Boss Rummy — तीसरी बार उसने माफ नहीं किया
Boss Rummy

Boss Rummy — तीसरी बार उसने माफ नहीं किया

काल्पनिक कहानी · पात्र और घटनाएँ कहानी का हिस्सा हैं।

ग्यारह बजकर सत्रह मिनट पर समीर ने अपनी नई टीम की कमीज की तस्वीर भेजी। कोई सफाई नहीं थी। बस होटल के बिस्तर पर सीधी रखी कमीज थी। कॉलर ध्यान से सँवारा गया था।…

ग्यारह बजकर सत्रह मिनट पर समीर ने अपनी नई टीम की कमीज की तस्वीर भेजी।

कोई सफाई नहीं थी।

बस होटल के बिस्तर पर सीधी रखी कमीज थी। कॉलर ध्यान से सँवारा गया था। जहाँ पुरानी टीम का निशान होना चाहिए था, वहाँ नए प्रायोजक का नाम था।

देव तस्वीर देखता रहा। केतली का पानी सूख गया।

फिर अगला संदेश आया।

घबराओ मत। बात करनी चाहिए।

छह महीने पहले यह पढ़कर वह फोन कर देता।

एक साल पहले ऑटो पकड़कर शहर के दूसरे छोर पर जाता और समीर की इमारत के बाहर तब तक खड़ा रहता जब तक चौकीदार जाने को न कहता।

इस बार उसने चूल्हा बंद किया। केतली में फिर पानी डाला और उत्तर लिखा।

तुम्हारा हटना दर्ज है। मीना का पंजीकरण कल पक्का हो गया।

समीर ने तुरंत पढ़ लिया।

तीन मिनट कुछ नहीं आया।

फिर पूछा, मीना कौन है?

देव ने फोन रखा और चाय बनाई।

* * *

पहली बार समीर उन्हें छोड़कर गया था तो देव की माँ घर में भी अस्पताल वाली पट्टी पहने थीं।

चार दिन पहले छुट्टी मिली थी। देव बिलों को छोटे ढेरों में मोड़ रहा था, जैसे आकार कम करने से रकम भी कम हो जाएगी।

सप्ताहांत की तीन पत्ती प्रतियोगिता में उनकी शौकिया टीम को चार खिलाड़ी चाहिए थे। आयोजन वयस्कों के लिए था। प्रवेश की शर्तें प्रकाशित थीं और अलग मेजों पर मिले अंक टीम के कुल में जुड़ते थे।

देव पंजीकरण सँभालता था। समीर सबसे मजबूत खिलाड़ी था।

पंजीकरण की सुबह समीर का फोन आया कि दूसरी टीम को उसकी जरूरत है।

“उनके पास जीतने का असली मौका है।”

“हम पैसे दे चुके हैं।”

“इसकी भरपाई कर दूँगा।”

देव ने रुकने को कहा।

माँ दूसरे कमरे से सुन सकती थीं। उसे अपनी आवाज से नफरत हुई। जानता था कि प्रतियोगिता से ज्यादा समय तक माँ को यही आवाज याद रहेगी।

समय सीमा के बाद खिलाड़ी नहीं बदला जा सकता था।

बाकी तीनों हट गए।

समीर ने दूसरी टीम के खाने की मुस्कुराती तस्वीर भेजी।

नीचे लिखा था, अगली बार साथ, भाई।

* * *

देव के जवाब देने की एक वजह थी।

तीन साल पहले माँ को तुरंत अस्पताल ले जाना पड़ा था। समीर आया था।

रात दो बजे फोन उठाया। उधार की चप्पल पहनकर शहर पार किया। सही प्रवेश द्वार ढूँढ़ा। बैग उठाया। देव का कार्ड नहीं चला तो बारह हजार रुपये दिए।

देव ने अगले महीने पैसे लौटा दिए।

याद का उधार बाकी रहा।

जब भी नाराज होता, इलाज वाले हिस्से के बाहर दो कागज के कप लिए खड़ा समीर याद आता।

एक कप में पहले से कम चीनी थी।

उसे याद था कि देव चाय कैसी पीता है। ऐसी छोटी परवाह करने वाला आदमी हमेशा लापरवाह नहीं हो सकता।

देव खुद को यही समझाता रहा।

पहली प्रतियोगिता छोड़ने के बाद समीर माँ के लिए मिठाई लेकर खाने पर आया।

देव ने प्रवेश शुल्क का जिक्र नहीं किया।

टीम के दूसरे खिलाड़ी आलोक और फिरोज ने किया।

देव ने दोनों से बात जाने देने को कहा।

उन्होंने एक-दूसरे को देखा। फिर देव को बोलने दिया।

* * *

दूसरी बार समीर ने छह दिन पहले बताया।

ज्यादा पैसे वाली टीम ने बाहर की प्रतियोगिता के लिए आने-जाने और रहने का खर्च देने की बात की थी। देव को बताने से पहले वह हाँ कर चुका था।

उनका प्रवेश शुल्क जा चुका था। चार लोगों के काम के समय देखकर अभ्यास रखा गया था।

फिरोज ने दो बार अपनी पाली बदली थी।

आलोक ने बहन को दुकान सँभालने के लिए मनाया था।

समीर ने कहा कि उससे अवसर छोड़ने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए।

देव ने माना कि कोई उसे रोक नहीं सकता।

फिर पूछा कि पिछली रात उसने आने की पुष्टि क्यों की थी।

समीर असहज होकर हँसा।

“दोस्ती को समझौते जैसा मत बनाओ।”

उन्होंने नया खिलाड़ी खोजा जिसने उनके साथ कभी अभ्यास नहीं किया था।

प्रतियोगिता खराब गई।

इसलिए नहीं कि नया खिलाड़ी बेकार था, जैसा समीर ने बाद में कहा। इसलिए कि उसे ऐसी योजनाओं में उतार दिया गया जिन्हें समझाने का समय किसी के पास नहीं था।

वापसी में आलोक ने टीम की कमीज उतारी और बैग के नीचे दबा दी।

देव ने पूछा, नाराज हो?

आलोक खिड़की से बाहर देखता रहा।

“हमारी तरफ से तुम्हें माफ करते देखकर थक गया हूँ।”

* * *

समीर फिर माफी लेकर लौटा।

उसने चाय मँगाई और कहा कि वे परिवार हैं।

फिरोज कप में चम्मच घुमाता रहा। पीया नहीं।

देव माफी स्वीकार करने को तैयार था। परिचित कहानी की ओर मन बढ़ने लगा था। अस्पताल। चप्पल। कागज के दो कप।

तभी आलोक ने देर से छोड़ने के कारण हुए खर्च में उसका तय हिस्सा माँगा।

समीर का चेहरा बदल गया।

“दोस्ती का बिल बनाओगे?”

“तुम्हारे फैसलों के पैसे देना बंद करना चाहता हूँ।”

देव ने बातचीत हल्की करने की कोशिश की।

आलोक उठ गया।

“नहीं। तुम तय कर सकते हो कि उसके कितने एहसान मानते हो। मेरे बारे में नहीं तय कर सकते।”

उसने अपनी चाय के पैसे रख दिए।

उस रात माँ ने पूछा कि टीम वाले अब आते क्यों नहीं।

देव ने कहा, सब व्यस्त हैं।

माँ ने पूछा, समीर फिर व्यस्त है क्या?

देव ने उनकी तरफ देखा।

वह जितना समझ रहा था, उससे ज्यादा उन्होंने देख लिया था।

* * *

माँ खाने की मेज पर धनिया साफ कर रही थीं।

देव सामने बैठ गया और पूरी कहानी बता दी।

उन्होंने बीच में नहीं टोका। फिर डंठलों का छोटा ढेर कचरे के बर्तन की तरफ सरकाया।

“उसने मेरी मदद की थी।”

“जानता हूँ।”

“तुमने मुझे भूलने नहीं दिया।”

देव ने नजर झुका ली।

माँ ने उसकी कलाई छुई।

“मेरा मतलब बार-बार कहने से नहीं है। तुम बार-बार चुकाते रहते हो।”

देव समझाने लगा कि जब कोई नहीं आ सका था, समीर आया था।

“हाँ। मैं आभारी हूँ। मिलूँगी तो कहूँगी भी। लेकिन मैं अस्पताल से इसलिए वापस नहीं आई कि तुम्हें हर साल उसके सामने हाथ जोड़ना पड़े।”

देव चुप बैठा रहा।

माँ फिर धनिया साफ करने लगीं।

उन्होंने दोस्ती तोड़ने को नहीं कहा। समीर को बुरा आदमी भी नहीं बताया।

ऐसा कहतीं तो देव के लिए बहस करना आसान होता।

उन्होंने उसके सामने सिर्फ यह संभावना छोड़ दी कि एहसान सच्चा रह सकता है, बिना अगला फैसला अपने कब्जे में लिए।

* * *

अगली प्रतियोगिता की तैयारी देव ने अलग तरह से शुरू की।

पहले आलोक और फिरोज से माफी माँगी।

समीर के व्यवहार के लिए नहीं। अपने पुराने रिश्ते के कारण उनके समय की बर्बादी को भी माफ करने का हक मान लेने के लिए।

आलोक बाँहें मोड़कर सुनता रहा।

“बदलेगा क्या?”

“उपलब्धता लिखकर। सही अतिरिक्त खिलाड़ी। पंजीकरण तय होने से पहले कोई सफर नहीं करेगा।”

“और समीर?”

“उसे भी वही समय सीमा।”

इस आयोजन में पंजीकृत अतिरिक्त खिलाड़ी रखने और तय समय से पहले बदलाव की अनुमति थी। उन्होंने आयोजक से शर्तें पूछीं। किसी दूसरी प्रतियोगिता की याद पर भरोसा नहीं किया।

समीर को कार्यक्रम और शर्तें भेजीं।

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उसने अंगूठा दिखाने वाला चिन्ह भेजा।

देव ने साफ पुष्टि माँगी।

कई घंटे बाद समीर ने हाँ लिखा।

देव ने संदेश सँभाल लिया।

फिर ऐसा व्यक्ति खोजने लगा जिसे अतिरिक्त खिलाड़ी की भूमिका ईमानदारी से बताकर साथ लाया जा सके।

* * *

मीना छत्तीस साल की थी। बहन के साथ छोटी सिलाई की दुकान चलाती थी।

देव उसे खुले अभ्यास सत्रों से जानता था। वह कमरे में बैठते ही जीत की भविष्यवाणी करने वाली खिलाड़ी नहीं थी। हारने पर आम तौर पर बता सकती थी कि किस फैसले पर फिर सोचना चाहती है।

हाँ कहने से पहले उसने तीन सवाल पूछे।

क्या बाहर बैठने के लिए भी पैसे देने होंगे?

खेलना हुआ तो कितना पहले बताएँगे?

सक्रिय खिलाड़ी बनी तो उसका हिस्सा और जिम्मेदारियाँ बाकी लोगों जैसी होंगी?

देव ने लिखकर उत्तर दिया। अतिरिक्त पंजीकरण का खर्च टीम के तय कोष से होगा। बुलाए जाने पर सहमति वाला यात्रा खर्च वापस मिलेगा। खेल में आने के बाद टीम की व्यवस्था में उसकी जगह किसी भी खिलाड़ी के बराबर होगी।

मीना ने पढ़ा।

फिर पूछा, “मुझे इसलिए ला रहे हो क्योंकि उसके चले जाने की उम्मीद है?”

देव झूठ बोल सकता था।

“हाँ।”

“तो अभ्यास भी ऐसे करो जैसे मुझे सच में खेलना पड़ सकता है।”

उन्होंने वही किया।

मीना बाकी तीनों के साथ बैठी। तैयारी का तरीका समझा। जो हिस्से उसे बेकार लगे, वह भी बताए।

फिरोज हँसा।

कई सप्ताह बाद देव ने उसकी इतनी सहज हँसी सुनी थी।

* * *

समीर कम अभ्यासों में आने लगा।

कभी देर से आता और चाहता कि जो हिस्सा छूटा है, वहाँ से सब फिर शुरू करें। कभी यह पूछे बिना सलाह भेज देता कि अभ्यास किस चीज का हो रहा है।

मीना उसकी कुर्सी से उठी नहीं।

किसी की तय कुर्सी थी ही नहीं।

यह बात शायद समीर को चुभती थी।

एक शाम उसने मीना को अंक की प्रविष्टि जाँचते देखा और कहा, “अतिरिक्त खिलाड़ी भी बहुत गंभीर हो रहे हैं।”

मीना ने पहले संख्या जाँची। फिर ऊपर देखा।

“तुम बीस मिनट देर से आए तो सब दोबारा शुरू करवाया। मैं दो अंक पूछ रही हूँ।”

आलोक ने कप से मुस्कान छिपाई।

देव ने समीर को खामोशी से निकालने की कोशिश नहीं की।

बाहर समीर ने पूछा कि टीम का माहौल अजीब नहीं हो गया है?

“व्यवस्थित लग रहा है,” देव ने कहा।

समीर ने कंधे पर हाथ रखा।

“तुम जानते हो, जरूरत में तुम्हारा आदमी मैं ही हूँ।”

देव को अस्पताल का गलियारा याद आया।

फिर दो पंजीकरण मेजें याद आईं।

“गुरुवार को अंतिम उपलब्धता का जवाब चाहिए,” उसने कहा।

* * *

बुधवार को समीर ने बताया कि दूसरा प्रस्ताव मिल सकता है।

इस बार देव ने नहीं पूछा कि कितना अच्छा है।

पूछा कि वह हट रहा है क्या।

“हर बात को अंतिम क्यों बनाते हो?”

“क्योंकि किसी को सफर करना है।”

“बता दूँगा।”

“कल दोपहर बारह बजे तक चाहिए। आयोजक की सीमा उससे बाद है, ताकि बदलाव ठीक से कर सकें।”

समीर ने कहा कि समझ गया।

गुरुवार ग्यारह चालीस पर उसका संदेश आया।

फिलहाल मेरे बिना आगे बढ़ो। दूसरी बात नहीं बनी तो बताऊँगा।

देव ने दो बार पढ़ा।

फिर लिखा, हम मीना के साथ आगे बढ़ेंगे। बदलाव पक्का होने के बाद तुम्हारी जगह रोककर नहीं रखेंगे।

समीर ने जवाब दिया, ठीक है। नाटक मत करो।

देव ने हटने और नए खिलाड़ी की जानकारी तय प्रक्रिया से भेज दी।

आयोजक ने उसी दोपहर मीना की जगह की पुष्टि कर दी।

आलोक ने आखिरी ट्रेन सीट बुक की।

फिरोज ने मिलने का समय भेजा।

मीना ने लिखा कि वह सेफ्टी पिन लाएगी। किसी न किसी की आस्तीन हमेशा फटती है।

किसी ने मिन्नत नहीं की।

* * *

अगली सुबह नई कमीज की तस्वीर आई।

समीर को घबराहट की उम्मीद थी।

देव से पहले वह उस बातचीत तक पहुँच चुका था। उसे पंक्तियाँ मालूम थीं।

ऐसा कैसे कर सकते हो?

अब हम क्या करें?

तुम जानते हो कि तुम्हारी जरूरत है।

इन्हीं पंक्तियों से वह जाते हुए भी सबसे जरूरी व्यक्ति बना रहता था।

इसके बजाय देव ने बताया कि बदलाव पक्का है।

समीर का फोन आया।

देव ने चाय उड़ेलकर उठाया।

“सच में निकाल दिया मुझे?”

“तुम हटे थे।”

“फिलहाल कहा था।”

“मैंने बताया था कि क्या होगा। तुम सहमत थे।”

समीर चुप हुआ।

फिर पूछा कि मीना सच में काफी अच्छी है क्या।

देव ने टीम के संदेश देखे। मीना ने चार नाम लगे लिफाफों की तस्वीर भेजी थी जिनमें यात्रा की जानकारी रखी थी।

“उसे पता है कि कहाँ पहुँचना है।”

समीर हँसने लगा। देव नहीं हँसा तो रुक गया।

“बिगड़े तो मुझे फोन मत करना।”

देव ने बात समाप्त की।

फिर माँ की चाय उनके कमरे में ले गया।

* * *

प्रतियोगिता में मीना घबराई हुई थी।

देव ने उसे एक ही कार्यक्रम दो बार देखते पाया।

उसने यह नहीं कहा कि समीर कभी नहीं घबराता था। समीर अपनी घबराहट बाकी लोगों से उठवाना पसंद करता था।

देव ने पूछा कि पाँच मिनट अकेले चाहिए क्या।

मीना ने हाँ कहा।

टीम ने उसे समय दिया।

शुरुआती अंक साधारण रहे। फिरोज से बचाई जा सकने वाली गलती हुई। किसी के पूछने से पहले उसने माफी माँग ली।

मीना ने कहा कि उससे भी गलती हुई है।

उन्होंने बात की कि क्या बदलना चाहिए और क्या सिर्फ बुरा परिणाम था।

पहले दिन के अंत तक अगले चरण में पहुँच गए।

देव ने आधिकारिक अंक सूची की तस्वीर लेकर टीम के समूह में भेजी।

समीर को नहीं भेजी।

किसी और ने भेजी होगी।

रात को उसका संदेश आया।

तो किसी तरह निकल गए।

देव ने पढ़ा। आलोक कमरे में टेलीविजन का खोया रिमोट खोज रहा था।

उसने फोन चार्ज पर लगाया और उसके साथ खोजने लगा।

* * *

अगली दोपहर समीर की नई टीम बाहर हो गई।

गलियारे में एक खिलाड़ी ने बताया। देव ने पूरा विवरण नहीं पूछा। बाहर होने से समीर खराब नहीं हो जाता था, जैसे आगे पहुँचने से उनकी टीम हार से सुरक्षित नहीं हो गई थी।

अभी काम बाकी था।

अगले चरण से पहले समीर का फिर फोन आया।

“मैं आ सकता हूँ।”

“किसलिए?”

“साथ देने। चीजों में मदद करने।”

देव ने उसे आते देखा, सलाह देते देखा, फिर धीरे-धीरे उस समूह के बीच में लौटते देखा जिसे छोड़ चुका था।

“हमारी व्यवस्था है।”

समीर ने साँस छोड़ी।

“बदल गए हो।”

“हाँ।”

“एक अच्छे दिन से खुद को मुझसे बेहतर समझने लगे?”

“नहीं।”

देव इंतजार करता रहा।

इतने छोटे उत्तर के लिए समीर के पास अगली बात नहीं थी।

फोन खत्म हुआ तो मीना पास बिस्कुट का पैकेट लिए खड़ी थी।

“सब ठीक?”

“वापस आना चाहता है।”

उसने एक बार सिर हिलाया।

फिर पूछा कि फिरोज कौन सा पैकेट खा सकता है जिससे अंक वाली शीट पर चूरा न गिरे।

टीम के पास पहले से अगला काम था।

* * *

अंतिम चरण ने दूसरी वजह से लगभग तोड़ दिया।

आलोक का एक दौर खराब हुआ। टीम का कुल गिर गया। वह प्रतीक्षा वाले हिस्से में होंठ दबाए लौटा और खुद को कमजोर कड़ी कहने लगा।

फिरोज ने कुर्सी खिसकाई।

“पहले बैठो।”

देव को याद आया कि पंजीकरण की मेज पर कभी ऐसे शब्द हार मान लेना होते थे।

यहाँ उनका मतलब था कि किसी ने तुम्हारी जगह रखी है।

मीना ने बाकी कार्यक्रम देखा।

चमत्कार नहीं चाहिए था। बाकी मेजों से पर्याप्त अच्छे परिणाम चाहिए थे। फिर भी जीत पक्की नहीं थी।

वे खेले।

देव एक करीबी फैसला हारा। मीना ने अगले सत्र में अंतर घटाया। फिरोज मजबूत तरीके से समाप्त हुआ।

आलोक, जो एक घंटे पहले गायब होना चाहता था, वे अंक लाया जिनसे आखिर दूसरी टीम पीछे रह गई।

आधिकारिक कुल जाँचा गया।

फिर दोबारा जाँचा गया।

उनका नाम पहले स्थान पर रहा।

आलोक दीवार से टिक गया और चेहरा ढक लिया।

तस्वीर के लिए जाने से पहले मीना ने बैग से सेफ्टी पिन निकाली और फिरोज की आस्तीन का छोटा चीरा जोड़ दिया।

* * *

समीर बाहर निकलने वाली जगह पर खड़ा था।

देव ने नहीं सोचा था कि वह आखिर आ ही जाएगा।

एक पल उसे अस्पताल के बाहर वाला दोस्त दिखाई दिया। थका हुआ, थोड़ा असहज, कुछ उपयोगी करना चाहता हुआ।

फिर समीर ने कहा, “फोन कर सकते थे।”

देव ने टीम का प्रमाणपत्र बगल में पकड़ा।

“सँभल गया।”

“दिख रहा है।”

समीर ने मीना की तरफ देखा। वह आलोक से हँसते हुए बहस कर रही थी कि खाने कहाँ जाएँ।

“अगले सत्र में, फिर?”

देव ने सिर हिलाकर मना किया।

इन्कार धीरे-धीरे उसके चेहरे तक पहुँचा।

“कुछ प्रतियोगिताओं के लिए इतने साल फेंक रहे हो?”

“नहीं। साल रहने दे रहा हूँ। टीम की साझेदारी खत्म कर रहा हूँ।”

समीर एक बार हँसा। खुशी नहीं थी।

“तुम्हारी माँ के लिए जो किया, उसके बाद?”

बात आखिर सीधे सामने थी।

देव इतने समय से इस कर्ज का नाम सुनने का इंतजार कर रहा था कि लगभग राहत हुई।

“मदद की थी तुमने,” उसने कहा। “कभी झुठलाऊँगा नहीं।”

प्रमाणपत्र दूसरे हाथ में लिया।

“लेकिन जब चाहो, उस रात को खर्च नहीं कर सकते।”

* * *

माँ के कहने पर वे एक बार फिर मिले।

उन्होंने खाना बनाया था।

अस्पताल वाली रात के लिए समीर को धन्यवाद दिया। उस धन्यवाद से कोई और बात मनवाने की कोशिश नहीं की। उसके पिता का हाल पूछा।

समीर चुपचाप खाता रहा।

बाद में देव ने उसे पुरानी तस्वीर दी। ठीक कराकर अच्छे कागज पर छपवाई थी। उसमें दोनों उधार की कार के पास थे, जब किसी के पास टीम की कमीज नहीं थी।

समीर की अलमारी में पुरानी प्रति खराब हो गई थी। देव ने उसे ठीक करवाने का वादा किया था।

वह वादा निभाया।

दोनों ने टीम के साझा खर्च भी जाँचे। अस्पताल का उधार पहले ही लौट चुका था। बाकी सहमति वाले टीम खर्च अलग से चुकाए और भुगतान की पुष्टि की गई।

समीर ने फिर पूछा कि क्या सब सामान्य हो सकता है?

देव ने तस्वीर देखी।

“कुछ चीजें अच्छी थीं। इसका मतलब टीम फिर शुरू नहीं होगी।”

वह उसे फाटक तक छोड़ने गया।

समीर के जाने पर कुछ देर वहीं खड़ा रहा। जीत जैसा नहीं, दुख जैसा लग रहा था।

फिर फोन बजा।

मीना थी। कपड़ों का बड़ा ऑर्डर आया था। अगला अभ्यास दूसरे समय करना चाहती थी।

देव ने बाकी लोगों से पूछा।

चारों के लिए समय मिल गया।

उसने लिखकर पुष्टि भेजी और घर के अंदर चला गया।

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