BET 213 — वह लिफाफा जिसे कोच ने नहीं लिया
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BET 213 — वह लिफाफा जिसे कोच ने नहीं लिया

काल्पनिक कहानी · पात्र और घटनाएँ कहानी का हिस्सा हैं।

अरुण बैठने वाला था कि रजत ने कुर्सी खींच ली। “ध्यान से। इस पर छूट नहीं मिलती।” तीन लोग हँसे। अभ्यास की कॉपी अरुण की बाँह के नीचे थी। कुर्सी के पैर फर्श पर…

अरुण बैठने वाला था कि रजत ने कुर्सी खींच ली।

“ध्यान से। इस पर छूट नहीं मिलती।”

तीन लोग हँसे।

अभ्यास की कॉपी अरुण की बाँह के नीचे थी। कुर्सी के पैर फर्श पर घिसटे। रजत ने उसे अपनी मेज के पास कर लिया।

किसी ने वापस रखने को नहीं कहा।

कमरे के दूसरे छोर पर राव मैडम हाजिरी का गायब पन्ना ढूँढ़ रही थीं। उन्होंने सुना नहीं था।

अरुण उन्हें बुला सकता था।

रजत यही चाहता था।

कमरा फिर देखता कि कोच अपने पसंदीदा को बचाने आ गईं।

अरुण गलियारे से प्लास्टिक की कुर्सी ले आया। दरवाजे के पास बैठ गया। आधे घंटे तक ऐसा दिखाता रहा जैसे बाहर के ट्रैफिक के बीच चर्चा सुन पा रहा हो।

अंत में देखा कि एक ही पंक्ति तीन बार लिख दी थी।

* * *

वह सत्ताईस साल का था। नागपुर के बाहर निजी बस डिपो में बसें साफ करता था।

सुबह की पाली अँधेरे में शुरू होती थी। यात्रियों के आने तक वह सीढ़ियों की धूल धो चुका होता। सीटों के नीचे छूटी चीजें देख चुका होता।

सिक्के मिलते थे। बालों की क्लिप। खाने के कागज।

एक बार चमकाया हुआ अकेला जूता मिला था।

कमाई से किराए और घरेलू खर्च में उसका हिस्सा निकल जाता था।

आयोजित भारतीय रमी के लिए पैसे दो बार खोजने पड़ते थे। पहले अभ्यास के। फिर वहाँ पहुँचने के जहाँ प्रतियोगिता होती थी।

राव मैडम का वयस्क समूह हफ्ते में तीन शाम मिलता था।

महीने की फीस बारह सौ रुपये थी।

अरुण नकद देता था। कमाई खर्च करने से पहले अलग-अलग लिफाफों में बाँट लेता था।

किराए का लिफाफा मोटा होता था। खाने वाला जल्दी पतला हो जाता था।

अभ्यास का लिफाफा सबसे आखिर में बंद होता था।

* * *

पहली बार पैसे कॉपी में लौटे।

बारह सौ रुपये। ऊपर एक पन्ना था।

आने-जाने के लिए। यहाँ पहुँचने के चक्कर में खाना मत छोड़ना।

वह पैसे वापस लेकर गया।

मैडम ने कहा, कुछ पैसे उपलब्ध हैं। चाहती हैं कि वह यह प्रशिक्षण चक्र पूरा करे।

“कब लौटाऊँ?”

“बाद में बात करेंगे। आखिरी बस से पहले घर जाओ।”

उसे फिर पूछना चाहिए था।

उसने नहीं पूछा।

पैसों की जरूरत थी। ज्यादा सवाल करने से प्रस्ताव गायब भी हो सकता था।

दूसरे महीने फिर बारह सौ लौटे।

तीसरे महीने एक नोट पहचान में आया। उस पर स्याही का छोटा निशान था। सुबह फीस के लिफाफे में वही रखा था।

वह उसके अपने दिए पैसे लौटा रही थीं।

* * *

राव मैडम दफ्तर की नौकरी से सेवानिवृत्त हुई थीं। स्टेशनरी की दुकान के ऊपर किराए के कमरे में समूह चलाती थीं।

अमीर नहीं थीं।

कमरे में एक पंखा ठीक चलता था। दूसरा आवाज ज्यादा करता था।

जरूरत पड़ने पर नई अभ्यास सामग्री अपने पैसों से खरीद लेती थीं।

अरुण समझता था कि आपात जरूरतों के लिए कुछ अतिरिक्त रकम रखती होंगी।

जब लौटाई फीस के बारे में सीधे पूछा, तो उन्होंने माना कि उसकी जगह का खर्च अपनी रकम से दे रही थीं।

“बताया क्यों नहीं?”

“तुम्हें शर्मिंदा नहीं करना चाहती थी।”

उसने मेज पर रखे तीन लिफाफे देखे।

शर्म तो पहले ही महसूस हो रही थी। बस ठीक से मालूम नहीं था कि किस बात की।

“यह उधार है?”

“नहीं।”

इस बार साफ कहा।

अरुण ने लिखकर देने को कहा।

उनका चेहरा थोड़ा बदला। फिर सिर हिला दिया।

* * *

रजत ने लिफाफे देख लिए।

अपना फोन लेने वापस आया था। मैडम लिख रही थीं। वह दरवाजे पर रुक गया।

पूछा, क्या हो रहा है।

“अरुण की फीस सहायता साफ कर रहे हैं,” उन्होंने कहा।

रजत ने अरुण को देखा। फिर पैसे देखे।

शाम को समूह में संदेश आने लगे।

कुछ लोग सीखने के पैसे देते हैं। कुछ को आने के पैसे मिलते हैं।

अरुण ने दो बार पढ़ा।

किसी ने हँसता हुआ चेहरा भेजा।

एक और ने पूछा, सहायता वाले छात्रों को चयन में भी मदद मिलती है क्या।

रजत ने लिखा, समझने वाले समझ जाएँ।

अरुण ने जवाब लिखा। मिटाया। दूसरा लिखा।

भेजने से पहले बस उसके स्टॉप पर पहुँच गई।

वह उतर नहीं पाया। अगले स्टॉप से पैदल लौटना पड़ा।

* * *

अगली बैठक में कुर्सी वाली बात हुई।

बाद में रजत ने ऊँची आवाज में पूछा कि चयन प्रतियोगिता में अरुण सामान्य दरवाजे से जाएगा क्या।

अरुण ने कॉपी बैग में रखी।

“सबकी तरह जाता हूँ।”

“हाँ, बस कुछ लोगों के लिए कोई दरवाजा पकड़े खड़ा रहता है।”

इस बार राव मैडम ने सुन लिया।

उन्होंने रजत को रोका।

उसने हाथ फैला दिए।

“बराबरी ही तो माँग रहे हैं।”

अरुण पहली बार देख रहा था कि सही शब्द में कितनी खराब बात छिपाई जा सकती है।

बराबरी सुनने में ठीक थी।

उसे भी बराबरी चाहिए थी।

एक कमरे में बैठने के लिए बार-बार यह साबित न करना पड़े कि बारह सौ रुपये की जरूरत ने उसका चरित्र नहीं बदल दिया।

मैडम ने अकेले में बात करने को कहा।

अरुण ने सिर हिला दिया।

इल्जाम तो सबको सुनने दिया गया था।

* * *

रात को उसने रसीदें निकालीं।

बारह सौ के तीन भुगतान।

बारह सौ की तीन वापसी।

कुल तीन हजार छह सौ की सहायता।

उधार न होने वाला लिखित पन्ना भी था।

हाजिरी के रिकॉर्ड थे। सामान्य अभ्यास के नोट थे। उसी प्रक्रिया से भेजा चयन आवेदन था जिससे दूसरों ने भेजा था।

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इनसे अच्छा खिलाड़ी होना साबित नहीं होता था।

जो हुआ था, वह दिखाया जा सकता था।

साथ रहने वाला नितिन उसे फर्श पर कागज लगाते देख रहा था।

“समूह छोड़ रहे हो?”

“पता नहीं।”

“वह न बोलता तो छोड़ते?”

“नहीं।”

नितिन ने पैर पीछे कर लिए ताकि रसीद पर न पड़ जाएँ।

“तो यह जवाब उससे मत लिखवाओ।”

* * *

अरुण ने अगले अभ्यास से पहले बैठक माँगी।

अपने भुगतान और मिली सहायता के कागज दिखाए। खाते की वह निजी जानकारी ढक दी जिसका सवाल से संबंध नहीं था।

राव मैडम ने बताया कि सहायता अपने पैसों से दी थी।

किसी दूसरे छात्र की फीस या प्रतियोगिता के प्रवेश कोष से नहीं ली थी।

उन्होंने यह भी माना कि तरीका ठीक नहीं था।

“शर्तें साफ होनी चाहिए थीं। इसे अंदाजा नहीं लगाना चाहिए था कि मुझ पर पैसा बाकी है या नहीं।”

रजत पीछे टिक गया।

“तो मान रही हैं कि पक्षपात था।”

“आर्थिक सहायता थी, यह मान रही हूँ।”

बात उनके चारों ओर घूमने लगे, उससे पहले अरुण बोला।

“अगर लगता है चयन का नतीजा बदला गया है तो वही जाँच माँगो जो किसी और के लिए माँगते। लिखो कि क्या बदला।”

रजत ने कहा, सब जानते हैं ये चीजें कैसे होती हैं।

“तो इस वाली बात लिख दो।”

* * *

अपमान के नीचे एक वास्तविक सवाल भी था।

देविका ने पूछा, किसी और को मदद चाहिए तो कैसे माँगे?

उसके पिता का कारोबार बंद हो गया था। किसी को कारण बताए बिना समूह छोड़ने के बारे में सोच रही थी।

मैडम के पास तैयार जवाब नहीं था।

अरुण ने यह देखा।

कहानी आसान होती अगर एक तरफ दयालु शिक्षक होती और दूसरी तरफ जलने वाले छात्र।

लेकिन यहाँ मदद करने वाली शिक्षक थीं।

बदनाम करने वाला छात्र था।

और एक छात्रा थी जिसे जरूरत थी, मगर पता नहीं था कि सहायता मिल भी सकती है।

तीनों एक समस्या नहीं थीं।

मैडम ने माना कि अगली सहायता के लिए साफ प्रक्रिया चाहिए।

अरुण ने कहा कि चयन वाला आरोप अलग निपटाया जाए।

वह प्रतियोगिता छोड़कर चुप्पी नहीं खरीदेगा।

* * *

आयोजन समिति के पास पहले से शिकायत जाँचने का तरीका था।

अरुण ने आवेदन के कागज दिए। पात्रता पर कोई सवाल हो तो सामान्य प्रक्रिया से जाँचने को कहा।

राव मैडम चयन समिति में नहीं थीं।

रजत ने शिकायत दी।

उसमें फीस की सहायता और अभ्यास के बाद अरुण के रुकने का जिक्र था।

समिति ने उन बैठकों के बारे में पूछा।

अरुण कुर्सियाँ लगाने और अपने नोट देखने रुकता था। तय सवाल-जवाब के समय का दूसरे खिलाड़ियों ने भी इस्तेमाल किया था।

उपस्थिति और सत्र के रिकॉर्ड से यही मिला।

फीस की मदद चयन की शर्तें नहीं बदलती थी।

नतीजा बदलने या चयन में निजी पहुँच का कोई आधार नहीं मिला।

समिति ने संबंधित लोगों को निष्कर्ष भेजा।

अरुण ने कहा कि जरूरी निष्कर्ष समूह में भी जाए, जहाँ आरोप फैला था।

* * *

रजत बोला, उसने तो सवाल पूछे थे।

अरुण ने पिछला संदेश खोला।

“तुमने कहा था मेरा दूसरा रास्ता है।”

“लोग गलत समझ गए।”

“तो ठीक कर दो।”

रजत ने मैडम की तरफ देखा।

इस बार उन्होंने किसी को उस चुप्पी से नहीं बचाया।

आखिर उसने लिखा कि जाँच में चयन संबंधी आरोप का आधार नहीं मिला।

उदार माफी नहीं थी। शब्द वैसे थे जैसे आदमी चाहता हो कि विषय तुरंत बंद हो जाए।

अरुण ने पढ़ा और फोन रख दिया।

अगली शाम काम से देर हो गई।

मुख्य मेज के पास एक कुर्सी खाली थी।

वह बैठ गया।

किसी ने खिसकाई नहीं।

* * *

अचानक अच्छा खेलने नहीं लगा।

बहस ने नींद खा ली थी। काम धीमा हो रहा था।

अभ्यास में जब मैडम उससे बात करतीं तो सोचने लगता कि बाकी क्या समझ रहे होंगे।

एक सामान्य सुधार पर बहुत लंबी सफाई दी।

उन्होंने खत्म होने दिया।

फिर पूछा, “अब असली गलती देख सकते हैं?”

वह अनचाहे हँस पड़ा।

फिर देखी।

अगले हफ्तों में बैठकें सामान्य होने लगीं।

दो बार मैडम उस पर झुँझलाईं।

एक बार दर्ज विवरण पर अरुण सही था। उन्होंने जाँचकर पन्ना ठीक किया।

सहायता पाने वाले ने कोच को ठीक किया तो कोई अनर्थ नहीं हुआ।

अपमान हुआ था, इसलिए प्रतियोगिता में जगह अपने आप नहीं मिलनी थी।

चयन में खेलना पड़ता।

* * *

आयोजन से एक दिन पहले डिपो का एक साथी बीमार पड़ गया।

अरुण से पूछा गया कि अतिरिक्त पाली का कुछ हिस्सा कर सकता है क्या।

पैसे चाहिए थे।

नींद भी चाहिए थी।

बीस मिनट तक दिन का ऐसा हिसाब बनाने की कोशिश की जिसमें दोनों आ जाएँ।

फिर अतिरिक्त घंटे मना किए। अपना काम ध्यान से पूरा किया।

नितिन ने यात्रा का खाना बाँधा। अरुण बैग की वही तीन चीजें बार-बार जाँच रहा था।

“चौथी चीज भी देख सकते हो,” नितिन बोला। “कुछ बदलाव रहेगा।”

अरुण मुस्कराया।

बस स्टॉप पर उसने किराए के पैसे गिने।

कई हफ्तों में पहली बार उस गिनती के साथ रजत की आवाज नहीं सुनाई दी।

* * *

चयन एक ऐसे हॉल में था जहाँ वह पहले नहीं गया था।

पंजीकरण डेस्क पर किसी को तीन लिफाफों में दिलचस्पी नहीं थी।

नाम, पुष्टि और जरूरी कागज चाहिए थे।

उसने दे दिए।

सुबह कठिन रही।

एक सत्र में समझ आया कि पिछली निराशा की भरपाई बहुत जल्दी करना चाह रहा है।

रुका। अनुमत विराम लिया। वापस आया।

दोपहर को मैडम का संदेश आया। खाना खाया?

उसने खाली डिब्बे की तस्वीर भेजी।

जवाब आया कि इतनी पास से फोटो ली है, कुछ साबित नहीं होता।

उसे उनकी आवाज सुनाई देने लगी।

शाम तक फाइनल के लिए चुना जा चुका था।

पहला फोन नितिन को किया।

उसे बताना था कि खाना बचाकर रखना है या नहीं।

* * *

चयन और फाइनल के बीच एक महीना था।

समूह मिलता रहा।

मैडम और दो स्वयंसेवकों ने अगले प्रशिक्षण चक्र के लिए छोटी सहायता योजना लिखी।

आवेदन की आखिरी तारीख साफ होगी। उपलब्ध रकम और सहायता देने के आधार बताए जाएँगे।

आर्थिक सहायता और प्रतियोगी चयन अलग रहेंगे।

जिसे सहायता मिलेगी, उसे लिखित शर्तें मिलेंगी।

उसके घर की निजी परेशानी पूरे कमरे का तमाशा नहीं बनेगी।

देविका ने मसौदा पढ़कर दो अस्पष्ट जगहें पकड़ीं।

अरुण ने एक और पकड़ी।

रजत ने शिकायत की कि अब सब कुछ बहुत औपचारिक हो गया है।

मैडम ने कागज देखा। फिर उसे देखा।

“हाँ,” उन्होंने कहा। “यह काम का लग रहा है।”

सुधार किए गए।

योजना छोटी ही थी। नियम लिख देने से पैसा पैदा नहीं होता था।

मगर किसी आवेदक को यह अंदाजा नहीं लगाना पड़ता कि कौन-सा सवाल धीरे से पूछे और सबके जाने के बाद किसके पास जाए।

* * *

फाइनल में ऐसे खिलाड़ी थे जिनकी जिंदगी अरुण नहीं जानता था।

एक दुकान चलाता था।

दूसरा उस कस्बे से आया था जिसका नाम उसने सिर्फ रास्ते के बोर्ड पर देखा था।

पास की मेज पर एक महिला खाना खाते हुए जासूसी उपन्यास पढ़ रही थी।

वे उसके निजी झगड़े को पूरा करने के लिए इकट्ठे नहीं हुए थे।

उन्हें भी जीतना था।

यह उसे अच्छा लगा।

सत्र ध्यान माँग रहे थे।

दूसरे दिन तक वह मन में भाषण बनाना भूल चुका था।

आखिरी नतीजे में देर हुई। कुल अंक जाँचे जा रहे थे।

अरुण पहले स्थान पर था।

वह इतनी जल्दी खड़ा हुआ कि पानी की बोतल गिरा दी।

पास के खिलाड़ी ने फर्श तक पहुँचने से पहले पकड़ ली।

जीत के बाद की पहली याद उसे उसी छोटी मदद की रही।

* * *

पुरस्कार दिए जाने के बाद मैडम निकास के पास खड़ी थीं।

गर्व भी लग रहा था। नाराज भी।

“आखिरी सत्र खत्म हुआ तो फोन क्यों नहीं किया?”

“नतीजा पता नहीं था।”

“भविष्य बताने को नहीं कहा था।”

वह हँस पड़ा।

बैग में कागजों के लिए सूखी जगह ढूँढ़ते समय उन्होंने ट्रॉफी पकड़ ली।

एक पल उसे ऐसे सँभाला जैसे उनकी अपनी हो।

फिर लौटा दी।

“नतीजे का पन्ना भी रखना।”

उसने रखा।

वापसी की बस में सोचा कि रजत के सामने ट्रॉफी रखेगा।

फिर सोचा कि उस एक क्षण के लिए कितनी देर उसे उठाए घूमना पड़ेगा।

सीधे घर गया।

नितिन ने मेज पर खाना ढककर रखा था।

* * *

अगले अभ्यास में लोगों ने बधाई दी।

रजत ने कहा, अच्छा प्रदर्शन था।

अरुण ने धन्यवाद कहा।

कुर्सियों के बारे में कुछ नहीं जोड़ा।

मैडम ने समय पर सत्र शुरू कर दिया।

तब अरुण को जीत असली लगी।

वह जीत चुका था। मंगलवार को फिर भी कुछ सीखना बाकी था।

बाद में बैग से लिफाफा निकाला।

तीन हजार छह सौ रुपये।

अलग रखने से पहले अपने खर्च देख लिए थे। यह लौटाने के लिए उतनी ही रकम कहीं और से उधार नहीं लेनी थी।

लिफाफा मैडम की मेज पर रखा।

उन्होंने खोला नहीं।

“क्या है?”

“जो फीस लौटाई थी।”

उन्होंने वापस सरका दिया।

“कहा था, उधार नहीं है।”

* * *

अरुण ने लिफाफा बीच में रहने दिया।

“अब दे सकता हूँ।”

“अगले महीने सामान्य फीस देना।”

“नहीं चाहता लोग कहें—”

उन्होंने रोक दिया।

“मुझे देने से उन्होंने जो कहा था, वह सही हो जाएगा?”

अरुण ने नीचे देखा।

उसका एक हिस्सा जीत को दाग साफ करने का मौका मान रहा था।

हर रुपया लौटा दे तो शायद कोई नहीं कह सकेगा कि जरूरत पड़ी थी।

मैडम कुर्सी पर पीछे हुईं।

“तुम्हें मदद चाहिए थी। मैं कर सकती थी। ठीक से समझाना चाहिए था। बस इतना हुआ था।”

नीचे स्टेशनरी की दुकान का शटर उतर रहा था।

उन्होंने पूछा कि घर लौटने के पैसे हैं क्या।

वह हँसा। फिर हथेली के पिछले हिस्से से चेहरा पोंछा।

“हाँ।”

“अच्छा। लिफाफा रखो।”

* * *

एक हफ्ते तक रखा।

फिर नई सहायता निधि के बारे में पूछा।

वही रकम दे सकता है क्या, बिना यह चुने कि किसे मिले?

स्वयंसेवकों ने हाँ कहा।

उसने लिखी शर्तें पढ़ीं। तीन हजार छह सौ भेजे। रसीद ली।

रकम उपलब्ध निधि में शामिल हो गई।

किसी दूसरे के आवेदन पर निर्णय लेने का अधिकार नहीं खरीदा था।

उसने एक बात कही।

“नए छात्र से मत कहिएगा कि मेरा एहसान माने।”

रिकॉर्ड में मदद कर रही देविका ने सिर उठाया।

“अरुण, रमी सिखाने की कोशिश कर रहे हैं।”

वह मुस्कराया।

लिफाफा अब खाली था।

घर ले गया। अगले महीने की सामान्य फीस उसी में रखी।

* * *

अगला चक्र शुरू हुआ तो एक नई वयस्क छात्रा मोटरसाइकिल का हेलमेट लेकर आई।

नाम काव्या था।

घरेलू उपकरण ठीक करती थी। शाम की बैठकों में ही आ सकती थी।

नई प्रक्रिया से सहायता मिली थी।

स्वागत करने के लिए समूह को उसके घर के खातों का विवरण नहीं चाहिए था।

अरुण दरवाजे के पास था।

एक पल प्लास्टिक की कुर्सी याद आई। बाहर के ट्रैफिक में दबती चर्चा याद आई।

फिर उसने पास की खाली कुर्सी से अपना बैग उठा लिया।

“यहाँ कोई बैठा है?” काव्या ने पूछा।

“नहीं।”

उसने हेलमेट रखा। कॉपी खोली।

राव मैडम ने उस शाम का काम समझाना शुरू किया।

काव्या ने सवाल पूछा।

अरुण ने उसकी तरफ से जवाब नहीं दिया।

मेज की तरफ मुड़कर सुनने लगा।

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