रोहन ने कागज थोड़ा ऊपर पकड़ने को कहा।
पहली तस्वीर में आखिरी पंक्ति कट गई थी।
अर्विंद कॉलेज के उत्सव वाले बैनर के नीचे खड़ा था। हाथ में बयान था कि उसने निशान लगे पत्ते इस्तेमाल किए।
उसने नहीं किए थे।
उँगलियाँ इतनी काँप रही थीं कि कागज लगातार हल्की आवाज कर रहा था।
“सामान्य मुस्कराओ,” रोहन बोला।
अर्विंद ने छात्र समन्वयक की तरफ देखा।
वह फोन देख रही थी।
आयोजन सँभालने वाले शिक्षक पहले ही जा चुके थे। समझाकर गए थे कि औपचारिक शिकायत से बेहतर होगा, चुपचाप माफी माँग ली जाए।
अर्विंद चौबीस साल का था। होटल प्रबंधन के स्नातकोत्तर कार्यक्रम का अंतिम वर्ष था। कमरे की जमा रकम वापस लेनी थी। छह सप्ताह बाद नौकरी का इंटरव्यू था।
माँ मानती थीं कि पढ़ा-लिखा होगा तो लोग बात सुनेंगे।
उसने कागज ऊपर किया।
दूसरी तस्वीर साफ आई।
रात के खाने तक बैच के समूह की सबसे ऊपर लगी सूचना बन गई।
* * *
उत्सव की तीन पत्ती प्रतियोगिता सिर्फ वयस्क छात्रों और पुराने विद्यार्थियों के लिए थी।
टूर्नामेंट काउंटर इस्तेमाल होते थे। शुरुआत में बराबर काउंटर और पहले से घोषित नियम थे।
अर्विंद ने इसलिए नाम लिखवाया था कि खेल पसंद था। और एक बार आयोजन में काम करने के बजाय हिस्सा लेना चाहता था।
अधिकतर सप्ताहांत वह भोजों में सर्विस करता। पढ़ाई का ऋण जिन खर्चों तक नहीं पहुँचता था, वे इससे निकलते थे।
रोहन ने इसलिए हिस्सा लिया क्योंकि दोस्तों को उम्मीद थी।
कॉलेज का कार्यक्रम हॉल नया हुआ था। उसके परिवार ने योगदान दिया था।
वह रोज नहीं बताता था। बाकी लोग बता देते थे।
सत्र में अर्विंद ने उसे दो बार हराया।
दूसरी हार के बाद रोहन ने गड्डी जाँचने को कहा।
समिति के सामने बाद में दिखाए गए कुछ पत्तों के पीछे पेंसिल के हल्के निशान थे।
रोहन ने अर्विंद की तरफ इशारा किया।
“बार-बार किनारे छू रहा था।”
पत्ते सबने छुए थे।
लेकिन आरोप इतना खास सुनाई दिया कि इस साधारण बात के बावजूद टिक गया।
* * *
अर्विंद ने पूछा कि समिति के सामने रखी गड्डी उसी की मेज की थी?
गत्ते का खोल अलग लग रहा था।
सीधा जवाब नहीं मिला।
स्वयंसेवक सफाई शुरू कर चुके थे। कई इस्तेमाल हुई गड्डियाँ एक भंडार कमरे में पहुँचा दी गई थीं।
समन्वयक ने कहा कि अर्विंद छोटी तकनीकी बात पकड़ रहा है।
शिक्षक ने पूछा कि क्या मामला आगे भिजवाना चाहता है?
अर्विंद ने कहा कि सही पत्ते जाँचना चाहता है।
रोहन पीछे टिक गया।
“निर्दोष हो तो इतना उलझा क्यों रहे हो?”
कमरे का तरीका तय हो चुका था।
अर्विंद सवाल पूछता।
कोई सवाल को उसके मुश्किल आदमी होने का प्रमाण बता देता।
आखिर शिक्षक ने व्यावहारिक समाधान दिया।
माफी लिखो। आयोजन से हटो। और रुकावट नहीं होगी।
अर्विंद ने पूछा कि आरोप पढ़ाई के रिकॉर्ड में जाएगा?
शिक्षक ने कहा कि सहयोग ध्यान में रखा जाएगा।
जवाब नहीं था।
धमकी जैसा सुनाई देने के लिए काफी था।
* * *
पहले सप्ताह कक्षा में घुसते ही लोग चुप हो जाते।
फिर कुछ लोग मजाक करने में सहज हो गए।
प्रस्तुति के नोट बाँटे तो किसी ने कहा, “पत्ते जाँच लेना।”
दूसरे ने पूछा कि उसके प्रोजेक्ट के आँकड़ों की खास जाँच चाहिए क्या?
तस्वीर बैच समूह में सबसे ऊपर लगी रही।
उसने समन्वयक से हटाने को कहा।
जवाब मिला कि आयोजन की अनुशासन संबंधी सूचना है।
उसने पूछा कि यह नाम किसने दिया?
जवाब आने बंद हो गए।
नौकरी की तैयारी के सत्र में एक सहपाठी ने पास की कुर्सी से बैग हटा लिया।
हो सकता था किसी और के लिए कुर्सी चाहिए हो।
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अर्विंद दोपहर भर यह मान नहीं पाया।
नुकसान सिर्फ लोगों का व्यवहार नहीं था।
हर चीज का मतलब समझने का नया काम था।
अगली भोज वाली ड्यूटी में एक मेहमान ने आगे भेजी तस्वीर से पहचान लिया।
“कॉलेज वाला लड़का,” अपनी पहचान पर मुस्कराकर बोला।
अर्विंद आगे का इंतजार करता रहा।
कुछ नहीं आया। आदमी ने खाली गिलास बढ़ा दिया।
बाकी तीन घंटे हर मेज पर उठते फोन देखता रहा। एक बार पानी गिरा दिया। इतनी जल्दी माफी माँगी कि सुपरवाइजर ने धीरे काम करने को कहा।
लौटती बस में शाम के पैसे दो बार गिने। हर रुपये की जरूरत थी। वापस काम पर जाने में इतनी शर्म महसूस करना भी उसके बस में नहीं था।
रात को दूसरे कॉलेज में स्थानांतरण की जानकारी देखी।
फिर फीस देखी और पन्ना बंद कर दिया।
* * *
माँ को रिश्तेदार से तस्वीर मिली।
फोन आया तो वह बाल्टी में भोज की नौकरी वाली वर्दी धो रहा था।
“तुम्हारी लिखावट है?”
“हाँ।”
“किया था?”
“नहीं।”
“फिर लिखा क्यों?”
वह पलंग के किनारे बैठ गया। कलाइयों से पानी गिर रहा था।
बातचीत का अभ्यास किया था। लगा था कि सही सफाई तस्वीर को थोड़ा कम सच बना देगी।
इसके बजाय बोला, “डर गया था।”
माँ चुप रहीं।
पीछे कुकर सुनाई दे रहा था।
फिर पूछा, “खाना खा रहे हो?”
वह चाहता था कि पहला सवाल फिर पूछें, ताकि बेहतर जवाब दे सके।
नहीं पूछा।
फोन रखने से पहले कहा, “जरूरत हो तो घर आ जाओ। लेकिन आज रात फैसला मत करना।”
वह रुका रहा।
अगली सुबह ग्राहकों की शिकायत सँभालने का व्याख्यान था।
स्क्रीन पर लिखा था: निष्कर्ष से पहले सुनें।
उसने जरूरत से ज्यादा ध्यान से कॉपी में उतारा।
* * *
पहली बार गंभीरता से सुनने वाला व्यक्ति कोई प्रभावशाली नहीं था।
मीनल अपना स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम करते हुए कॉलेज के मीडिया कमरे में अंशकालिक काम करती थी।
उत्सव से पहले कमरों की तस्वीरें ली थीं।
अर्विंद ने पूछा कि खेल शुरू होने से पहले उसकी मेज दिखती है?
दो तस्वीरें मिलीं।
दूसरी में स्वयंसेवक मेज के नंबर के पास सीलबंद गड्डी पकड़े था।
छोटा सामान नंबर दिख रहा था।
अर्विंद ने बड़ा किया।
सैंतालीस।
समन्वयक के पहले ईमेल में एक तस्वीर थी, जिसका नाम था प्रतिभागी को दिखाया गया प्रमाण।
उसमें निशान वाले पत्ते और खोल समिति की मेज पर रखे थे।
अर्विंद पेंसिल की लकीरें इतनी बार देख चुका था कि याद से बना सकता था।
खोल ध्यान से नहीं देखा था।
मीनल ने दोनों तस्वीरें पास रखीं।
बाहर छात्र प्रोजेक्टर की बुकिंग पर बहस कर रहे थे।
समिति वाली गड्डी का नंबर अलग था।
उन्नीस।
* * *
तस्वीरें अकेले पूरा जवाब नहीं थीं।
आयोजन में गड्डी बदली जा सकती थी। नंबर गलत दर्ज हो सकता था।
फिर भी पहली बार उसकी घबराई हुई जिद से ज्यादा उपयोगी कुछ था।
मीनल ने तस्वीरें बैच समूह में नहीं भेजीं।
मूल वितरण रिकॉर्ड और किसी बदलाव के रिकॉर्ड के लिए अनुरोध लिखवाया।
“पूछो क्या हुआ,” उसने कहा। “यह मत बताओ कि क्या हुआ होना चाहिए।”
पहला जवाब आया कि उत्सव का फोल्डर व्यवस्थित किया जा चुका है।
दूसरे में वही माफी वाली तस्वीर लगी थी।
अर्विंद ने लाइब्रेरी में ईमेल पढ़ा।
कई मिनट कर्सर नहीं हिला पाया।
प्रमाण माँगा था।
वापस वही चीज भेज दी गई थी जो उससे प्रमाण के बारे में कहलवाई गई थी।
मीनल सामने बैठी थी।
“जिस सवाल का जवाब नहीं दिया, वही फिर लिखो।”
“दो बार लिखा।”
“तारीखें डालो।”
वह चिल्लाना चाहता था।
तारीखें लिखीं।
* * *
पुरानी बातचीत के साथ अनुरोध विभाग प्रमुख तक गया।
अर्विंद ने ऐसे व्यक्ति से समीक्षा माँगी जो मूल आयोजन की कार्रवाई में शामिल न रहा हो।
एक सप्ताह बाद अपना विवरण देने को बुलाया गया।
नए समीक्षक ने पूछा कि किस चीज पर हस्ताक्षर किए थे?
अर्विंद ने बयान भेजा।
फिर वह संदेश भेजा जिसमें तस्वीर के लिए खड़े होने की जगह बताई गई थी।
संदेश इसलिए बचा था कि उस दिन की बातचीत खोलते हुए इतनी शर्म आती थी कि देखता ही नहीं था।
बैकअप गायब नहीं हुआ था।
मीडिया और आयोजन के रिकॉर्ड अलग रखे जाते थे।
दिखने वाला उत्सव फोल्डर सँवारा गया तो भी मूल वितरण पन्ना पुराने आयोजन की सामग्री में बचा रहा।
समीक्षक ने जिम्मेदार कर्मचारियों से मँगवाया।
सैंतालीस नंबर अर्विंद की मेज को दिया गया था।
उन्नीस नंबर प्रदर्शन किट का था। स्वयंसेवकों को सामान जाँचना सिखाने में इस्तेमाल हुआ था।
उसके निशान प्रतियोगिता से पहले दर्ज थे।
अर्विंद की मेज पर गड्डी बदले जाने का कोई रिकॉर्ड नहीं था।
* * *
एक स्वयंसेवक ने बताया कि सत्र के बाद गड्डियाँ साथ इकट्ठी हुई थीं।
समिति वाली तस्वीर का खोल उसी ढेर से उठा था। मेज के वितरण नंबर से मिलान नहीं हुआ।
अर्विंद ने बैठक में निष्कर्ष पढ़े।
पेंसिल के निशानों में कोई शानदार छिपी साजिश नहीं निकली।
जल्दबाजी का आरोप निकला।
और ऐसे लोग निकले जिन्हें नंबर जाँचने से आसान, डरे छात्र से माफी लिखवाना लगा था।
यह सहना लगभग ज्यादा कठिन था।
शाम को रोहन का फोन आया।
तस्वीर फैलते समय एक बार भी नहीं किया था।
“सुना फिर देख रहे हैं।”
“हाँ।”
“मैंने तो बस सवाल उठाया था।”
“तस्वीर ली थी।”
“आयोजक ने माफी माँगने को कहा।”
“तुमने ऊपर पकड़ने को कहा।”
रोहन चुप हुआ।
फिर बोला, “सब तनाव में थे।”
अर्विंद ने कमरा देखा। गीली वर्दी। लाइब्रेरी की किताबें। पेन वाला टूटा मग।
वह महीनों उस तनाव में रहा था।
रोहन एक दोपहर आया था।
* * *
“सुधार आए तो डालोगे?” अर्विंद ने पूछा।
“फिर तमाशा मत बनाते हैं।”
अर्विंद लगभग हँस दिया।
जिसका चेहरा तमाशा नहीं बना, उसके लिए वाक्य कितना आसान था।
“सवाल पूछा।”
रोहन ने कहा कि आधिकारिक कुछ आएगा तो बात करेंगे।
अर्विंद ने फोन रख दिया।
आखिर आधिकारिक कुछ आने वाला था।
समीक्षा ने उसके खिलाफ आयोजन का निष्कर्ष वापस लिया।
लिखा था कि आरोप के समर्थन में दिखाई गड्डी उसके मेज की स्थापित नहीं हुई थी। उपलब्ध रिकॉर्ड उस पहचान के खिलाफ थे।
हस्ताक्षर वाली माफी भरोसेमंद स्वीकारोक्ति नहीं मानी जाएगी।
लिखवाने के दबाव का भी वर्णन था।
अर्विंद ने पूछा कि जिन लोगों तक आरोप पहुँचा, सुधार उन तक कैसे पहुँचेगा?
विभाग ने उसे ईमेल भेजने की बात की।
उसने समीक्षक को देखा।
“तस्वीर सिर्फ मुझे नहीं भेजी थी।”
समीक्षक ने सिर हिलाया।
उन्हीं छात्र माध्यमों और आयोजन की सूचना वाली जगह के लिए सुधार तैयार हुआ।
* * *
पुरानी समूह सूचना बदली जानी थी।
तस्वीर केवल वहाँ रहेगी जहाँ यह समझाने के लिए जरूरी हो कि किस चीज को सही किया जा रहा है।
अर्विंद चाहता था कि हर फोन से गायब हो जाए।
कोई वादा नहीं कर सकता था।
उसे सही रिकॉर्ड बताना बंद किया जा सकता था।
उसने फर्क मान लिया। तसल्ली नहीं मिली।
तब तक अगले कॉलेज आयोजन की तैयारी थी।
करियर कार्यक्रम के दौरान वयस्क छात्रों और पूर्व विद्यार्थियों की छोटी खुली प्रतियोगिता होनी थी।
अर्विंद हिस्सा ले सकता था।
दो दिन निमंत्रण देखता रहा।
मीनल ने कहा कि कुछ साबित करने के लिए खेलना जरूरी नहीं।
जानता था।
यह भी जानता था कि पसंद का काम छूट गया है। गड्डी खुलते ही दिमाग में रोहन आता है।
देखना चाहता था कि बदल सकता है या नहीं।
नाम लिखवाया।
आयोजकों से सामान की जाँच और शिकायत सँभालने का तरीका पूछा।
इस बार लिखित जवाब मिला।
अभ्यास में बहुत सावधान रहा।
फिर अपनी सावधानी पर गुस्सा आया।
दोस्त बोला, “रोक सकते हैं।”
अर्विंद ने मेज देखी।
“एक मिनट।”
एक मिनट बाद अगला हाथ खेला।
* * *
उस दिन वही कमीज पहनकर पहुँचा जो माफी की तस्वीर में थी।
बड़ा प्रतीक नहीं था।
सबसे अच्छी कमीज थी।
महीनों उससे बचता रहा था।
पिछली बार घर गया तो माँ ने धोकर प्रेस की। तस्वीर का जिक्र किए बिना तह रख दी।
रोहन दो दोस्तों के साथ मौजूद था।
उसने अर्विंद का पंजीकरण बैज देखा।
“अच्छा है आगे बढ़ रहे हो।”
अर्विंद ने जवाब नहीं दिया।
आगे बढ़ना भी ऐसा वाक्य था जो लोग तब देते हैं जब चाहते हैं कि चोट खाया आदमी उन्हें असहज बातचीत से बचा ले।
प्रतियोगिता शुरू हुई।
खिलाड़ियों के सामने गड्डियाँ दी गईं।
अधिकारी ने मेज के नंबर दर्ज किए।
अर्विंद को पेट की जकड़न थोड़ी ढीली लगी।
समय पर की गई साधारण जाँच उसके छह महीने बचा सकती थी।
उसने पत्ते उठाए।
* * *
एकदम सही नहीं खेला।
बीच के दौर में एक फैसले से काफी पीछे हो गया।
पुराना डर लौटा। हारा तो कहेंगे पहले वाला नतीजा सही था।
फिर पास के खिलाड़ी ने कमरे की ठंड की शिकायत की।
अधिकारी ने पंखा ठीक किया।
छोटे व्यवधान से मदद मिली।
उसी कमरे में बाकी लोगों का साधारण दिन चल रहा था।
उसे भी मिल सकता था।
धीरे-धीरे वापसी की। अंतिम सत्र में पहुँचा।
रोहन पहले बाहर हो चुका था।
अर्विंद ने उसे जाते नहीं देखा।
आखिर में बढ़त के इतना पास था कि अंतिम दो हाथों ने क्रम बदल दिया।
हिसाब की पुष्टि हुई तो जीत गया था।
पहले स्कोर रखने वाले को देखा।
“पक्का?”
“हाँ।”
फिर मीनल को देखा।
वह फोन उठाए थी।
होंठों से कहा, “तुम्हारी माँ।”
अर्विंद ने हथेली पैंट पर पोंछी। फोन लेने से पहले मेज पर रखे पत्ते समेटने लगा।
अधिकारी ने कहा कि वह काम हो जाएगा।
तब समझ आया कि अब उससे कोई गलती का बयान नहीं माँग रहा।
* * *
प्रस्तोता ने माइक दिया।
अर्विंद ने पूछा कि तय सुधार प्रकाशित हुआ?
प्रस्तोता ने आयोजक को देखा।
मंजूर था, लेकिन बाकी सूचनाओं की कतार में पड़ा था।
अर्विंद ने माइक वापस दिया।
“पहले वह डाल दीजिए।”
आयोजक बोला कि दर्शक इंतजार कर रहे हैं।
“मैं भी कर रहा था।”
उस दिन सबसे तीखी बात यही कही।
छोटा विराम हुआ।
फिर तय माध्यमों में सूचना जारी हुई। प्रस्तोता ने विजेता बुलाने से पहले मुख्य निष्कर्ष पढ़ा।
अर्विंद ने जीत को इस बात का प्रमाण नहीं कहा कि पहले धोखा नहीं दिया था।
समीक्षा बता चुकी थी कि पुराना निष्कर्ष क्यों नहीं टिक सकता।
आज दूसरा आयोजन जीता था।
उसने उन लोगों का धन्यवाद किया जिन्होंने कक्षा में आते रहने में मदद की, जब गायब होना आसान लगता था।
फिर माँ का फोन लिया।
कुछ सेकंड दोनों की आवाज बातचीत लायक साफ नहीं निकली।
* * *
रोहन ने उसी शाम सुधार डाला।
आयोजकों ने छात्र प्रतिनिधियों से कहा था कि जहाँ आरोप फैलाया था, वहीं सुधार पहुँचाएँ।
मूल तस्वीर को अधिकार देने के लिए उसने प्रतिनिधि वाली जगह इस्तेमाल की थी। शब्द असुविधाजनक होने से जिम्मेदारी खत्म नहीं हुई।
उसने लिखा कि मामला सुलझ गया है।
अर्विंद ने नीचे जवाब दिया।
कृपया साथ लगा सुधार पूरा पढ़ें।
गाली नहीं जोड़ी।
समन्वयक ने पुरानी सूचना बदल दी।
कुछ सहपाठियों ने निजी माफी माँगी।
एक ने समूह में लिखा।
“बिना पूछे तस्वीर आगे भेजी। गलत किया।”
अर्विंद ने वाक्य कई बार पढ़ा।
छह महीने वापस नहीं आए।
लेकिन भेजने वाले को अच्छा महसूस करवाने की जिम्मेदारी भी उसमें नहीं थी।
उसने लिखा, “यहाँ कहने के लिए धन्यवाद।”
फिर समूह बंद किया।
सुबह प्रोजेक्ट जमा करना था।
* * *
पाठ्यक्रम के अंत में नए हॉल में बैच की तस्वीर का प्रस्ताव आया।
अर्विंद मीनल के पास खड़ा हुआ।
रोहन दो पंक्ति दूर था।
किसी ने नाटकीय मेल-मिलाप नहीं करवाया।
तस्वीर हुई। लोगों ने चेहरे की शिकायत की। दूसरी ली गई।
बाद में अर्विंद ने सुधार के पास उसे सुरक्षित किया।
पुरानी माफी की तस्वीर भी रखी। ऐसे फोल्डर में जो अनजाने में नहीं खुलता था।
खुद के उस रूप को समझने के लिए उससे प्यार करना जरूरी नहीं था।
कागज पकड़ा युवक डर गया था।
फिर भी रुका रहा था।
घर पर माँ ने नई प्रतियोगिता का प्रमाणपत्र दिखाने को कहा।
दिखाया।
फिर सूचना माँगी।
फोन पर खोली।
माँ धीरे पढ़ती रहीं। उँगली पंक्तियों के नीचे चलती रही।
निष्कर्ष वापस लेने वाले अनुच्छेद पर पहुँचीं तो फिर शुरुआत से पढ़ा।
“यह वाला मुझे भेजो।”
उसने भेज दिया।
अगला पारिवारिक संदेश माँ ने आगे भेजा तो उसमें उसके नाम के साथ वे शब्द भी थे जो महीनों पहले होने चाहिए थे।
नौकरी के पहले दिन अर्विंद ने वही कमीज पहनी।
इस बार यह नहीं जाँचा कि कोई चीज कितनी ऊँची पकड़ रखी है।