Diwa Game — चार खिलाड़ी, तीन चेहरे
Diwa Game

Diwa Game — चार खिलाड़ी, तीन चेहरे

काल्पनिक कहानी · पात्र और घटनाएँ कहानी का हिस्सा हैं।

कटी हुई तस्वीर में अन्वी का हाथ बच गया था। बाएँ किनारे पर दिख रहा था। टीम की ट्रॉफी का कोना पकड़े हुए। चेहरा, कंधे और बाकी शरीर गायब थे। ऊपर लिखा था: इस टीम…

कटी हुई तस्वीर में अन्वी का हाथ बच गया था।

बाएँ किनारे पर दिख रहा था। टीम की ट्रॉफी का कोना पकड़े हुए।

चेहरा, कंधे और बाकी शरीर गायब थे।

ऊपर लिखा था: इस टीम को बनाने वाले चार लोग।

तस्वीर में तीन आदमी थे।

अन्वी ने इतनी बड़ी की कि अँगूठे के नीचे रंग छोटे चौकोर टुकड़ों में टूट गए।

बची कलाई का कंगन पहचानने में गलती नहीं हो सकती थी। पहली नौकरी पर माँ ने दिया था।

उसने रितेश को तस्वीर भेजी।

किसी को भूल गए।

फोन हाथ में था, तभी जवाब आया।

शुरू मत हो। डिजाइन की समस्या है।

अन्वी ने विमल के कंधे के ऊपर खाली जगह देखी। डिजाइनर ने वहाँ बड़ा सजावटी तारा लगाया था।

शायद तारा टीम में आ गया था।

शाम को माँ का फोन आया। पड़ोसी ने पोस्ट देखी थी और पूछा था कि बेटी कौन सी खिलाड़ी है?

“तस्वीर तुमने ली?” माँ ने पूछा।

“नहीं। उसमें थी।”

चुप्पी हुई।

“ठीक वाली भेजो।”

अन्वी ने मूल तस्वीर भेजी। फोन पर रहते माँ ने देखी।

“यहाँ खुश लगती हो।”

“थी।”

सोचा था तस्वीर काटने का तकनीकी फर्क समझाएगी। इसके बजाय उस चेहरे को देखती रही जो उसने यह जाने बिना बनाया था कि बाद में उसके साथ क्या होगा।

माँ बोलीं कि यही वाली रखेंगी।

फोन के बाद टीम की पोस्ट फिर खोली। नीचे लोग तीनों पुरुषों को नाम लेकर बधाई दे रहे थे।

उस कैप्शन का पहला मसौदा उसने खुद लिखा था।

कुछ देर उँगली टिप्पणी की जगह पर रही। लिख सकती थी कि चौथी खिलाड़ी मैं हूँ। लेकिन अपनी ही टीम की तस्वीर के नीचे अपनी मौजूदगी साबित करने का काम उस रात उससे नहीं हुआ।

* * *

हार्बर फोर की शुरुआत रेस्तराँ के ऊपर किराए के कमरे में हुई थी।

उनतीस साल की अन्वी होटल के आरक्षण विभाग में काम करती थी। छुट्टी की शाम वयस्क समूह के साथ तीन पत्ती खेलती थी।

रितेश प्रतियोगिताएँ ढूँढ़ लेता था। विमल अजनबी को पुराना दोस्त महसूस करवा सकता था। ओजस मुश्किल सत्र में बिना जल्दी दिखाए बैठ सकता था।

अन्वी चीजें याद रखती थी।

किस आयोजक को गुरुवार तक फॉर्म चाहिए। किस अभ्यास कमरे का पंखा चलता है। किस प्रायोजक ने एक और खुश संदेश के बजाय बिल माँगा है।

वह खेलती भी थी।

पहली सफल क्षेत्रीय प्रतियोगिता में उसके नतीजे से टीम आगे जाने की रेखा पार हुई थी।

बाद में रितेश ने गले लगाकर कहा था कि उसे पता था वह कर देगी।

उस दिन की तस्वीर में वह सबसे बाईं तरफ खड़ी थी।

वहाँ इसलिए थी क्योंकि ओजस को पीछे की रोशनी चाहिए थी। किसी को ट्रॉफी स्थिर पकड़नी थी।

किसी ने फ्रेम से बाहर होने को नहीं कहा था।

बाद में कर दिया।

* * *

प्रायोजक के साथ शुक्रवार को भोजन था।

अन्वी ने काम के दो विराम में तय किया था। प्रस्तुति भेजी थी। रितेश को उपस्थित लोगों के आँकड़े लाने की याद दिलाई थी।

पाँच मिनट देर हुई क्योंकि निकलने से पहले होटल के अतिथि की बुकिंग ठीक करनी पड़ी।

तीनों बैठे थे।

रितेश ने परिचय दिया, “यही हमें व्यवस्थित रखती है।”

प्रायोजक की प्रतिनिधि मिसेज राव ने पूछा कि खेलती भी है?

अन्वी ने उसे देखा।

वह मुस्कराया।

“बिल्कुल। सब मदद करते हैं।”

अन्वी ने थैला रखा।

“चार खिलाड़ियों में एक हूँ।”

मिसेज राव ने पिछला परिणाम पूछा।

जवाब पूरा होने से पहले विमल टीम के पूरे प्रदर्शन पर बोलने लगा।

बात आगे गई। भोजन आया। फिर अन्वी से पूछा गया कि रेस्तराँ से बिल की प्रति मिल सकती है?

छपी प्रस्तुति में वही कटी तस्वीर थी।

हाथ अब भी बचा था।

नीचे रितेश ने लिखा था: हमारी ताकत है कि किसी को अलग श्रेय नहीं चाहिए।

अन्वी वाक्य पढ़ती रही। बाकी अगली शूटिंग के कपड़ों की बात कर रहे थे।

* * *

खाने के बाद उसने रुकने को कहा।

कोई सुनने पर तैयार होता, उससे पहले वेटर तीन प्लेटें उठा चुका था।

“पूरी तस्वीर चाहिए।”

रितेश ने माथा रगड़ा।

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“सब छप गया।”

“अगला बदलो। पोस्ट भी सुधारो।”

ओजस ने कहा कि शायद चौकोर तस्वीर चाहिए थी।

अन्वी ने मूल फोटो खोली। उँगलियों से बनाए चौकोर में चारों आ गए।

कोई देर तक नहीं देखता रहा।

विमल बोला, “जानती हो प्रचार कैसे होता है। पहचान बनाने की कोशिश है।”

“तीन लोगों की।”

“उधर मत ले जाओ।”

“तो क्या है?”

रितेश पीछे टिका।

“जिम्मेदारी तुम चाहती थीं। जिस काम में अच्छी हो, उसे माना तो गुस्सा है।”

अन्वी ने व्यवस्था दोबारा लिखे जाते सुनी।

आयोजकों को फोन करने के घंटे अब उसकी उचित जगह थे। खेलना उदारता से दिया अतिरिक्त मौका था।

“खिलाड़ी हूँ तो तस्वीर में रखो।”

रितेश ने बिल उठाया।

“और बड़े काम हैं।”

* * *

वह उसी दोपहर नहीं गई।

तीन सप्ताह अभ्यास करती रही। प्रायोजक से किया काम पूरा किया। पोस्ट बदलने का इंतजार किया।

नहीं बदली।

बाद में इस देर पर शर्म आई।

अच्छा लगता याद कर पाती कि तुरंत उठी, सही वाक्य कहा और निकल गई।

इसके बजाय चाहती रही कि जिनकी परवाह थी वे पहले रुकने की वजह दें, ताकि छोड़ना आसान हो।

एक रात अभ्यास पहुँची तो चौथा आदमी टीम की अतिरिक्त कमीज पहनकर फोटो की तैयारी कर रहा था।

“सिर्फ शूट के लिए,” रितेश बोला।

“हमारे साथ खेलता है?”

“अन्वी।”

नाम में चेतावनी थी।

उसने चाबियाँ मेज पर रखीं। हथेली में चुभना बंद हुआ।

“अगले प्रायोजक के फोन में अपना नंबर देना।”

कमरा चुप हुआ।

उसने अभ्यास की कॉपी उठाई।

इस बार चली गई।

सीढ़ी उतरते समय पीछे से कोई पुकारेगा, ऐसी उम्मीद रही। नीचे रेस्तराँ का लड़का खाली बर्तन लेकर निकल रहा था। उसने रास्ता दिया। टीम के कमरे से कोई नहीं आया।

* * *

काम सौंपने में दो दिन लगे।

बाकी तारीखें भेजीं। तय खाते से साझा फाइलें लौटाईं। आयोजकों से अपना निजी नंबर संपर्क से हटाने को कहा।

अपना काम और जाने से जुड़े संदेश रखे।

रितेश का एक शब्द आया।

दर्ज।

दो सप्ताह बाद हार्बर फोर चयन की अंतिम तारीख चूक गई।

विमल ने लिखा कि कुछ लोग आसान समय तक ही टीम में रहना चाहते हैं।

रितेश ने साझा परिचित को बताया कि अन्वी सूचना दिए बिना छोड़ गई।

परिचित ने फोन करके समझदारी रखने की सलाह दी।

अन्वी ने तारीख वाला सौंपने का संदेश भेजा।

वह बोला बीच में नहीं पड़ना चाहता।

“फोन करने तक पड़े थे।”

जवाब नहीं था।

जहाँ आरोप साझा हुआ, अन्वी ने छोटा तथ्यात्मक उत्तर दिया। तारीख और संपर्क उसके जाने से पहले भेजे गए थे।

फिर जवाब बंद किए।

शाम को फिल्म ठीक से नहीं देख पाई। बार-बार फोन देखने से आधी कहानी छूट गई।

छोड़ने से तुरंत आजाद नहीं हुई थी।

* * *

दोबारा खेलने के लिए पहला फोन बेला को किया।

अड़तीस साल की बेला स्कूल में प्रयोगशाला सहायक थी। हार्बर फोर ने जगह के लिए सोचा था। फिर इसलिए मना किया कि अनिश्चित रूप से देर से शुरू अभ्यास में नहीं आ सकती।

“रितेश ने कहा पर्याप्त समर्पण नहीं,” अन्वी को याद था।

बेला हँसी।

“रात ग्यारह चालीस पर कहा। कुछ लोगों को सुबह काम था।”

छियालीस साल का हारून टैक्सी कार्यालय में बुकिंग सँभालता था। कहा गया टीम को युवा चेहरा चाहिए।

चौबीस साल का तपन एक खराब आयोजन के बाद निकाला गया था। रितेश ने स्तर बनाए रखना कहा। किसी ने बैठकर नहीं देखा कि गलत क्या हुआ।

तीनों अन्वी को जानते थे।

किसी ने तुरंत हाँ नहीं की।

तपन ने वह सवाल किया जिससे बचना चाहती थी।

“निकाला तब कहाँ थीं?”

“बैठक में।”

“कुछ कहा?”

“जितना चाहिए था नहीं।”

वह इंतजार करता रहा।

अन्वी ने अपनी असहजता नहीं बताई। उससे तपन को मदद नहीं मिली थी।

“कहना चाहिए था।”

उसने एक अभ्यास में आने को कहा।

अधिक वादा नहीं किया।

* * *

बेला के परिचित सामुदायिक कमरे में मिले।

अलग कुर्सियाँ थीं। केतली साफ करनी थी। घड़ी दस मिनट आगे थी।

शुरू होने से पहले हारून ने ठीक की।

सप्ताह की दो निश्चित शामें तय कीं। समाप्त होने का समय भी।

यह भी तय किया कि हर आयोजन में पंजीकरण देखने वाला बदलेगा। दूसरा व्यक्ति जाँचेगा।

अन्वी सब लेने को तैयार होने लगी।

बेला ने देखा।

“दूसरी टीम चाहिए या अलग लोगों के साथ वही नौकरी?”

अन्वी चुप हुई।

पहला फॉर्म तपन ने लिया।

तीन सवाल पूछे। खुद करती तो जल्दी हो जाता। उसने जवाब दिए।

पहले अभ्यास में समीक्षा पर बहस हुई।

हारून को लगा अन्वी दूसरे का फैसला जल्दी समझाने लगती है।

अन्वी को लगा वह बहुत समय ले रहा है।

बेला ने तपन से पूछा कि वास्तव में क्या सोच रहा था?

सब रुके।

जवाब से बातचीत बदली।

सत्र समय पर खत्म हुआ। सामूहिक आलिंगन नहीं हुआ। दुनिया चौंकाने का वादा नहीं हुआ।

अन्वी दूसरी तरह थककर घर गई।

* * *

पहला आयोजन खराब रहा।

जिन टीमों को चुनौती देने की उम्मीद थी, उनसे नीचे रहे।

सामान समेटते समय तपन किसी को नहीं देख रहा था।

अन्वी ने मुद्रा पहचानी। इंतजार था कि अब भी टीम में है या नहीं, इसका फैसला आएगा।

हारून ने पूछा कि लौटने से पहले चाय चाहिए?

तपन माफी माँगने लगा।

“किस फैसले की?” बेला ने पूछा।

“सबकी।”

“वह समीक्षा नहीं।”

सड़क किनारे बैठे। खास क्षणों पर बात हुई।

अन्वी ने भी गलतियाँ की थीं। किसी के निकलवाने से पहले खुद बताईं।

ड्राइवर सुंदर वाहन के पास अखबार लिए था। हारून के कार्यालय से काम मिला था। तय घंटों का भुगतान था।

देर हुई तो हारून ने पूछा कि रुक सकता है? अतिरिक्त समय का कितना लगेगा?

धैर्य को मुफ्त टीम निष्ठा नहीं बनाया।

सुंदर राजी हुआ।

लौटते तपन खिड़की पर सिर रखकर सो गया।

किसी ने मजाक के लिए तस्वीर नहीं ली।

अन्वी ने फोन निकाला भी तो घर पहुँचने का समय बताने के लिए। कैमरा बंद रहा। अगले दिन तपन सामान्य तरह अभ्यास में आया। उसे यह जाँचने नहीं जाना पड़ा कि रात को उसका कौन सा चेहरा समूह में भेजा गया।

* * *

अगले दो आयोजनों में सुधरे।

बराबर नहीं।

जिस दिन अन्वी संघर्ष करती रही, बेला मजबूत थी। तपन ने एक टीम नतीजा सँभाला।

हारून अपनी गलती पर इतनी देर बोला कि आखिर बाकी ने कहा समझ गए।

आखिरी क्षेत्रीय आयोजन में जगह मिली।

हार्बर फोर दूसरे रास्ते से पहुँची।

सूची देखकर रितेश का फोन आया।

“तो यह योजना थी।”

अन्वी बाजार की कतार में थी। हाथ में दूध गरम हो रहा था।

“नहीं।”

“जिन्हें निकाला, उन्हें लेकर बदला लेने आई?”

“खिलाड़ी हैं। तुम्हारा बचा सामान नहीं।”

वह हँसा।

“हर बात व्यक्तिगत बना देती हो।”

पुष्टि के संदेश में अपने पास के तीन नाम देखे।

इस बार पुरानी तस्वीर की चोट नहीं समझाई।

“प्रवेश का सवाल है तो आयोजक से करो।”

उसने मुश्किल हो जाने को कहा।

कतार चली।

अन्वी ने दूध के पैसे दिए। घर जाकर टीम के साथ समय जाँचा।

* * *

क्षेत्रीय आयोजन में रितेश नया बैनर लाया।

अब हार्बर फोर की तस्वीर में चार चेहरे थे।

अन्वी देखकर रुक गई।

सोचा था इतनी छोटी चीज फिर नहीं दुखेगी।

दुखी।

जगह हमेशा थी।

बेला ने नजर देख ली।

“एक मिनट चाहिए?”

“हाँ।”

बाकी दोनों प्रवेश जाँचते रहे। वे खिड़की के पास खड़ी रहीं।

अन्वी ने कहा मूर्ख लग रहा है।

बेला ने सिर हिलाया।

“साधारण बात माँगी थी। करने से बेहतर बदलना समझा।”

दूसरी तरफ नया चौथा खिलाड़ी बैज ठीक कर रहा था। घबराया था, विजयी नहीं।

अन्वी को याद दिलाना पड़ा कि तस्वीर उसने नहीं काटी।

बाद में सामने से गुजरा तो नमस्ते की।

उसने जवाब दिया।

फिर अपनी मेज पर गई। तपन ने समय-सारणी रखी थी। जरूरी कमरे का नंबर निशान से बताया था।

उससे यह नहीं पूछा कि वहाँ कैसे पहुँचना है। यह छोटी बात अच्छी लगी। उस सुबह उसे भी तैयार कागज दिया जा सकता था।

* * *

हर टीम के चार खिलाड़ी थे। व्यक्तिगत नतीजे जुड़कर कुल बनते।

कप्तान का एक मुकाबला नहीं था जो बाकी काम मिटा दे।

हारून ने अपने हिस्से में इतना किया कि बढ़त के पास रहे।

बेला ने स्थान सुधारा।

तपन कठिन बीच से लौटा और मुकाबले में रहने लायक अंतर दिया।

अन्वी का हिस्सा आखिर में खत्म होता।

रितेश भी सामने आने वाले खिलाड़ियों में था।

पहले बोला, “अच्छा है प्रशासन वाली को आखिर मेज का समय मिला।”

अधिकारी सुनने जितना पास था।

अन्वी ने बाँटे जाने वाले पत्ते देखे।

“हमेशा खेली हूँ।”

रितेश ने उसके पीछे देखकर मुस्कराया। हँसी बुला रहा था।

नहीं आई।

अधिकारी ने बैठने को कहा।

अन्वी बैठ गई।

अच्छा लगा कि और तीखा वाक्य जरूरी नहीं था।

असली मुकाबला पूरा करना था।

* * *

शुरू में पीछे हुई।

कुछ मिनट पुरानी टीम दिमाग में बैठी लगी। तैयार थी समझाने को कि व्यवस्था करने को काबिलियत मान लिया।

इतनी जल्दी जीतना चाहती थी कि आवाज बंद हो।

फिर अपनी टीम देखी।

बेला हारून को सुन रही थी। वह समय-सारणी में कुछ दिखा रहा था। तपन पानी की बोतलें भर रहा था।

इंतजार नहीं कर रहे थे कि वह साबित करे बचाने के लिए सही महिला चुनी।

बचा दिन सँभाल रहे थे।

अन्वी मेज पर लौटी।

अगला हिस्सा स्थिर था।

रितेश अच्छा खेला। चिढ़ हुई। लेकिन उसके बर्ताव के गलत होने के लिए उसका अयोग्य होना जरूरी नहीं था।

अंत में स्थान करीब हुए।

अन्वी ने स्पष्टीकरण पूछा। सुना। आगे खेली।

हिस्सा पूरा हुआ तो रितेश से आगे थी।

अधिकारी ने चार नतीजे जोड़े।

उनकी टीम क्षेत्रीय आयोजन जीत गई।

एक पल पुरानी तस्वीर याद आई।

फिर तपन ने नाम चिल्लाया। कमरा उससे बड़ा हो गया।

* * *

नतीजों की तस्वीर लेते समय रितेश आया।

“हमेशा कहा था तुम कर सकती हो।”

अन्वी ने देखा।

उसने हाथ बढ़ाया।

अन्वी ने अपनी इच्छा से थोड़ी देर मिलाया। छोड़ दिया।

“तो तस्वीर में रखना चाहिए था।”

बाद में भाषण नहीं हुआ।

रितेश ने कैमरे देखे। पीछे हो गया।

प्रायोजक प्रतिनिधि ने विजेता चार की तस्वीर माँगी।

बोर्ड के पास खड़े हुए।

अन्वी किनारे हुई। फिर देखा कि खुद को सबके हिसाब से दोबारा जमा लिया।

“खिसको,” हारून से कहा।

वह खिसक गया।

जहाँ चाहती थी खड़ी हुई।

औपचारिक तस्वीर के बाद अपनी फोटो में सुंदर को बुलाया।

हर आयोजन तक चलाकर लाया था। पिछले बीस मिनट इतना पास पार्किंग ढूँढ़ रहा था कि हारून को सारे बैग सड़क पार न ढोने पड़ें।

सुंदर ने पूछा सच में?

“हाँ,” बेला बोली। “तुम चाहो तो।”

उसने बैग नीचे रखे।

* * *

पोस्ट बनाते समय तस्वीर के हर व्यक्ति से नाम जाँचा।

चार खिलाड़ी।

एक ड्राइवर। सफर में सहयोग के रूप में नाम था। झूठा प्रतियोगी नहीं बनाया।

अन्वी ने सुंदर को मसौदा भेजा। पूछा साझा करने में सहज है?

उसने उपनाम की वर्तनी सुधारी।

फिर अँगूठे का निशान भेजा।

तपन ने देखा चौकोर में हारून की कोहनी कटती है।

डिजाइन बदला। सजावटी शीर्षक छोटा किया।

किसी ने नहीं कहा डिजाइन में संभव नहीं।

किसी ने नहीं कहा बड़ी भलाई के लिए हटना समझना चाहिए।

पोस्ट से पहले अन्वी ने पुरानी तस्वीर आखिरी बार देखी।

किनारे उसका हाथ ट्रॉफी पकड़े था।

पुराने संदेशों के फोल्डर में रखी। फोल्डर बंद किया।

नई तस्वीर को पुरानी का हर हिस्सा ठीक नहीं करना था।

दिखाती थी कौन मौजूद था।

शुरुआत में वही माँगा था।

* * *

अगले सप्ताह बड़े आयोजन ने आवेदन को बुलाया।

अन्वी ने संदेश भेजा और जवाब लिखने लगी।

फिर याद आया किसकी बारी है।

रुक गई।

तपन ने आवेदन किया। बेला ने विवरण जाँचा। हारून ने सुंदर से उपलब्धता पूछकर वाहन तय किया।

अन्वी काम पर गई।

होटल में अतिथि ने उलझी बुकिंग ठीक करने का धन्यवाद दिया।

उसने ऐसे बिना माने स्वीकार किया कि काम आसान था।

शाम को अभ्यास आई तो केतली साफ थी। फॉर्म जा चुके थे।

बेला ने कप दिया।

“आज सिर्फ खेल सकती हो।”

अन्वी ने चारों तरफ देखा।

व्यवस्थित करने को चीजें थीं। गलत कोने में बैग। बिना ढक्कन पेन। पन्ना जो फोल्डर में ज्यादा ठीक लगता।

छोड़ दिए।

बैठी। अपनी गलतियों वाले पन्ने पर कॉपी खोली। बाकी का इंतजार किया।

इस बार टीम में शामिल होने के लिए उसके पीछे गायब होना जरूरी नहीं था।

हारून ने पहला अभ्यास हाथ बाँटा तो चारों जगह लोग थे।

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