Diwa Play — उस टिफिन को हाथ मत लगाना
Diwa Play

Diwa Play — उस टिफिन को हाथ मत लगाना

काल्पनिक कहानी · पात्र और घटनाएँ कहानी का हिस्सा हैं।

कबीर के पहुँचने से पहले देव ने स्टील का टिफिन उठा लिया। “आज क्या लाए हैं?” “नीचे रखो।” इस आवाज़ पर बाकी लोगों ने सिर उठाया। अभी तक सब ताश देख रहे थे। बीस से…

कबीर के पहुँचने से पहले देव ने स्टील का टिफिन उठा लिया।

“आज क्या लाए हैं?”

“नीचे रखो।”

इस आवाज़ पर बाकी लोगों ने सिर उठाया।

अभी तक सब ताश देख रहे थे। बीस से ऊपर की उम्र के छह लड़के उस हॉस्टल की मेज़ के चारों ओर बैठे थे जो कॉलेज की थी, लेकिन किसी तरह देव भसीन की हो गई थी।

देव ने टिफिन कान के पास हिलाया।

“कुछ कीमती है?”

कबीर खड़ा हो गया।

देव ने ऊपर का डिब्बा खोला।

चावल। आलू और बीन्स। नींबू का छोटा टुकड़ा अलग लिपटा था, ताकि पूरे खाने में खटास न भर जाए।

कोई हँसा।

“नीचे रखो,” कबीर ने दोहराया।

देव ने टिफिन मेज़ के बीच के ऊपर कर दिया।

“तुम्हारी तरफ से यही सही। जीतने वाले को रात का खाना।”

कुंडी खिसक गई।

चावल पत्तों पर बिखर गए।

एक पल कोई नहीं हिला।

फिर देव हँसने लगा।

कबीर को छत के पंखे की रुक-रुककर आती खटखट सुनाई दे रही थी। एक दाना देव की घड़ी पर था। दूसरा दो गिलासों के बीच हरे कपड़े पर अटका था।

उसने टिफिन उठा लिया।

“अब मेज़ भी खराब कर दी,” देव बोला।

कबीर खाना समेटने झुका।

दायाँ हाथ इतना काँप रहा था कि चावल ठीक से बटोर नहीं पा रहा था।

दरवाज़े से आवाज़ आई, “छोड़ो। सफाई वाला आएगा।”

उसने यह देखने के लिए सिर नहीं उठाया कि किसने कहा।

* * *

कबीर तेईस साल का था। हॉस्पिटैलिटी डिप्लोमा के आखिरी साल में पढ़ रहा था।

शहर आया था तो दो बैग, टूटा फोन और पहले टर्म भर के पैसे थे। उसके बाद हर चीज़ का हिसाब लगाना पड़ता था।

सप्ताह की शामों में रेस्तराँ की रसोई में काम करता। रविवार को कॉलेज कैंटीन में कांता का नाश्ता लगवाने में हाथ बँटाता।

कांता उसकी रिश्तेदार नहीं थीं। वह फिर भी उन्हें कांता आंटी कहता था।

तीन कैंटीन ठेकेदारों के साथ काम कर चुकी थीं। स्थायी नौकरी के दो वादे सुन चुकी थीं। बकाया मजदूरी का छोटा हिसाब खुद रखना सीख गई थीं।

उन्हें पता चल जाता था कि कबीर ने खाना खाया है या नहीं।

कबीर को उनका जान जाना अच्छा नहीं लगता था।

“भूख नहीं है तो ले जाओ,” वह टिफिन काउंटर पर सरकाते हुए कहतीं।

वह जितना हो सकता, भुगतान करता। कभी सब्जियाँ काट देता, कभी स्टॉक गिन देता।

उस महीने कांता ने एक निजी कैटरिंग ऑर्डर के खर्च की शीट बनाने का काम उसे दिया था। वह ऑर्डर अपनी एक परिचित के साथ कर रही थीं।

छह हजार रुपये।

रेस्तराँ में हफ्ते भर काम करके मिलने वाले पैसों से भी ज्यादा।

कबीर ने तय कर लिया था कहाँ खर्च होंगे। हॉस्टल का बकाया। फोन की मरम्मत। रसोई में पहनने के नए जूते, इससे पहले कि बाएँ तलवे की दरार छिपाना असंभव हो जाए।

देव की मेज़ पर एक रुपया खर्च करने का भी इरादा नहीं था।

ऊपर तो चार्जर लेने गया था।

* * *

टिफिन वाली घटना का वीडियो हॉस्टल में फैल गया।

वीडियो देव के टिफिन लेने के बाद से शुरू होता था।

उसमें बिखरे चावल के ऊपर खड़ा, गुस्से में भरा कबीर दिख रहा था।

कैप्शन था—जब दोस्ताना खेल को जरूरत से ज्यादा गंभीर ले लो।

नाश्ते तक लोग पूछने लगे थे, आलू वापस जीत लिए या नहीं।

कबीर ने खुद से कहा, कुछ दिन में भूल जाएँगे।

फिर कांता ने टिफिन माँगा।

“नींबू वाला डिब्बा नहीं है।”

कबीर थाली देखता रहा।

“ढूँढ़ लूँगा।”

“हुआ क्या?”

“कुछ नहीं।”

वह इंतज़ार करती रहीं।

उसने मुख्य डिब्बा दे दिया। किनारा दब गया था।

कांता ने उस पर अँगूठा फेरा।

“गिरा है।”

“कहा न, दूसरा ला दूँगा।”

आवाज़ जरूरत से तेज निकली।

उन्होंने टिफिन काउंटर के नीचे रख दिया।

“जल्दी नहीं है।”

कबीर नाश्ता अधूरा छोड़कर चला गया।

शाम को देव के कमरे में लौटा।

छोटा डिब्बा ऐशट्रे बना हुआ था।

वह दरवाज़े पर खड़ा रहा, जब तक देव ने देख नहीं लिया।

“अपनी जायदाद लेने आए हो?”

कबीर ने डिब्बा उठा लिया।

“अच्छे से धोना,” देव बोला। “आंटी को सिगरेट का स्वाद नहीं आना चाहिए।”

पहली बार किसी को मारने का इतना मन हुआ कि कंधे में हाथ उठने की हरकत महसूस हुई।

वह बाहर चला गया।

बीस मिनट डिब्बा रगड़ा।

गंध फिर भी रही।

* * *

दो दिन बाद हॉस्टल के पूर्व छात्र सप्ताहांत के फंड से पैसे गायब हो गए।

देव योगदान जमा कर रहा था। छात्र प्रतिनिधि रितु आयोजन की सूची बना रही थी।

गायब रकम छह हजार थी।

उसी दोपहर कबीर ने हॉस्टल के बकाए में छह हजार जमा किए थे।

शाम तक वार्डन उसका लॉकर देखना चाहते थे।

“क्यों?” कबीर ने पूछा।

“छिपाने को कुछ नहीं तो एक मिनट लगेगा।”

गलियारे में पीछे देव खड़ा था।

कई कमरों के दरवाज़े खुले थे।

वार्डन ने लॉकर देखा। हॉस्टल की रसीद मिली तो उठाकर दिखाई।

“ये पैसे कहाँ से आए?”

“काम के।”

“कौन-सा काम?”

“कैटरिंग ऑर्डर की लागत की शीट बनाई थी।”

देव के मुँह से हल्की आवाज़ निकली।

वार्डन ने उसे देखा।

“कुछ नहीं, सर। बस समय थोड़ा अजीब है।”

कबीर ने टूटे फोन पर संदेश दिखाए। स्क्रीन का एक कोना उँगली का दबाव नहीं पकड़ रहा था।

वार्डन ने स्क्रॉल करने की कोशिश की, फिर झुँझलाकर लौटा दिया।

“कैंटीन में बात करेंगे।”

देव दीवार से टिक गया।

“लौटा दो। इतने पैसों के लिए कोई भविष्य खराब नहीं करना चाहता।”

कबीर ने खुले दरवाज़ों में खड़े चेहरे देखे।

कुछ सहानुभूति भरे थे।

वह लगभग और बुरा लगा।

वे पहले ही मान चुके थे कि जानते हैं उसने क्या किया।

* * *

अगली सुबह कांता कपड़े का थैला लेकर दफ्तर आईं।

हरे रंग की वह साड़ी पहनी थी जिसे उन मुलाकातों के लिए रखती थीं जहाँ लोग वरना उन्हें कमरे के सामान की तरह देखते।

“मैंने दिए,” उन्होंने कहा।

ठेकेदार सूद ने भौंहें चढ़ाईं।

“कैंटीन के पैसे?”

“मेरे काम के।”

“कौन-सा काम?”

“निजी ऑर्डर। मेरी शिफ्ट के बाहर।”

सूद वार्डन की तरफ मुड़ा।

“देख रहे हैं? यही बाहर के काम। कर्मचारियों को समझाते रहते हैं।”

कांता ने लिखित काम का हिसाब और कैटरिंग की पुष्टि निकाली।

कबीर पन्ने पहचानता था। आँकड़े तैयार करने में उसने मदद की थी, फिर असली कागज़ उन्हें लौटा दिए थे।

“ग्राहक का अग्रिम मंगलवार को आया। इसे गुरुवार सुबह भुगतान किया।”

वार्डन पढ़ने लगे।

दरवाज़े के पास बैठे देव ने कहा, “ये इसका खयाल रखती हैं। मदद तो करेंगी ही।”

कांता मुड़ीं।

कबीर को लगा अब चिल्लाएँगी।

उन्होंने पूछा, “मेरा खाता देखना है या फैसला हो गया?”

सूद ने लहजा सँभालने को कहा।

कबीर के भीतर कुछ टूट गया।

“इसके उँगली उठाने से इन्हें पूरी जिंदगी साबित नहीं करनी पड़ेगी।”

वार्डन ने हाथ उठाया।

“बस। जाँच करेंगे।”

कांता ने कागज़ सावधानी से वापस रखे।

निकलते समय कबीर के पास रुकीं।

“दोपहर का खाना मत छोड़ना।”

* * *

जाँच में चार दिन लगे।

उन चार दिनों में कबीर को पूर्व छात्र आयोजन के स्वयंसेवक समूह से हटा दिया गया। रेस्तराँ मैनेजर ने पूछा अफवाहें सच हैं क्या। किताब उधार लेने वाले सहपाठी ने किसी और के हाथ वापस भेजी।

देव आयोजन करता रहा।

रविवार को कबीर ने माँ को फोन किया।

माँ ने पूछा, थका क्यों लग रहा है?

“अतिरिक्त शिफ्ट।”

“ठीक से खाना।”

“खा रहा हूँ।”

उसे खिड़की के पास से माँ के कुछ भारी चीज़ हटाने की आवाज़ आई। घर पर बारिश शुरू हो गई थी।

“कमरा अब भी टपकता है?”

“थोड़ा। पहले अपनी पढ़ाई पूरी करो।”

फोन के बाद वह हॉस्टल की सीढ़ी पर बैठ गया।

उसने गरीबी को ऐसी समस्या माना था जो काम करके हल हो सकती है।

किसी ने नहीं बताया था कि कितना समय यह साबित करने में लगेगा कि उसके पास की चीज़ें चोरी की नहीं हैं।

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रितु वहीं मिली।

“साउंड वाले का भुगतान देखा,” उसने कहा।

कबीर ने सिर उठाया।

“क्या?”

“छह हजार।”

फंड कम होने की घोषणा से पहले देव ने साउंड टेक्नीशियन को नकद भुगतान किया था। उसकी रसीद कॉलेज दफ्तर में पहुँच चुकी थी।

फिर उसी खर्च को बकाया भुगतान की सूची में दोबारा जोड़ दिया।

रितु ने फर्क पूछा था।

उसने हिसाब की उलझन बताई।

“लॉकर खुलवाने से पहले मुझे जाँचना चाहिए था,” रितु बोली।

कबीर खड़ा हो गया।

“हाँ।”

उसने बहस नहीं की।

* * *

कॉलेज ने पुष्टि की कि कबीर पर आरोप का कोई आधार नहीं था।

देव को अनुशासन संबंधी चेतावनी मिली। सही हिसाब दर्ज हुआ।

कबीर को ईमेल मिला।

तीन वाक्य।

हॉस्टल के उस समूह में कोई संदेश नहीं गया जहाँ पूरे हफ्ते उसकी चर्चा हुई थी।

उसने भेजने को कहा।

वार्डन बोले कि मामला शांत हो जाने देना बेहतर है।

“मेरे ऊपर आकर शांत हुआ है,” कबीर ने कहा।

वार्डन ने कहा, अब सुलझने के बाद मुश्किल मत खड़ी करो।

दोपहर को कांता कैंटीन के बाहर एप्रन तह करती मिलीं।

सूद ने अगले महीने की ड्यूटी सूची से उनका नाम हटा दिया था।

“क्यों?”

“निजी काम। अनुशासन। जो शब्द चाहिए।”

“आप दफ्तर आईं, इसलिए?”

उन्होंने उत्तर नहीं दिया।

अंदर दूसरी औरत सीख रही थी कि चायपत्ती कहाँ रहती है।

कबीर ने कपड़े का थैला देखा।

उसमें काम का हिसाब, स्टील का गिलास और दबा हुआ टिफिन था।

“मैं उस पर आपसे चिल्लाया था।”

“हाँ।”

“बताया नहीं क्या हुआ।”

“वीडियो देखा था।”

उसका चेहरा गर्म हो गया।

“नहीं चाहता था आपको पता चले।”

“मेरा डिब्बा है। दिखना ही था।”

उन्होंने थैला दूसरे हाथ में लिया।

“चलो। और खड़े रहे तो किराया माँगने लगेगा।”

* * *

पूर्व छात्र सप्ताहांत हुआ।

उसका एक हिस्सा प्रायोजित तीन पत्ती आयोजन था। प्रतिभागी वयस्क थे—इक्कीस साल या उससे ज्यादा उम्र के वर्तमान विद्यार्थी, पूर्व विद्यार्थी और कर्मचारी। प्रवेश शुल्क नहीं था। स्थानीय हॉस्पिटैलिटी कारोबार ने निश्चित नकद पुरस्कार रखा था।

टिफिन की घटना से पहले कबीर ने नाम लिखाया था।

लगभग वापस ले लिया।

देव मेहमानों की व्यवस्था में मदद कर रहा था। मुकाबले के अलग अधिकारी थे।

कबीर ने हटने की बात की तो रितु बोली, “मैं होती तो नहीं हटती।”

“क्योंकि तुम्हें अपराधबोध है?”

“हाँ। लेकिन सिर्फ इसलिए नहीं।”

कबीर नहीं चाहता था कि सहानुभूति भी किसी और के उसके लिए फैसला करने की वजह बने।

उसने नाम रहने दिया।

बड़े चचेरे भाई नीरज ने पारिवारिक मिलन में खेल सिखाया था। दोनों अक्सर बात करते थे, आम तौर पर काम से लौटते हुए।

कबीर ने सब बताया तो नीरज बिना टोके सुनता रहा।

फिर पूछा, “खेलना चाहते हो?”

कबीर ने सोचा।

“हाँ।”

“तो खेलो। पूरी जिंदगी मेज़ पर हल नहीं करनी है।”

* * *

कांता ने किराने की दुकान के पीछे साझा रसोई से छोटे ऑर्डर लेने शुरू किए थे।

दिन के हिसाब से किराया था। फ्रिज दुकानदार का था। कोई और पहले बुक कर ले तो समय बदलना पड़ता।

कबीर शिफ्टों के बीच मदद करता।

वह उसे भुगतान करतीं।

एक बार मना करने की कोशिश की।

“तो कल नहीं आना,” उन्होंने कहा।

दोनों ने छोटा मेन्यू बनाया। तीस पकवान नहीं। छह चीज़ें जिन्हें वह एक जैसी अच्छी बना सकें और कबीर लागत ठीक से निकाल सके।

मुकाबले से पहले की रात उन्होंने उसका खाना प्लास्टिक के डिब्बे में दिया।

“स्टील वाला कहाँ है?”

“घर पर।”

“दूसरा ला सकता हूँ।”

“पहले अपने जूते लो।”

उसने नीचे देखा।

उन्होंने तलवा देख लिया था।

देखना ही था।

उस रात नींद खराब आई। एक सपने में वह अंतिम मेज़ पर पत्तों की जगह थालियाँ लेकर पहुँचा।

अलार्म से पहले जागा। हॉस्टल की सुबह की आवाज़ें आने तक लेटा रहा।

दरवाज़े। बाल्टियाँ। कोई तौलिया माँग रहा था।

आगे कुछ भी हो, दिन अपनी तरह शुरू हुआ था।

* * *

रजिस्ट्रेशन पर देव मिल गया।

“अब भी खेल रहे हो?”

कबीर ने अधिकारी को पहचान पत्र दिया।

देव ने उसके दूसरी तरफ मुड़ने तक इंतज़ार किया।

“दूसरों के पैसों से सावधान रहना।”

कबीर ने देखा।

“ऐसे बोलो कि इन्हें सुनाई दे।”

देव ने डेस्क की तरफ देखा।

“कहा सावधान रहना।”

“फिर ठीक है।”

कबीर ने बैज लिया।

उसे लगा था जवाब देने के बाद अच्छा महसूस होगा।

इसके बजाय जी मिचलाया।

शरीर अब भी हर कमरे में किसी के हँसने की उम्मीद करता था।

पहला सत्र खराब गया।

वह खुद पर गुस्सा हुआ, फिर गुस्सा होने पर शर्म आई।

ब्रेक में बाहर जाकर प्लास्टिक का डिब्बा खोला।

कांता ने नींबू अलग रखा था।

उसने धीरे-धीरे खाया।

रितु कुछ कदम दूर रुकी। पूछा, साथ बैठना है?

“नहीं।”

“ठीक है।”

वह चली गई।

किसी ने एक बार बिना समझाए उत्तर मान लिया कि उसे क्या महसूस करना चाहिए।

कबीर अंदर लौटा।

* * *

दिन आसान नहीं हो गया।

एक करीबी दौर हारा। सँभला। सेवानिवृत्त शिक्षक एक सत्र में उससे आगे रहे, दूसरे में पीछे।

प्रारूप पहले समझा दिया गया था। कबीर सत्रों के बीच अंक देखता रहा और हर नतीजे को अपने पूरे अस्तित्व का फैसला बनाना रोकने की कोशिश करता रहा।

देर दोपहर तक अंतिम चरण में जगह बन गई।

नीरज का वॉइस मैसेज आया।

कबीर ने ब्रेक तक नहीं सुना।

पीछे बस का शोर था।

“कुछ भी हो, बैग मत भूलना। घबराते हो तो कुछ न कुछ छोड़ आते हो।”

कबीर हँसा।

कोई उसे पिछले दो हफ्तों के अलावा किसी और बात के लिए जानता था, यह अच्छा लगा।

देव उसकी मेज़ पर आना बंद कर चुका था।

दूसरी तरफ वह फोटोग्राफर से बात करता दिखा।

वही जिसने हॉस्टल की कुछ मौज-मस्ती रिकॉर्ड की थी।

कबीर ने फोन रख दिया।

आखिरी चरण में चार खिलाड़ी थे।

एक सहपाठी था। बाकी पूर्व विद्यार्थी। किसी पर उसका उधार नहीं था। उसकी कहानी ठीक से खत्म हो, इसलिए किसी को हारना जरूरी नहीं था।

पिछले दिनों के कमरों से यह मुकाबला ज्यादा साफ लगा।

देर तक पीछे रहा।

फिर दो नतीजों से इतना पास आ गया कि अब जीत संभव थी।

आखिरी तय हाथ पूरा हुआ तो अंक जाँचने का इंतज़ार किया।

सहपाठी मेज़ का किनारा पकड़े था।

एक पूर्व विद्यार्थी पीछे झुककर आँखें बंद किए बैठा था।

कबीर ने दोनों पैर जमीन पर रखे।

विजेता का नाम पुकारा गया।

उसका।

एक पल सिर्फ छत का पंखा सुनाई दिया।

देव के कमरे वाला नहीं।

यह खटखटा नहीं रहा था।

* * *

पुरस्कार एक लाख रुपये था।

अगले कुछ महीने बदलने के लिए काफी।

पिछला सब मिटाने के लिए नहीं।

मंच पर निदेशक ने हाथ मिलाया और लगन की बात की।

फोटोग्राफर ने छात्र आयोजकों को साथ आने को कहा।

देव आगे बढ़ा।

कबीर ने ट्रॉफी दूसरे हाथ में ली।

“तस्वीर से पहले एक बात ठीक करवानी है।”

निदेशक की मुस्कान तन गई।

“अभी समय नहीं है।”

“कॉलेज ने आयोजन के पैसे चुराने के आरोप से मुझे साफ किया है। यहाँ ज्यादातर लोगों को बताया नहीं गया।”

कुछ लोग देव की तरफ मुड़े।

माइक हटे, उससे पहले कबीर आगे बोला।

“हॉस्टल का भुगतान अपने काम के पैसों से किया था। कांता ने असली काम के पैसे दिए। समझाने आईं तो उसके बाद कैंटीन की शिफ्टें चली गईं।”

सूद पीछे खड़ा था।

निदेशक कहने लगे कि नौकरी का मामला अलग है।

“हो सकता है,” कबीर बोला। “लेकिन वे काल्पनिक इंसान नहीं हैं जिन्हें कहानी से निकाल दें।”

उसने ट्रॉफी प्रस्तुति वाली मेज़ पर रख दी।

“सुधार होने के बाद ले लूँगा।”

कुछ पल कोई नहीं हिला।

फिर रितु आगे आई।

“मेरे पास साफ किया हुआ हिसाब और कॉलेज का ईमेल है।”

देव ने कहा, गलती का नाटक मत बनाओ।

रितु निदेशक की ओर मुड़ी।

“समूह में पहले ही सुधार भेजना चाहिए था। हमारी जिम्मेदारी थी।”

निदेशक ने कागज़ माँगे।

इस बार इतने लोग देख रहे थे कि बात दफ्तर में जाकर गायब नहीं हो सकती थी।

* * *

अंतिम सामूहिक तस्वीर से पहले सुधार पढ़ा गया।

छात्र समूह में भी भेजा गया। सप्ताहांत की रिपोर्ट में भी जोड़ा गया।

देव कबीर के पास नहीं खड़ा हुआ।

कांता की नौकरी संबंधी शिकायत में अधिक समय लगा। कबीर ने रिकॉर्ड जमा कराने में मदद की। उसने यह दिखावा नहीं किया कि जीत से किसी और का अनुबंध निपटाने का अधिकार मिल गया।

जाँच के दौरान सूद ने दोबारा शिफ्टें देने की बात की।

कांता ने लिखित शर्तें माँगीं।

इस बीच साझा रसोई के ऑर्डर बढ़े।

पुरस्कार का भुगतान आया तो कबीर ने जूते खरीदे।

फिर हॉस्टल का बाकी बकाया चुकाया।

बचे पैसों से दोनों ने बस अड्डे के पास छोटा काउंटर किराए पर लेने की बात की। कांता के पास ग्राहक थे। उसके पास लागत की शीट और शाम के घंटे। लापरवाही के लिए दोनों के पास पैसे नहीं थे।

तय किया किसका क्या योगदान होगा।

उन्होंने लिखने को कहा।

“आंटी, हम ही तो हैं।”

“हाँ,” वह बोलीं। “इसीलिए साफ समझना चाहिए।”

* * *

पहला नियमित ऑर्डर पास के दफ्तर से आया।

बीस खाने।

पहली सुबह डिलीवरी वाला जल्दी आ गया, चावल देर से बने और लेबल लिखने का मार्कर कबीर से चूल्हे के पीछे गिर गया।

कांता ने उसे कोसा।

उसने मार्कर को।

खाना समय पर निकल गया।

काउंटर अपना खर्च निकालने लगा।

कबीर कॉलेज में रहा। रेस्तराँ की शिफ्टें भी करता रहा। कुछ शाम इतना थकता कि लगता ही नहीं कभी कुछ जीता था।

फिर अगली सुबह के लिखे ऑर्डर देखता।

वे आँकड़े उस काम के थे जो सचमुच किया था।

एक दोपहर देव दो सहपाठियों के साथ आया।

मेन्यू देखा।

“फेयरवेल के लिए खाना चाहिए।”

“कितने लोग?” कबीर ने पूछा।

उसने संख्या बताई।

कबीर ने कोटेशन बनाया।

“स्टूडेंट डिस्काउंट?”

“रेट शीट पर हैं।”

देव ने पढ़ा।

फिर मुस्कराने की कोशिश की।

“अरे, एक ही हॉस्टल के हैं।”

पीछे कांता डिब्बा बंद कर रही थीं।

ढक्कन बैठने की क्लिक सुनाई दी।

“भुगतान की शर्तें भी वहीं हैं,” कबीर ने कहा।

देव ने कागज़ लिया।

उस दिन ऑर्डर नहीं दिया।

किसी और ने दे दिया।

* * *

टर्म के आखिरी दिन कांता पुराना स्टील का टिफिन काउंटर पर लाईं।

किनारा सीधा था। छोटा डिब्बा साफ था।

“ठीक करने वाला मिल गया।”

कबीर ने हाथ में घुमाया।

“नया ले सकती थीं।”

“तुम भी।”

वह मुस्कराया।

उन्होंने चावल, आलू और बीन्स भरे। नींबू अलग रखा।

बाहर बस अड्डे के पास दोपहर का यातायात बढ़ने लगा था।

कबीर टिफिन लेकर शटर के पास पतली बेंच की ओर गया।

बैठने से पहले कांता ने बुलाया।

“चम्मच भूल गए।”

उसने उनसे चम्मच लिया।

फिर खाना गर्म रहते हुए खाया।

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