1. BET 213 — बंद दराज़ में रखा स्ट्राइकर
विक्रम ने काँच की दराज़ बस इतनी खोली कि सुरेश अपना स्ट्राइकर देख सके। फिर बंद कर दी। हाथी दाँत जैसे रंग की वह गोल डिस्क चाँदी के सिगरेट केस के पास रखी थी। अभ्यास कक्ष में बैठे वे लोग, जो कभी सुरेश से अपनी दुकानों के नाम लिखवाते थे, उसे खाली हाथ खड़ा देखते रहे।
“मेरी सलाह पर खरीदा था,” विक्रम बोला। “पूरा हिसाब निपटाकर ले जाना।”
खरीद की कोई रकम बाकी नहीं थी। रसीद सुरेश के पास थी। विवाद पुराने साझा अभ्यास कक्ष के खर्चों का था। कुछ मदों पर असहमति थी, कुछ चुकाए जा चुके थे। कमरा विक्रम का था। उसने तय कर लिया था कि इसलिए फैसला करने वाला भी वही होगा। सुरेश ने दराज़ की तरफ हाथ बढ़ाया तो उसने कलाई पकड़ ली।
“पहले ये हाथ धोओ। यह प्रतियोगिता का सामान है।”
सुरेश के नाखूनों के आसपास दरारों में नीला रंग जमा था। चवालीस साल की उम्र में वह वडोदरा में दुकानों के बोर्ड लिखकर कमाता था। सॉल्वेंट कुछ रंग उतार देता, मगर चमड़ी रूखी और दुखती छोड़ता। पूरा रंग कभी नहीं निकलता था। किसी ने हँस दिया। सुरेश ने रसीद जेब में रखी और बिना स्ट्राइकर बाहर आ गया।
उसकी पत्नी रूपा स्कूटर के पास इंतज़ार कर रही थी। वह जानती थी इस डिस्क पर कितनी रकम लगी थी। तीन शाम बहस हुई थी। अब सुरेश को बताना था कि जिस चीज़ से उसने अपना खेल सुधरने का वादा किया था, वह दूसरे आदमी की दराज़ में बंद है।
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2. महँगी सफाई
रूपा ने कैरम छोड़ने को नहीं कहा। उसने कहा कि हर हार के बाद बदलने वाली सफाई की कीमत परिवार से लेना बंद करे। पहले बेहतर स्ट्राइकर चाहिए था। फिर परिचित बोर्ड। फिर विक्रम के कमरे में एक और शाम। इसी अभ्यास में वह रूपा के पिता से मिलने के दो तय कार्यक्रम भूल गया था। उन मुलाकातों को उसने ध्यान भटकाने वाली बातें कहा था। रूपा ने सारी घटनाएँ गिनाईं तो सुरेश खेल का बचाव करने लगा। बात खेल की नहीं, उसके वादों की थी।
अगला रविवार उसने अधूरा पड़ा दुकान का बोर्ड पूरा करने में बिताया। सोमवार को मोहल्ले के हॉल गया और वहाँ का साधारण, स्वीकृत स्ट्राइकर उधार लिया। उसका शानदार केस नहीं था। किनारा उँगली के नीचे अलग महसूस होता था।
पहले दस शॉट खराब गए। उसने पुराने स्ट्राइकर जितना जोर लगाया। दो बार स्ट्राइकर खुद पॉकेट में चला गया। फिर बताने लगा कि सामान उपयुक्त नहीं है। हॉल की देखभाल करने वाले सेवानिवृत्त खिलाड़ी पॉल उसकी बात पूरी होने तक सुनते रहे।
“क्या अगला शॉट यह सफाई सुनेगा?”
सुरेश को वह आदमी तुरंत नापसंद हुआ। फिर भी अगले दिन लौट आया। पॉल ने स्ट्राइकर को हॉल की उपकरण शर्तों के अनुसार जाँचा, साफ करने का कपड़ा दिया और दस छोटे शॉट खेलने को कहा। कुछ पॉकेट नहीं करना था। संपर्क के बाद स्ट्राइकर को अभ्यास के चिह्नित हिस्से में रोकना था। सुरेश दस में सात बार असफल रहा।
3. स्ट्राइकर कहाँ रुका
अभ्यास में हटाए जा सकने वाले कागज़ के संकेत लगते थे। प्रतियोगिता में उनका उपयोग नहीं होता था। पॉल ने एक गोटी को कोने की पॉकेट के पास रखा। सुरेश को उसे अंदर करना था और फिर स्ट्राइकर कहाँ जाएगा, यह भी नियंत्रित करना था। सीधा तेज शॉट अक्सर गोटी और स्ट्राइकर दोनों गिरा देता। बहुत हल्का कट कभी गोटी को छूता ही नहीं। अब वह शॉट को केवल अपनी गोटी गायब होने से सफल नहीं कह सकता था।
हर प्रयास के दो नतीजे लिखता। लक्ष्य का परिणाम और स्ट्राइकर की अंतिम जगह। दूसरे खाने में गलतियों के निशान भर गए। उँगली दुखती तो रुक जाता। दर्द को जिद की परीक्षा नहीं बनाता था।
पॉल ने दिखाया कि बेसलाइन पर वैध स्थिति में थोड़ा बदलाव संपर्क का कोण कैसे बदलता है। उन्होंने सीधे रास्ते और पहले कुशन से लौटकर आने वाले रास्ते की तुलना की। कुशन गति घटाता और दिशा बदलता था। वह सटीकता की जरूरत समाप्त नहीं करता था। कुछ वापसी शॉट नाखून की चौड़ाई से चूकते।
सुरेश ने तीन अलग गति वाले बोर्डों पर अभ्यास किया। तेज बोर्ड पर पुरानी रिलीज बहुत दूर जाती। धीमे पर अधिक सावधान शॉट संपर्क से पहले मर जाता। अनुमत वॉर्मअप में बोर्ड को देखने की आदत बनी। उसे अच्छा या खराब घोषित करना छोड़ दिया।
घर में रूपा ने घरेलू कैलेंडर के पास छोटे तीरों वाला पन्ना देखा। अभ्यास के घंटे पहले से तय जिम्मेदारियों के आसपास लिखे थे। उसने तारीफ नहीं की। गुरुवार को सुरेश समय पर तैयार मिला तो उसने पिता से मिलने जाने के लिए स्कूटर की चाबी उसके हाथ में रख दी।
4. वह अंत जो मान्य नहीं हुआ
पहले क्वालिफायर ने पुरानी आदत की कीमत ली। सुरेश की एक सफेद गोटी बची थी और सीधा रास्ता आकर्षक था। उसने जरूरत से ज्यादा जोर लगाया। सफेद गोटी गिरी, मगर स्ट्राइकर भी गिर गया। स्ट्रोक सही तरीके से खेला गया था, लेकिन पॉकेट हुई सफेद और एक देय गोटी बोर्ड पर लौटानी पड़ीं। उसकी बारी जारी रही। वह अगला शॉट चूका। उसके बाद ही प्रतिद्वंद्वी की बारी आई और उसने बोर्ड जीता।
सुरेश ने मुँह खोला, फिर बंद कर लिया। दोनों चीजें गिरते उसने देखी थीं। उधार का स्ट्राइकर अपने आप नहीं चला था। उसी शाम पॉल ने जीते हुए बोर्डों से शुरुआत करने से इनकार किया। उन्होंने वह स्थिति फिर बनाई जिसमें सफेद के पीछे स्ट्राइकर भी पॉकेट में गया था। सुरेश ने वही तेज रास्ता तीन बार और लिया। दो बार वही गलती हुई। शुरू की जगह बदलकर और रिलीज घटाकर ही स्ट्राइकर सुरक्षित रहा।
नया शॉट कम नाटकीय था। संकरा संपर्क, धैर्य और सतह का ईमानदार अनुमान चाहिए था। सुरेश तब तक अभ्यास करता रहा जब तक चौकीदार ने आधी बत्तियाँ बंद नहीं कर दीं। फिर तय समय पर उठा। घर का एक और वादा तोड़कर अभ्यास का अतिरिक्त घंटा नहीं खरीदा।
अगला क्वालिफायर तीन गेम चला। पहला हारा। दूसरे में संभला। तीसरे के अंतिम चार बोर्ड में उसका स्ट्राइकर एक बार भी पॉकेट में नहीं गया। जीत से मुख्य चैंपियनशिप में जगह मिली। उसकी कॉपी अब भी उसी अमान्य अंत से शुरू होती थी। जीत की शीट उसने उसके बाद लगाई, ऊपर रखकर गलती को छिपाया नहीं।
5. दराज़ फिर खुलती है
विक्रम चैंपियनशिप में दो चमकते केस लेकर आया। सुरेश के हाथ में हॉल का साधारण स्ट्राइकर देखकर हल्का मुस्कराया। “तुम्हारा भी लाया हूँ। मैच से पहले हिसाब खत्म कर सकते हैं।”
दोनों की रसीदों के साथ विवाद पहले ही हॉल की समिति तक पहुँच चुका था। सुरेश उस बैठक में जाएगा। मुकाबले के बोर्ड के पास सौदा नहीं करेगा। “नहीं। समिति की बैठक मंगलवार को है।”
विक्रम ने केस रख दिया। शुरुआती दौर में उसने अच्छा खेला। आत्मविश्वास वाले कट, नियंत्रित क्वीन कवर और एक लंबा रिबाउंड, जिस पर सुरेश ने भी ताली बजाई। वह मजबूत प्रतिद्वंद्वी था। केवल उसका लहजा न मानने से उसे नहीं हराया जा सकता था।
क्वार्टर फाइनल में सुरेश को अभ्यास और असली स्थिति का अंतर समझ आया। जिस रिबाउंड रास्ते से सफेद निकालना चाहता था, वहाँ काली गोटी खड़ी थी। उसने अपनी एक बारी सफेद की स्थिति बेहतर करने में लगाई। कॉपी में मौजूद लेकिन बोर्ड पर बंद रास्ते का शॉट नहीं लिया। प्रतिद्वंद्वी ने अच्छा सफाया करके वह बोर्ड जीता। सुरेश ने अगले दो बोर्ड उनकी वास्तविक स्थितियाँ पढ़कर जीते।
सेमीफाइनल में वह पहला गेम 21–25 हारा। फिर 25–18 और 25–20 से जीता। गेमों के बीच स्ट्राइकर साफ करता, पानी पीता और अगला ब्रेक किसका है देखता। किसी अधिक भाग्यशाली डिस्क से बदलने नहीं गया। दूसरे बोर्ड पर विक्रम ने भी अपना सेमीफाइनल जीता। अब दोनों को फाइनल में बैठना था। पुरानी दराज़ का मामला मंगलवार तक रुका रह सकता था। सामने का बोर्ड अभी जवाब माँग रहा था।
6. ग्यारह अंकों का सबूत
फाइनल तीन में से दो गेम जीतने का था। प्रत्येक गेम प्रतियोगिता के नियमों के अनुसार पच्चीस अंक या आठ बोर्ड की सीमा तक चलता। पहले गेम में विक्रम ने बार बार सुरेश को असुविधाजनक कोण दिए। उसने क्वीन वाला बोर्ड तब साफ किया जब सुरेश की चार गोटियाँ बची थीं। पहला गेम 25–11 से खत्म हुआ।
ग्यारह अंकों पर पुराने अभ्यास कक्ष की हर हँसी जैसे संख्या बन गई। सुरेश की नजर विक्रम की कुर्सी के पास रखे केस पर गई। उसने अपनी नजर पकड़ ली। भीतर की डिस्क अभी चूके हुए कट नहीं बदल सकती थी।
ब्रेक में उसने दो स्पष्ट गलतियाँ देखीं। आखिरी सफेद को ऐसी पॉकेट के पास छोड़ दिया था जहाँ स्ट्राइकर की सुरक्षित निकासी नहीं थी। फिर कठिन क्वीन पर हमला किया, जबकि आसान कवर बचाकर नहीं रखा। दोनों निर्णय महँगे स्ट्राइकर पर निर्भर नहीं थे।
दूसरे गेम में उसने क्वीन से पहले बाधा बन रही सफेद निकाली। विक्रम ने नियंत्रित क्रम में तीन काली गोटियाँ उतारीं। सुरेश अपनी अगली वैध बारी तक रुका। फिर क्वीन पॉकेट करके तुरंत अलग सफेद से उसका कवर किया। बाकी सफेद मौजूद थीं, इसलिए उसने जश्न नहीं मनाया।
गेम उसके पक्ष में 21–17 पहुँचा। अगले बोर्ड में उसने अपना रंग साफ किया और चार विरोधी गोटियाँ बचीं। क्वीन के अंक की जरूरत के बिना चार अंक मिले। स्कोर 25–17 हुआ। दोनों ने एक एक गेम जीता था। लोग उपकरण का किस्सा देखने आए थे। खेल अगले उपलब्ध रास्ते की परीक्षा बन चुका था।
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7. लाल गोटी के बाद बचा काम
निर्णायक गेम में शुरू से विक्रम आगे रहा। सुरेश ने दो छोटे बोर्ड जीतकर अंतर घटाया। फिर एक पतला कट जरूरत से ज्यादा भर गया और बोर्ड हार गया। अगले तय विराम में उसका हाथ हल्का काँप रहा था। उसने पानी पिया, उँगलियाँ आराम में रखीं और अंपायर के बुलाने से पहले काँपना घटने दिया।
छह बोर्ड बाद विक्रम 22–20 से आगे था। सातवें बोर्ड में सुरेश का ब्रेक था। दोनों ने उपलब्ध गोटियाँ उतारीं और दूसरे के लिए कठिन रास्ते छोड़े। क्वीन कुछ गोटियों के पास अटकी रही। सुरेश ने नियंत्रित शॉट से उपयोगी सफेद को खुली जगह पहुँचाया, मगर क्वीन को गलती से नहीं गिराया।
अगली बारी पर उसने क्वीन पॉकेट की और तुरंत एक अलग सफेद उतारकर सही कवर किया। गेम में उसके बीस अंक थे। यदि यही बोर्ड जीतता, तो क्वीन के तीन अंक अभी मिल सकते थे। विक्रम पहले साफ कर देता तो सुरेश को उस क्वीन का लाभ नहीं मिलता।
विक्रम ने जवाब में दो शानदार काली गोटियाँ निकालीं। तीसरा प्रयास सफेद के आसपास से संकरा कट था। काली दूर के कुशन के पास रह गई। उसकी दो काली बचीं। सुरेश की भी दो सफेद थीं। क्वीन पहले ही सही कवर हो चुकी थी। अब लाल गोटी के नाम पर कोई चमत्कार नहीं गढ़ा जा सकता था।
सुरेश ने पास वाली सफेद देखी। वह दाएँ कोने की पॉकेट के बहुत करीब थी। सीधा आकर्षक हमला स्ट्राइकर को भी उसी पॉकेट की तरफ भेजता। मोहल्ले के आधी रोशनी वाले हॉल में वह यह निमंत्रण पहले देख चुका था।
8. जिस शॉट से मना करना सीखा था
उसने बेसलाइन पर स्ट्राइकर वैध ढंग से रखा और आँखों से रास्ता जाँचा। सीधा शॉट सफेद को गिरा सकता था। क्वालिफायर वाली गलती दोहरा भी सकता था। तब सफेद गोटियाँ बोर्ड पर लौटतीं और जीतने से पहले अधिक काम बचता। शानदार दिखने वाला संपर्क स्ट्राइकर के गिरने की सफाई नहीं था।
सुरेश ने स्ट्राइकर उठाया और दूसरी वैध शुरुआती जगह चुनी। वहाँ से पहले कुशन छूने वाला रास्ता सफेद तक कम तीखे कोण से पहुँचता था। गोटी को गिरने के लिए बहुत कम दूरी चलनी थी। स्ट्राइकर को संपर्क से पहले धीमा होना और बाद में पॉकेट के मुँह से दूर रहना था।
कमरा शांत हो गया। विक्रम आगे झुका। वह भी वही रास्ता देख रहा था। अब मुस्कान नहीं थी। सुरेश ने हल्की रिलीज दी। स्ट्राइकर कुशन से लगा, संकरे रास्ते से लौटा और सफेद के किनारे को छुआ। सफेद गिर गई। स्ट्राइकर पॉकेट के मुँह के सामने से निकलकर बोर्ड पर रुक गया। अब एक सफेद बची थी, दूर वाले कुशन के दूसरे हिस्से के पास।
अपनी गोटी सही पॉकेट हुई थी, इसलिए सुरेश की बारी जारी रही। दूसरे शॉट की रिलीज अलग चाहिए थी। पहले जैसी बहुत हल्की होती तो दूरी पूरी न होती। पुरानी ताकत दोहराता तो संपर्क के बाद बहुत आगे जाता। अभी स्ट्राइकर जहाँ रुका था, उसने उसे एक बार देखा। वह सतह की उपयोगी जानकारी थी, भाग्य का संकेत नहीं।
सुरेश ने हाथ फिर जमाया। बाहर किसी स्कूटर का हॉर्न दो बार बजा। बोर्ड के पास किसी ने नजर नहीं हटाई।
9. नीले नाखूनों के नीचे पाँच अंक
आखिरी सफेद के लिए दूर की कोने वाली पॉकेट तक नियंत्रित रिबाउंड रास्ता था। सुरेश ने बेसलाइन की जगह चुनी, कोहनी स्थिर की और तब तक रुका जब तक उँगली जरूरत से ज्यादा दबाव देना बंद नहीं कर गई। वह पूरे गेम खेलकर थकने के बाद ऐसी दूरी का अभ्यास करता था। ताजा हाथ से अभ्यास आसान होता है। यह हाथ निर्णायक गेम के सातवें बोर्ड का था।
स्ट्राइकर कुशन तक गया और लौटा। उसने सफेद के बाहरी किनारे को पकड़ा। एक क्षण गोटी पॉकेट के बीच में जाने के बजाय बगल से चलती दिखी। दर्शक सीमा के पीछे किसी ने साँस खींची। फिर गोटी पॉकेट के होंठ से लगी और अंदर चली गई। स्ट्राइकर खेल की सतह पर रहा।
दो काली बची थीं। सुरेश ने अपना रंग साफ किया था। इसी बोर्ड पर क्वीन पहले ही सही कवर की थी। गेम में उसका मौजूदा स्कोर बीस था, इसलिए क्वीन के तीन अंक मिल सकते थे। दो और तीन मिलाकर पाँच हुए। बीस से पच्चीस। विक्रम बाईस पर रहा। सुरेश ने मैच दो गेम से एक जीता।
तालियों से पहले अंपायर ने बोर्ड का हिसाब घोषित किया। विक्रम ने दोनों काली देखीं, फिर बोर्ड पर पड़ी साधारण डिस्क। उसने शीट पर क्वीन की प्रविष्टि जाँची। वह सही थी।
सुरेश की नीले रंग वाली उँगलियाँ बेसलाइन के पास टिकी थीं। उसने उन्हें हथेली में नहीं छिपाया। इस बार उसे सॉल्वेंट, सफाई या बड़े नाम वाले नए केस की तलाश नहीं थी। उसकी अगली हरकत केवल खड़े होकर प्रतिद्वंद्वी से हाथ मिलाना थी।
10. दराज़ से बाहर क्या आया
सम्मान के समय आयोजक ने कप आगे बढ़ाया। सुरेश ने दोनों हाथों से लिया। फोटोग्राफर ने कहा कि थोड़ा रोशनी की तरफ करें। उसने किया। नाखूनों के आसपास जमा रंग साफ दिखाई देता रहा।
बाद में विक्रम पुराना स्ट्राइकर लेकर आया। “ले जा सकते हो।”
सुरेश ने बंद केस देखा। “मंगलवार समिति में ले आना। हिसाब ठीक तरह खत्म कर लें।” वह अपना सामान अस्वीकार नहीं कर रहा था। वह नहीं चाहता था कि निजी इशारा उस लिखित विवाद की जगह ले ले जिसे दोनों अब तक अलग ढंग से बताते आए थे।
मंगलवार को समिति ने रसीदें मिलाईं। बढ़ाकर लिखी गई एक मद ठीक की और बाकी साझा खर्च दर्ज किया। सुरेश ने अपने हिस्से की वास्तविक रकम दी। विक्रम ने हस्ताक्षरित रसीद पर स्ट्राइकर लौटाया। उस कमरे में ताली नहीं बजी। उस प्रक्रिया को ताली की जरूरत नहीं थी।
मोहल्ले के हॉल में सुरेश ने उधार की डिस्क साफ करके पॉल को लौटा दी। दूसरे खिलाड़ी ने तुरंत अभ्यास के लिए उठा ली। उसे अलग हाथों में जाते देखना, अपने महँगे स्ट्राइकर को केस में रखने से अजीब तरह अधिक अच्छा लगा।
हॉल बंद होने के समय रूपा आई। दोनों को उसके पिता को खाने पर लाना था। सुरेश तैयार था। हॉल की बत्तियाँ अभी जली थीं।
“अगले सप्ताह कौन सा इस्तेमाल करोगे?” रूपा ने केस की ओर देखकर पूछा।
“जिसके साथ उस दिन ठीक अभ्यास किया होगा।”
उसने सुरेश से स्कूटर की चाबी ली और पीछे की सीट की तरफ इशारा किया। आज वह चलाएगी। सुरेश बैठ गया। कप उसी कपड़े के थैले में था जिसमें वे आमतौर पर सब्जियाँ लाते थे।
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