1. Diwa Lucky कथा: कप्तान की कुर्सी
अदिति को अपनी रमी टीम से निकाले जाने का पता तब चला जब भाई ने चयन बैठक में उससे चाय लाने को कहा।
पंजीकरण सूची से उसका नाम गायब था। वहाँ भाभी रोहनिका का नाम था और सामने बड़े अक्षरों में कप्तान लिखा था। तीन साल की मेहनत सीढ़ियों के नीचे रखे एक गत्ते के डिब्बे में समेट दी गई थी।
“तुम अभी भी काम आ सकती हो,” वरुण ने कहा। “इंतज़ाम तुमसे अच्छा कौन करता है?”
पीछे शेल्फ पर माँ की शोक सभा वाली तस्वीर थी। पिछले महीने अदिति ने माँ की बीमारी की आखिरी रातें उनके पास बिताई थीं। उसी दौरान वरुण ने टीम का पंजीकरण बदलवाया और खिलाड़ियों को बताया कि उसकी बहन खुद हट रही है।
“मैंने ऐसा कभी नहीं कहा।”
“तुम उपलब्ध नहीं थीं।”
अदिति ने अपनी कॉपी उठाई। रोहनिका ने उस पर हाथ रख दिया। “टीम की संपत्ति है।”
कमरा चुप हो गया। अदिति ने इन्हीं लोगों को बचे हुए पत्तों के अंक गिनना सिखाया था। उनकी पहली प्रतियोगिता के फॉर्म भरे थे। कोई नहीं बोला।
वरुण ने मेज़ के सिरहाने वाली कुर्सी उठाकर दीवार से लगा दी। “सबके सामने तमाशा मत करो।”
अदिति डिब्बा लेकर निकली। बाहर बारिश शुरू हो चुकी थी। बस स्टॉप पहुँचते-पहुँचते गत्ता भीग गया। पुरानी स्कोर शीट नीचे की नाली में बिखर गईं।
वह उन्हें उठाने के लिए घुटनों पर बैठ गई। अजनबी उसके आसपास से पैर बचाकर निकलते रहे।
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2. उधार की मेज़ पर तीन नाम
नौ दिन अदिति ने ताश की गड्डी नहीं खोली। दसवें दिन मीरा उसके किराए के कमरे में दो मुड़ने वाली कुर्सियाँ लेकर पहुँची।
“अगली बार मेज़ भी उठा लाऊँगी,” उसने कहा।
अड़तीस साल की मीरा जाँच केंद्र में काम करती थी और कभी अदिति की टीम की रिज़र्व खिलाड़ी थी। इकतालीस साल का जिल्दसाज़ इरफान अपनी शिफ्ट के बाद आया। घरवालों को लगता था कि प्रतियोगिताएँ उसके निराश करने का एक और तरीका हैं। वह सीक्वेंस अच्छे बनाता था, लेकिन सुधार बंद हो चुके हाथ को छोड़ नहीं पाता था।
उनके पास न क्लब का कमरा था, न एक जैसी पोशाक। मेज़ का एक पाया ढीला था।
अदिति ने टीम बनाने का प्रस्ताव रखा। दोनों तुरंत मान गए।
“मुझ पर तरस खाकर हाँ मत कहना।”
मीरा ने पत्ते नीचे रख दिए। “तो ऐसे मत पूछो जैसे हमें तुम्हें बचाने आना चाहिए।”
पहले अभ्यास ने सब खोल दिया। इरफान के पास राजाओं का अच्छा सेट था, लेकिन प्योर सीक्वेंस नहीं। मीरा ने पत्ते सुंदर जमाने के लिए उपयोगी जोड़ने वाला पत्ता फेंक दिया। अदिति दोनों को समझाते हुए अपना हाथ भूलकर हार गई।
बहस इतनी बढ़ी कि पड़ोसी ने दरवाज़ा खटखटाया।
अदिति ने भीगे कागज़ों वाले डिब्बे पर तीन जिम्मेदारियाँ लिखीं। अपना हाथ खेलना। अपनी गलती दर्ज करना। दौर के बीच सच बोलना।
फिर डिब्बा डगमगाती मेज़ के नीचे रख दिया। अब उसका कुछ काम था।
3. जिन नियमों पर सबने हस्ताक्षर किए
उनका लक्ष्य शहर की वयस्क तीन-सदस्यीय टीम प्रतियोगिता थी। हर खिलाड़ी अलग मेज़ पर विरोधी खिलाड़ी से खेलता। छह डील मिलकर एक मुकाबला बनातीं। तीनों खिलाड़ियों के कुल पेनल्टी अंक जोड़े जाते। कम अंक वाली टीम जीतती।
इस प्रतियोगिता के प्रकाशित नियमों में शुरुआती ड्रॉप के बीस अंक, खेल शुरू होने के बाद ड्रॉप के चालीस और अधूरे हारने वाले हाथ की अधिकतम पेनल्टी अस्सी थी। तेरह पत्तों की सही घोषणा में कम से कम दो सीक्वेंस चाहिए थे, जिनमें एक प्योर हो। चलती डील में सलाह या संकेत देना मना था।
अदिति ने सबसे नियम ज़ोर से पढ़वाए। दबाव में वे अपनी सुविधा के नियम नहीं बनाने वाले थे।
फिर उसने अभ्यास जानबूझकर कठिन किया। मीरा को लगभग पूरे दिखने वाले हाथ मिले जिनमें प्योर सीक्वेंस नहीं था। इरफान को अच्छे रन के साथ लुभावने लेकिन अकेले बड़े पत्ते मिले। अदिति खुद खेलती तो दोनों उसका समय देखते और डील के बीच टीम के स्कोर पर सवाल करते।
टीम की स्थिति पर चर्चा सिर्फ तय ब्रेक में होती।
“कप्तान होने का मतलब तीन हाथ खेलना नहीं है,” अदिति ने कहा। “हम पहले स्थिति समझेंगे। फिर हर व्यक्ति खुद फैसला करेगा।”
शोध और स्कोर पुरानी फाइल में रहते थे। हर शाम पत्ते निकालने से पहले वे उसे खोलते थे।
उस फाइल के अंदर कोई फैसला सिर्फ किस्मत के भरोसे नहीं छोड़ा जाता था।
4. काम आने वाली हार
पहला स्थानीय मुकाबला भारी हार पर खत्म हुआ। सबसे अधिक अंक इरफान ने खोए।
वह एक खास पत्ते का इंतज़ार करता रहा और सामने वाले हाथ पूरे करते गए। बाद में उसने सीक्वेंस के बीच का खाली स्थान दिखाया।
“एक पत्ता। बस यही चाहिए था।”
अदिति ने उसके फेंके पत्ते हाथ के पास फैला दिए। “कितनी चालें सिर्फ इसी इंतज़ार में निकल गईं?”
इरफान उठ गया। मीरा ने अदिति को इशारा किया कि उसे जाने दे।
लेकिन वह चाय की दुकान तक गया, तीन कप लेकर लौटा और फिर बैठ गया। “समझाओ। मगर मुझे बेवकूफ महसूस कराए बिना।”
उन्होंने हाथ दोबारा बनाया। चौथी चाल में मिला पत्ता दूसरा सीक्वेंस पूरा कर सकता था, अगर इरफान पुरानी जमावट तोड़ता। उसने उसे इसलिए फेंका था क्योंकि वह पहले से चुने रास्ते में नहीं बैठता था।
उन्होंने इस गलती का नाम बंद दरवाज़ा रखा। अगले अभ्यास में हर खिलाड़ी को पत्ता फेंकने से पहले हाथ दो अलग तरीकों से जमाना था।
मीरा ने दूसरी आदत बनाई। घोषणा से पहले वह तेरह पत्ते गिनती और अभ्यास में अपना प्योर सीक्वेंस बोलकर बताती। प्रतियोगिता में यही जाँच चुपचाप होती।
अदिति ने कठिन चीज़ सीखी। दूसरा मुकाबला थोड़े अंतर से हारे तो उसने भाषण नहीं दिया। पूछा कि हर व्यक्ति कौन सा फैसला बदलना चाहेगा।
इस बार तीनों ने जवाब दिया। अदिति ने भी अपनी गलती स्वीकार की।
5. भाई को उसका नंबर याद आया
तीसरी कोशिश में वे क्वालिफाई कर गए। निर्णायक डील में अदिति ने तीन नौ के सेट को तोड़ा। एक नौ दूसरे पत्तों के साथ सीक्वेंस में लगा। अगला पत्ता आने पर शेष समूह भी सही बने और उसने घोषणा कर दी।
कभी वह सुंदर सेट तोड़ने को तैयार नहीं होती थी। उस रात बिना झिझक तोड़ा।
घर पहुँचने से पहले वरुण का फोन आया। “हमारी रिज़र्व बनकर वापस आ जाओ। रोहनिका समझौता करने को तैयार है।”
“टीम का चुनाव मैं करूँगी?”
“फिर वही शुरू मत करो।”
अदिति कुछ पल सड़क का शोर सुनती रही। “तो फोन समझौते के लिए नहीं है। तुम्हें रिज़र्व चाहिए।”
उसकी आवाज़ ठंडी हो गई। “मुश्किल आएगी तो वे दोनों तुम्हें छोड़ देंगे।”
बस स्टॉप पर मीरा चाट की तीन कागज़ी प्लेटें संभाल रही थी। इरफान क्वालिफिकेशन की शीट हवा से बचा रहा था।
“मुश्किल पहले ही आ चुकी है,” अदिति ने कहा और फोन रख दिया।
अगली शाम उसने दोनों को बात बताई। वफादारी की कसम लेने के लिए नहीं। परिवार के दबाव को छिपाने से वह और जगह घेरता।
इरफान बिना खुशी के हँसा। “मेरे भाई को भी लगता है कि पहली पसंद मना करे तो मैं हमेशा उपलब्ध हूँ।”
मीरा ने पत्ते बाँटे। “तो रविवार को दोनों भाइयों के पढ़ने के लिए कुछ अप्रिय तैयार करते हैं।”
उस रात अभ्यास पहले से शांत रहा। किसी को समझाना नहीं पड़ा कि वे वहाँ क्यों बैठे थे।
6. बिना दर्शकों वाला सेमीफाइनल
सेमीफाइनल शुरू हुआ तो अधिकतर दर्शक हॉल के दूसरे छोर पर वरुण की टीम देख रहे थे। दो डील के बाद अदिति की टीम चौंतीस अंक पीछे थी।
मीरा गति बढ़ाना चाहती थी। ब्रेक में उसने कहा कि अब हर संभावित कॉम्बिनेशन बचाकर खेलना चाहिए।
“इससे पूरा होने के रास्ते बढ़ते हैं,” अदिति ने कहा, “और नुकसान भी। चार डील अभी बाकी हैं।”
उन्होंने पूरे मुकाबले को एक बहादुर दिखने वाले फैसले में झोंकने के बजाय धीरे वापसी चुनी।
तीसरी डील में इरफान ने अपना पुराना बंद दरवाज़ा पहचान लिया। एक अधूरा सीक्वेंस सिर्फ एक पत्ता माँग रहा था। नए पत्ते ने दूसरी जमावट दी जिसमें दो उपयोगी रास्ते थे। उसने पुराना ढाँचा तोड़ा और तीन चाल बाद हाथ पूरा कर लिया।
मीरा हारी, लेकिन पहले ही कई बेमेल पत्तों के अंक कम कर चुकी थी। नुकसान छोटा रहा। अदिति ने जल्दबाज़ी की घोषणा रोकी, दूसरा सीक्वेंस जाँचा और अपना हाथ जीता।
अंतर अब सिर्फ छह था।
आखिरी दो डील धीमी चलीं। विरोधी ने खुले ढेर से एक पत्ता उठाया, जिससे उसके पास का दूसरा पत्ता छोड़ना खतरनाक हो सकता था। अदिति ने उसे एक चाल रोका और सुरक्षित पत्ता मिलने पर वही छोड़ा। उसे सामने वाले का पूरा हाथ मालूम नहीं था। उसकी सार्वजनिक पसंद दिखाई दे रही थी।
अगली ड्रॉ पर सही घोषणा बन गई। विरोधियों ने पत्ते दो बार जाँचे। नतीजा नहीं बदला।
अब हॉल के उस हिस्से में दर्शक आने लगे।
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7. परिवार फिर सामने बैठा
वरुण की टीम भी फाइनल में पहुँची। उसने आयोजक से पूछा कि भाई-बहन को अलग मेज़ों पर रखना चाहिए या नहीं।
आयोजक ने पहले से प्रकाशित जोड़ी बनाने की प्रक्रिया देखी। अदिति का मुकाबला वरुण से था। मीरा रोहनिका से और इरफान तीसरे खिलाड़ी प्रकाश से खेलता।
“कोई विशेष व्यवस्था नहीं होगी,” आयोजक ने कहा।
बैठते हुए वरुण मुस्कराया। “तुम चाहती ही थीं कि पूरा परिवार देखे।”
अदिति ने स्कोर की पेंसिल मेज़ के किनारे के बराबर रखी। “मैं मुकाबला चाहती थी।”
पहली दो डील कठिन रहीं। एक में वरुण जल्दी पूरा हुआ। दूसरी में उसका नुकसान छोटा रहा। अदिति की टीम पीछे हो गई। दर्शकों में बैठे चाचा ने कहा कि रिज़र्व की जगह मान लेनी चाहिए थी।
अदिति ने सुना। लेकिन इस बार सुनना मान लेना नहीं बना।
ब्रेक में मीरा ने माना कि रोहनिका का बार-बार फेंके पत्तों का ढेर सीधा करना उसका ध्यान तोड़ रहा है। इरफान ने माना कि अपने पत्तों के बजाय टीम का अंतर गिन रहा है।
अदिति ने कोई बड़ी कसम नहीं खाई। “तेरह पत्ते गिनो। प्योर सीक्वेंस देखो। फिर तय करो कि हाथ कितना खेलने लायक है। पूरा मुकाबला एक चाल में नहीं जीतेंगे।”
अगली डील में मीरा ने लुभावने सेट के बजाय पूरा प्योर सीक्वेंस बचाया। इरफान ने निरर्थक हाथ समय रहते छोड़ दिया।
स्कोर अभी वरुण के पक्ष में था। लेकिन अंतर बढ़ना बंद हो गया।
8. वह हाथ जिसे बिगड़ते देखने की उम्मीद थी
पाँचवीं डील में अदिति के पास ऐसी जमावट आई जिस पर पहले वह जरूरत से ज्यादा गर्व करती। एक पूरा प्योर सीक्वेंस, एक सेट और दो मदद माँगते समूह।
वरुण ने उसे पत्ते सजाते देखा। “अभी भी हर चीज़ सुंदर चाहिए?”
उसने सेट से एक पत्ता निकालकर पास की जोड़ी में लगाया। हाथ कम सुंदर और अधिक लचीला हो गया।
वरुण ने खुले ढेर से सात उठाया। अदिति ने याद रखा, लेकिन ऐसा नहीं माना कि उससे उसके पूरे तेरह पत्ते खुल गए। अगली बार उसे दूसरा सात मिला। उसे रखने से अभी लाभ नहीं था। लेकिन फेंकने से उस योजना को मदद मिल सकती थी जिसका संकेत सार्वजनिक उठान से मिला था।
उसने अकेला बड़ा पत्ता फेंका।
दो चाल बाद दूसरा सीक्वेंस पूरा हुआ। अदिति ने बाकी समूह जाँचे, अपना डिस्कार्ड रखा और घोषणा की।
तेरह पत्ते चार समूहों में सामने आए। चार पत्तों का प्योर सीक्वेंस, तीन पत्तों का दूसरा सीक्वेंस और तीन-तीन पत्तों के दो सेट। कोई पत्ता दो जगह नहीं गिना गया था। कोई अधूरी शर्त कल्पना से पूरी नहीं की गई थी।
वरुण के अधूरे हाथ पर प्रतियोगिता के नियमों के अनुसार साठ अंक लगे।
उसने दोबारा गिनने को कहा। अधिकारी ने गिने। साठ ही थे।
दूसरी मेज़ों पर मीरा और इरफान ने नुकसान सीमित रखा था। पाँच डील के बाद अदिति की टीम 162 और वरुण की 183 पर थी।
पहली बार उसने बहन से पहले स्कोरबोर्ड देखा।
9. बीस अंक और खामोश कमरा
आखिरी दौर तीनों मेज़ों पर शुरू हुआ। इरफान का हाथ पहले समाप्त हुआ। हार के सोलह अंक जुड़े और अदिति की टीम 178 पर पहुँची।
फिर मीरा ने सही घोषणा की। रोहनिका के उन्नीस अंक दूसरी टीम को 202 तक ले गए।
दोनों नतीजे आधिकारिक बोर्ड पर आ चुके थे, जब अदिति ने अपना पहला पत्ता भी नहीं उठाया था। उनकी मेज़ देर से शुरू हुई थी क्योंकि खराब पत्ता मिलने पर गड्डी बदलकर जाँची गई थी।
उसने अपने तेरह पत्ते देखे। न प्योर सीक्वेंस, न जोकर। कई बड़े बेमेल पत्ते थे। संभावनाएँ थीं, लेकिन संभावना पूरा हाथ नहीं होती।
शुरुआती ड्रॉप के बीस अंक जुड़ते तो टीम 198 पर रहती। सामने 202। चार अंक की जीत।
वरुण उसी पल समझ गया। “मुझसे खेलने में डर लग रहा है?” उसने सबको सुनाकर पूछा।
लोग मेज़ की ओर झुक रहे थे। जैसे उसका अहंकार भाई का बाकी काम कर देगा।
वरुण फिर बोला। “इतना तमाशा किया, अब छिपना है?”
अदिति ने अधिकारी को बुलाकर दोनों दर्ज स्कोर की पुष्टि की। अधिकारी ने उन्हें ज़ोर से पढ़ा। अदिति ने पत्ते उल्टे रखे और ड्रॉ करने से पहले शुरुआती ड्रॉप घोषित किया।
बीस अंक लिखे गए।
198। 202।
एक धड़कन तक हॉल उलझा रहा। फिर मीरा की आवाज़ निकली, आधी हँसी और आधा रोना।
जिस आदमी ने उसकी कुर्सी छीनी थी, उसे जवाब देने के लिए अदिति ने अपनी टीम की कमाई बढ़त नहीं फेंकी थी।
10. साथ खड़े तीन खिलाड़ी
वरुण ने नियम दिखाने को कहा। अधिकारी ने वही कागज़ सामने रख दिया जिस पर सुबह हर कप्तान ने हस्ताक्षर किए थे।
शुरुआती ड्रॉप की उसी शर्त के नीचे उसका नाम था जिसे अदिति ने इस्तेमाल किया था। वह दस्तखत ऐसे देख रहा था जैसे स्याही ने धोखा दिया हो।
रोहनिका बोली कि फाइनल बिना ठीक से लड़ाई के खत्म हुआ।
मीरा ने छह डील की स्कोर शीट मेज़ पर रखी। “पूरी लड़ाई यहाँ है। आप छह डील में हारे हैं।”
किसी ने उसे गलत नहीं कहा।
पुरस्कार के समय कप्तान अदिति को बुलाया गया। वह मीरा और इरफान को साथ ले गई। तीनों ने ट्रॉफी उठाई। उसके चमकते हैंडल पर अलग-अलग रंगों की बाँहें एक साथ थीं।
रिज़र्व बनने की सलाह देने वाले चाचा ने तस्वीर माँगी। अदिति ने कहा, टीम की तस्वीरों के बाद। वह इंतज़ार करते रहे।
वरुण दरवाज़े के पास खड़ा था। आज उसके पास बहन के लिए कोई निर्देश नहीं था। कोई छोटा काम नहीं था जिसके बहाने उसे कमरे के बीच से हटाया जा सके।
अदिति भाषण देने उसके पास नहीं गई। वह छह डील और आखिरी स्कोर दे चुकी थी।
कमरे में लौटकर उन्होंने समीक्षा फाइल खोली। जीत वाले फैसलों के पास गलतियाँ भी लिखीं। इरफान ने स्कोरबोर्ड की तस्वीर जोड़ दी।
मीरा ने मेज़ के नीचे रखा डिब्बा देखा। “कल इसका ठीक पाया खरीदते हैं।”
अदिति मुस्कराई। “कल एक और कुर्सी खरीदेंगे।”
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