1. DD1: अस्सी
पहली डील के बाद स्कोरर ने राघव के नाम के सामने अस्सी लिखा। राघव शुद्ध सीक्वेंस बना पाता, उससे पहले आदित्य ने घोषणा कर दी थी। बिना तैयार समूहों वाले हाथ का दंड प्रतियोगिता की अधिकतम अस्सी अंक की सीमा तक पहुँच गया था।
राघव अंक देखता रहा। वह अड़तालीस का था। छह महीने तैयारी की थी। अब उसी स्मृति प्रतियोगिता का फाइनल खेल रहा था जिससे आदित्य उसे बाहर रखना चाहता था।
सामने आदित्य के शून्य थे। मीना के चौदह। विक्रम के बीस।
फाइनल छह डील का था। सबसे कम कुल दंड अंक वाला विजेता होता। एक डील ने राघव को हर खिलाड़ी से बहुत पीछे कर दिया था।
पत्ते समेटे जा रहे थे। आदित्य पीछे होकर बोला, “इस साल आए तो सही।”
दर्शकों तक वह वाक्य स्कोर से ज्यादा साफ पहुँचा। उन्हें पुरानी कहानी पता थी: दोस्त संदीप की मृत्यु पर राघव गायब हो गया था। अब उसके नाम का कप जीतने लौटा था।
राघव जानता था कि पिछले बरसों में क्या हुआ था। यह भी जानता था कि पूरा कमरा सुन ले, तब भी अभी हाथ में न सँभले पत्तों का नतीजा नहीं बदलेगा।
संदीप की वयस्क बेटी नैना खेलने की जगह से बाहर खड़ी थी। वह सत्ताईस की थी। राघव ने ऊपर देखा तो वह स्कोर शीट नहीं, आदित्य को देख रही थी।
राघव ने पानी की बोतल कुर्सी के नीचे रखी। अगली डील थोड़ी देर में शुरू होनी थी। उसमें अपने साथ क्या ले जाएगा, यह तय करना था।
ऐप लिंक और मौजूदा ऑफ़र की जानकारी चाहिए? नीचे अपनी पसंद की कम्युनिटी चुनें।
टीजी चैनलWhatsApp चैनलWhatsApp ग्रुप
2. DD1 की कहानी: निमंत्रण में खाली जगह
तीन महीने पहले निमंत्रण आया था। संदीप की परिचित तस्वीर थी और आने वाले पुराने दोस्तों की सूची। उसमें राघव का नाम नहीं था।
फोन किया तो आदित्य ने कहा कि आयोजन उन लोगों के लिए है जो परिवार के करीब बने रहे। वह ऐसे कमरे में था जहाँ दूसरे लोग भी थे। राघव को उनकी बातचीत रुकती सुनाई दी।
संदीप की मृत्यु के बाद राघव ने कई शामें उसकी माँ की खरीदारी, कागजों और आने-जाने में मदद करते बिताई थीं। उसका अपना नियमित काम भी छूट गया था। सस्ता कमरा लेना पड़ा था। क्लब की शामों में जाना बंद किया, क्योंकि घर की आखिरी बस खेल खत्म होने से पहले निकल जाती थी।
आदित्य सार्वजनिक अवसरों पर जाता। राघव सामान्य दिनों में। धीरे-धीरे तस्वीरों ने एक तरह की मौजूदगी दर्ज की और दूसरी छोड़ दी।
संदीप की माँ की मृत्यु तक यह कहानी आसानी से दोहराई जाने लगी थी कि राघव ने परिवार छोड़ दिया।
नैना को दादी के कागजों में कुछ गायब वर्ष मिले। मिलने की तारीखें थीं, बस टिकट थे और राघव की लिखी सूचियाँ थीं। उसने पूछा कि यह सब कभी बताया क्यों नहीं।
“मुझे लगा तुम्हें मालूम है।”
नैना ने संबंधित तारीखों की प्रतियाँ आदित्य को भेजीं और लोगों से कही गई बात सुधारने को कहा। समिति ने पुष्टि की कि राघव भी बाकी सबकी तरह क्वालिफाइंग प्रक्रिया से प्रवेश ले सकता है।
उसने प्रवेश लिया। निमंत्रण नोटबुक में मोड़कर रखा रहा। जहाँ उसका नाम होना चाहिए था, वहाँ की खाली जगह भी।
3. बारह अंक और
फाइनल की दूसरी डील में राघव ने वह बड़ा पत्ता देखा जिसे जरूरत से ज्यादा देर पकड़े रखा था। उसे इस्तेमाल करने का एक रास्ता अब भी था, लेकिन उसके लिए कई अनुकूल पत्ते मिलने जरूरी थे। बाकी हाथ ज्यादा व्यावहारिक बन गया था।
उसने बड़ा पत्ता छोड़ दिया।
वह हरकत उसे अभ्यास के पहले हफ्ते में ले गई। वह अच्छे दिखने वाले समूह बचाए रखता और उम्मीद करता कि बाकी हाथ उनके आसपास अपने आप बन जाएगा। एक शाम मीना ने हर रखे हुए पत्ते की वजह पूछी थी।
उसने बादशाह को उपयोगी कहा।
“किसके साथ?” मीना ने पूछा।
उसने दो ऐसे पत्तों के नाम लिए जो पास नहीं थे। मीना ने कहा कि पहले पास के पत्ते गिनाए।
अगले हफ्तों में वह पूरी हो चुकी डील की समीक्षा करते समय आगे आने वाले पत्ते छिपा देता। नतीजा देखने से पहले चुनाव करना पड़ता। कुछ समझदार फैसले हारते। कुछ खराब फैसलों को अच्छा अगला पत्ता बचा लेता। उसने फैसले और बाद के नतीजे के अलग नोट्स बनाए।
अब मीना प्रतिद्वंद्वी बनकर सामने बैठी थी। दूसरी डील उसने घोषित की। राघव के व्यवस्थित समूहों के कारण बचा दंड बारह था।
आदित्य को चौदह मिले। विक्रम को सोलह।
कुल हुए: राघव बानवे, आदित्य चौदह, मीना चौदह और विक्रम छत्तीस।
अंतर अब भी बहुत बड़ा था। राघव ने जाँचा कि उसके बारह सही लिखे हैं। फिर पेन शीट के पास रख दिया।
4. पहला शून्य
तीसरी डील में आदित्य ने खुले ढेर से पत्ता उठाया। राघव ने उसे ध्यान में रखा। इससे यह तय नहीं किया कि आदित्य के बाकी पत्ते भी जान गया है।
यह फर्क सीखने में कई अभ्यास शामें लगी थीं। पहले एक पत्ता उठते देखकर वह सामने वाले का पूरा काल्पनिक हाथ बना लेता था। बाद में छोड़ा पत्ता उस तस्वीर से मेल नहीं खाता, तो नई जानकारी को चाल समझता।
एक समीक्षा में मीना ने उसे रोका। कहा कि जो हुआ और जो अनुमान लगाया, उनकी अलग सूचियाँ बनाए। पहली छोटी थी। दूसरी आधा पन्ना भर गई।
महीनों उसने खेलते समय केवल दिखी घटनाएँ याद रखने और संभावनाएँ बाद में जाँचने का अभ्यास किया। दूसरों के पत्तों के बारे में उसका निश्चय कम हुआ। अपने पत्तों के बारे में सटीकता बढ़ी।
फाइनल की तीसरी डील में जरूरी पत्ता बंद ढेर से मिला। उसने इसे आदित्य के चेहरे की कहानी नहीं बनाया। पत्ता हाथ में रखा, दूसरे संभव समूह देखे और छोड़ने वाला पत्ता चुना।
घोषणा से पहले तेरह वास्तविक पत्ते जाँचे। शुद्ध सीक्वेंस सुरक्षित था। दूसरा सीक्वेंस और सेट बाकी पत्तों से बने थे। कोई पत्ता दो जगह नहीं गिना गया था।
अधिकारी ने घोषणा स्वीकार की।
राघव के शून्य। आदित्य के अठारह, मीना के बीस और विक्रम के चौबीस जुड़े।
बानवे, बत्तीस, चौंतीस, साठ।
उस शाम पहली बार आदित्य ने अपने कुल से ज्यादा देर राघव का कुल देखा।
5. आठ फिर भी आठ थे
चौथी डील आदित्य ने जीती।
उसने साफ तरीके से बाकी खिलाड़ियों से पहले हाथ पूरा किया था। राघव की बनावट उपयोगी थी, लेकिन वैध घोषणा तक नहीं पहुँची थी। उसने दंड गिनने के लिए पत्ते फैलाए और आठ स्वीकार किए।
मीना के अठारह जुड़े। विक्रम के बारह।
अब कुल थे: राघव एक सौ, आदित्य बत्तीस, मीना बावन और विक्रम बहत्तर।
दो डील बाकी थीं।
राघव का अंक तीन अंकों में पहुँचा तो घेरे के बाहर किसी दर्शक के मुँह से छोटी आवाज निकली। आदित्य ने सुनकर स्कोरर की ओर मुस्कराया।
राघव को वह अभ्यास रात याद आई जब हार की भरपाई के लिए लगातार कम समझदार जोखिम लिए थे। अंत में नोटबुक में ऐसी सफाइयाँ थीं जो सभी स्कोर से शुरू होती थीं। उस शाम के साथी ने पूछा था कि क्या पत्तों को पता है कि वह पीछे है।
उसके बाद उसने एक ही हाथ को अलग कल्पित मैच अंकों के बीच खेला। आसपास का स्कोर फैसले को बदल सकता था, लेकिन टूटे समूह को वैध नहीं कर सकता था।
वास्तविक हाथ में आठ का दंड बचा था। उसने आठ के लिए हस्ताक्षर किए।
नैना दर्शकों के पीछे दूसरी जगह खड़ी हो गई थी। उसके हाथ में पुराना निमंत्रण दिखाई दे रहा था। राघव ने नजर हटा ली, इससे पहले कि वह दृश्य दिमाग में एक और बातचीत बन जाए।
उसने पानी पिया। अगली डील तैयार हो रही थी।
6. बिस्तर के पास की कुर्सी
पाँचवीं डील धीरे शुरू हुई। ईंट के छोटे पत्ते ने राघव को वह सस्ती गड्डी याद दिलाई जिसे संदीप जीवन के आखिरी महीनों में बिस्तर के पास रखता था।
तबीयत ठीक लगती तो छोटी, कई बार अधूरी डील खेलते। कभी पत्ते कंबल पर पड़े रहते और सामान्य बातें होतीं: खिड़की की टूटी कुंडी, नैना की पढ़ाई, पंखा ठीक कराने का खर्च।
संदीप के जाने के बाद आदित्य उनकी प्रतियोगिताओं वाले वर्षों की बात करता रहा। राघव के लिए उन दोपहरों को बताना कठिन था जहाँ कोई दर्शक नहीं था, कोई पूरा स्कोर नहीं था।
एक दिन संदीप की माँ ने बिस्तर के पास की खाली कुर्सी हटाने को कहा था। राघव उसे अगले कमरे में रख आया। खुद फर्श पर बैठा, क्योंकि उस कुर्सी का इस्तेमाल सहन नहीं हुआ।
कई वर्षों तक गंभीरता से खेलने बैठता तो ये यादें आतीं। हाथ एक जगह शुरू होता और ध्यान दूसरे कमरे में पहुँच जाता।
अभ्यास में वापसी का हिस्सा उस भटकाव को पहचानकर लौटना भी था। विराम में पत्ते रख देता, समय पर खाता और हारी डील की समीक्षा उसके समाप्त होने के बाद करता।
अब उसने हाथ का ईंट देखा और मौजूदा सीक्वेंस में उसकी जगह रख दिया।
बाकी मेज उसके पत्ता छोड़ने का इंतजार कर रही थी। उसने सामने के पत्तों में से चुनाव किया। पुराने कमरे की याद से अगली मुलाकात विराम में हो सकती थी। अभी उसकी बारी थी।
नई गतिविधियों और ऐप अपडेट के लिए अपना पसंदीदा चैनल देखें।
टीजी चैनलWhatsApp चैनलWhatsApp ग्रुप
7. खेलने लायक आखिरी डील
जरूरी समूह पूरा करने और पूरा हाथ जाँचने के बाद राघव ने पाँचवीं डील घोषित की। आदित्य को बाईस अंक मिले। मीना को अट्ठाईस। विक्रम को चौदह।
नए कुल थे: एक सौ, चौवन, अस्सी और छियासी।
राघव अब भी सबसे पीछे था। दो डील जीता था, तीन हारा था। पहली अस्सी शीट पर बनी हुई थी।
आखिरी डील में इक्के वाइल्ड थे। एक और सही घोषणा से खिताब मिल ही जाएगा, यह निश्चित नहीं था। बाकी खिलाड़ियों के हाथों में पर्याप्त दंड भी रहना चाहिए था। वह उनके पत्ते नहीं देख सकता था। उन्हें मिलने वाले पत्ते भी तय नहीं कर सकता था।
आदित्य किसी और की घोषणा पर भी कम दंड लेकर खिताब बचा सकता था। मीना और विक्रम के लिए भी पहला स्थान संभव था। चारों के पास सावधानी से खेलने की वजह थी।
राघव ने पत्ते लगाए। उसके पास प्राकृतिक ईंट का रन और कुछ उपयोगी जोड़ थे। डील के दौरान उसने केवल एक अधूरे समूह को सुंदर दिखाने के लिए वह रन तोड़ने से मना किया।
पूरी बनावट जाँचने में लगने वाला समय अब परिचित था। घर पर तेरह पत्तों के नीचे नंबर की पर्चियाँ रखकर अभ्यास किया था, ताकि गलती से एक वास्तविक पत्ता दो जगह न गिने।
फाइनल की मेज पर पर्चियाँ नहीं थीं। समूह उसने खुद गिने।
अगले पत्ते में चिड़ी नौ मिला तो सात और आठ के पास रखा। फिर देखा कि अब कौन-सा पत्ता जरूरी नहीं रहा।
8. तेरह पत्ते
राघव ने ईंट दस छोड़ा और घोषणा की।
चार समूह खोले: ईंट दो-तीन-चार-पाँच; चिड़ी सात-आठ-नौ; पान, हुकुम और ईंट के तीन गुलाम; और पान, हुकुम और चिड़ी के तीन छक्के।
चार, तीन, तीन और तीन पत्ते। कुल तेरह।
दोनों रन प्राकृतिक सीक्वेंस थे। दोनों सेट अलग रंगतों के पत्तों से बने थे। कोई पत्ता दो समूहों में नहीं था। अधिकारी ने बनावट जाँची और स्वीकार की।
राघव का कुल एक सौ रहा।
आदित्य ने अनिच्छा से हाथ फैलाया। उसके दो वैध सीक्वेंस थे: पान तीन-चार-पाँच और हुकुम आठ-नौ-दस। सात बिना समूह के पत्ते थे: चिड़ी का बादशाह, ईंट की बेगम, पान नौ, ईंट आठ, ईंट छह, हुकुम तीन और चिड़ी दो।
दस, दस, नौ, आठ, छह, तीन और दो। अड़तालीस अंक।
उसके चौवन बढ़कर एक सौ दो हुए।
मीना के बचे दंड चौबीस थे। कुल एक सौ चार हुआ। विक्रम के छत्तीस जुड़े। वह एक सौ बाईस पर समाप्त हुआ।
एक पल मेज पर कोई नहीं बोला। स्कोरर ने बैठने के क्रम से कुल पढ़े। फिर सबसे कम से सबसे ज्यादा के क्रम में पढ़े।
राघव दो अंक से जीत गया था।
आदित्य ने राघव के कॉलम में ऊपर लिखी अस्सी देखी। नीचे बारह, शून्य, आठ, शून्य और शून्य थे। कोई एक अंक ऐसा नहीं था जिस पर उँगली रखकर पूरी कहानी बता सके।
9. माइक पर पढ़ा गया नाम
घोषणा से पहले अधिकारियों ने अंतिम जाँच पूरी की। मीना ने सबसे पहले राघव से हाथ मिलाया। फिर विक्रम ने। आदित्य ने अपनी तरफ हस्ताक्षर के लिए शीट आने तक इंतजार किया।
उसने अड़तालीस फिर जाँचे। दोनों सीक्वेंस सही अलग थे। बाकी पत्तों की गिनती सही थी। उसने हस्ताक्षर कर दिए।
पुरस्कार के समय अंतिम स्थान पढ़ने की जिम्मेदारी अब भी आदित्य की थी। उसने माइक लिया और चौथे स्थान से शुरू किया।
चैंपियन तक पहुँचा तो उसी कमरे में राघव का पूरा नाम बोलना पड़ा जहाँ उसके आने के अधिकार पर सवाल उठाया था।
राघव आगे गया। नैना प्रस्तुति की मेज के पास खड़ी थी। पिता के नाम का कप उसके हाथ में था। उसने आदित्य की अनुमति लेने के लिए उसकी तरफ देखे बिना कप राघव को दिया।
“पापा आखिरी हाथ देखना चाहते,” उसने कहा।
राघव अचानक एक बार हँसा। “पहले वाले के बारे में भी पूछते।”
नैना मुस्कराई। बात शुरू होने से पहले ही आँसू आ गए थे।
तालियों के बाद आदित्य आया। बोला कि निमंत्रण का काम गलत तरीके से हुआ था।
“तुमने लोगों से कहा कि मैंने परिवार के पास जाना बंद कर दिया,” राघव ने कहा।
आदित्य ने नैना की ओर देखा। वह इंतजार करती रही।
“वह गलत था,” उसने आखिर कहा।
राघव ने वाक्य नरम करने में मदद नहीं की। उसे पूरा रहने दिया। फिर मीना की ओर मुड़ा। वह अभ्यास नोटबुक के लिए अंतिम स्कोर शीट की प्रति चाहती थी।
10. सातवाँ हाथ
ज्यादातर दर्शक जा चुके थे जब नैना ने विजयी हाथ फिर देखने को कहा। राघव ने खाली मेज पर पत्ते लगाए। मीना भी रुकी। समझाया कि अच्छे समूह से एक पत्ता हटाने पर कभी पूरी घोषणा कैसे बिगड़ सकती है।
नैना ने पहली डील की अस्सी के बारे में पूछा।
राघव ने बाद में बनाया रिकॉर्ड दिखाया। प्रतिद्वंद्वी की घोषणा से पहले शुद्ध सीक्वेंस नहीं बना पाया था। प्रतियोगिता के नियम के अनुसार दंड लिखा गया था। उसने हारा हाथ उतनी ही सावधानी से बताया जितनी सावधानी से जीत वाला।
आदित्य थोड़ी दूर खड़ा था। इस बार शाम का विवरण उसके माध्यम से नहीं आ रहा था।
बाद में राघव और नैना ने पुरस्कार की चीजें डिब्बों में रखीं। उसने पूछा कि अगले शुक्रवार आएगा क्या। दादी के कुछ और कागज सँभालने थे। वे सामान्य कहानियाँ भी सुननी थीं जो स्मृति भाषणों में कभी नहीं पहुँचीं।
राघव ने काम का समय देखकर एक वक्त तय किया।
निकलने से पहले नैना ने गड्डी उठा ली। “एक हाथ?”
वे खाली मेज पर बैठे। मीना ने तीसरी कुर्सी ली। स्कोरर ने आधिकारिक शीट रख दीं। यह हाथ फाइनल का हिस्सा नहीं था।
नैना ने धीरे पत्ते फेंटे, गड्डी बराबर की और राघव की तरफ देखा।
पहली अस्सी वह पाँच और डील तक साथ लेकर चला था। अब कप कुर्सी के पास था, दोस्त की बेटी सामने इंतजार कर रही थी और एक नई शुरुआत की जगह थी।
“बाँटो,” उसने कहा।
आगे जानना चाहते हैं? ऐप की जानकारी और साझा ऑफ़र की शर्तें चैनल पर देखें।
टीजी चैनलWhatsApp चैनलWhatsApp ग्रुप