1. Diwa King कहानी: कूड़ेदान के पास रखी थाली
नैना की सगाई की तस्वीर खाने के खाली डिब्बों के पास उलटी पड़ी थी। किसी ने उसके चाँदी जैसे फ्रेम से पिछला दरवाज़ा अटका दिया था। हॉल के भीतर वीरेन लोगों को समझा रहा था कि जिस लड़की के पिता का कर्ज़ सबके सामने आ गया हो, उससे शादी करना अब सम्भव नहीं है।
पिता को गुज़रे ग्यारह दिन हुए थे। उसी सुबह मकान मालिक ने उनकी छोटी स्टेशनरी की दुकान पर ताला लगा दिया था। नैना सगाई की अंगूठी लौटाने आई थी। वह अकेले में यह काम करना चाहती थी, लेकिन वीरेन की माँ ने कहा कि वापसी सबके सामने होनी चाहिए। फिर नैना ने पानी माँगा तो एक रिश्तेदार ने कागज़ की थाली पीछे के रास्ते की ओर सरका दी।
“वहीं खा लेना। यहाँ मेहमान हैं।”
वीरेन देख रहा था। उसने थाली उठाकर मेज़ पर नहीं रखी।
उसके पीछे वही रमी की मेज़ थी जहाँ नैना रविवार को सबके स्कोर लिखा करती थी। एक बार उसने वीरेन की गलत घोषणा चुपके से सुधारी थी, ताकि उसकी हँसी न उड़े। आज वीरेन ने ऊँची आवाज़ में कहा, “देखते रहने से कोई खिलाड़ी नहीं बन जाता।”
उसने नैना को एक बाज़ी खेलने बुलाया। चचेरे भाई फोन निकाल चुके थे। मना करना नैना को हर अपमान स्वीकार करने जैसा लगा। गुस्से में उसने सम्भावित सीक्वेंस तोड़ दिया और तीन बड़े पत्ते पकड़े रखे। वह हार गई। पिछला दरवाज़ा पार करते समय हँसी उसका पीछा कर रही थी।
उसने तस्वीर फ्रेम से निकाली। फ्रेम वहीं छोड़ दिया। तस्वीर बैग में रखी, लेकिन वीरेन के चेहरे पर मोड़ डालकर।
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2. ऐसी हार जिसे समझा जा सकता था
तीन रात तक नैना अपमान दोहराती रही। चौथी रात उसने पत्ते दोहराए। शुरुआत उस कॉपी से हुई जिसे दुकान से निकालने की अनुमति मिल गई थी।
उसने याद बची बाज़ी लिखी। फिर उन समूहों पर निशान लगाए जो कभी बन ही नहीं सकते थे। एक ही सूट की दो क्वीन उस सेट का हिस्सा नहीं बन सकती थीं जो उसने सोचा था। जोकर लगाकर बनाया गया रन उसकी गायब शुद्ध सीक्वेंस की जगह नहीं ले सकता था। वीरेन निर्दयी था, लेकिन उस बाज़ी में उसने बेहतर खेला भी था।
दूसरा सच इतना चुभा कि नैना उसे समझने बैठ गई।
उनतीस साल की नैना सुबह दवाइयों के थोक गोदाम में पैकेट तैयार करती थी। शाम को वह प्रिंटिंग की दुकान के ऊपर मिलने वाले वयस्क रमी खिलाड़ियों के छोटे समूह में जाने लगी। वहाँ किसी को सगाई के बारे में पता नहीं था। पहले दिन वह पाँच अभ्यास बाज़ियाँ हारी। उसने सबसे अनुभवी खिलाड़ी रूपा से आखिरी बाज़ी दोनों हाथ खुले रखकर दोबारा खेलने को कहा।
रूपा मान गई। उसने सहानुभूति का भाषण नहीं दिया।
“पत्ते बदल गए थे। तुम फिर भी पहली बात को सही साबित करने में लगी थीं।”
नैना के फोन में एक फोल्डर था। उसमें अपरिचित शब्दों के नोट और अपने अभ्यास के हाथों की तस्वीरें जमा होने लगीं। जीत के नारे इकट्ठे करने के बजाय वह उस मोड़ को ढूँढ़ना चाहती थी जहाँ ठीक योजना ज़िद बन गई थी।
उस रात जवाब चौथी चाल था। उसने उसे लाल रंग में लिखा।
3. एक कुर्सी, चार तरह के प्रतिद्वंद्वी
प्रिंटिंग की दुकान वाला समूह हर अभ्यास के बाद सीटें बदलता था। नैना कभी अधीर अकाउंटेंट के सामने बैठती, कभी धैर्यवान स्कूल प्रशासक के, कभी रूपा के। एक महिला खुले ढेर से इतने कम पत्ते उठाती थी कि उसका हाथ समझना कठिन रहता।
आदतें उपयोगी संकेत थीं, पक्की जानकारी नहीं। एक बार नैना ने खतरनाक पत्ता रोक लिया, क्योंकि उसे पूरा विश्वास था कि अकाउंटेंट उसी का इंतज़ार कर रहा है। उसने बिल्कुल अलग समूहों से घोषणा कर दी। नैना ने अपने दिमाग की कहानी बचाने के लिए अपना हाथ बिगाड़ लिया था।
उसके बाद उसने तथ्य और अनुमान अलग लिखे। “क्लब का नौ उठाया” एक खाने में जाता। “शायद क्लब की सीक्वेंस बना रहा है” दूसरे में। खुले पत्ते याद करने का अभ्यास किया, लेकिन बंद गड्डी जानने का नाटक नहीं किया।
हर रविवार मुश्किल हाथ दोबारा लगाए जाते। बीच के लगातार दो पत्तों से कितने रास्ते खुल सकते हैं? अकेले किंग से वास्तव में क्या बन सकता है? जोकर को पहले से सम्भल रहे समूह में रखे रहना बेहतर है या अधूरी दूसरी सीक्वेंस में लगाना? नैना हर सवाल पत्ते सामने रखकर पूछती।
उसने किसी की घोषणा होते ही अंगूठी वाली उँगली छूना भी बन्द किया। यह हरकत रूपा ने उससे पहले देख ली थी।
बारह हफ्ते बाद नैना एक अभ्यास सत्र में सबसे आगे रही। अगले हफ्ते सबसे पीछे। दोनों नतीजे कॉपी में दर्ज हुए। दिन में गत्ते के किनारों से उसकी उँगलियाँ कटती थीं। रात में वही उँगलियाँ तेरह पत्ते बिना घबराए जमाना सीख रही थीं।
4. वह प्रवेश जिसकी उसे उम्मीद नहीं थी
अगस्त में काल्पनिक अशोका रूम्स चैम्पियनशिप का पंजीकरण खुला। वयस्क खिलाड़ियों को पहले क्वालिफाइंग टेबल, फिर नॉकआउट दौर खेलने थे। फाइनल दो खिलाड़ियों के बीच आठ बाज़ियों का था। आठों के बाद कम दंड अंक वाला खिलाड़ी विजेता होता। स्कोर के नियम प्रवेश से पहले सभी को दिए गए।
पोस्टर पर पिछले विजेता वीरेन का चेहरा था।
नैना ने गोदाम के लंचरूम से फॉर्म भेजा। एक घंटे बाद वीरेन का संदेश आया, “गलत जगह नाम लिखवा दिया है। देखने वालों का पंजीकरण नहीं होता।”
उसने जवाब में अपनी प्रवेश संख्या भेज दी।
वीरेन ने उसे पुराने पारिवारिक समूह में डाल दिया। शाम तक वे लोग सलाह देने लगे जो कूड़ेदान वाली थाली देखकर चुप थे। अपनी बेइज़्ज़ती मत करवाओ। घर की बात बाहर मत ले जाओ। ध्यान खींचने के लिए प्रतियोगिता का इस्तेमाल मत करो।
नैना ने समूह की सूचनाएँ बन्द कीं और अभ्यास पर चली गई।
क्वालिफाइंग टेबल पर एक सेवानिवृत्त इंजीनियर और तेज़ी से योजना बदलने वाला युवा अकाउंटेंट बैठे थे। पहली बाज़ी में लगभग पूरी सीक्वेंस से चिपके रहने की वजह से वह हारी। अगली में उसने आकर्षक जोड़ी जल्दी छोड़ दी, दो सीक्वेंस पूरी कीं और इंजीनियर के पहले समाप्त करने पर भी अपने दंड अंक सीमित रखे।
वह बहुत छोटे अन्तर से आगे पहुँची। कोई आसान विजय यात्रा नहीं हुई थी। क्वालिफाइंग की तस्वीर में वह चौथे स्थान पर थी—थकी हुई, बिना मुस्कान के, लेकिन हॉल के भीतर।
वीरेन ने वह तस्वीर उससे पहले देख ली।
5. पिछला स्कोर छोड़कर अगला हाथ
क्वार्टरफाइनल में उसकी छिपी कमजोरी खुली। बढ़त मिलने पर वह उसे खोने से इतना डरती कि खेलना ही बदल देती। सविता ने दो बाज़ियों में उसकी छोटी बढ़त छीन ली।
निर्धारित विराम में नैना खुली खिड़की के पास खड़ी हुई। नीचे एक डिलीवरी कर्मचारी गार्ड से बहस कर रहा था। नैना को अपनी पुरानी आदत याद आई—समझाते जाओ, जब तक सामने वाला तुम्हें जगह देने को तैयार न हो।
वह मेज़ पर लौटी तो उसने सवाल बदला। यह हाथ अभी किस योजना का साथ देता है?
न शानदार घोषणा का, न बदले की तस्वीर का। सामने एक शुद्ध सीक्वेंस थी, दो उलझे समूह थे और चुनाव था: एक संकरे रास्ते का इंतज़ार करे या कई सम्भावनाएँ खुली रखे।
उसने पुराने स्कोर की रखवाली बन्द की। अगली बाज़ी में उसका हाथ पूरा हुआ। आखिरी में उसने बिखरे हुए बड़े पत्ते पकड़े रखने के बजाय छोटा नुकसान स्वीकार किया। वह छह अंक से आगे निकली।
बाद में सविता ने उसकी कॉपी देखने को कहा। बीस मिनट तक दोनों एक डिस्कार्ड पर बहस करती रहीं। महीनों बाद नैना घर लौटते समय किसी दुश्मन के बारे में नहीं, किसी अच्छे प्रतिद्वंद्वी के बारे में सोच रही थी।
सेमीफाइनल और कठिन निकला। सामने वाली खिलाड़ी ने नैना के पत्ते व्यवस्थित होने से पहले दो बार घोषणा कर दी। शेष बाज़ियों में नैना लौटी। कुछ अनुकूल पत्ते मिले, और उसने उनका सही उपयोग किया। अंतिम स्कोर ने उसे वीरेन के विरुद्ध फाइनल में पहुँचा दिया।
इस बार उसकी तरफ से कोई संदेश नहीं आया।
6. सफेद रोशनी के नीचे आठ बाज़ियाँ
वीरेन रिश्तेदारों, इस्त्री किए जैकेट और कैमरे वाली मुस्कान के साथ आया। नैना रूपा और अपना टिफिन लेकर पहुँची। उसने काम से एक दिन की छुट्टी ली थी। आयोजन लम्बा चला तो दूसरी छुट्टी लेना आसान नहीं था।
निर्देशक ने आठ बाज़ियों का प्रारूप फिर पढ़ा। सही घोषणा के लिए सभी तेरह पत्ते मान्य समूहों में होने चाहिए थे। कम से कम दो सीक्वेंस, जिनमें एक शुद्ध हो। प्रकाशित नियमों के अनुसार बचे हुए असम्बद्ध पत्ते हारने वाले के दंड अंक बनते।
पहली बाज़ी वीरेन ने ली। नैना ने अकेली क्वीन जल्दी छोड़ दी थी, इसलिए नुकसान कुछ कम रहा। दूसरी भी वही जीता। स्कोर लिखते ही वह कुर्सी पर पीछे टिक गया।
“तुम्हें हमेशा कोई समझाने वाला चाहिए था।”
निर्देशक ने उसे खेल से बाहर की टिप्पणी बन्द करने को कहा।
तीसरी बाज़ी में नैना ने धीरे घोषणा की। पत्ते खोलने से पहले हर समूह जाँचा। वीरेन के बिखरे पत्तों से बड़ा नुकसान हुआ। उसके रिश्तेदारों ने रात के खाने की जगह तय करना बन्द कर दिया।
वीरेन ने अपना तरीका बदला। उपयोगी दिखने वाले बीच के पत्ते रोकने लगा और बड़े पत्ते जल्दी छोड़ने लगा। नैना जिन भारी दंड अंकों से अन्तर घटाना चाहती थी, वे अब आसानी से नहीं मिलने वाले थे। उसने उसके अहंकार के लिए तैयारी की थी; फिर भी उसके कौशल को हराना बाकी था।
पाँच बाज़ियों के बाद वीरेन इकतीस अंक से आगे था। विराम में नैना ने टिफिन खोला। उसके हाथ इतने स्थिर थे कि संतरे का छिलका एक ही लड़ी में उतर गया।
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7. वह चाल जिसने कमरे का स्वर बदला
छठी बाज़ी में वीरेन ने खुले ढेर से डायमंड का नौ उठाया। दो चाल बाद उसने डायमंड का जैक भी ले लिया। दस नैना के पास था। उसके अपने हाथ में डायमंड की चार पत्तों वाली उपयोगी सीक्वेंस बनी थी।
वह दस छोड़ती तो भी तीन पत्तों का रन बच जाता। लेकिन किसी पत्ते को छोड़ सकना और उसका छोड़ना समझदारी होना अलग बातें थीं। वीरेन के खुले चुनावों से ऐसा जोखिम दिखाई दे रहा था जिसका नाम वह बता सकती थी, भले उसका पूरा हाथ न जानती हो।
उसने दस रोक लिया और अलग पड़ा बड़ा पत्ता छोड़ा। वीरेन ने बंद गड्डी से उठाया। उसके चेहरे से कोई भरोसेमन्द सूचना नहीं मिली। जो पत्ते उसने सबके सामने चुने थे, उनसे ज़्यादा जानकारी मिली थी।
अगली चाल में नैना की दूसरी सीक्वेंस पूरी करने वाला पत्ता आया। उसने बाकी समूह जाँचे और घोषणा की। स्कोर लिखने वाले ने वीरेन के असम्बद्ध पत्ते गिने।
अन्तर घटा। सातवीं बाज़ी में वीरेन कुछ अंक वापस ले गया। आखिरी बाज़ी से पहले नैना बाईस अंक पीछे थी: नैना 112, वीरेन 90। कम स्कोर बेहतर था।
उसके चचेरे भाई ने फोन नैना के चेहरे के पास किया। निर्देशक ने दर्शकों को चिह्नित रेखा के पीछे भेज दिया।
नई गड्डी तैयार हो रही थी। वीरेन बोला, “एक अच्छा पत्ता मिल जाने से तुम यहाँ की नहीं हो जाओगी।”
नैना ने स्कोर देखा। “उसकी ज़रूरत नहीं। सात बाज़ियाँ यह तय कर चुकी हैं।”
कमरे में उसकी बात सबने सुनी।
8. तेरह पत्ते, कोई माफी नहीं
आखिरी बाज़ी तैयार जीत लेकर नहीं आई। नैना के पास हार्ट के चार, पाँच, छह थे; क्लब के आठ, नौ; अलग सूट की दो क्वीन; डायमंड के सात से दस तक चार पत्ते; और दो अलग पड़े बड़े पत्ते। कुल तेरह। अभी काफी काम बचा था।
उसने शुद्ध हार्ट सीक्वेंस और पूरी डायमंड सीक्वेंस सुरक्षित रखीं। कुछ चाल बाद मिले छपे हुए जोकर से क्लब की सीक्वेंस बन सकती थी। उसने अलग पड़े किंग को छोड़ दिया। अकेला जैक अब भी बोझ था, लेकिन पूरा हाथ बनाने के लिए अब उसे एक क्वीन चाहिए थी।
वीरेन ने खुले ढेर से पत्ता लिया। फिर एक और। उसका हाथ नज़दीक लगता था, पर नैना ने इसी वजह से अपने हाथ तेज़ नहीं चलाए। जल्दी करने की इच्छा से बंद गड्डी में अगला पत्ता बदल नहीं जाता।
जब ज़रूरी क्वीन आई, उसने उसे मेज़ पर पटकने के बजाय सूट जाँचा। स्पेड की क्वीन, क्लब और डायमंड की क्वीन के साथ जुड़ी। तीन अलग सूट, सही सेट। क्लब में आठ, नौ और जोकर। डायमंड में सात, आठ, नौ, दस। हार्ट का समूह पहले से शुद्ध था।
उसने अकेला जैक छोड़ा और घोषणा की।
वीरेन ने पहले उसका चेहरा देखा, फिर पत्ते। उसने सभी समूह दोबारा देखे। स्कोर लिखने वाला प्रतीक्षा करता रहा, जब तक वीरेन ने अपना हाथ व्यवस्थित नहीं कर लिया। उसके बचे हुए पत्तों का योग छत्तीस था।
नैना का 112 नहीं बदला। वीरेन का 90 बढ़कर 126 हो गया।
नैना चौदह अंक से जीत चुकी थी।
9. परिणाम ज़ोर से पढ़िए
एक पल किसी ने ताली नहीं बजाई। सन्नाटा इतना साफ था कि नैना को पानी की बोतल खुलने की आवाज़ सुनाई दी। फिर रूपा ने ताली बजाई और उसके पीछे पूरा कमरा गूँज उठा।
वीरेन ने दोबारा गिनने को कहा। निर्देशक ने गिना। छत्तीस। उसने जोकर की जगह पर सवाल उठाया। निर्देशक ने नियम और क्लब की पूरी सीक्वेंस दिखाई। सही। वह क्वीन के सेट में दोहराया हुआ सूट ढूँढ़ने लगा। वहाँ ऐसा कोई पत्ता नहीं था।
जिस भाई ने पहला अपमान रिकॉर्ड किया था, उसने फोन नीचे कर लिया।
“रिकॉर्ड करते रहिए,” नैना बोली। “पिछली बार आपने पुरस्कार वाला हिस्सा नहीं लिया था।”
ट्रॉफी के पास विजेता की कुर्सी रखी गई। हर पोस्टर में वीरेन उसी पर बैठता था। एक स्वयंसेवक ने उसका नाम उठाया, पल भर रुका, फिर नैना का कार्ड रख दिया।
इंटरव्यू लेने वाले ने पूछा कि जीत का अर्थ क्या है। नैना ने भाग्य की घोषणा नहीं की। उसने छठी बाज़ी के डायमंड के दस की बात की, खराब हाथ छोड़ना सीखने के हफ्तों की बात की, और उन छत्तीस अंकों की बात की जिन्हें प्रतिद्वंद्वी समूहों में नहीं बाँध पाया था।
फिर वह उस आदमी की तरफ मुड़ी जिसने उसे पिछली गली में भेजा था।
“तुमने कहा था बाहर खड़ी होकर देख सकती हूँ। अब परिणाम पढ़ दो।”
वीरेन ने मना कर दिया। उद्घोषक ने उसकी जगह साफ आवाज़ में दो बार पढ़ा। नैना ने दोनों हाथों से ट्रॉफी ली। पीछे स्कोरबोर्ड पर वीरेन का नाम ठीक वहीं था जहाँ परिणाम ने उसे रखा था।
10. जिस मेज़ पर उसका नाम था
उस रात पुराना पारिवारिक समूह अचानक बहुत सक्रिय हो गया। रिश्तेदार ऐसे बधाई दे रहे थे जैसे सभी उसकी कुर्सी के पीछे खड़े रहे हों। वीरेन का लम्बा संदेश आया: दोनों भावुक थे; अकेले में बात करनी चाहिए; उसकी माँ का अपमान करने का कोई इरादा नहीं था।
नैना ने जवाब दिए बिना संदेश अलग रख दिया।
समूह में उसने पूरे मैच की रिकॉर्डिंग भेजी। कोई संगीत नहीं, चेहरे पर काटकर लगाए दृश्य नहीं। जिसे परिणाम समझना था, वह आठ बाज़ियाँ और दोबारा हुई गिनती देख सकता था।
अगले अभ्यास में सविता ने पूछा कि आखिरी क्वीन का मिलना किस्मत थी क्या। नैना ने कहा, हाँ। पत्ता फेंटी हुई गड्डी से आया था। उसका काम ऐसा हाथ बनाना था जिसमें वह उपयोगी हो, पहले की बाज़ियों में टिकना था, और मौका मिलने पर सही घोषणा करने लायक स्थिर रहना था।
प्रिंटिंग की दुकान में सविता ने अगला मुकाबला माँगा। रूपा ने उस शाम खिड़की के पास की कुर्सी छोड़ दी। ट्रॉफी के बारे में बात करने देने से पहले सबने क्वार्टरफाइनल की गलतियों पर उससे बहस की।
रविवार को नैना पिता की बन्द दुकान से आखिरी बक्से लेने गई। उनमें लकड़ी की छोटी नामपट्टी मिली। बचपन में पिता ने उस पर टेढ़े अक्षरों में लिखा था—नैना।
वह उसे अभ्यास वाली मेज़ तक ले गई और अपने पत्तों के पास रख दिया।
इस बार किसी और को तय नहीं करना था कि वह कहाँ बैठ सकती है।
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