लिफाफे का नाम देखने से पहले प्रणव ने नंदिता की लिखावट पहचान ली।
वह अब भी सात के बीच लकीर खींचती थी।
एक मूर्ख क्षण के लिए इतना काफी था। पूरी सुबह उम्मीद के हिसाब से फिर व्यवस्थित होने लगी।
फिर उसने लिफाफा पलटा और पंजीकरण वाले स्वयंसेवक को दिया।
“अभय राव। खिलाड़ी की जानकारी वाला पैकेट।”
स्वयंसेवक ने फोल्डर निकाला।
नंदिता ने भीतर देखा, बाँह के नीचे दबाया और आखिर पानी की मशीन के पास खड़े प्रणव को देखा।
मुस्कान गरमजोशी वाली थी।
प्रणव का पेट ठंडा पड़ गया।
“जल्दी आ गए,” उसने कहा।
वह चालीस मिनट जल्दी आया था क्योंकि नंदिता ने बताया था कि वहाँ होगी।
* * *
फाइनल से दो रात पहले संदेश आया था।
रविवार को आयोजन में रहूँगी। बात कर सकते हैं?
प्रणव ने शादी वाले हॉल में माइक और तार बक्सों में भरने के बाद पढ़ा।
आठ महीने से अधिकतर बातचीत अलमारियों में बची चीजों और उस साझा सदस्यता की थी जिसे दोनों रद्द करना भूल गए थे।
इस संदेश में सामान नहीं था।
उसने समय पूछा।
कहा, पहले सत्र से पहले ढूँढ़ लेगी।
एक मिनट बाद लिखा: बाहर की चाय की दुकान अब भी है? तुमसे बात करना याद आता है।
प्रणव उपकरण के बक्से पर बैठा रहा। हॉल मैनेजर ने पूछा कि वहीं सोने का इरादा है?
इकतीस साल की उम्र में जानता था कि संदेश के कई अर्थ हो सकते हैं।
जो चाहता था, चुन लिया।
कमीज दो बार प्रेस की। शनिवार को वह साबुन खरीदा जो नंदिता को पसंद था।
रविवार को शीशे में ऐसे भाव का अभ्यास किया जिससे लगे कि खुश है, इंतजार में नहीं था।
आयोजन में उसे दूसरे खिलाड़ी का पैकेट लेते देखा।
उसके देखने से पहले अभ्यास वाला चेहरा गायब हो गया।
* * *
नंदिता के प्रवेश कार्ड पर मीडिया कोऑर्डिनेटर लिखा था।
प्रणव जरूरत से ज्यादा देर देखता रहा।
“काम कर रही हो, नहीं पता था।”
“पिछले महीने एजेंसी से जुड़ी।”
“अभय के साथ?”
“उसकी टीम ने हमारा पैकेज लिया है।”
आसानी से कहा। उसके लिए सामान्य जानकारी थी।
प्रणव ने दो रात माफी की कल्पना में बिताई थीं। या यह सुनने में कि चुप्पी उसके लिए भी असहनीय हो गई।
नंदिता ने चाय पूछी।
हॉल के बाहर खड़े रहे। दुकानदार गिलास धो रहा था।
उसे याद था प्रणव कैसी चाय पीता है।
प्रणव चाहता था कि याद न होता।
“किस बारे में बात करनी थी?”
“फाइनल। तुम। कैसे रहे।”
“किस क्रम में?”
वह मुस्कराई। उम्मीद थी प्रणव भी मुस्कराएगा।
नहीं मुस्कराया तो प्रवेश की तरफ देखा।
“असहज मत बनाओ।”
आखिरी महीनों का वाक्य याद था। तब आता जब प्रणव ऐसी बात पूछता जिसे बिना बताए समझ लेने की उम्मीद थी।
* * *
वह छोटे आयोजनों में आवाज सँभालकर कमाता था।
एक बार अभ्यास के समय नंदिता कंट्रोल की मेज के पास बैठी थी। कागज में मूँगफली खा रही थी।
पूछा था कि पूरी प्रस्तुति के बजाय अलग आवाजें क्यों सुनता है?
“गलती ढूँढ़ने के लिए।”
“अकेला काम लगता है।”
“नहीं, जब कोई खाली माइक के पास खाता रहे।”
वह भरे मुँह हँसी थी।
अच्छे साल भी थे।
अलग हुए तो थकान में दोनों का हिस्सा था। प्रणव बहुत सप्ताहांत काम करता और स्थिरता देना कहता।
नंदिता योजनाएँ चाहती। वह कम व्यस्त महीने के वादे देता।
वास्तविक बातों की माफी माँगी थी।
फिर धीरे-धीरे पूरे अंत को अपनी जिम्मेदारी मानने लगा। यह मानने से आसान था कि असफलता समझ लेने से दूसरा मौका पक्का नहीं होता।
साथ रहते ही ताश प्रतियोगिताओं में जाना शुरू किया था।
तीन पत्ती काम से बाहर वयस्क दोस्तों के साथ पसंद की चीज थी। मुकाबले से सप्ताहांत का अपना आकार बना।
नंदिता गई तो हर अच्छे नतीजे पर कल्पना करने लगा कि उसे कैसे पता चलेगा।
जितना मानना चाहता था, उससे ज्यादा दूर यह आदत साथ आई।
* * *
चाय की दुकान पर नंदिता ने कॉपी खोली।
“सत्र खराब हो तो क्या होता है?” पूछा।
प्रणव पन्ने को देखता रहा।
“क्या?”
“थोड़ी निजी कहानी वाली सामग्री बना रही हूँ। अभय की प्रोफाइल है। प्रोडक्शन को दूसरे फाइनलिस्ट का भी अंदाजा चाहिए।”
“कहा था बात करना याद आता है।”
“आता है।”
“यह इंटरव्यू है?”
“बातचीत भी हो सकती है।”
“जो कहूँगा इस्तेमाल करोगी?”
वह रुकी।
“आखिरी रूप दिखा दूँगी।”
उसने गिलास रख दिया।
पहले ही पूछ चुकी थी कि आयोजन से पहले नींद कैसी आती है। गुस्से में अब भी चुप हो जाता है? गलती के बाद लौटना मुश्किल लगता है?
जिसने पूरा घर जाना हो, उससे आए सवाल अलग लगते हैं।
पहले दो के जवाब बिना सोचे दे दिए थे।
“इंटरव्यू की हाँ नहीं की।”
नंदिता ने कॉपी बंद की।
“पहले भरोसा करते थे।”
“पहले जानता था क्यों पूछ रही हो।”
दुकानदार ने पीछे खड़े ग्राहक के लिए दो नए गिलास रखे।
दोनों हट गए।
चाय किसी ने पूरी नहीं की।
प्रवेश की तरफ लौटे तो कैमरे की बैटरी लिए आदमी ने नंदिता को पुकारा।
“वही निजी कहानी हैं जिनका बताया था?”
उसने प्रणव की तरफ देखा।
“बाद में।”
आदमी चलता गया। चाय की दुकान पर क्या हुआ था, जानने की वजह नहीं थी।
प्रणव ने कॉपी फिर देखी। उसने कमीज चुनी थी। जल्दी आया था। उम्मीद कितनी कम दिखानी है, अभ्यास किया था।
उसके काम वाले दिन में कहीं इन सबका सुविधाजनक नाम पहले से था।
निजी कहानी।
गलत न समझने को कह सके, उससे पहले भीतर चला गया। गलियारे में धीमा हो गया क्योंकि किसी को दिखाना नहीं चाहता था कि भाग रहा है।
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* * *
अंदर अभय ने अभिवादन किया।
प्रणव ने खुद को तीखा जवाब देते सुना।
अभय चौंका।
“सब ठीक?”
“अपनी मीडिया टीम से पूछो।”
कुछ पल बीते।
फिर अभय बोला, “तुमसे पूछा।”
प्रणव ने उसे देखा।
चौंतीस साल का आदमी था। चौड़े कंधे। टूटे जिप वाला बैग।
पिछले पाँच मिनट से प्रणव जिस आदमी को बना रहा था, वैसा कुछ नहीं।
संदेश उसने नहीं लिखा था।
वापस साथ आने का वादा उसने नहीं किया था।
दूसरा फाइनलिस्ट था।
प्रणव बोला, “गलत तरह कहा। माफ करना।”
अभय ने सिर हिलाया।
“इंटरव्यू की परेशानी है तो समन्वयक को बताओ। खेल से पहले कोई तंग करे, मुझे नहीं चाहिए।”
फिर सीट देखने चला गया।
प्रणव सूचना बोर्ड के पास अकेला रहा।
जिससे चिढ़ना चाहते हो, उसका ठीक व्यवहार बहुत असुविधाजनक होता है।
असल समस्या के साथ छोड़ देता है।
* * *
पहला सत्र खराब गया।
तबाही नहीं। इतना खराब कि खुद से कही हर अपमानजनक बात की पुष्टि लगे।
नंदिता कैमरों के पीछे चली तो घोषणा का हिस्सा छूट गया।
अभय के कंधे की तरफ झुकते देखा तो जल्दी फैसला किया।
अगले हाथ में कल्पना करता रहा कि क्या कह रही होगी।
पत्तों से ज्यादा ध्यान कल्पना ने लिया।
विराम में फोन भर गया।
दोस्त ने पूछा कि नंदिता आई है?
दूसरे ने उसके प्रवेश कार्ड की तस्वीर और सवाल का निशान भेजा।
नंदिता ने लिखा: साफ बात कर लें। खेल पर असर मत आने दो।
जवाब देना चाहता था कि असर पहले ही आ चुका है।
फिर पूछना चाहता था कि चाय की दुकान वाले संदेश में कुछ भी सच्चा था?
फिर कहना चाहता था कि कभी परवाह नहीं थी।
तीनों जवाब दिमाग में बहस कर रहे थे। कौन चोट पहुँचाएगा? कौन वापस लाएगा?
इस बीच अगला सत्र पास आ रहा था।
* * *
जुबिन उसे खाली बगल वाले कमरे में मिला।
दोनों सालों से आयोजनों में काम करते थे। जुबिन प्रसारण की आवाज देख रहा था। अतिरिक्त तार लेने आया था।
प्रणव प्लास्टिक की कुर्सी पर दोनों हाथों में फोन लिए बैठा था।
“आज खेल रहे हो?” जुबिन ने पूछा।
“क्या लग रहा है?”
“स्क्रीन पर बहस जीतना चाहते हो।”
प्रणव बिना खुशी हँसा।
जुबिन ने पूरा किस्सा नहीं पूछा। तार का जोड़ देखा। ध्यान से लपेटा। इंतजार किया।
“उसके लिए आई,” प्रणव बोला।
“काम के लिए?”
“हाँ।”
“तो ऐसे क्यों कहा?”
सवाल सही था। इसलिए चुभा।
प्रणव ने संदेश, कॉपी और निजी सवाल बताए।
“वह हिस्सा गलत लगता है,” जुबिन बोला। “उसका क्या करोगे?”
“पता नहीं।”
“तो तय करो अगले दस मिनट क्या नहीं करोगे।”
प्रणव ने फोन की स्क्रीन बुझती देखी। फिर अंगूठे से जगा दी। इतनी छोटी हरकत कई बार कर चुका था कि खुद से छिपी रही थी।
* * *
उसने एक संदेश लिखा।
इस बातचीत को किसी प्रोफाइल या प्रचार में इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं है। आयोजन के बाद सामान लौटाने पर बात कर सकते हैं। खेल के समय उपलब्ध नहीं हूँ।
नंदिता को भेजा। अलग से आयोजन के मीडिया समन्वयक को बताया कि इंटरव्यू स्वीकार नहीं किया था।
समन्वयक ने बात दर्ज की।
नंदिता ने जवाब दिया कि इस्तेमाल नहीं करेगी।
एक बार पढ़ा।
फिर निजी चैट शांत कीं। सूचनाओं में संदेश दिखना बंद किया। फोन बैग में रखा।
दूसरा आदमी नहीं बन गया।
अब भी जानना चाहता था कि नंदिता को कुछ पछतावा है?
सवालों की सहज निकटता पर अब भी गुस्सा था।
लेकिन भावनाएँ हर कुछ मिनट रोशनी और आवाज के साथ नहीं आ रही थीं।
तारों से भरे हाथ लिए जुबिन ने दरवाजा पकड़ा।
प्रणव उठा।
“अच्छा खेलना,” जुबिन बोला।
इस बार कोई और उपयोगी बात नहीं जोड़ी।
इतना काफी था।
* * *
अगला सत्र हारे हुए हाथ से शुरू हुआ।
पुराना चक्र आने की उम्मीद थी। हार से बुद्धि का फैसला होता। फिर मूल्य का। फिर वजह बनती कि नंदिता क्यों गई।
इसके बजाय कलाई के नीचे मेज थोड़ी चिपचिपी लगी।
अधिकारी से पूछा कि विराम में पोंछ सकते हैं?
पोंछ दी गई।
दुनिया फिर इतनी सामान्य हुई कि उसमें लौट सके।
अगली घोषणा सुनी। खेल देखा। अच्छा फैसला किया। फिर ऐसा जिसे बाद में जाँचता।
दूसरी तरफ नंदिता काम करती रही।
कभी दिखती।
हर हरकत को संदेश बनाना जरूरी नहीं था।
सत्र खत्म होने तक अंतिम चरण में पहुँचने लायक वापसी हुई।
नतीजा देखा। पानी पिया।
स्वयंसेवक ने चाय पूछी।
“नहीं, धन्यवाद।”
इनकार का बाहर की दुकान या पसंद याद रखने वाली महिला से संबंध नहीं था।
और चाय नहीं चाहिए थी।
यह छोटी बात अच्छी लगी।
* * *
आखिरी चरण शुरू हुआ तो अभय आगे था।
दूसरे दावेदार भी थे। कुछ देर कमरा सबका रहा। उस निजी नाटक का नहीं जिसे प्रणव साथ लाया था।
मुकाबले का आनंद आने लगा।
सुधरती स्थिति से ज्यादा इससे आश्चर्य हुआ।
आदत हो गई थी मानने की कि कुछ साबित करने के बाद आनंद की अनुमति मिलेगी।
अब अनिश्चितता के बीच आया। अभी हार सकता था।
अभय कठिन खिलाड़ी था। कम संकेत देता। चुभाने वाली बातें करके विराम नहीं भरता।
प्रणव को अच्छा लगा।
अंत के पास स्थान करीब हुए। दूसरी मेज के नतीजे से क्रम बदला।
अधिकारी ने आखिरी क्रम बताने से पहले हिसाब देखा।
प्रणव पीछे टिका।
जीतने पर नंदिता जो वाक्य सुनेगी, वह नहीं बना रहा था।
सामने कहा जाने वाला सुन रहा था।
खेल खत्म हुआ तो पुष्टि असल से ज्यादा लंबी लगी।
फिर नाम पुकारा गया।
पहला।
* * *
पहले कुछ सेकंड कुछ नहीं किया।
अभय ने मेज के पार हाथ बढ़ाया।
“अच्छा अंत।”
प्रणव ने हाथ लिया।
“धन्यवाद।”
तालियाँ सुनीं। आवाज वाली मेज के पास जुबिन दोनों बाँहें उठाए था। एक में अब भी तार का गोला था।
फिर अनिवार्य रूप से नंदिता को ढूँढ़ा।
कैमरा ऑपरेटर के पास थी।
मुस्कराई।
सीना कस गया।
आदत नतीजे के बाद भी बची थी।
मुस्कान को वादा बनाए बिना गुजरने दिया।
तस्वीर में पुरस्कार उल्टा पकड़ा। फोटोग्राफर ने सुधारा तो हँस पड़ा।
थकी, राहत वाली हँसी थी। बहुत सम्मानजनक नहीं।
किसी को उसका मतलब महिला वापस जीतना बनाने की जरूरत नहीं थी।
वह लगभग पूरा दिन खुद की बनाई कहानी से बहस में खो देता। उसके बाद ताश आयोजन जीता था।
इतना पर्याप्त जटिल था।
* * *
औपचारिक तस्वीरों के बाद नंदिता आई।
“पता था कर सकते हो।”
प्रणव ने धन्यवाद कहा।
“पुराने फ्लैट की छोटी मेज याद है? हर हाथ समझाते थे। मुझे सुनना पड़ता था।”
“हाँ।”
“खुश थे तब।”
“कभी-कभी।”
वह इस जोड़ से आहत लगी।
प्रणव ने बाकी नहीं जोड़ा। थके भी थे। अधीर भी। छोटी तरह से एक-दूसरे के प्रति खराब भी।
गलियारे को रिश्ते की दूसरी सुनवाई नहीं बनाना चाहता था।
नंदिता बोली कि एजेंसी उसकी यात्रा पर अच्छा फीचर बना सकती है। साझा इतिहास निजीपन देगा। दूसरे इंटरव्यू में नहीं मिलेगा।
उसने हाथ की कॉपी देखी।
दोपहर एक पल के लिए दर्दनाक ढंग से साफ हुई।
शायद नंदिता उसे याद करती थी। शायद अच्छी कहानी भी चाहती थी।
दोनों सच हो सकते थे। तब भी उसे मना करने का अधिकार था।
“रिश्ता इस्तेमाल नहीं करना।”
“नकारात्मक जरूरी नहीं।”
“शर्त वह नहीं है।”
उसने बैग में हाथ डाला।
* * *
चाबी छोटे लिफाफे में थी।
नंदिता के फ्लैट की अतिरिक्त चाबी। साथ रहते समय दी थी। सामान ले जाने की आखिरी बातचीत के बाद उसकी मेज में छोड़ गई थी।
महीनों पहले लौटानी चाहिए थी।
न लौटाने की वजहें मिलती रहीं।
एक बार उसकी छूटी किताब के साथ थैले में रखी। किताब भेजने से पहले निकाल ली।
किताब सहकर्मी के हाथ लौट सकती थी। चाबी में मुलाकात जरूरी लगती थी। मुलाकात कुछ और बन सकती थी।
अपनी छोटी बेईमानी अब समझ आ रही थी।
व्यावहारिक मौका नहीं ढूँढ़ रहा था। बहाना बचा रहा था।
महीनों दराज में एक संभावित बातचीत रखी थी। उस सुबह लिफाफा निकालना आखिर उसकी तैयारी लगा था।
अब सामने खड़े होकर पता चला कि कुछ लौटाने के लिए दूसरे से बदले में कुछ मिलना जरूरी नहीं।
उसने लिफाफे का मुड़ा कोना सीधा किया। चाबी भीतर हल्की हिली। आवाज इतनी साधारण थी कि उसे खुद की लंबी कल्पना पर शर्म और राहत साथ हुई।
नंदिता ने आयोजन में आने को कहा तो बैग में रखी। खुद से कहा, देखकर तय करेगा क्या करना है।
अब हाथ में दे दी।
“बहुत देर रखी।”
नंदिता ने भीतर देखा।
चाबी की छोटी नीली मछली वाली चेन एक तरफ से घिसी थी।
उसने अँगूठा फेरा।
“यह माँगने नहीं आई।”
“पता है।”
उस दिन पहली बार ये शब्द बिना उम्मीद को जानकारी बनाए कहे थे।
लौटाने में देर की माफी माँगी।
बाकी जवाब की नहीं।
उसने लिफाफा बैग में रख लिया।
फिर काम पर लौट गई।
* * *
इंटरव्यू में पूछा गया कि किसे गलत साबित करना चाहता था?
ललचाने वाला सवाल था।
साफ कहानी दे सकता था। अलगाव। अपमान। सही रोशनी में उठी ट्रॉफी।
नंदिता को हर चीज की वजह बना सकता था। उस काम की भी जो मिलने से पहले किया था।
इसके बजाय बोला, “पूरा दिन ठीक खेलना चाहता था। लगभग नहीं खेल पाया।”
पूछा कि क्या बदला?
“सार्वजनिक आयोजन में निजी बातचीत करने की कोशिश बंद की।”
थोड़ी चुप्पी हुई।
फिर अंतिम सत्र पूछा गया।
प्रणव ने दिलचस्पी से जवाब दिया।
कठिन बीच की बात की। जल्दी किए फैसलों की। दूसरे फाइनलिस्ट के लिए सम्मान की।
ड्यूटी सँभालने वालों का धन्यवाद किया। उस दोस्त का भी जिसने अगले सत्र से पहले बगल वाले कमरे से निकाला।
हेडफोन पर सुनते जुबिन ने मुँह बनाया।
प्रणव फिर लगभग हँस दिया।
प्रेम जीवन से खलनायक माँगे बिना इंटरव्यू चलता रहा।
* * *
घर पर पुरस्कार उस स्पीकर के पास रखा जिसे ठीक करना बाकी था।
कमरा बदला हुआ नहीं लगा।
सिंक में बर्तन थे। काम की कमीज धोनी थी। ऊपर कोई पूरी मेहनत से कुर्सी घसीट रहा था।
फोन खोला।
बधाइयाँ थीं। तस्वीरें थीं। नंदिता का एक संदेश था।
सुबह के सवालों के लिए माफी। मिलने को कहने से पहले बताना चाहिए था कि किस काम पर हूँ।
दो बार पढ़ा।
फिर लिखा: कहने के लिए धन्यवाद।
यह नहीं पूछा कि याद आने का क्या मतलब था।
उस रात जवाब जरूरी नहीं था।
अगली सुबह चाबी वाला दराज खाली किया।
पुरानी बैटरी, पेंच का पैकेट और तार बाँधने वाली दो पट्टियाँ थीं। सही डिब्बों में रखीं।
फिर काम पर गया।
अभ्यास में माइक से कड़ी आवाज फूटी। प्रणव ने सही चैनल ढूँढ़ा। कम किया। बोलने वाले से फिर कहने को कहा।
आवाज साफ आई।
उसने सुना।
कार्यक्रम शुरू होने वाला था।