने निखिल के मँगाए खाने की रकम की पुष्टि की। अग्रिम पाँच हजार के बाद उसने ग्यारह हजार आठ सौ रुपये दिए। उसे सिर्फ उसी भोजन के खाते में भुगतान की रसीद मिली।
बाकी उनहत्तर हजार छह सौ रुपये की जाँच होनी थी।
मीरा ने अतिरिक्त ऑर्डर से जुड़े लोगों के संपर्क माँगे। रितेश बहस करने लगा। काव्या के पिता ने कहा कि ऐसी बातें करने की यह जगह नहीं है।
निखिल अपनी रसीद छपने तक रुका।
किसी ने खाने के लिए धन्यवाद नहीं कहा।
बाहर बारिश शुरू हो गई थी। स्कूटर पर उलटा टँगा हेलमेट अंदर से भीग गया था। उसने अच्छी कमीज की बाँह से उसे पोंछा।
मुख्य सड़क तक पहुँचने से पहले फोन काँपा।
काव्या ने उसके जाने के बाद की मेज की तस्वीर भेजी थी।
नीचे लिखा था, उम्मीद है पैसे बचाकर खुशी मिली होगी।
निखिल बंद दवा की दुकान के छज्जे के नीचे खड़ा हो गया।
तस्वीर में उसकी जगह खाली थी।
इस्तेमाल किया हुआ नैपकिन अब भी प्लेट के पास तह किया रखा था।
* * *
सुबह तक कहानी बदल चुकी थी।
अब निखिल वह आदमी था जिसने परिवार को बुलाया, खाना खाया और पैसे दिए बिना भाग गया।
उसकी बड़ी बहन पूनम को यह कहानी एक रिश्तेदार ने सुनाई। तब तक निखिल ने उसे कुछ बताया भी नहीं था।
उसका फोन आया।
“बिना पैसे दिए चले आए?”
“नहीं।”
“फिर जो चुकाया है, वह भेजो।”
उसने रसीद, बुकिंग के संदेश और तीन पन्नों का बिल भेज दिया।
पढ़ने के बाद पूनम ने फिर फोन किया।
“आज कुछ खाया?”
उसने नहीं खाया था।
वह डिब्बे में पोहा लेकर आई। दरवाजे से सलाह देना शुरू नहीं किया।
निखिल खाता रहा और उसने लैपटॉप पर कागज खोले। उसे बुरा लग रहा था कि बहन को यह सब करना पड़ रहा है। लेकिन अकेला रहता तो शायद रकम देखने के बजाय काव्या का संदेश ही पढ़ता रहता।
पूनम ने चार हिस्से बनाए।
तय भोजन, सोलह हजार आठ सौ।
निजी कमरा और सेवा, चौबीस हजार।
शराब, अट्ठाईस हजार आठ सौ।
पैक भोजन और कंपनी का केक, सोलह हजार आठ सौ।
आखिरी तीन हिस्सों का जोड़ उनहत्तर हजार छह सौ था।
“यह कंपनी किसकी है?” उसने केक के विवरण पर उँगली रखकर पूछा।
निखिल जानता था।
रितेश ने छह महीने पहले संपत्ति खरीदने-बेचने की सलाह देने वाला कारोबार शुरू किया था।
* * *
दोपहर को मीरा का फोन आया।
उसने रेस्तराँ के बुकिंग संदेश और ऑर्डर पर्चियाँ देख ली थीं। पास वाले कमरे में रितेश ने अपने ग्राहकों की छोटी बैठक रखी थी। शराब उन्होंने मँगाई थी।
पैक भोजन उसके कार्यालय गया था, जहाँ लोग कारोबार के एक कार्यक्रम की तैयारी कर रहे थे।
केक की तस्वीर पर उसी कंपनी का निशान था।
रितेश ने कर्मचारी से कहा था कि परिवार का मेजबान सब मंजूर कर चुका है। उसी आधार पर दोनों खाते जोड़ दिए गए थे।
मीरा ने माना कि कर्मचारी को निखिल से सीधे पुष्टि करनी चाहिए थी।
वह खाता ठीक करेगी और रितेश से उसके खर्च का भुगतान माँगेगी।
निखिल ने लिखित पुष्टि चाही।
अगली सुबह वह मिल गई।
अतिरिक्त बकाया से उसका नाम हट चुका था।
वह उँगली स्क्रीन पर रखे संदेश पढ़ता रहा, जैसे उँगली हटाने पर अक्षर अपनी जगह से खिसक जाएँगे।
फिर उसने काव्या को भेजा।
चार घंटे बाद जवाब आया।
तुम इसे थोड़ी शालीनता से सँभाल सकते थे।
निखिल ने तीन उत्तर लिखे और तीनों मिटा दिए।
आखिर लिखा, तुम्हें पता था कि मेरी नौकरी चली गई है।
* * *
वे उसी पार्क में मिले जहाँ कभी शादी के बाद के फर्नीचर पर बात की थी।
काव्या ने पीला कुर्ता पहना था, जो निखिल को पसंद था। उसका ध्यान उस पर गया और उसे अपने ऊपर गुस्सा आया।
काव्या ने कहा कि उस पर दबाव था।
निखिल ने माना। उसका परिवार खरीदारी, तारीख और हर फैसले पर राय देता था। उसने उसे कई बार परेशान देखा था।
लेकिन उसने यह भी देखा था कि उसने वह दबाव किस पर उतारा।
“तुम पहले पैसे दे सकते थे,” काव्या ने कहा। “बाद में सुलझा लेते।”
“कहाँ से देता?”
“बचत थी।”
“किराए और खाने के लिए।”
“ऐसे कह रहे हो जैसे हम तुम्हें भूखा रखना चाहते थे।”
पीछे एक आदमी बेटी को साइकिल चलाना सिखा रहा था। लड़की गिरने से पहले एक पैर जमीन पर रख देती थी।
निखिल ने चाहा कि उसने भी यह पहले सीख लिया होता।
“मुझे चाहिए था कि तुम पूछतीं, बिल में क्या है,” उसने कहा। “तुमने पूछा कि उस मेज पर बैठने की मेरी हैसियत है या नहीं।”
काव्या का चेहरा बदला।
पहली बार उसने दावत का बचाव करना बंद किया।
लेकिन अपने कहे के लिए माफी नहीं माँगी।
उठते समय उन्होंने अगली मुलाकात तय नहीं की।
* * *
सगाई खत्म करने में रेस्तराँ से निकलने से ज्यादा समय लगा।
तोहफे लौटाने थे, रिश्तेदारों को बताना था। कुछ बातचीत की शुरुआत ही इस वाक्य से होती थी कि कम से कम अपने माँ-बाप के बारे में सोचो।
निखिल ने उनके बारे में सोचा।
माँ ने सालों थोड़ा खाना इस तरह फैलाया था कि किसी को कमी न लगे। पिता ने परीक्षा के फॉर्म भरवाने के लिए मरम्मत की हुई चप्पल पहनी थी।
उन्होंने कभी अपनी उदारता के नाम पर उसे किसी और के हाथों जेब खाली करवाने को नहीं कहा था।
दोनों परिवारों ने सामान लौटाया तो पूनम उसके साथ गई। जो तय हुआ था, निखिल ने लौटाया और प्राप्ति की पुष्टि सँभालकर रखी।
काव्या नहीं आई।
उसे जितना दुख होना चाहिए था, उससे ज्यादा हुआ।
कई रात वह उसके किए अच्छे काम याद करता रहा। वे अच्छे काम सच थे। यही मुश्किल थी। वह उसे पूरी तरह बुरा बनाकर अपना फैसला आसान नहीं कर सकता था।
उसे अच्छी यादों के साथ बुरी घटना भी रखनी थी। एक से दूसरी को मिटाए बिना।
इसी बीच एक छोटे थोक व्यापारी के यहाँ माल गिनने का अस्थायी काम मिला।
वेतन कम था।
किराया निकल जाता था।
* * *
निखिल तुरंत खेल की तरफ नहीं लौटा।
कुछ सप्ताह तक रेस्तराँ की मेज देखते ही लगता था कि कोई ऐसा बिल रख देगा जिसकी उसने सहमति नहीं दी।
आखिर दोस्त फैज ने मोहल्ले के मनोरंजन भवन में अभ्यास के लिए बुलाया।
संदेश में लिखा, खाने का पैकेज नहीं है। अपनी चाय लाना।
उस दिन निखिल पहली बार हँसा।
वहाँ लोग खेल हारकर एक-दूसरे की नौकरी पर ताने नहीं मारते थे। एक सेवानिवृत्त बिजलीकर्मी ने किस्मत को कोसा, फिर माना कि चाल खराब चली थी। स्कूल का प्रशासन सँभालने वाली महिला ने निखिल को हराया और अपना आधा सैंडविच दिया।
सगाई की कहानी किसी को तब तक नहीं पता चली जब तक उसने खुद नहीं बताई।
कुछ महीने बाद अलग आयोजकों की वयस्क तीन पत्ती प्रतियोगिता के प्रवेश खुले। नियम, शुल्क और पुरस्कार की शर्तें प्रकाशित थीं।
निखिल ने पहले बजट देखा। जीवन के खर्च वेतन से चल रहे थे। प्रवेश शुल्क मनोरंजन के लिए पहले से अलग रखी रकम से दिया।
वह किराए के पैसे लेकर पत्तों से जिंदगी ठीक करवाने नहीं बैठा था।
जिंदगी के कुछ हिस्से कम नाटकीय तरीकों से पहले ही ठीक करने लगा था।
* * *
प्रतियोगिता दो दिन चली।
पहले दिन शुरुआत में हुई एक गलती सँभालने में बाकी सत्र निकल गया।
दोपहर के खाने पर फैज ने पूछा कि उस हाथ पर बात करना चाहेगा क्या।
“पहले चबाने दो,” निखिल ने कहा।
फैज रुक गया।
यह छोटा सा व्यवहार था। इतना छोटा कि उसका ध्यान शायद न जाता।
दूसरा दिन कठिन था। अंतिम समूह तक पहुँचा, लेकिन कभी लगा नहीं कि अब हार ही नहीं सकता। एक समय लगा कि मौका अपने हाथ से निकाल चुका है।
फिर भी बैठा रहा। अगला फैसला लिया। हर हाथ को उन लोगों के लिए जवाब बनाना बंद किया जो कमरे में थे ही नहीं।
अंतिम परिणाम की पुष्टि हुई तो उसका नाम पहले स्थान पर था।
सामान्य जाँच के बाद प्रकाशित शर्तों के अनुसार पुरस्कार मिला।
पूनम काम से देर से पहुँची। निखिल प्रस्तुति वाली जगह के पास प्रमाणपत्र को इस तरह पकड़े था कि एक कोना मुड़ रहा था।
“सीधा पकड़ो,” उसने कहा।
फिर इतनी जोर से गले लगाया कि कोना दोबारा मुड़ गया।
* * *
आयोजकों के पन्ने पर तस्वीर लगी।
शाम तक उन रिश्तेदारों को भी उसका नंबर याद आ गया जिन्होंने कभी नौकरी खोजने के बारे में नहीं पूछा था।
गर्व है तुम पर।
हमें पहले से पता था।
परिवार की दावत कब है?
रितेश ने दो बार फोन किया।
पहली बार निखिल ने नहीं उठाया। दूसरी बार इसलिए उठाया कि सुनना चाहता था, शुरुआत कैसे होगी।
“चैंपियन!” रितेश बोला। “अब बड़ी पार्टी चाहिए। उसी जगह?”
निखिल पलंग के किनारे बैठ गया।
“वहाँ अपना पुराना हिसाब चुका दिया?”
कुछ पल जवाब नहीं आया।
“वह बात अब क्यों ला रहे हो?”
“क्योंकि उसी रेस्तराँ का नाम ले रहे हो।”
“गलतफहमी थी।”
“तो हिसाब साफ करना आसान होगा।”
रितेश की आवाज धीमी हुई।
“पुरस्कार वाली फोटो भेजो। अपने कारोबार के पन्ने पर लगाऊँगा। स्थानीय जीत की अच्छी कहानी है।”
निखिल ने पानी की बोतल से टिके प्रमाणपत्र को देखा।
“नहीं।”
रितेश वजह सुनने के लिए रुका।
निखिल ने कोई वजह नहीं दी।
* * *
अगला निमंत्रण काव्या के पिता का आया।
उन्होंने परिवार के खाने पर पुरानी अप्रिय बात पीछे छोड़ने का सुझाव दिया।
निखिल ने पूछा कि जिन्हें बताया गया था कि वह बिना पैसे दिए भाग गया, क्या उन्हें सही हिसाब बताया गया है?
उन्होंने कहा, सब फिर खोलने की जरूरत नहीं है।
“मेरे लिए अभी बंद नहीं हुआ,” निखिल ने कहा।
उसने खाने की रसीद और रेस्तराँ की सुधार वाली पुष्टि फिर भेजी।
“जो खाना देने का वादा किया था, वह मैंने चुकाया। रितेश के खर्च उसके हैं। किसी मुलाकात से पहले मेरे बारे में कही गई गलत बात ठीक कर दीजिए।”
गुस्से वाला जवाब नहीं आया।
खाने का दूसरा संदेश भी नहीं आया।
दो दिन बाद एक रिश्तेदार ने छोटा संदेश भेजा।
उन्होंने गलत समझा था। उन्हें अफसोस था।
निखिल ने धन्यवाद कहा।
उसी शाम काव्या ने लिखा, तस्वीर देखी। बधाई।
उसने लिखा, धन्यवाद।
उसने यह नहीं पूछा कि वह कैसी है।
एक मिनट बाद फोन उलटा रख दिया और माँ के साथ सब्जी काटने लगा।
* * *
तीन सप्ताह बाद वह मीरा के रेस्तराँ लौटा।
इस बार छह लोग थे। माता-पिता, पूनम, फैज, फैज की पत्नी और वह।
बुकिंग उसने खुद की। छह तय भोजन। जो अतिरिक्त मँगाएगा, उसका भुगतान खुद करेगा।
मीरा ने बिना मजाक किए पुष्टि कर दी।
खाने के बीच पिता ने उस नए गोदाम के बारे में पूछा जहाँ निखिल ने सोमवार से काम शुरू किया था। कुछ देर काम की बात हुई। फिर बातचीत खराब पंखे और पूनम के रास्ते भूलने की आदत पर चली गई।
किसी ने नहीं पूछा कि पुरस्कार में कितना पैसा बचा है।
अंत में वेटर ने बिल उसके पास रखा।
सबसे ऊपर उसका नाम था।
नीचे छह भोजन और पहले से दिए अग्रिम का हिसाब था।
निखिल ने रकम जाँची।
फैज ने अपने अतिरिक्त मँगाए मीठे के लिए बटुआ निकाला। उदारता का कोई प्रदर्शन नहीं हुआ। रिश्ते की परीक्षा नहीं ली गई।
निखिल ने उतना चुकाया जितना देने का वादा किया था।
फिर जब परिवार इस बात पर हँसते हुए उलझ रहा था कि किसके साथ कौन घर जाएगा, उसने रसीद मोड़ी और जेब में रख ली।