मीरा चाय की ट्रे लेकर कमरे के बीच पहुँची ही थी, जब उसके पति ने इंटरव्यू लेने वाले से कहा कि उसे खेल समझ नहीं आता।
“शायद इसीलिए शादी चल रही है,” राघव बोला।
इंटरव्यू लेने वाला हँसा। सोफे पर राघव के पास बैठी तारा भी हँसी।
मीरा डाइनिंग टेबल के पास रुक गई।
ट्रे में छह कप थे। उसे याद था किसे चीनी नहीं चाहिए, किसे चाय की जगह कॉफी, किस मेहमान ने पिछली बार दूध ज़्यादा गर्म होने की शिकायत की थी।
राघव को इनमें से कुछ याद नहीं रहता।
उसे रविवार को जीते फाइनल का हर हाथ याद था।
मीरा जानती थी। उसी मेज़ पर रात दो बजे तक दोनों ने उनके बारे में बात की थी।
इंटरव्यू लेने वाले ने उसे देखा।
“और आप जरूर इन्हें जमीन से जुड़ा रखती होंगी।”
मीरा बोलती, उससे पहले राघव ने उँगली उठा दी।
“पहले चाय। रोशनी बदलने से पहले खत्म करना है।”
उसने ट्रे रख दी।
तारा ने पास वाला कप उठाया।
“मेरे में चीनी नहीं है न?”
मीरा ने उस औरत को देखा जो पति के बगल में उसकी रोज की जगह पर बैठी थी।
“नहीं।”
“बहुत अच्छा। राघव कहते हैं तुम्हें सब याद रहता है।”
एक पल मीरा को लगा, उसने कॉपियों के बारे में बताया होगा।
फिर तारा बोली, “जन्मदिन, घर का सामान। मुझे भी तुम्हारे जैसी कोई चाहिए।”
मीरा ने आखिरी चम्मच तश्तरी पर रखा।
हल्की, साफ आवाज़ हुई।
* * *
शादी को नौ साल हो चुके थे।
शादी से पहले वह ट्रैवल ऑफिस में बुकिंग का काम करती थी। पारिवारिक मिलन में ऐसे मामा के साथ ताश खेलती, जिन्हें सबसे छोटी भांजी से हारना पसंद नहीं था।
राघव को उसकी यह बात अच्छी लगी थी।
पहली शाम साथ खेलते हुए उसने कहा था, “तुम सच में देखती हो। ज़्यादातर लोग बस अपनी बारी का इंतज़ार करते हैं।”
वह खुद भी अच्छा खिलाड़ी था। तेज, संयत, गलती मान लेने वाला।
बाद में उसने आयोजित तीन पत्ती मुकाबलों में हिस्सा लेना शुरू किया।
मीरा साथ जाती थी। शुरू में इसलिए कि दोनों को अच्छा लगता था। लौटते समय सड़क किनारे चाय पर फैसलों की बहस होती। कभी वह सही होती, कभी राघव।
एक ही शाम को अलग-अलग याद करने से बचने के लिए उसने कॉपी खरीद ली।
फिर और कॉपियाँ आईं।
तारीखें। सवाल। बहसों के छोटे विवरण जिन्हें दोनों शांत होने के बाद दोबारा देखते।
राघव अच्छा करने लगा तो डाइनिंग टेबल अभ्यास की मेज़ बन गई।
नाम होने लगा तो इंटरव्यू का सेट।
कैमरे आने पर मीरा की कुर्सी रसोई में चली जाती।
पहली बार उसने ध्यान दिया।
पाँचवीं बार खुद हटा दी।
नौकरी धीरे-धीरे छूटी।
कभी उसकी यात्रा राघव के मुकाबले से टकराई। फिर कोई जरूरी मीटिंग। फिर उसके बाहर होने पर फोन सँभालने वाला चाहिए था।
“हम कुछ बना रहे हैं,” राघव कहता।
मीरा ने विश्वास किया।
नौवें साल तक वह उसे मुश्किल इंटरव्यू के लिए तैयार कर सकती थी, यात्रा की व्यवस्था कर सकती थी और पहचान सकती थी कि वह घबराहट छिपा रहा है।
वह उसका परिचय ऐसी औरत के रूप में देता था जिसे ताश समझ नहीं आती।
* * *
टीम के जाने के बाद मीरा कप सिंक तक ले गई।
राघव तारा के फोन पर तस्वीरें देख रहा था।
“अच्छे लग रहे थे,” तारा बोली। “कोई संकेत देता रहे तो ज्यादा सहज रहते हो।”
मीरा ने नल बंद किया।
“पिछली बार कैमरे के पीछे से मैं संकेत दे रही थी।”
तारा ने सिर उठाया।
राघव ने साँस छोड़ी।
“यह कोई मुकाबला नहीं।”
“फिर क्यों कहा मुझे खेल समझ नहीं आता?”
“मजाक था।”
“पिछले इंटरव्यू में भी मजाक था?”
उसने तारा की ओर माफी माँगती मुस्कान फेंकी।
“थकी हुई है।”
मीरा हाथ में गीला कप लिए खड़ी रही।
तारा सामान समेटने लगी।
दरवाज़े पर उसने राघव से कहा कि संशोधित प्रेजेंटेशन भेज देगी। मीरा से विदा नहीं ली।
दरवाज़ा बंद हुआ तो राघव की आवाज़ बदल गई।
“तुमने मुझे शर्मिंदा किया।”
“मैं जिस चीज़ पर आधी जिंदगी तुमसे बात करती हूँ, उसी के बारे में कहा मुझे कुछ नहीं आता।”
“बात करना और करना अलग चीज़ें हैं।”
मीरा ने कप रख दिया।
उसने देख लिया था कि बात लगी है।
“मैं दबाव में खेलता हूँ। तुम घर पर पेन लेकर बैठती हो।”
“तो मुझे खेलने दो।”
“किसने रोका?”
नौ साल तक उसके कैलेंडर के हिसाब से मुलाकातें, काम और यात्राएँ तय होने के बाद यह पूछना आसान था।
मीरा ने रविवार के फाइनल की फ्रेम की हुई तस्वीर देखी।
किनारे पर जैकेट पकड़े उसका हाथ दिखता था।
बाकी शरीर काट दिया गया था।
* * *
अगले हफ्ते उसने एक छोटे स्थानीय मुकाबले में नाम लिखा दिया।
परिचित ने प्रतिभागियों की सूची भेजी तो राघव को पता चला।
उसने फोन दोनों के बीच मेज़ पर रखा।
“कुछ साबित करना है?”
“हाँ।”
“मुझे नीचा दिखाकर?”
“फीस अपने खाते से दी है।”
वह बिना मुस्कराए हँसा।
“जानती हो मेरा मतलब।”
वह जानती थी।
मुकाबले की सुबह उसने मीरा से घर रुककर आने वाले प्रायोजक को सँभालने को कहा।
“सिर्फ आज शहर में है।”
“तो तुम मिल लो।”
“मेरा अभ्यास है।”
“मेरा भी।”
राघव ने ऐसे देखा जैसे उसने अपरिचित भाषा में जवाब दिया हो।
वह उत्तर खोजता, उससे पहले मीरा निकल गई।
जगह पहुँचकर नाम लिखने के लिए उसे तीन बार कोशिश करनी पड़ी। हाथ काँप रहा था।
वह हार गई।
न नाटकीय तरीके से, न किसी की बेईमानी से। दूसरों को कैसी दिख रही होगी, यही सोचते हुए कई गलत फैसले किए। नतीजा घोषित हुआ तो उसके पास विरोध का कारण नहीं था।
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बाहर फोन चमका।
कैसा गया?
उसने लिखा—क्वालिफाई नहीं किया।
लगभग तुरंत उत्तर आया।
अब समझ आया?
वह बस स्टॉप पर संदेश खोले बैठी रही। फिर स्क्रीन अंधेरी हो गई।
* * *
मुकाबले में मिली एक महिला पास बैठ गई।
“कोई लेने आ रहा है?”
मीरा ने सिर हिलाया।
“बस छूट गई।”
“दूसरी आ जाएगी।”
उनका नाम फराह था। प्रयोगशाला में काम करती थीं और सप्ताहांत में मोहल्ले के क्लब में खेलती थीं।
“तुम्हारा दूसरा दौर देखा,” उन्होंने कहा।
मीरा का मन हुआ गायब हो जाए।
“तो काफी देख लिया।”
“नहीं। एक दौर देखा है।”
फराह ने पूछा, बस आने तक साथ बैठ सकती हैं?
पहले काम की बात हुई। फिर मुकाबले की। मीरा ने माना कि बार-बार सोच रही थी लोग कहेंगे राघव सूरी की पत्नी इतनी मामूली कैसे है।
फराह ने सुना।
“शनिवार को आओगी?”
“आपके क्लब में?”
“मन हो तो। वहाँ कोई तुम्हारे पति का इंटरव्यू नहीं ले रहा।”
मीरा हँस पड़ी।
अपनी हँसी से खुद चौंक गई।
* * *
फराह के क्लब में उसने कोई धाक नहीं जमा दी।
सेवानिवृत्त स्कूल प्रशासक डिसूज़ा साहब उसकी लंबी व्याख्या रोक देते।
“तीन चीज़ें बता दीं जो कर सकती थीं। किया क्या?”
एक युवा अकाउंटेंट ने पूछा कि बार-बार खाली कुर्सी क्यों देखती है।
मीरा को मालूम ही नहीं था कि ऐसा कर रही है।
सालों से उलझन होती तो राघव की ओर देखती। असहमत होने पर भी उसकी प्रतिक्रिया से समझती कि बात किस ओर जाएगी।
अब सिर्फ कुर्सी थी।
वह हफ्ते में दो बार आने लगी।
बुकिंग का पार्ट-टाइम काम भी मिल गया। वेतन कम था। अपने समय का कुछ हिस्सा राघव का न होना अजीब लगता।
घर पर उसने पहले बदलाव अनदेखा किया।
फिर देर से बने खाने की शिकायत की।
फिर पूछा कि उसके दिमाग में बातें कौन भर रहा है।
एक रात मीरा को अपनी दो कॉपियाँ उसके डेस्क पर तारा के प्रेजेंटेशन के पास मिलीं।
पन्नों की तस्वीरें ली गई थीं।
स्लाइड पर राघव का नाम था।
मीरा ने अपना योगदान स्वीकार करने को कहा।
“अपना घर है,” वह बोला। “यहाँ रहने का किराया माँगता हूँ क्या?”
उसने कॉपियाँ उठा लीं।
राघव ने ऊपर वाली पकड़ ली।
एक पल दोनों उसे थामे रहे।
फिर उसने अचानक छोड़ दी। ढीले पन्ने फर्श पर फैल गए।
“ले जाओ। देखते हैं छोटी-छोटी टिप्पणियाँ क्या जिताती हैं।”
वह घुटनों पर बैठकर पन्ने उठाने लगी।
बाहर जाते हुए राघव एक पन्ने के ऊपर से निकल गया।
* * *
दस दिन बाद मीरा चचेरी बहन अंजलि के अतिरिक्त कमरे में रहने चली गई।
कपड़े, नौकरी के कागज़, कॉपियाँ और पहली तनख्वाह से खरीदा छोटा लैम्प साथ लिया।
राघव बेडरूम के दरवाज़े में खड़ा था।
“मजा खत्म होगा तो लौट आओगी।”
उसने बैग बंद किया।
“शायद इसमें कुछ भी मजेदार नहीं होगा।”
“तो कर क्यों रही हो?”
मीरा ने कमरे में नज़र घुमाई।
उसकी ट्रॉफियाँ। उसका यात्रा वाला बैग। मीरा के पुराने डेस्क के ऊपर उसका कैलेंडर।
“क्योंकि इंतज़ार करती रहती हूँ कि तुम्हें दिखे मैं भी यहाँ हूँ।”
वह तुरंत रास्ते से नहीं हटा।
जब हटा, मीरा ने अपना बैग खुद उठाया।
अंजलि के घर पहली रात वह तह किए तौलिए में मुँह छिपाकर रोई, ताकि किसी की नींद न खुले।
सुबह काम पर गई।
कमरे में कोई संगीत नहीं बजा। अचानक आजाद हो जाने का एहसास नहीं हुआ।
बुकिंग की पुष्टि करनी थी। मकान मालिक पूछ रहा था कि क्या एक महीने से ज्यादा रुकेगी।
* * *
आमंत्रण श्रृंखला अक्टूबर में शुरू हुई।
क्षेत्रीय आयोजक ने कई सत्रों वाले प्रकाशित प्रारूप का नया मुकाबला घोषित किया। कई खुले आयोजनों से चयन होना था। अंतिम चरण में आठ खिलाड़ी आते। राघव पहले ही जगह पा चुका था।
मीरा नहीं।
पहली कोशिश जल्दी खत्म हुई।
दूसरी बेहतर शुरू हुई, फिर बिगड़ गई।
उसने फराह के अलावा किसी को नतीजे भेजना बंद कर दिया।
तीसरी में उसका चयन हुआ।
सूची लगने पर वह अकेली थी।
नाम पढ़ा। बोर्ड से हटी। फिर लौटकर देखा कि किसी और को अपना नाम तो नहीं समझ लिया।
उसने अंजलि को फोन किया।
“रात को कुछ अच्छा खाएँ?”
“कितना अच्छा?”
“वहीं, जिसकी ब्रेड तुम्हें पसंद है।”
अंजलि ने नहीं पूछा किसने पैसे दिए या खर्च कर सकती है या नहीं।
पूछा, कितने बजे मिलना है।
खाने पर मीरा ने सूची की तस्वीर दिखाई।
अंजलि ने बड़ी करके देखी।
“यह रही तुम।”
इतनी सीधी बात थी कि मीरा को नज़र फेरनी पड़ी।
* * *
अगली दोपहर राघव का फोन आया।
शुरू के कुछ मिनट वह उसी आदमी जैसा लगा जिससे उसने शादी की थी।
काम पूछा। याद था अंजलि की बेटी की परीक्षा है। कहा, घर बहुत चुप लगता है।
फिर फाइनल की बात की।
“लोग इसे गंदा बना देंगे।”
“कौन?”
“आयोजक। मीडिया। पति के खिलाफ पत्नी।”
“नाम से बुला सकते हैं।”
“जानती हो नहीं बुलाएँगे।”
मीरा ने कुछ पल फोन दूर किया।
वह पूरी तरह गलत नहीं था। एक प्रचार पोस्ट में बिना पूछे शादी की पुरानी तस्वीर लग चुकी थी।
मीरा ने आयोजक से उसे हटाने को कहा।
उन्होंने अलग-अलग खिलाड़ी वाली तस्वीरें लगा दीं।
राघव ने फिर फोन किया।
“अब सबको लगता है कुछ छिपाना है।”
“तुम चाहते क्या हो?”
कुछ देर चुप्पी रही।
“इस बार हट जाओ। आगे और मौके आएँगे।”
मीरा ने इंतज़ार किया कि वह अपने हटने की भी बात करेगा।
नहीं की।
“नहीं,” उसने कहा।
* * *
फाइनल सप्ताहांत में था।
शुक्रवार को मीरा अपना बैग उठाए पहुँची।
रजिस्ट्रेशन पर बैठी कर्मचारी मुस्कराई।
“सूरी साहब आ चुके हैं। आपका सामान उनके साथ रखवा दूँ?”
“नहीं। मेरा अलग कमरा है।”
उसने तुरंत माफी माँगी।
मीरा को वह माफी उम्मीद से ज्यादा अच्छी लगी।
शनिवार सुबह प्रायोजकों के बोर्ड के पास तारा राघव के साथ दिखी।
वह ऐसे मुस्कराई जैसे कोई मुश्किल बात हुई ही न हो।
“तुम्हारी प्रगति देख रही हूँ।”
मीरा ने सिर हिलाया।
“राघव हमेशा कहते थे तुममें क्षमता है।”
मीरा ने उसे देखा।
राघव ने आस्तीन ठीक की।
वह जवाब देती, इससे पहले अधिकारी ने खिलाड़ियों को बुला लिया।
खेल क्षेत्र के प्रवेश पर राघव उसके बराबर आ गया।
“किसी के कहने से जल्दी मत करना।”
सलाह अच्छी थी।
यही बात मीरा उससे सौ बार कह चुकी थी।
“नहीं करूँगी।”
* * *
पहले सत्र के बाद मीरा अंक तालिका में काफी नीचे थी।
राघव ऊपर के खिलाड़ियों में था।
ब्रेक में कैमरा उसके पास पहुँचा।
“पत्नी के लिए कोई सलाह?”
उसने मीरा की ओर देखा।
“अनुभव मायने रखता है। कुर्सी पर बैठकर बात अलग होती है।”
तीन मीटर दूर खड़ी मीरा ने सुन लिया।
उसका मन कमरे में लौट जाने का हुआ।
लिफ्ट के पास फराह दो कागज़ के कपों में चाय लिए इंतज़ार कर रही थीं।
“क्या हुआ?”
मीरा सब बताने लगी। राघव। तारा। इंटरव्यू वाला। रजिस्ट्रेशन की कर्मचारी।
फराह ने पूरा सुना।
“और तुम्हारी मेज़ पर?”
मीरा रुक गई।
दोनों बेंच पर बैठीं।
इस बार उसने सचमुच के सत्र की बात की।
फराह ने यह नहीं कहा कि जीतना उसका हक है। उन्होंने देखा कहाँ गलती हुई और किस बात पर अभी निश्चित होना ठीक नहीं।
फिर फराह ने बिस्कुट का पैकेट खोला।
“लो।”
मीरा ने दो लिए।
अगला सत्र शुरू हुआ तो उसने सामने बैठे खिलाड़ियों को देखा।
राघव की मेज़ को नहीं।
नतीजे सुधरे।
दौड़ में बने रहने लायक।
बेफिक्र होने लायक नहीं।
* * *
रविवार को हर खिलाड़ी के पास खोने को कुछ था।
एक आदमी पारिवारिक आपातस्थिति के बाद रात भर सफर करके लौटा था। दूसरा विदेश में नौकरी शुरू करने से पहले आखिरी आयोजन खेल रहा था। जिस महिला को मीरा ने कम आँका था, वह कठिन सत्र जीतकर आगे निकल गई।
पूरा सप्ताहांत सिर्फ सूरी दंपती का नहीं था।
यह बात मीरा के काम आई।
उसे लगना बंद हुआ कि कमरे का हर इंसान उसकी शादी टूटते देखने आया है।
दिन में वह ऊपर चढ़ी। राघव भी मजबूत दावेदार बना रहा। मीरा के उससे नाराज होने से वह अचानक खराब खिलाड़ी नहीं हो गया था।
इसीलिए आखिरी हिस्सा कठिन था।
वह जानती थी वह कितना अच्छा खेल सकता है।
यह भी जानती थी कि अब उसे सहज रखना उसकी जिम्मेदारी नहीं।
आखिरी सत्र से पहले वह पानी की मशीन के पास मिला।
“जो भी हो, इन्हें तमाशा मत देना।”
मीरा ने बोतल का ढक्कन लगाया।
“तो मेरी तरफ से मत बोलना।”
वह उसे जाते देखता रहा।
* * *
अंतिम मेज़ उम्मीद से ज्यादा शांत थी।
अधिकारी ने बाकी कार्यक्रम समझाया। कुल अंक सबके सामने लगे थे।
राघव ने शुरुआत में सुधार किया।
मीरा कुछ पीछे गई।
तीसरा खिलाड़ी दोनों के बीच आया। कई हाथ तक न पति आगे था, न पत्नी।
मीरा को फिर सामने देखकर भरोसा खोजने की पुरानी इच्छा हुई।
उसने जाने दिया।
एक बार राघव घर की मेज़ वाले परिचित लहजे में बोला।
“तुम हमेशा बहुत समय लेती हो।”
अधिकारी ने व्यक्तिगत टिप्पणी न करने को कहा।
मीरा ने जवाब नहीं दिया।
अगला फैसला फिर भी अपना ही लिया।
आखिरी तय हाथ आए। कहीं और आए परिणाम से अंक तालिका बदली। दर्शकों में किसी के मुँह से तेज आवाज़ निकली, फिर उसने माफी माँगी।
मीरा ने खेल रुकने पर ही कुल अंक देखे।
अंतिम तुलना तक मुँह सूख गया था।
राघव ने पत्ते दिखाए।
फिर उसने।
अधिकारी ने परिणाम की पुष्टि की और अंक पूरे किए।
मीरा पहले स्थान पर थी।
राघव बोर्ड देखता रहा।
कोई गलती नहीं थी जिसकी ओर वह इशारा कर सके।
मीरा तब तक बैठी रही जब तक अधिकारी ने अंतिम खिलाड़ियों को खड़े होने को नहीं कहा।
तभी उसने देखा कि हाथ अब नहीं काँप रहे।
* * *
पुरस्कार देते समय मेजबान परिचित परिचय की ओर बढ़ा।
“एक असाधारण सप्ताहांत, जिनकी पत्नी—”
“मीरा,” उसने कहा।
वह रुक गया।
उसने चिल्लाया नहीं था। माइक्रोफोन पास था।
“मेरा नाम लीजिए, प्लीज़।”
मेजबान ने कार्ड देखा।
“बिल्कुल। मीरा सूरी, इस साल के फाइनल की विजेता।”
वह आगे बढ़ी।
ट्रॉफी अनुमान से भारी थी।
किसी ने राघव को तस्वीर के लिए साथ आने को कहा।
वह तुरंत आ गया।
“शानदार नतीजा। सालों से इस पर साथ काम कर रहे थे।”
मीरा थोड़ा हटी ताकि फोटोग्राफर दोनों के चेहरे देख सके।
“मैंने सालों तुम्हारे साथ काम किया। इस आयोजन की तैयारी में फराह, डिसूज़ा साहब और क्लब ने मदद की।”
मेजबान ने दर्शकों की ओर देखा।
“वे यहाँ हैं?”
थे।
फराह पहले शर्माकर सिर हिलाने लगीं। डिसूज़ा साहब खड़े हो चुके थे।
राघव को जगह देनी पड़ी।
मीरा ने सबको नाम लेकर धन्यवाद दिया।
शादी की व्याख्या नहीं की। चाय की ट्रे का किस्सा नहीं सुनाया।
शिष्ट बने रहने के लिए अपना यह पल भी उसके हवाले करना जरूरी नहीं था।
* * *
शाम को राघव उसके होटल के कमरे पर आया।
उसने लॉबी में बात की।
कुछ देर वह कैमरों, गलत समझी गई टिप्पणियों और अपने ऊपर रहे दबाव की बात करता रहा।
फिर कहा, “तुमने ऐसा दिखाया जैसे कभी मदद ही नहीं की।”
“की थी। पहले।”
“यह ठीक नहीं कह रही।”
“तुमने नाम वापस लेने को कहा।”
उसने घूमते दरवाज़े की ओर देखा।
एक परिवार दो बड़े सूटकेस अंदर लाने में उलझा था। बच्चा बार-बार गलत दिशा में जा रहा था।
“ठीक कर सकते हैं,” उसने कहा।
मीरा को फराह के क्लब की खाली कुर्सी याद आई।
महीनों लगे थे वहाँ उसे ढूँढ़ना छोड़ने में।
“शादी का आगे क्या होगा, अभी नहीं जानती। लेकिन कल घर वापस नहीं जा रही।”
“चाहती क्या हो?”
“ऐसी बातचीत जो इससे शुरू न हो कि मुझे क्या छोड़ना है।”
उसके पास तुरंत जवाब नहीं था।
मीरा खड़ी हो गई।
“सुबह जल्दी ट्रेन है।”
इस बार उसने बदलने को नहीं कहा।
* * *
तीन महीने बाद भी मीरा बुकिंग ऑफिस में काम कर रही थी।
अब अपना छोटा किराए का फ्लैट था। कुछ सप्ताहांत क्लब के सत्र आयोजित करने में मदद करती। नए खिलाड़ी कितने घबरा सकते हैं, जान चुकी थी, इसलिए उनके स्वागत का ध्यान रखती।
ट्रॉफी खिड़की के पास शेल्फ पर थी।
नाम ठीक खुदा था।
अलग रहने के दौरान बातचीत और सलाह की व्यवस्था अब वह राघव से नहीं करवाती थी।
कभी उसकी याद आती।
अक्सर दोनों के पहले वाले रूप की याद आती थी।
एक शाम पार्सल आया। पुराने फ्लैट में छूटी चीज़ें थीं—स्कार्फ, दो किताबें और एक कॉपी जिसे वह खोया मान चुकी थी।
पन्नों के बीच से तस्वीर गिरी।
राघव की शुरुआती छोटी जीतों में से एक की थी। मीरा पास खड़ी हँस रही थी। पूरा चेहरा दिखता था। राघव की बाँह उसके कंधे पर थी। दोनों में से कोई कैमरे को नहीं देख रहा था।
उसने बहुत देर तस्वीर देखी।
फिर कॉपी में रख दी।
घंटी बजी।
फराह और अंजलि खाने पर आई थीं।
“चाय?” मीरा ने पूछा।
“मैं बनाती हूँ,” अंजलि बोली।
फराह ने अलमारी खोलकर तीन कप निकाले।
मीरा बताने लगी कि अंजलि को कौन-सा पसंद है, फिर रुक गई।
फराह पहले से जानती थी।
सोफे पर तीनों के लिए जगह थी।
मीरा बैठ गई।