1. DD Game कथा: सुबह आठ बजकर सत्रह मिनट
आठ बजकर सत्रह मिनट पर दत्तात्रेय ने पानी की ट्रे दीपक के हाथों में रख दी।
“अच्छा हुआ आ गए। मेहमान इंतज़ार कर रहे हैं।”
दीपक नीचे से लिया प्रतियोगी का बैज पहनकर आया था। ट्रे ने उसे ढक दिया। स्वागत क्षेत्र में एक पल के लिए सिर्फ पुराना दृश्य बचा। प्रसिद्ध शिक्षक लोगों से मिल रहे थे। पूर्व शिष्य उनकी जरूरत का सामान ढो रहा था।
छियालीस साल का दीपक रसोई के उपकरण ठीक करके कमाता था। कभी लगभग हर शाम दत्तात्रेय के क्लब के अभ्यास हाथ तैयार करता था। पत्नी की बीमारी में अधिक मजदूरी लेनी पड़ी तो शिक्षक ने उसे बदल दिया। उसके जाने को अनुशासन की कमी बताया।
नई क्लब पुस्तिका में दीपक के तीन अभ्यास दत्तात्रेय की तस्वीर के नीचे थे। दूसरा नाम नहीं था।
मेहमान ने पहचाना। “अभी भी सर की मदद करते हो?”
दीपक ने ट्रे नाश्ते के काउंटर पर रखी। शर्ट की ओर मुड़ गया बैज सीधा किया।
“मैं खेलने आया हूँ।”
दत्तात्रेय ने नीचे देखा। “बिल्कुल। अच्छा अनुभव मिलेगा।”
मेहमान वैसे मुस्कराया जैसे महत्वाकांक्षा दिखाते सहायक को देखकर लोग मुस्कराते हैं।
दीपक ने नहीं समझाया कि वह क्वालिफाई करके आया था। सूची दीवार पर थी। वह सिर्फ अपना बैग लेकर उसके पास से खेल कक्ष की ओर गया।
पीछे दत्तात्रेय ने स्वयंसेवक से पानी ले जाने को कहा।
उस सुबह पहली बार किसी दूसरे ने ट्रे उठाई।
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2. आठ चालीस: पाठ के नीचे का पाठ
शहर की आमंत्रण प्रतियोगिता में आठ वयस्क खिलाड़ी थे। प्रकाशित व्यवस्था के अनुसार हर नॉकआउट मुकाबला तीन डील पहले जीतने वाला जीतता। तेरह पत्तों की सही रमी घोषणा में दो सीक्वेंस जरूरी थे, जिनमें कम से कम एक प्योर हो। डील छोड़ने वाला वह डील हारता।
दीपक ने कागज़ ध्यान से पढ़ा। इस प्रारूप का अभ्यास किया था। फिर भी सामने के नियमों की जगह याद को नहीं रखने वाला था।
वर्षों पहले दत्तात्रेय ने खुले पत्तों से प्रतिद्वंद्वी की पसंद देखना सिखाया था। अच्छा पाठ था। समस्या तब बनी जब अनुमान प्रदर्शन बन गया।
एक पत्ता देखकर शिक्षक कहते, “इसके पास पूरा सीक्वेंस है।” शुरुआती खिलाड़ी मानते क्योंकि स्वर निश्चित था। दीपक भी मानता था।
अपने रिकॉर्ड में उसने बाद में देखा कि एक ही सार्वजनिक पसंद के पीछे कई अलग छिपी जमावटें हो सकती थीं।
उसने तीन खाने बनाए। देखा हुआ। संभव। अज्ञात। तीसरा अक्सर सबसे लंबा था।
इस बदलाव ने वह आराम छीना जिसमें लगता था सबके पत्ते पता हैं। बदले में फैसले बेहतर मिले।
आठ चालीस पर वह तय मेज़ पर बैठा। सामने स्कूल प्रशासक अजित था। उसने कंधे ढीले किए और रोशनी जाँची। क्वालिफाइंग रिकॉर्ड मजबूत था।
दीपक ने पुराने शिक्षक की आवाज़ दिमाग से हटाई।
अधिकारी ने शुरू कराया। तेरह पत्ते आए।
उसने पहले वह देखा जो हाथ में था, फिर सोचा कि दूसरी जगह क्या हो सकता है।
3. नौ बारह: पहली हार
पहली डील अजित जीता। दीपक के पास प्योर सीक्वेंस और उपयोगी अधूरे समूह थे। लेकिन विरोधी ने बाकी पहले पूरे कर लिए।
हार ने अपने फैसले दोबारा लिखने का लालच दिया। वह ऐसा दूसरा डिस्कार्ड सोच सकता था जिससे अगली ड्रॉ काम आती। वर्षों तक हार के बाद यही करता था। बाद की जानकारी को विश्लेषण मान लेता था।
इस बार उसने वही पल दर्ज किया जब वास्तव में जानकारी थी।
दूसरी डील में अजित ने खुले ढेर से नौ उठाया। दीपक के पास उसका पास का आठ था। नौ उठने से आठ विरोधी के काम का हो सकता था। सीक्वेंस साबित नहीं था। वह नौ का सेट भी बना सकता था।
दीपक के पास छोड़ने के दो समान रूप से बेकार पत्ते थे। उसने दूसरा छोड़ा। सिर्फ यह दिखाने के लिए अतिरिक्त जोखिम जरूरी नहीं था कि उसे डराया नहीं जा सकता।
अगली ड्रॉ छोटे पत्तों का सीक्वेंस सुधारती थी। उसने सुंदर जोड़ी तोड़ी और दूसरा सीक्वेंस जीवित रखा। बाद की ड्रॉ से आखिरी सेट बना।
सही घोषणा हुई।
एक-एक डील।
तीसरी में अजित ने तरीका बदला। अधिकतर बंद गड्डी से लिया। अनुमान के लिए कम जानकारी थी। दीपक ने सीमा स्वीकार की और अपने लचीले समूह बचाए।
मुकाबला पाँच डील चला। आखिरी में दीपक जाँचकर सही घोषणा से जीता। विरोधी की किसी प्रक्रियागत गलती से नहीं।
दस छियालीस पर उसने पहले नतीजे पर हस्ताक्षर किए।
4. ग्यारह पाँच: उधार लिया अभ्यास
ब्रेक में युवा स्वयंसेवक नई क्लब पुस्तिका लेकर आया।
“सर कहते हैं इन्हें लगाने में आपने मदद की थी। यह समझा देंगे?”
दीपक ने स्थिति पहचान ली। पुराने किराए के कमरे में अभ्यास हाथ हारने के बाद खुद बनाई थी। सवाल था कि दो एक-दूसरे में मिलते सीक्वेंस में कौन सा सही रखा जाए।
उसने दोनों रास्ते समझाए। स्वयंसेवक ने पूछा कि छपा जवाब इतना निश्चित क्यों है।
“क्योंकि उसमें दूसरी संभावित ड्रॉ छोड़ दी गई है।”
समझाना खत्म होने से पहले दत्तात्रेय आए।
“उलझाओ मत। शुरुआती अभ्यास है।”
दीपक ने पन्ना पलटा। नए अक्षरों के पीछे हल्की तस्वीर में मूल हाथ का लिखा नोट दिखाई देता था। किनारे उसके नाम के शुरुआती अक्षर बचे थे।
“विकल्प वजह से लिखा था।”
शिक्षक ने पुस्तिका बंद की। “तुम मेरे सत्रों की सामग्री तैयार करते थे। अंतर याद रखो।”
स्वयंसेवक दोनों को देखता रहा। दीपक को पुरानी आदत खींचने लगी। मुस्कराए, माहौल सहज करे, शिक्षक का अधिकार बना रहने दे।
उसने इसके बजाय पुस्तिका माँगी और स्वयंसेवक को लौटा दी।
“दोनों रास्ते महत्वपूर्ण हैं। जाँचकर देखना।”
फिर खाने चला गया।
पत्नी का पैक किया खाना खाया। ढक्कन के नीचे नोट था कि पानी की बोतल याद रखे। उसमें ट्रॉफी, शिक्षक या बदले का उल्लेख नहीं था।
उसने अगले मैच से पहले पानी पिया। भोजन धीरे खत्म किया और खाली डिब्बा साफ करके बैग में रखा।
5. साढ़े बारह: योजना टूटकर खुली
सेमीफाइनल की विरोधी तारा जल्दी जमावट बदलती थी। दीपक जिस पत्ते को बचाए रखने की उम्मीद करता, वह छोड़ देती। फिर ऐसी बनावट से घोषणा करती जिसके बारे में उसने सोचा नहीं था।
दो डील बाद बराबरी थी।
तीसरी में दीपक ने सेट पर जल्दी निर्णय कर लिया। नए पत्ते से दो सीक्वेंस का बेहतर रास्ता मिला। वह रुका क्योंकि सेट तोड़ना किया काम मिटाना लगा। जब वह आज के हाथ में कल की योजना बचा रहा था, तारा पूरी हो गई।
वह दो-एक आगे थी।
दत्तात्रेय रस्सी के पार से देख रहे थे। उन्होंने साथी की ओर अपने माथे पर उँगली रखी। बिना सुने दीपक टिप्पणी समझ सकता था।
छोटे ब्रेक में वह हाथ धोने गया और कलाइयों पर ठंडा पानी डाला। पाँच मिनट में दूसरा व्यक्ति नहीं बनना था। पहली जमावट को वादा समझना बंद करना था।
चौथी डील में वैसा ही चुनाव मिला। इस बार नया ढाँचा सही हुआ तो उसने पत्ता तुरंत बदला।
जोड़ी का हिस्सा रन में गया। बचा पत्ता दूसरे संभावित सेट से जुड़ा। दो टर्न हाथ कम व्यवस्थित दिखा। फिर वास्तव में पूरा होने के करीब आया।
वह जीता।
निर्णायक डील में तारा ने कई बेकार ड्रॉ तक इंतज़ार करवाया। दीपक पूरा हाथ जाँचता रहा। उपयोगी पत्ता आया तो उसने पहचाना कि उससे क्या बदला।
घोषणा के बाद तारा ने समूह देखे और सिर हिलाया। इस बार उसे काम वापस बदलना नहीं पड़ा था।
6. दो पंद्रह: बिना तालियों का काम
फाइनल के इंतज़ार में दीपक ने पत्नी को फोन किया। लीला ने पूछा खाना खाया? उसने हाँ कहा।
“हाथ काँप रहे हैं?”
“थोड़े।”
“काम पर लौटने के पहले दिन मेरे भी काँपे थे।”
उसने हर खोई चीज़ के लिए जीतने को नहीं कहा। इसलिए दीपक सच बता सकता था।
तैयारी मरम्मत के कामों के बाद खाने की मेज़ पर होती थी। वह याद की मनपसंद कहानी के बजाय लिखे नोट से डील बनाता। लीला कभी शुरू के हाथ की फोटो लेती ताकि बाद में अनजाने उसे बेहतर न बना दे।
पता चला कि सबसे आत्मविश्वासी स्पष्टीकरण हमेशा सबसे अच्छे फैसलों के नहीं थे।
वह तेरह पत्ते जाँचने जितना धीरे घोषणा करता। इतना धीरे नहीं कि सही समूहों पर बेवजह शक होने लगे। सेट तोड़ना, रन बढ़ाना और प्राकृतिक पत्ता आने पर जोकर की नई जगह पहचानना दोहराया।
कुछ शाम कोई सुधार नहीं होता। एक सप्ताह छह अभ्यास मैच हारा। फिर भी फैसले लिखे। कॉपी जीतों की तस्वीरों की किताब नहीं बनी।
दो पंद्रह पर दूसरा सेमीफाइनल समाप्त हुआ। दत्तात्रेय साफ जीतकर आए थे।
दीपक ने फोन रखा और उनकी मेज़ देखी।
जिस व्यक्ति ने पहला उपयोगी पाठ दिया था, अब वही जाँचेगा कि उसने बाद के पाठों पर सवाल करना सीखा या नहीं।
दीपक ने कॉपी बैग में बंद की और उठ गया। उसे अब नोट पढ़ने नहीं थे। सामने मौजूद पत्तों के अनुसार उनका उपयोग करना था।
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7. तीन दो: शिक्षक अभी भी अच्छे हैं
फाइनल की पहली डील दत्तात्रेय तेज और सही घोषणा से जीते। सही समय पर जोड़ी तोड़ी थी और दूसरा सीक्वेंस बचाया था जिसका दीपक को अनुमान नहीं था।
उनका कौशल वास्तविक था। इसलिए उनका तिरस्कार आसानी से खारिज नहीं किया जा सकता था।
अगली डील शुरू होते समय पूछा, “यह याद है?”
दीपक को याद था। यह भी याद था कि वह फोटोकॉपी के पैसे देता था और शिक्षक पाठ की तालियाँ लेते थे।
दूसरी डील उसने अकेला बड़ा पत्ता सिर्फ भविष्य के सेट की उम्मीद में न बचाकर जीती। तीसरी में दत्तात्रेय ने तेज उठानों से दबाव डाला और पहले पूरे हुए।
दो-एक।
शिक्षक पीछे टिक गए। खिताब से एक डील दूर थे।
दीपक ने खाली मेज़ देखी जहाँ पत्ते थे। गुस्सा आ रहा था। इतना तेज कि कोई भी आक्रामक फैसला सही लग सकता था।
नई डील आने तक उसने हाथ घुटनों पर रखे।
चौथी में प्योर सीक्वेंस जल्दी बना। बाकी के दो विकल्प बचाए। दत्तात्रेय की सार्वजनिक पसंद से एक तय डिस्कार्ड कम आकर्षक हुआ। दीपक ने दोनों रास्ते बिगाड़े बिना दूसरा चुना।
बाद की ड्रॉ ने उनमें से एक पूरा किया।
दो-दो।
दत्तात्रेय बोलना बंद कर गए। आखिरी डील में वही पूरा ध्यान चाहिए था जिसकी कमी वह सिर्फ पुराने शिष्य में मान रहे थे। दीपक ने कुछ नहीं कहा। अधिकारी ने अगले पत्ते तैयार किए और दोनों फिर आगे झुके।
8. तीन छत्तीस: झूठी निश्चितता
निर्णायक डील में दत्तात्रेय ने सात उठाया और पत्ते तीन छोटे हिस्सों में जमा दिए। ऐसी हरकत पहले दीपक को यकीन दिलाती थी कि पूरा छिपा हाथ दिख गया।
अब उसने देखे हुए और कल्पना को अलग किया।
सात लिया गया था। जमावट बदली थी। सही समूह अभी अज्ञात थे।
अपने हाथ में पूरा प्योर सीक्वेंस, अधूरा दूसरा सीक्वेंस और दो संभावित सेट थे जिनमें एक उपयोगी जोड़ने वाला पत्ता साझा था। उसे दो बार नहीं गिना जा सकता था। एक जमावट लगभग पूरी सिर्फ इसलिए लगती थी क्योंकि मन में वही पत्ता दोनों को उधार मिल रहा था।
उसने चित्र ठीक किया।
अगली ड्रॉ से प्योर सीक्वेंस चार पत्तों का हुआ। इससे दूसरी प्रस्तावित जमावट का पत्ता मुक्त करके बाकी संरचना बनाई जा सकती थी। सुंदर सेट का दिखाई देने वाला नुकसान अधिक उपयोगी दूसरा सीक्वेंस दे रहा था।
दत्तात्रेय ने पत्ते बदलते देखे। “ज्यादा सोच रहे हो।”
अधिकारी ने शांत रहने को कहा।
दीपक ने जवाब नहीं दिया। कभी शिक्षक का शब्द दूसरा विचार रोकने को पर्याप्त था। अब पत्तों को अपनी वजह देनी थी।
उसने दोनों सीक्वेंस बचाने और बाकी समूहों में अधिक उपयोगी संबंध छोड़ने वाला डिस्कार्ड चुना।
दत्तात्रेय ने बंद गड्डी से लिया। नए पत्ते को कई सेकंड अलग रखा, फिर हाथ में लगाया।
चेहरे की निश्चितता गायब थी। दीपक ने उससे जीत का अनुमान नहीं लगाया। अपने हाथ में अभी काम बाकी था।
9. तीन इकतालीस: तेरह अलग जगहें
दीपक को ऐसा पत्ता मिला जो आखिरी सेट पूरा कर सकता था, यदि दूसरा पत्ता दूसरे सीक्वेंस में जाता। बदलाव से पहले वह रुका।
अभ्यास में ऐसा फिनिश बहुत देखा था। बारह उपयोगी पत्ते तेरह होने का दिखावा करते, क्योंकि एक पत्ता दो आशावादी कहानियों का हिस्सा बन जाता।
इस बार हर समूह अलग जाँचा।
चार पत्तों का प्योर सीक्वेंस जस का तस था। दूसरे में तीन अलग वास्तविक पत्ते थे। दोनों सेट तीन-तीन के थे। किसी प्राकृतिक सेट में सूट दोहराया नहीं गया था।
चार, तीन, तीन, तीन।
उसने अंतिम डिस्कार्ड रखा और घोषणा की।
दत्तात्रेय आगे झुके। पहले लंबा प्योर सीक्वेंस देखा, फिर दूसरा रन। वह पत्ता खोजा जिसे पुराने मानसिक ढाँचे में दीपक दो बार गिन रहा था।
अब दो बार नहीं था। उसकी एक जगह थी। दूसरी नई ड्रॉ ने भरी थी।
अधिकारी ने घोषणा सही मानी।
तीन-दो।
दीपक उछलकर नहीं उठा। घोषणा पूरी सुनी और शिक्षक से हाथ मिलाया। उनकी पकड़ छोटी थी।
दर्शक आखिरी बदलाव की बात करने लगे। पुस्तिका वाला स्वयंसेवक पास आया और चारों समूह देखे।
“वही दूसरा रास्ता था।”
दीपक ने सिर हिलाया।
शिक्षक ने सुन लिया। इस बार स्पष्टीकरण खत्म होने से पहले पन्ना बंद नहीं कर सकते थे।
तीन इकतालीस पर दीपक ने अपने छपे नाम के नीचे परिणाम पर हस्ताक्षर किए। पेंसिल रखते समय हाथ अब भी थोड़ा काँप रहा था, लेकिन लिखावट साफ थी।
10. चार दस: माइक किसे मिलता है
पुरस्कार में दत्तात्रेय से पुराने शिष्य के बारे में बोलने को कहा गया। उन्होंने वर्षों की शिक्षा का वर्णन शुरू किया जिससे यह जीत संभव हुई।
दीपक इंतज़ार करता रहा। अच्छे पाठों से इनकार नहीं किया।
माइक मिलने पर उसने उस शिक्षक का नाम लिया जिसने पहला प्योर सीक्वेंस बनाना सिखाया। फिर उन शामों का जिक्र किया जब लीला ने शुरुआती हाथों की फोटो ली, और उन विरोधियों का जिन्होंने उसकी धारणाएँ परखी थीं।
अंत में क्लब पुस्तिका उठाई।
“पन्ना छह का अभ्यास मेरा है। अगली छपाई में मेरा नाम लगाइए।”
आयोजक ने दत्तात्रेय को देखा। शिक्षक इसे इस बहस में नहीं बदल सकते थे कि दीपक खेल समझता है या नहीं। फाइनल की शीट उसी मेज़ पर थी। पन्ने पर नाम के हल्के अक्षर भी थे।
“सुधार करवा दूँगा,” आयोजक ने कहा।
दीपक ने धन्यवाद दिया और माइक लौटा दिया।
विजेता की तस्वीर में अपेक्षा से अधिक समय लगा। लोग कप थोड़ा ऊपर रखने को कहते रहे। पानी की ट्रे वाला दृश्य देखने वाला स्वयंसेवक गिलास लेकर आया।
“आपके लिए।”
दीपक ने ले लिया।
चार दस पर लीला को फिर फोन किया। पीछे प्रेशर कुकर की सीटी सुनाई दे रही थी।
“कैसा गया?”
“मैं जीत गया।”
कुछ पल बाद उसकी हँसी आई।
“खाना ठंडा होने से पहले घर आ जाओ।”
दीपक ने कप बैग में रखा और निकल पड़ा। आज लौटते समय हाथ खाली नहीं थे, लेकिन उन्हें किसी और की ट्रे भी नहीं उठानी थी।
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