“मेहमान निकल जाएँ तब तक इन्हें दीवार की तरफ कर दो।”
आयोजन का बैज पहने लड़के ने परिचारक से कहा था, शंकर से नहीं।
शंकर चौंसठ साल के थे। अड़तीस साल पंप ठीक किए थे। दो बच्चे पाले थे। उसी सुबह दो शहर पार करके आए थे।
वह वहीं मौजूद थे। अपने चेहरे की दिशा के बारे में कहा गया वाक्य साफ सुन रहे थे।
“कौन से मेहमान?” उन्होंने पूछा।
लड़के ने सँकरे रास्ते की तरफ देखा। एक तरफ कुर्सियाँ रखी थीं। दूसरी तरफ मुड़े बैनर। पर्दे के पार कहीं माइक जाँचा जा रहा था।
“प्रायोजक वाले, सर। बस एक मिनट।”
परिचारक छू पाता, उससे पहले शंकर ने पहिए पर हाथ रख दिया।
“खुद मोड़ सकता हूँ।”
क्यों, नहीं पूछा।
पिछले घंटे व्यवस्था के नाम पर पर्याप्त निर्देश सुन चुके थे।
कुर्सी आधी घुमाई। रुक गए। सामने दीवार के ऊपर निकास का निशान देखा।
बेटे ने कहा था, खेल अच्छी तरह दिखेगा।
* * *
रास्ते में शंकर ने छपी समय-सारणी मोड़कर कमीज की जेब में रखी थी।
ड्राइवर से पूछा था कि पहले सत्र से पूर्व पहुँच जाएँगे? फिर दोबारा पूछने के लिए माफी माँगी थी।
घर पर कभी बेटे का खेल स्टील के कप के सहारे रखे फोन पर देखते थे। यहाँ कमरे की अपनी आवाज सुनने की उम्मीद थी।
बचपन में अरमान को पसंद आने वाले बिस्कुट लाए थे।
अब पैकेट घुटने के पास थैले में था।
बेटी को फोन करने का सोचा। फिर कल्पना की कि वह काम छोड़ देगी। अरमान मेज छोड़ देगा। सब समझाएँगे कि घर पर रहना चाहिए था।
फोन हाथ में रखा रहा।
नंबर नहीं मिलाया।
पर्दे के पार हँसी आई। किसी ने कुर्सी खींची। शंकर को पता नहीं था कि कार्यक्रम शुरू हुआ है या लोग सिर्फ बैठ रहे हैं। जो जानने आए थे, उसी की खबर नहीं मिल रही थी।
* * *
अरमान नहीं जानता था पिता कहाँ बैठे हैं।
नीचे क्षेत्रीय तीन पत्ती फाइनल के लिए अपना प्रवेश पक्का कर रहा था। उनतीस साल का था। खुले मुकाबलों से चुना गया था। अपने नाम से खेल रहा था।
पुराने मालिक नरेन चोपड़ा ने यात्रा और होटल का खर्च देने की पेशकश की थी।
बदले में अरमान तस्वीरों में कंपनी का बैज पहनता और सहायता का उल्लेख करता।
समझौता सीधा लगा था।
छह साल चोपड़ा के पैकेजिंग गोदाम में काम किया था। बाद में बेहतर समय वाली छोटी नौकरी ले ली।
चोपड़ा को कहना पसंद था कि पुराने कर्मचारियों को अब भी देखता है।
अरमान चुना तो आधे परिवार को खबर देने से पहले उसका फोन आ गया।
“पिता को लाओ। अच्छा दिन बिताएँगे।”
व्हीलचेयर इस्तेमाल करने वाले शंकर के लिए बाहर का दिन एक उदार वाक्य से ज्यादा तैयारी माँगता था।
अरमान और बहन नीरजा ने स्थल की पहुँच जाँची। सही वाहन तय किया। दर्शकों की जगह सीधे आयोजन कार्यालय से पक्की की।
फिर चोपड़ा ने प्रायोजक क्षेत्र में बेहतर सीट देने को कहा।
अरमान मान गया।
पहली मेज तक पहुँचने से पहले पछताया।
* * *
पिता का फोन दो बार बजा। जवाब नहीं आया।
तीसरी बार उठाया। कहा कि कार्यक्रम शुरू नहीं हुआ।
“मंच दिख रहा है?”
“बीच में दीवार है।”
अरमान हँसा। लगा पिता की सूखी मजाक वाली बात है।
फिर आवाज सुनी, “सर, यहीं रहें।”
जगह पूछी।
शंकर ने चिंता न करने को कहा। खेल पर ध्यान दे।
तभी चिंता शुरू हुई।
अरमान पंजीकरण छोड़कर प्रायोजक लाउंज की तरफ गया। पीछे के रास्ते में गीले कपड़े और गरम होते खाने की गंध थी।
स्टूलों के ढेर के पास परिचारक खड़ा था।
पिता पर्दे की दीवार की तरफ थे।
पास मुड़ा कालीन रखा था।
“पापा।”
शंकर ने सिर घुमाया।
एक पल ऐसे मुस्कराए जैसे बिल्कुल ठीक जगह मिले हों।
फिर बेटे ने उनके आगे का दृश्य देखा।
खाली पैनल। दो बिजली के सॉकेट। सफाई की ट्रॉली का किनारा।
* * *
परिचारक समझाने लगा। प्रायोजक की सीटें बदली थीं। रास्ता खाली रखना था। किसी ने कहा था यह जगह शांत होगी।
अरमान ने पूछा किसने?
बैज वाला लड़का बोला, चोपड़ा के सहायक का निर्देश था।
“और दीवार?”
लड़का नीचे देखने लगा।
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शंकर ने कहा, “समूह निकलते समय कुर्सी घुमाने को कहा था।”
अरमान का गला कस गया।
सोचा था पिता खेल देखेंगे। कमेंट्री पर शिकायत करेंगे। नाश्ता मना करके अधिकांश खा लेंगे।
कठिन हाथ के बाद ऊपर देखेगा तो कमरे में मिलेंगे।
इसके बजाय उन्हें हटाए जाने की प्रतीक्षा करती चीजों में रख दिया गया था।
आयोजन प्रबंधक को बुलाने की बात हो रही थी कि चोपड़ा आ गया।
“क्या हो रहा है?”
अरमान ने पैनल दिखाया।
“यहाँ रखा है उन्हें।”
“थोड़ी देर के लिए।”
“पीछे मुड़ने को कहा।”
चोपड़ा ने परिचारक को देखा।
“लड़के ठीक से समझाते नहीं।”
दोष उसके सिर जाने से पहले शंकर बोले।
“साफ समझाया था।”
* * *
रास्ता न रोकें इसलिए खाली बैठक में गए।
चोपड़ा ने दरवाजा बंद किया। आवाज नीचे की।
“छोटी व्यवस्था को अपमान बना रहे हो।”
अरमान ने कहा कि प्रायोजक कार्यालय के बीच आने से पहले पिता की तय जगह ठीक थी।
चोपड़ा ने साँस छोड़ी।
“ठीक। कुर्सी हटवा देता हूँ।”
“कुर्सी है उनके पास।”
“मतलब समझते हो।”
शंकर ने हाथ गोद में रखे। अरमान देख सकता था कि बीच में न बोलने की कोशिश कर रहे हैं।
चोपड़ा बोला। आयोजन जरूरी था। बड़े लोग आ रहे थे। भावनाओं से आगे देखना चाहिए।
फिर कहा, “किए की कीमत नहीं समझते तो सहायता अभी खत्म कर देते हैं।”
कमरा शांत हो गया।
अरमान ने होटल, वापसी के वाहन और घर के खर्च के लिए अलग पैसे सोचे।
प्रायोजक का वादा परीक्षा बन जाएगा, बजट में नहीं था।
चोपड़ा चेहरे पर हिसाब देख रहा था।
“तय करो। परिवार का अभिमान या भविष्य।”
शंकर ने सिर उठाया।
“दोनों को आमने-सामने रखने का अधिकार तुम्हें नहीं।”
* * *
अरमान ने दस मिनट माँगे।
पिता को लॉबी में लाया। नीरजा को फोन किया।
उसने पूरा सुना। फिर पूछा वास्तव में क्या भुगतान हुआ है? क्या रद्द हो सकता है? अब क्या चाहिए?
व्यावहारिक सवालों से सहारा मिला।
प्रतियोगिता का प्रवेश स्वतंत्र रूप से पक्का था। चोपड़ा का उस पर अधिकार नहीं था। पूछने पर आयोजन कार्यालय ने सीधे पुष्टि की।
होटल अनिश्चित था।
नीरजा ने पास रहने वाले रिश्तेदार से बात की। एक रात रुक सकते थे।
लिफ्ट से फ्लैट तक सीढ़ी नहीं थी। शंकर पहले रह चुके थे। फिर भी जाँचा, मान नहीं लिया।
वापसी का वाहन परिवार ने अलग बुक किया था।
चोपड़ा की सहायता महत्वपूर्ण थी।
पूरा दिन उसकी संपत्ति नहीं था।
शंकर सुनते रहे। फिर स्पीकर पर करने को कहा।
“होटल के नाश्ते के बिना एक रात रह सकता हूँ।”
नीरजा हँसी।
“शिकायत वैसे भी करते।”
“अधिकार सुरक्षित है।”
अरमान सोफे के किनारे बैठ गया। रास्ते वाला दृश्य देखने के बाद पहली पूरी साँस ली।
शंकर ने पास के थैले से छोटा बटुआ निकाला।
“पैसे लाया हूँ।”
“पापा, जरूरत नहीं कि—”
“क्या करना जरूरी है, जानता हूँ। क्या कर सकता हूँ, बता रहा हूँ।”
यात्रा और खाने में अपना हिस्सा देने के लिए रकम रखी थी। कुछ खराब होने से पहले भी रात का खाना खुद खिलाने का इरादा था।
अरमान ने बटुआ देखा। शर्म आई कि कितनी जल्दी पिता को एक और खर्च मान लिया जिसे अकेले उठाना होगा।
बाकी खर्च बाँटने पर बात हुई। फोन पर रहते नीरजा ने रकम लिखी।
शंकर ने बटुआ वापस रखा।
“अब अपनी मेज पूछो। इतना दूर होटल की चर्चा करने नहीं आए हैं।”
नीरजा ने कहा कि पहुँचने पर रिश्तेदार को फोन कर देगी। बातचीत खत्म हुई तो अरमान ने पहली बार घड़ी इस उम्मीद से देखी कि अभी खेलने का समय बचा है।
* * *
उसने कंपनी का बैज लौटा दिया।
चोपड़ा देखता रहा।
“बेवकूफ मत बनो।”
“जो अग्रिम दिया है, समझौते के अनुसार हिसाब करूँगा। पुष्टि कर दो कि सहायता यहीं खत्म।”
“एक सीट पर दुश्मन बनाने का पछतावा होगा।”
अरमान तीखा जवाब देना चाहता था।
पिता पीछे थे।
सिर्फ कहा, “सीट से ज्यादा था।”
चोपड़ा बैज लेकर चला गया।
कुछ मिनट बाद आयोजन प्रबंधक अंजलि आईं। उपकरणों की देर सँभाल रही थीं। सिर्फ पता था कि दर्शक की व्यवस्था खराब हुई है।
अरमान ने बताया।
उन्होंने शंकर से पूछा कहाँ बैठना पसंद करेंगे?
स्थल पर सीधे उनसे पूछा गया पहला उपयोगी सवाल था।
मेजें दिखनी चाहिए थीं। घूमने की जगह होनी चाहिए थी, बिना रुकावट समझे जाएँ।
अंजलि ने उनके साथ मूल योजना देखी।
मुख्य दर्शक क्षेत्र की आरक्षित जगह अब भी उपलब्ध थी।
चलने से पहले गलियारे वाला लड़का पास आया।
इस बार शंकर को देखा।
“आपसे पूछना चाहिए था।”
“हाँ,” शंकर ने कहा।
वह बताने लगा कि निर्देश किसने दिया। फिर रुक गया।
शंकर इंतजार करते रहे।
“माफी चाहता हूँ।”
“सही पंक्ति ढूँढ़ने में मदद करो।”
लड़का आगे गया। रास्ते का थैला हटवाया। अरमान ने देखा कि धकेलने के बजाय मालिक से पूछा।
सुबह ठीक नहीं हो गई थी। लेकिन आदेश दोहराने के अलावा करने को कुछ मिला था।
ले जाने वाली स्वयंसेवक ने माफी माँगी।
शंकर ने कुर्सी छूने से पहले पूछने के लिए धन्यवाद दिया।
खेल में पंद्रह मिनट थे।
* * *
पहला सत्र अरमान ने गुस्से में खेला।
मदद नहीं हुई।
जिस फैसले को सामान्य तौर पर सोचता, वह सीने की गर्मी निकालने का तरीका बन गया।
पीछे हुआ। फिर और बुरा लगा कि चोपड़ा अंक देखेगा और सुबह को एहसानफरामोशी का प्रमाण कहेगा।
विराम में पिता के पास गया।
पास बैठे आदमी से स्पीकर पर हँसते हुए बहस कर रहे थे।
“कैसे हैं?”
“ठीक। जल्दी कर रहे हो तुम।”
अरमान ने नजर हटाई।
“पता है।”
“तो अपने खेल की बात से बचने को मेरी हालत मत पूछो।”
वाक्य इतना पिता वाला था कि लगभग हँस पड़ा।
शंकर ने आवाज धीमी की।
“बुरा हुआ। सँभाल लिया। हर हाथ में मेरी इज्जत दोबारा कमाने की जरूरत नहीं।”
अगली घोषणा तक पास बैठा रहा।
बिस्कुट बाँटे। पिता ने ज्यादा मीठे कहे और एक और खाया।
कुछ मिनट दिन वैसा लगा जैसा अरमान ने सोचा था।
* * *
पास के दर्शक ने शंकर से पूछा कि खुद भी खेलते हैं?
“खराब। लेकिन पत्ते खुलने के बाद सलाह बहुत अच्छी देता हूँ।”
अरमान हँसा।
आदमी ने पत्नी से परिचय करवाया। उन्होंने तुरंत पति की अपनी काबिलियत वाली कहानी गलत बताई।
जल्द तीनों इस पर बहस कर रहे थे कि किसकी याददाश्त सबसे खराब है।
अगला सत्र बुलाया गया तो बातचीत रोके बिना शंकर ने बेटे को जाने का इशारा किया।
लौटते समय अरमान को थोड़ी मूर्खता महसूस हुई।
सुबह से सिर्फ सोच रहा था कि पिता को कैसे चोट पहुँचेगी। जैसे वही एक अनुभव बचा हो।
पूरी दोपहर बाकी थी। पिता उसे जीना शुरू कर चुके थे।
अरमान आगे बढ़ा। पीछे से पिता की हँसी आई। उसने मुड़कर नहीं देखा। इस बार देखने की जरूरत नहीं थी।
* * *
वापसी चमत्कारी दोपहर से नहीं हुई।
कुछ हाथ पक्ष में गए। कुछ नहीं।
खराब शुरुआत सँभाली। इतने छोटे अंतर से आखिरी चरण पहुँचा कि नतीजा दो बार देखा।
बीच में अंजलि ने पूछा कि सीट में कुछ बदलना है?
शंकर ने नहीं कहा।
फिर पास वाले स्पीकर की आवाज पूछी।
पूरा इंतजाम बदल नहीं सकती थीं। तकनीशियन से पूछकर छोटा स्पीकर थोड़ा दूर किया।
अरमान ने गलियारे से देखा।
कोई नायक नहीं बना।
सवाल पूछा गया। संभव काम किया गया।
चोपड़ा दो मेहमानों के साथ पीछे से गुजरा। नतीजे के बोर्ड पर धीमा हुआ।
अरमान अब भी मुकाबले में था।
पुराने मालिक ने हल्का सिर हिलाया। जैसे बराबर लोगों में सुबह मतभेद हुआ, अब भूल सकते हैं।
अरमान ने कार्यक्रम देखा।
उस सिर हिलाने को समझौता मानना जरूरी नहीं था।
* * *
अंतिम सत्र से पहले चोपड़ा का संदेश आया।
सुबह जो भी हुआ, गर्व है। पुरस्कार में बैज पहनना। बड़ी तस्वीर देखते हैं।
अरमान ने पानी के पास पढ़ा।
साथ तस्वीर थी। मेज पर कंपनी का तैयार बैज।
उसने आयोजन के मीडिया संपर्क को संदेश भेजा। बताया निजी प्रायोजन सुबह खत्म हो गया। घोषणा में वर्तमान प्रायोजक न कहें।
सुधार मिलने की पुष्टि हुई।
खेल चलते समय गुस्से वाली कहानी प्रकाशित नहीं की।
फोन रखा।
पिता हॉल देख रहे थे। उसे नहीं।
यह महत्वपूर्ण था।
शंकर आयोजन देखने आए थे। दरवाजे पर हुई बात का स्थायी प्रतीक बने बिना आनंद ले सकते थे।
अरमान जगह पर गया।
अधिकारी ने बचा प्रारूप स्पष्ट किया।
पत्ते बाँटे गए।
* * *
अंत इतना करीब था कि नतीजे की जाँच से पहले तालियाँ शुरू हो जातीं।
अरमान ने जितना हो सका अनसुना किया।
बिस्कुट याद किए। स्पीकर पर पिता का चिढ़ा चेहरा याद किया।
साधारण बातें लोगों को गलत साबित करने वाले भाषण से ज्यादा मदद करती थीं।
अंत के पास हार से नतीजा संदिग्ध हुआ।
गुस्सा फिर पहुँचा।
अगले फैसले को जितना चाहिए था उतना समय दिया।
अंतिम हिसाब आया तो जीत गया था।
पहला दृश्य अधूरा था। स्कोरर का पेन। उठा फोन। अधिकारी के पीछे खाली कुर्सी।
फिर पिता मिले।
ताली बजा रहे थे।
बचाए हुए आदमी जैसे नहीं लग रहे थे।
बेटे से खुश लग रहे थे।
अरमान इतना मुस्कराया कि चेहरा दुखा।
गलियारे के पार चोपड़ा फोटोग्राफर से बात कर रहा था।
* * *
पुरस्कार की सूची पहले तैयार हुई थी।
प्रस्तोता ने नीचे देखा तो अरमान को अपने नाम के नीचे कंपनी दिखी।
माइक उठने से पहले धीरे कहा।
“सहायता सुबह खत्म हुई। कार्यालय को पता है।”
प्रस्तोता ने समन्वयक से जाँचा।
चोपड़ा पास आया।
“ठीक है। परिवार हैं यहाँ।”
अरमान ने देखा।
“नहीं। सुधरा परिचय पढ़िए।”
प्रस्तोता ने पढ़ा।
संक्षेप में बताया कि अरमान स्वतंत्र प्रवेश से आया और पहले लिखा निजी प्रायोजन अब लागू नहीं है।
आरोप नहीं था। लेकिन चोपड़ा के लिए विजेता को खोजने और सँभालने की कहानी डालने की जगह भी नहीं थी।
व्यवस्था साफ होने तक फोटोग्राफर ने कैमरा नीचे रखा।
उस दिन पहली बार चोपड़ा को ऐसी जगह खड़ा होना पड़ा जो उसने नहीं चुनी थी।
* * *
अरमान ने पिता से तस्वीर में साथ आने को पूछा।
शंकर ने मंच देखा।
“उठाकर ले जाए बिना पहुँच सकता हूँ?”
अंजलि ने सामान और प्रतिभागियों के लिए इस्तेमाल होने वाला सुलभ रास्ता दिखाया। बगल से नीची मंच-जगह तक जाता था।
वह राजी हुए।
अरमान साथ चला। छोटी चढ़ाई पर हैंडल लेने से पहले पूछा।
पिता ने हाँ कहा।
बीच में फोटोग्राफर ने थोड़ा किनारे होने को कहा ताकि प्रायोजक का पर्दा दिखे।
अरमान रुका।
शंकर बोले, “बेटा मेरे पास खड़ा हो सकता है।”
फोटोग्राफर ने बदला।
तब तक नीरजा काम से आ गई थी। कार्यालय का बैग हाथ में था।
दूसरी तरफ खड़ी होकर शिकायत की कि अच्छे कपड़े पहनने को बताया नहीं।
“अपने जैसी लगती हो,” शंकर बोले।
तस्वीर हुई।
पिता बीच में थे।
पीछे मुड़ने को किसी ने नहीं कहा।
* * *
रात रिश्तेदार के फ्लैट में बिताई।
पुरस्कार खाने की छोटी मेज पर फल के कटोरे के पास रखा।
अरमान ने चेहरा धोया। नीरजा ने खाना मँगवाया। शंकर उस हाथ की पूरी कहानी बता रहे थे जिसे दोनों बच्चों के हिसाब से उन्होंने साफ देखा ही नहीं था।
बाद में शांत हुआ तो अरमान ने सुबह की माफी माँगी।
पिता ने सिर हिलाया।
“हुआ।”
“कहाँ ले गए, जाँचना चाहिए था।”
“हाँ।”
अरमान ने नीचे देखा।
फिर शंकर बोले, “अगली बार दोनों जाँचेंगे। और कोई मेरे बारे में ऐसे बोले जैसे मौजूद नहीं हूँ, तो पहले मुझे जवाब देने देना।”
अरमान राजी हुआ।
यह सीख कुछ जीतकर पूरी नहीं हो सकती थी।
सुबह समय से निकले ताकि सफर में भागना न पड़े।
चोपड़ा ने बेहतर शर्तों पर रिश्ता फिर शुरू करने का संदेश भेजा।
नाश्ते से पहले जवाब नहीं दिया।
बाद में भी नहीं।
पिता को पारिवारिक तस्वीर भेज दी।
दोनों एक वाहन में थे, तभी जवाब आया।
अच्छी तस्वीर। वह भेजो जिसमें बहन की आँख खुली हो।
अरमान हँसा। दूसरी ढूँढ़ी।
पिता खिड़की से सड़क देख रहे थे।
ठीक उस तरफ जहाँ देखना चाहते थे।