1. BOOM79: खाली कुर्सी के पास घड़ी
तपन ने रिटायरमेंट प्रमाणपत्र उस कुर्सी पर रखा था जहाँ सुरेश बैठता था। क्लब का आधिकारिक फैसला नहीं था। मोटे कागज पर छपा मजाक था, जिसमें पुराने योगदान के लिए धन्यवाद था।
सुरेश पचपन का था। पिछली शाम बेहतर स्थिति समय पर हार गया था। अंतिम सेकंड का वीडियो क्लब समूह में घूम रहा था। उसमें हाथ गलत मोहरे के ऊपर ठहरता था और घड़ी शून्य हो जाती थी।
उसके उनतीस साल के बेटे अमन ने उससे पहले प्रमाणपत्र देखा।
“शायद थोड़ा आराम करो,” अमन ने कहा। तपन मुस्कराया जैसे परिवार ने मजाक स्वीकार कर लिया हो।
छह सप्ताह बाद चार खिलाड़ियों के चयन आयोजन में सुरेश के पास उसी मॉडल की घड़ी थी। सब एक-दूसरे से रंग बदलकर दो बार खेलते। छह राउंड से टीम की एक जगह तय होती। प्रकाशित समय नियंत्रण में हर चाल के बाद इंक्रीमेंट था।
तपन भी था। भैरव और किरण भी। न अनुभव के लिए सुरेश की जगह आरक्षित थी, न आत्मविश्वास के लिए तपन की।
अंतिम राउंड से पहले सुरेश के तीन अंक थे। तपन के साढ़े तीन। भैरव के ढाई और किरण का एक। सुरेश और तपन सामने थे। केवल जीत सुरेश को बाकी सभी की पहुँच से आगे रखती।
अमन सीमा के पीछे खड़ा था। पैरों के पास कपड़े के बैग में वही बोर्ड था जिसे बेचने को पिता को मनाया था। वापस क्यों लाया है, बताने का साहस अभी नहीं जुटा पाया था। बोर्ड के कोने कपड़े से बाहर दिख रहे थे, मगर सुरेश की निगाह अपनी मेज पर थी।
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2. पुरानी चीजों की दुकान का बोर्ड
समय पर हारने के बाद अमन ने पूछा था कि शतरंज अब भी पिता के लिए अच्छा है क्या। सुरेश अधूरी स्थिति समझाने लगा। अमन ने कहा कि समस्या स्थिति नहीं है।
प्रमाणपत्र आने पर बहस बिगड़ी। सुरेश उसे अखबार में मोड़कर घर लाया। कुर्सी पर छोड़ता तो कोई और तस्वीर बनाता।
रात में अमन ने पुराना लकड़ी का बोर्ड बेचने को कहा क्योंकि खाने की मेज घेरता था। सुरेश ने उस थकी आवाज में हाँ कहा जिससे आदमी बातचीत खत्म करना चाहता है।
खरीदार ने बहुत कम दिया। अमन मान गया। सुरेश ने देखा कि मोहरों को उनके खानों में रखने के बजाय प्लास्टिक बैग में डाल दिया गया। तीन दिन खाली मेज से बचता रहा।
फिर प्रमाणपत्र खोलकर “पुराना योगदान” पढ़ा। कॉपी के नीचे उल्टा रखा और समय पर हारी स्थिति स्मृति से लिखी। बाद में आधिकारिक शीट से मिलाया। याद में दो गलतियाँ थीं। उन्हें सुधारा। कहानी बेहतर बनाकर छूटी हुई जबरन जीत नहीं बनाई।
स्थिति अच्छी थी, लेकिन निर्णय चाहिए थे। पूर्ण चाल खोजने में इतना समय लगा दिया था कि अच्छी चाल चुनने का समय नहीं बचा।
अगली सुबह सामुदायिक कमरे से बोर्ड उधार लिया और घड़ी के साथ अभ्यास शुरू किया। काम पर जाते अमन मेज के पास से गुजरा। सुरेश ने रुकने को नहीं कहा।
उसने पहले घड़ी सेट की। फिर मोहरे लगाए। इस बार आरंभ से ही दोनों एक ही काम का हिस्सा थे। समय को आखिरी परेशानी मानने की पुरानी आदत तोड़नी थी।
3. क्या गिनना बंद करना सीखना
पहले अभ्यास अप्रिय थे। कई स्थितियों के बारे में सुरेश युवाओं से अधिक जानता था। फिर भी घड़ी निर्णय माँगती तो ज्ञान का खराब उपयोग करता। एक पर टिकने से पहले हर संभावित सुधार देखना चाहता। परिणाम झंडा गिरने के बाद सुंदर व्याख्या होता।
अभ्यास साथी फरीदा ने पाँच धुँधली इच्छाओं के बजाय दो गंभीर उम्मीदवार चालों पर काम कराया। विश्लेषण में लिख सकता था। लाइव खेल में बिना नोट्स या बाहर की मदद के चुपचाप प्रक्रिया इस्तेमाल करता।
विरोधी का तत्काल खतरा पहचानते। मजबूर करने वाले उत्तर देखते। फिर स्थिति ठीक रखने वाली चाल चुनते। जबरन जीत नहीं थी तो आधा समय उसे कल्पना से बनाने पर खर्च करने की अनुमति नहीं थी।
वास्तविक इंक्रीमेंट वाले समय नियंत्रण पर भी अभ्यास किया। चाल पूरी करना, घड़ी ठीक दबाना और विरोधी के समय अपनी पिछली झिझक दोहराने के बजाय योजनाएँ देखना सीखा।
हर काम में तेज नहीं हुआ। यह चुनने में बेहतर हुआ कि किसे समय देना चाहिए।
एक शाम अकेले कठिन निर्णय पर जल्दबाजी से हाथी अंतखेल हारा। फरीदा ने उसी जगह अधिक समय देकर दोहराया। दूसरी बार सरल चालों से समय बचाया और महत्वपूर्ण प्यादा दौड़ गिनने के लिए पर्याप्त बचा।
दोनों असफलताएँ और सफलताएँ लिखीं। कॉपी उम्र का बचाव कम और फैसले कहाँ बिगड़ते हैं उसका नक्शा अधिक बनी।
पहले जिस जगह वह कहता कि यह मुझे पहले से पता है, अब वहीं घड़ी चलाकर दिखाना पड़ता। ज्ञान को सही क्षण पर इस्तेमाल करना नया काम था।
4. पहला राउंड फिर भी चोट पहुँचा गया
चयन आयोजन के पहले राउंड में तपन ने हराया। सुरेश काले मोहरों से था। मजबूत स्थिति मिली। केंद्र को चुनौती देने के फैसले में बहुत समय लगाया। जब किया तो सही समय से एक चाल देर थी। तपन के सक्रिय मोहरों ने फर्क इस्तेमाल किया।
यह फिर समय पर हार नहीं थी। स्थिति हारी और घड़ी में समय रहते इस्तीफा दिया। अंतर से हार सुखद नहीं हुई।
तपन ने कहा कि नई प्रक्रिया ने कम से कम ज्यादा कुशलता से हारना सिखाया। सुरेश ने शीट पर हस्ताक्षर किए और जवाब देने से पहले खेल क्षेत्र छोड़ा।
बाहर अमन ने घर ले चलने को कहा। सुरेश ने दूसरे राउंड का समय पूछा। बेटे ने अनिच्छा से कार्यक्रम देखा।
दूसरे राउंड में भैरव ने हाथी अंतखेल में दबाया। सुरेश ने सक्रिय बचाव किया। न बचने वाला प्यादा छोड़ा और बराबरी के लिए पर्याप्त शहें खोजीं। स्वीकार करने से पहले आखिरी स्थिति जाँचने का समय था।
दो बाजियों में आधा अंक।
भोजन के समय केवल पहले राउंड के महत्वपूर्ण फैसले को देखा। जारी खेलों से दूर विश्लेषण बोर्ड पर पहले आने वाला केंद्रीय तोड़ पहचाना। तपन का सबसे अच्छा उत्तर जाँचा। अगले राउंड की घोषणा पर रोक दिया।
पुराना सुरेश समझाता रहता कि चाल चलनी चाहिए थी। नई प्रक्रिया कहती थी कि मोहरे रखो और अगली स्थिति के लिए तैयार रहो।
उसने किया। गुस्सा अब भी था। निराशा भी। आयोजन में मौजूद भी था। पहली हार को बाकी पाँच राउंड छोड़ने की अनुमति नहीं दी।
5. वे अंक जो कोई दे नहीं सकता था
तीसरे राउंड में किरण के खिलाफ अधिक जिम्मेदारी वाले रक्षक को हटाने वाले सामरिक क्रम से अतिरिक्त प्यादा मिला। छोटी बढ़त को तुरंत हमले में नहीं बदला। राजा सुधारा, हाथी सक्रिय रखा और बदलने से पहले प्यादा अंतखेल गिना। इस बार अनुकूल था। जीत पूरी की। डेढ़ अंक।
भैरव से दूसरी बाजी कठिन मध्यखेल के बाद बराबर हुई। सुरेश ने आकर्षक प्यादा बलिदान छोड़ा क्योंकि उसमें भैरव को गलत बचाव चुनना पड़ता। बाद में साथ जाँचकर बचाने वाली चाल खोजी। चार राउंड में दो अंक।
पाँचवें में किरण रंग बदलकर फिर मिला। किनारे पर हमला किया। सुरेश ने अपने राजा की सुरक्षा जाँचकर केंद्र में लाइन खोली। जवाबी खेल से प्यादा मिला और सक्रिय हाथी अंतखेल बना।
आखिरी अदला-बदली गिनने का समय रखा। निर्णायक सामग्री खोए बिना पास्ड प्यादा नहीं रुकता था, तब किरण ने हार मानी। तीन अंक।
तपन किरण से एक बाजी हारा था, बाकी अच्छा खेला। आखिरी राउंड में साढ़े तीन लेकर गया। सुरेश को हराना जरूरी था। बराबरी तपन की बढ़त रखती।
अंतिम जोड़ी बैठने से पहले अमन ने चाय लाने को पूछा। सुरेश ने कहा, हाँ, बाजी के बाद।
उस दिन की पहली साझा योजना थी जिसमें माना गया कि पिता जो करने आया है उसे पूरा करेगा। अमन ने समय देखा और फोन रख दिया। इस बार कार्यक्रम पूछना पिता को जल्दी बाहर निकालने के लिए नहीं था। वह उसकी बाजी समाप्त होने का इंतजार करने वाला था।
6. तपन का हमला
अंतिम राउंड में सफेद सुरेश के थे। समझी संरचना चुनी। मोहरे विकसित किए। केवल जीत जरूरी थी, इसलिए जल्दी सामरिक झगड़ा नहीं बनाया।
तपन ने आक्रामक जवाब दिया। राजा की तरफ प्यादे बढ़ाए और घोड़ा ऐसी जगह रखा जहाँ लापरवाही पर फोर्क का खतरा हो।
सुरेश ने दो उम्मीदवार चालों से पहले तत्काल खतरा जाँचा। एक सब बचाती, मगर निष्क्रिय छोड़ती। दूसरी केंद्र को चुनौती देती और तपन को तय करना पड़ता कि लाइन खुलने के बाद हमला बचेगा क्या।
उसने केंद्रीय तोड़ चुना।
चाल ने तपन का खेल गलत साबित नहीं कर दिया। कठिन स्थिति बनी जिसमें दोनों के सामने ठोस समस्याएँ थीं। तपन ने तीखा उत्तर खोजा। प्यादा बदलकर लाइन खोली। उपलब्ध दिखता सामान लेने से पहले सुरेश को रक्षक हटाना पड़ा। उस फैसले पर सात मिनट लगाए। उपयोगी समय था।
अदला-बदली से राजा के पास हमलावर ताकत घटी। तपन का कमजोर केंद्रीय प्यादा बचा। सुरेश ने हमला किया। तपन ने दूसरी जगह जवाबी हमला। बढ़त का आकार बदला, सुरेश की स्थिति ठीक रही।
दूसरी अंतिम बाजी चल रही थी। भैरव साढ़े तीन तक पहुँच सकता था, चार तक नहीं। सुरेश गणना बैठने से पहले जानता था। अब दूसरा बोर्ड देखने की जरूरत नहीं थी।
ऐसी चालें खोजनी थीं जो तपन से बचाव कराएँ और अपनी जीतने की स्थिति न दें। उसने बोर्ड के बीच में फिर देखा। बाहर का प्रमाणपत्र अब इस गणना में कोई चाल नहीं जोड़ सकता था।
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7. वह चाल जिस पर पहले बीस मिनट लगते
तपन ने रानियाँ बदलने का प्रस्ताव दिया। लगता था बचाव सरल होगा। सुरेश ने केवल महत्वाकांक्षा के कारण ठुकराने के बजाय अंतखेल देखा।
बदलने पर अपने राजा को केंद्र का उपयोगी रास्ता मिलता। तपन के हाथी को कमजोर प्यादा बचाना पड़ता। सुरेश अपना राजा हमले में खोले बिना सुधार कर सकता था। उसने स्वीकार किया।
एक साल पहले शायद सुंदर क्रम खोजने में बीस मिनट लगाता। अब जरूरी विवरण जाँचने जितना समय लिया और बाकी अंतखेल के लिए रखा।
तपन ने अच्छा बचाव किया। किनारे से हाथी सक्रिय किया। प्यादों के पीछे प्रवेश का खतरा दिया। सुरेश को चुनना पड़ा कि किस कमजोरी पर वास्तव में हमला हो सकता है। आसान लगातार खानों की सूची नहीं थी।
राजा सुधारा, हाथी बदला और तब तक रुका जब तक प्यादा बढ़ाना केवल आक्रामक दिखने के बजाय लक्ष्य पैदा न करे।
मौका आया तो सही प्यादा धकेला। तपन को दो अप्रिय बचावों में चुनना पड़ा। उसने प्यादे की कीमत पर सक्रियता वाला चुना। सुरेश ने लिया।
अतिरिक्त प्यादे ने गणना से मुक्त नहीं किया। तपन का हाथी सक्रिय था। राजा की लापरवाह चाल से ऐसी शहें आतीं जो प्रगति रोक देतीं।
सुरेश ने घड़ी देखी। सोचने का पर्याप्त समय बचाया था। क्षण भर पुराना वीडियो याद आया, फिर सामने शह वाले खानों पर लौटा। इस बार हाथ किसी गलत मोहरे के ऊपर नहीं ठहरा। वह चाल चुनने से पहले वास्तविक जवाब देख रहा था।
8. अदला-बदली जिसे दो बार गिना
निर्णायक विकल्प हाथी बदलना था। बहुत जल्दी करता तो प्यादा अंतखेल में तपन का राजा मुख्य पास्ड प्यादे तक समय पर पहुँचता। अतिरिक्त प्यादा अकेला काम नहीं करता।
उसने हाथी रखे और राजा एक कदम सुधारा।
तपन ने पीछे से शह दी। सुरेश ने तैयार आश्रय पाया। तपन ने किनारे का प्यादा निशाना बनाया। सुरेश ने राजा की नई जगह खोए बिना बचाया।
अब हाथी बदलने का अर्थ अलग था।
प्यादा अंतखेल दो बार गिना। एक बार अपनी तरफ से, दूसरी बार तपन के सर्वश्रेष्ठ बचाव से। राजाओं के रास्ते महत्वपूर्ण थे। बची हुई प्यादे की अतिरिक्त चाल भी, जिससे अपना पास्ड प्यादा धकेलने से पहले तपन को हटना पड़ता।
सहयोग वाले क्रम में विरोधी को मुख्य खाने से दूर नहीं चलाया। सबसे जिद्दी बचाव खोजकर उसका पीछा किया। फिर अदला-बदली दी।
तपन कई मिनट ऐसा रास्ता खोजता रहा जिससे हाथी सक्रिय रहे और दूसरा प्यादा न गिरे। विकल्प खराब थे। उसने स्वीकार किया।
हाथी हटे। सुरेश की घड़ी में केवल इंक्रीमेंट से अधिक बचा था। पहली राजा चाल जाँची और चला।
अमन सीमा के पीछे आगे झुका, अपनी हरकत पहचानी और पीछे हुआ। पिता को इशारा, आह या जल्दी करने की याद नहीं चाहिए थी। घड़ी स्थिति का हिस्सा थी। इस बार तैयार किए काम के भीतर थी।
मेज पर अब कम मोहरे थे। बाहर से खेल सरल दिख सकता था। सुरेश जानता था कि इसी सरलता के भीतर एक गलत राजा चाल पूरी बढ़त मिटा सकती है।
9. चार अंक
तपन ने राजा सक्रिय रखा और जरूरी खाना जितनी देर संभव था रोका। सुरेश ने गिने हुए क्षण पर बची प्यादा चाल इस्तेमाल की। अपना राजा हटाए बिना रक्षक को पहले चलना पड़ा।
मिला प्रवेश समर्थित पास्ड प्यादे को आगे लाया। तपन ने दूसरे किनारे का रास्ता आजमाया। सुरेश ने फिर गिना और जारी रखा।
प्रमोशन अनिवार्य हुआ तो तपन ने तुरंत हार नहीं मानी। आखिरी देरी वाली चाल खेली और देखा कि सुरेश जल्दबाजी में गलती करता है क्या।
सुरेश ने उत्तर जाँचा, आगे बढ़ा और घड़ी दबाई। तपन ने उसे रोक दिया।
छह बाजियों में चार अंक। चयन आयोजन का अकेला विजेता। तपन साढ़े तीन पर रहा। भैरव उससे अधिक नहीं पहुँच सकता था।
सुरेश ने ध्यान से परिणाम लिखा। समय नहीं गिरा था। भूली घड़ी दबाने से बचाने के लिए आर्बिटर नहीं चाहिए था। कठिन चालें जाँचने का समय लेकर खेली थीं।
तपन ने हाथ मिलाया और दर्शकों की तरफ देखा। कोई हँस नहीं रहा था।
कहाँ बिगड़ा पूछने पर सुरेश ने कहा, “बदलने के बाद अंतखेल हार रहा था।”
तपन ने पुरानी स्थिति दिखाई। “मुझे लगा वही अदला-बदली है जिसे पहले मना किया।”
“तुम्हारा राजा एक चाल दूर था।”
परिणाम दर्ज होने के बाद आर्बिटर की अनुमति से स्थिति वापस रखी। तपन ने रास्ता गिना और गायब समय देखा। उस दिन पहली बार उसने सुरेश से ऐसा सवाल पूछा जिसके पहले मजाक नहीं लगाया। सुरेश ने मोहरे उसके सामने छोड़े ताकि वह बचाव खुद चलकर देख सके।
10. बोर्ड घर लौटा
खेल क्षेत्र के बाहर अमन ने कपड़े का बैग उठाया। निकलने से पहले सुरेश ने आकार पहचान लिया।
“खरीदार मिल गया,” अमन ने कहा। “उसके पास था।”
एक काला प्यादा गलत खाने में था। सुरेश ने ठीक रखा। किनारे पर अंगूठा फेरा जहाँ वर्षों के इस्तेमाल से चमक घिस गई थी।
अमन ने कहा कि एक खराब शाम को पिता के लिए तय करने की अनुमति समझ लिया था कि अब किस चीज की परवाह छोड़नी चाहिए। सुरेश ने काफी देर देखा। फिर पूछा कि वादा की चाय अभी मिलेगी क्या।
हॉल के बाहर छोटी दुकान पर बैठे। अमन आखिरी राजा चाल देखना चाहता था। कपों के बीच पुराना बोर्ड रखकर स्थिति बनाई।
महत्वपूर्ण क्षण पर अमन ने रक्षक राजा पास्ड प्यादे की तरफ चलाया। सुरेश ने अतिरिक्त प्यादा चाल दिखाई। अमन ने फिर लगाकर दूसरा रास्ता लिया। इस बार समझ आया कि देर क्यों हो रही है।
तपन निकलते हुए पास रुका। समीक्षा के लिए तस्वीर लेने को पूछा। सुरेश ने बोर्ड थोड़ा घुमाया ताकि हर प्यादा साफ दिखे।
शाम को घर में अमन ने खाने की प्लेटें हटाकर जगह बनाई। सुरेश ने कॉपी से मुड़ा रिटायरमेंट प्रमाणपत्र निकाला। अगले अभ्यास के लिए अंतिम स्थिति उसके खाली पीछे लिखी।
नाम और “पुराना योगदान” वाली तरफ मेज की ओर रही। अमन ने दो कप रखे और काले मोहरे अपनी तरफ कर लिए। सुरेश ने घड़ी बीच में रखी। बेटा बचाव का दूसरा रास्ता आजमाना चाहता था। पिता ने समय सेट किया और उसे पहली चाल दी।
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