शकुंतला के बेटे ने उन्हें दो सौ रुपये दिए और कहा, बची हुई रकम वापस दे देना।
उन्होंने दोनों नोट देखे।
“किताब दो सौ अस्सी की है।”
“तो दूसरी ले लो।”
“यही मँगवाई थी मैंने।”
महेश ने साँस छोड़ी। फिर अपनी पत्नी की तरफ देखा और सौ का एक नोट और निकाल दिया। जैसे उसकी सहनशीलता का कोई दर्शक बैठा हो।
“इस बार खो मत देना।”
पिछली बार भी पैसे खोए नहीं थे।
शकुंतला ने फल खरीदे थे। पड़ोस की महिला उनकी दवा ले आई थी, उसे पैसे लौटाए थे। दोनों खर्च उनकी कुर्सी के पास रखी छोटी कॉपी में लिखे थे।
बहत्तर की उम्र में कभी किसी का नाम याद आने में देर होती थी। जल्दी-जल्दी सवाल पूछे जाएँ तो झुँझलाहट होती थी। डाक विभाग में तीस साल तक खातों की जाँच भी उन्होंने ही की थी।
महेश को आजकल पहली बात याद रहती थी।
पच्चीस साल की पोती मिली ने पूछा कि क्या वह किताब की दुकान तक साथ चले।
शकुंतला ने थैला उठाया और धीरे से खड़ी हुईं।
दरवाजे तक पहुँचते-पहुँचते बेटे ने फिर कहा, “छुट्टे सँभालकर लाना।”
उन्होंने बिना मुड़े जवाब दिया, “पहली बार सुन लिया था।”
* * *
यह सिलसिला पिछली सर्दियों में शुरू हुआ था।
उन दिनों शकुंतला की तबीयत ढीली रहती थी। एक बिल भरने की तारीख निकल गई। उन्होंने महेश से कहा था कि कुछ दिन बिलों में मदद कर दे।
उसने बिल भरे।
फिर बैंक का कार्ड अपने पास रख लिया। कहा, कहीं रखकर भूल जाओगी।
फिर उनके हिस्से के जवाब भी देने लगा।
बैंक में बताता कि माँ को इतनी जानकारी से उलझन होती है। घर में कहता, अब उन्हें हिसाब देखने से थकान हो जाती है।
जब शकुंतला पूछतीं कि खाते में कितना पैसा है, जवाब मिलता, “आपकी जरूरत भर है।”
जरूरत क्या है, यह भी वही तय करता था।
पेंशन पहले की तरह आती थी। उससे कुछ खरीदना हो तो ऐसे समय माँगना पड़ता जब महेश काम में व्यस्त न हो, खाना खाकर चिड़चिड़ा न हो, या फोन पर किसी से नाराज न हो।
चश्मा बनवाना था। एक सहेली के जन्मदिन पर उपहार देना था। खुद मँगवाई हुई किताब लेनी थी।
छोटी-छोटी चीजें थीं। माँगते समय छोटी नहीं लगती थीं।
जन्मदिन की दोपहर एक पुराने सहकर्मी ने फूल भेजे। शकुंतला ने चश्मा लगा लिया था, फिर भी महेश ने कार्ड पढ़कर सुनाया।
कूरियर वाले ने दस्तखत के लिए कागज बढ़ाया तो महेश ने कलम ले ली।
“मैं कर देती हूँ,” शकुंतला ने कहा।
“हो गया, माँ।”
कागज लौट गया। आदमी चला गया। वह फूल पकड़े खड़ी रहीं और बेटा फूलदान ढूँढ़ने लगा।
रात को सविता ने उनकी रोटी के टुकड़े करके प्लेट में रख दिए।
शकुंतला ने प्लेट देखी। रोटी तोड़ने में उनके हाथों को कोई दिक्कत नहीं थी।
“कल आपने ठीक से खाया नहीं था,” सविता बोली।
कल दाल में नमक ज्यादा था। उन्होंने कहा भी था। जवाब मिला था कि उनकी जीभ का स्वाद बदल रहा होगा।
उन्होंने टुकड़े खा लिए।
रात में यही बात चुभती रही। इसलिए खा लिए थे कि एक और बहस की हिम्मत नहीं थी। नाराज होतीं तो नाराजगी भी उनके खिलाफ गिनी जाती।
धीरे-धीरे उन्होंने कम चीजें माँगनी शुरू कर दीं।
घर में इसे सब ठीक चलना कहा गया।
* * *
मिली पुस्तकालय में सहायक का काम करती थी।
बचपन से उसने दादी को रसीदें अलग-अलग लिफाफों में रखते देखा था। ऊपर महीना और खर्च लिखा रहता था।
जब महेश ने कहना शुरू किया कि माँ अब पैसे नहीं सँभाल सकतीं, मिली ने पहले मान लिया था। शायद पापा को कुछ ऐसा मालूम हो जो उसे नहीं मालूम।
फिर एक रविवार वह दादी के साथ वयस्कों की रमी बैठक में गई।
एक नतीजा लिखते समय दो अंक उलट गए थे। शकुंतला ने पूछकर बात समझी और गलती बता दी। दूसरे खिलाड़ियों ने जाँच की। लिखने वाले ने माफी माँगकर अंक ठीक कर दिए।
वापसी में दादी अपना चश्मा ढूँढ़ने लगीं।
वह उनके थैले में था।
मिली के लिए दोनों बातें सच थीं। अच्छा खेल लेना हर सवाल का जवाब नहीं था। थैले में चश्मा भूल जाना भी किसी की पूरी समझ का फैसला नहीं हो सकता था।
ऑटो में उसने पूछा, “दादी, आप किसी ऐसे व्यक्ति से बात करना चाहेंगी जो आपकी बात अलग से सुने? क्या बदला है, किस मदद की जरूरत है।”
शकुंतला बाहर देख रही थीं।
कुछ देर बाद बोलीं, “चाहती हूँ कोई मुझे बताने से पहले मुझसे पूछे।”
* * *
मुलाकात उनकी सहमति से तय हुई।
मिली ने समय लिख दिया और पूछा कि क्या वह अंदर भी साथ रहे।
“पहुँचा देना,” दादी ने कहा। “बात मुझे करने देना।”
उनसे मिलने वाले पेशेवर ने उनकी चिंताएँ सुनीं। जरूरी सवालों की जाँच हुई। न महेश की कही बात को अंतिम मान लिया गया, न रमी की जीत को कोई प्रमाण बनाया गया।
कुछ मदद काम की थी। तारीख लिख लेना। बड़े अक्षरों में जानकारी मिलना। सवाल समझने और जवाब देने के लिए थोड़ा समय मिलना।
मगर जाँच से परिवार का यह मान लेना सही नहीं निकला कि शकुंतला अपने पैसों से जुड़ा कोई निर्णय ही नहीं ले सकतीं।
उन्होंने नतीजा समझने के लिए सवाल किए। एक जवाब जल्दी दिया गया तो फिर से पूछ लिया।
मिली ज्यादातर समय बाहर बैठी रही।
निकलने के बाद दादी को चाय चाहिए थी।
“ठीक रहा?” मिली ने पूछा।
“उन्होंने मुझसे बात की।”
बस इतना कहा।
मिली को उन मौकों की याद आई जब उसने भी दादी की बात पूरी होने से पहले उनका जवाब दे दिया था।
* * *
अगली बार वे बैंक गईं।
शकुंतला ने खुद चुनी हुई सहायता के साथ खाते की व्यवस्था समझी। महेश बिलों में मदद कर रहा था। कार्ड उसके पास रहने से पेंशन उसकी नहीं हो गई थी।
बैंक वालों ने जरूरी जानकारी जाँची। बदलाव पूरे करने में एक से ज्यादा चक्कर लगे।
शकुंतला चाहती थीं कि खर्च खुद करें, जानकारी सीधे उन्हें मिले और मदद तभी ली जाए जब वह माँगें।
इंतजार से उन्हें चिढ़ हुई। साफ अक्षरों में छपा विवरण हाथ में आने पर उन्होंने वहीं बैठकर पढ़ना शुरू कर दिया।
मिली बोली, “कागज मैं सुरक्षित रख लूँ?”
दादी ने सिर हिलाया।
“एक अच्छा फोल्डर दिलवा दे।”
उन्होंने मजबूत बंद वाला फोल्डर खरीदा।
घर आकर शकुंतला ने उसे अपनी अलमारी में रखा।
मिली ने चाबी नहीं माँगी।
* * *
महेश को मुलाकातों का पता चला तो उसने मिली पर बरसना शुरू कर दिया।
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“एक बूढ़ी औरत को अपने ही परिवार से डरा दिया तुमने।”
शकुंतला उसी कमरे में बैठी थीं।
“मुझसे पूछ लो कि मैं डरी थी या नहीं।”
महेश उनकी तरफ घूमा।
“माँ, आपको पता नहीं ये क्या शुरू कर रही है।”
“मैंने मदद माँगी थी।”
“जिद तो आपकी हमेशा से है।”
शकुंतला को एक पल के लिए वही पुरानी इच्छा हुई। कुछ ऐसा कह दें कि बेटा सहज हो जाए। सर्दियों में उसने मदद की थी। वह मदद उन्हें याद थी।
लेकिन उसका शुक्रिया करते रहने से यह सवाल हल नहीं होता था कि खाते में कितना है, यह उसे मालूम था और उन्हें नहीं।
उन्होंने उससे खाते के विवरण और खर्चों की रसीदें माँगीं।
“अब मुझ पर इल्जाम लगा रही हैं?”
“हिसाब माँग रही हूँ।”
सविता ने कहा, सब शांत हो जाएँ तो बात कर लेंगे।
शकुंतला बोलीं, “शनिवार को ग्यारह बजे।”
महेश उठकर चला गया।
शुक्रवार शाम उन्होंने समय याद दिला दिया।
* * *
ज्यादातर खर्च शकुंतला पहचानती थीं।
तीन रकमों पर उन्होंने निशान लगाया।
दो हजार चार सौ रुपये की एक सदस्यता।
आठ हजार छह सौ रुपये महेश की कार के बीमे के।
पंद्रह हजार रुपये उसके खाते में भेजे गए थे। सामने मरम्मत लिखा था।
कुल छब्बीस हजार।
उन्होंने अनजान दिखने वाली हर रकम को गलत नहीं माना। जिन घरेलू खर्चों में हिस्सा देने के लिए हामी भरी थी, उन्हें अलग रखा।
मिली ने बड़े अक्षरों वाली प्रति बनवा दी।
सवाल शकुंतला ने खुद लिखे।
शनिवार से पहले सविता कमरे में आई तो रसीदें बिस्तर पर फैली थीं।
“मिली को इसमें मत पड़ने दीजिए,” उसने कहा।
शकुंतला ने चश्मा उतारा।
“तुम्हें बीमे के पैसे मालूम थे?”
“इन्होंने कहा था आपने दिए हैं।”
“मैंने नहीं दिए।”
सविता बैठ गई। इस बार उसने तुरंत महेश की तरफ से कुछ नहीं कहा।
थोड़ी देर बाद बोली, “वॉशिंग मशीन की मरम्मत सच में हुई थी।”
“मालूम है। उसकी रसीद यहाँ है।”
शकुंतला ने कागज आगे किया।
सविता रकम पढ़ती रही। शकुंतला इंतजार करती रहीं। वह चाहती थीं बहू समझे कि साझा घर पर सहमति से हुआ खर्च उन्हें गलत नहीं लगता।
उन्हें हर बार या तो कृतज्ञ माँ बनना पड़ता था या शक करने वाली बूढ़ी औरत।
सविता ने रसीद लौटा दी।
“ग्यारह बजे चाय बना दूँगी।”
“अपने लिए भी बनाना। हमारे साथ बैठना।”
* * *
शनिवार को महेश ने कहा कि कार उनके काम के लिए भी इस्तेमाल होती है।
शकुंतला ने पूछा, “इसलिए बीमे के पैसे मेरे खाते से देने की बात कब हुई?”
“घर में हर चीज का हिसाब थोड़े होता है।”
उन्होंने पास रखी कॉपी देखी। पिछली खरीदारी से लौटाए गए सत्तर रुपये उसमें लिखे थे।
उन सत्तर का हिसाब उससे छूटा नहीं था।
इस बार भी वह अपनी बात कहकर कुर्सी पीछे करने लगा।
“मरम्मत किस चीज की थी?” शकुंतला ने पूछा।
“इतने पुराने कागज अभी कहाँ से लाऊँ?”
“जब मिलें, ले आना। किस चीज की थी, वह तो बता दो।”
महेश ने सविता की तरफ देखा। वह चाय के कप उठाने के बजाय बैठी रही।
बात उस दिन पूरी नहीं हुई।
बाद में कुछ रसीदें मिलीं। उनसे मान्य घरेलू खर्च साफ हुए। तीनों सवाल फिर भी बचे रहे।
महेश ने और समय माँगा।
शकुंतला ने अगली तारीख तय की। कार्ड अपने पास रखा।
* * *
वह अचानक हर चीज में बेगलती नहीं हो गई थीं।
छोटे अक्षर पढ़ने के लिए मिली से मदद लेतीं। कैलेंडर पर तारीखें लिखतीं। एक बार बुधवार की बैठक मंगलवार को लिख दी और एक दिन पहले पहुँच गईं।
खाली कमरा देखकर खुद पर गुस्सा आया।
महेश को पता चला तो बोला, “मैं यही तो कहता हूँ।”
शकुंतला ने कैलेंडर देखा। तारीख ठीक की।
“इससे यही मालूम हुआ कि बुधवार की जगह मंगलवार लिखा था।”
शाम को नलिनी का फोन आया।
पुरानी सहेली थी। पहले किताब की चर्चा हुई। फिर स्थानीय रमी प्रतियोगिता की।
“नाम लिखाएँ?” नलिनी ने पूछा।
“समय बता।”
फिर शकुंतला ने फीस पूछी।
इतना खर्च कर सकती हैं या नहीं, इसका जवाब अब वह खुद दे सकती थीं।
* * *
प्रतियोगिता सामुदायिक भवन में थी।
अतिरिक्त पंखे किराए पर आए थे। पंजीकरण में दोपहर का खाना शामिल था। कार्यक्रम बड़े अक्षरों में छपा था, जिसे पढ़ने के लिए शकुंतला को कागज नाक के पास नहीं लाना पड़ा।
उन्होंने इसलिए नाम लिखाया क्योंकि खेल पसंद था।
मिली ने साथ चलने को पूछा।
“पहले दिन चलना। हर समय के लिए छुट्टी मत लेना।”
नलिनी और दूसरे वयस्क खिलाड़ियों के साथ अभ्यास हुआ।
कभी अच्छा खेलीं। कभी खराब।
एक कम उम्र के खिलाड़ी ने उनकी बार-बार हो रही गलती समझाई। पहले बुरा लगा। घर आकर पिछला विवरण देखा तो उसकी बात ठीक निकली।
अगली बैठक में उन्होंने उसे धन्यवाद दिया।
महेश ने कहा, “चलो, आपका मन लगा रहेगा।”
शकुंतला ने पूछा, “मरम्मत की रसीद मिली?”
“हर बात में वही शुरू कर देती हैं।”
उन्होंने फोल्डर बंद कर दिया। सवाल हटाया नहीं।
* * *
प्रतियोगिता से एक शाम पहले उन्होंने आरामदेह साड़ी निकाली।
महेश ने कहा कि सुबह छोड़ देगा।
उन्होंने धन्यवाद दिया और समय पूछा।
“सुबह देख लेंगे।”
“नौ बजे पहुँचना है।”
“अभी से परेशान मत होइए।”
शकुंतला ने नलिनी के साथ जाने का इंतजाम कर लिया।
सुबह महेश नीचे आया तो वे निकल चुकी थीं।
उसका संदेश आया कि इंतजार क्यों नहीं किया।
विराम में शकुंतला ने जवाब दिया, नौ बजे पहुँचना था।
फोन रखकर वह कमरे में लौट गईं।
पहला सत्र खराब गया।
जितनी शर्म महसूस हुई, उतनी उस नतीजे से होनी नहीं चाहिए थी। उन्हें समझ आया कि मन में कहीं वह यह प्रतियोगिता जीतकर घरवालों को अपनी समझ का प्रमाण देना चाह रही थीं।
उन्होंने पानी पिया।
जरूरी सवालों की अलग जाँच हो चुकी थी। यहाँ एक खेल चल रहा था।
हार जाने पर भी किताब खरीदने के लिए बेटे से अनुमति लेना जरूरी नहीं हो जाता।
* * *
अगले सत्र बेहतर रहे।
जहाँ जल्दबाजी कर रही थीं, वहाँ रुकीं। एक खराब नतीजे के बाद अगली पूरी बैठक उसी के बारे में सोचते हुए नहीं बिताई।
नलिनी पहले बाहर हो गई, मगर रुककर अनुमत हिस्से देखती रही।
मिली काम से पहुँची तो दोनों खाने की जगह पर बहस कर रही थीं।
नलिनी को पास की दुकान पसंद थी।
शकुंतला का कहना था कि वहाँ चाय खराब है।
“आज जीती नहीं हैं अभी,” नलिनी बोली। “अभी से हुक्म मत चलाइए।”
दोनों हँस पड़ीं।
अंतिम चरण में अलग-अलग उम्र और ढंग के खिलाड़ी थे। शकुंतला से बड़े भी। बहुत छोटे भी।
एक गलती उनसे फिर हुई। उन्होंने मानी और आगे खेलीं।
नतीजों की जाँच पूरी हुई तो उनका स्थान पहला था।
एक पल उन्होंने दरवाजे की तरफ देखा। जैसे महेश आएगा और बताएगा कि इसका मतलब क्या है।
फिर उन्हें अपनी आदत पर हँसी आ गई।
वह उठीं और पुरस्कार लिया।
मिली ने पूछकर तस्वीर खींची।
शकुंतला ने नलिनी को भी बुलाया। अकेली विजेता की तस्वीर से कौन जानता कि जगह ढूँढ़ने और समय पर पहुँचने में किसने साथ दिया था।
* * *
घर में बधाइयाँ मिलीं।
महेश किसी रिश्तेदार से फोन पर कह रहा था, “माँ को व्यस्त रखते हैं तो अच्छा रहता है।”
शकुंतला ने फोन खत्म होने दिया।
फिर बोलीं, “नाम मैंने लिखाया था। अभ्यास मैंने किया। आने-जाने में नलिनी साथ थी।”
महेश का चेहरा उतर गया।
“आपकी तारीफ ही तो कर रहा था।”
“तो जहाँ मेरा किया हुआ काम है, वहाँ मेरा नाम भी कह दो।”
सविता ने पूछा कि पुरस्कार कहाँ रखें।
शकुंतला ने किताबों वाली शेल्फ बताई।
सविता ने जगह बनाने को फूलदान हटाया। शकुंतला ने वापस रख दिया। किताबों के पीछे की धूल साफ कर दें तो दोनों आ सकते थे।
अगले हफ्ते उन्होंने समुद्र के पास रहने वाली पुरानी सहेली से मिलने की तैयारी शुरू की।
उस सर्दी से पहले से इस यात्रा के लिए पैसे अलग कर रही थीं।
सहेली ने हाल में समुद्र की तस्वीर भेजी थी। सामने प्लास्टिक की कुर्सी थी।
नीचे लिखा था, तुम्हारा इंतजार करते-करते तुम्हारी कुर्सी पुरानी हो रही है।
शकुंतला ने तारीखें देखीं। खर्च जोड़ा। सफर में जहाँ मदद उपयोगी थी, उसके बारे में पूछा।
मिली ने माँगने पर जानकारी समझने में साथ दिया।
बुकिंग शकुंतला की पसंद से हुई।
* * *
खाने पर महेश को यात्रा का पता चला।
“मुझसे कह देतीं। मैं कर देता।”
“कर लिया है।”
“कहीं कुछ गलत कर दिया तो?”
“देख लिया है।”
“कार्ड दे दीजिए। जाने तक मेरे पास रहेगा।”
शकुंतला ने चम्मच रख दिया।
“नहीं।”
महेश ने हाथ बढ़ाए रखा। मानो उन्होंने बात समझी ही न हो।
उन्होंने कुर्सी के पास रखा फोल्डर खोला।
“दो हजार चार सौ। आठ हजार छह सौ। पंद्रह हजार।”
मेज पर चुप्पी हो गई।
“अभी यह बात जरूरी है?”
“कल होनी थी। तुम आए नहीं।”
उन्होंने तारीखें पढ़ीं। सामने लिखे खर्च पढ़े। सब याद करके चमत्कार दिखाने की जरूरत नहीं थी। कागज उनके हाथ में थे।
फिर पूछा, “इनमें से कौन-सा खर्च मुझसे पूछकर किया था?”
महेश का हाथ नीचे हो गया।
शकुंतला ने इस बार बात हल्की करने के लिए कोई छोटी माँग नहीं रखी।
सवाल वहीं रहने दिया।
* * *
अगले कुछ हफ्तों में उनकी चुनी हुई स्वतंत्र सहायता के साथ विवादित रकम पर बात पूरी हुई।
महेश ने माना कि वे खर्च बिना उनकी सहमति के किए थे। छब्बीस हजार रुपये लौटाने की लिखित व्यवस्था बनी।
घर के जिन खर्चों में शकुंतला अब भी हिस्सा देना चाहती थीं, वे अलग रखे गए।
महेश बदलाव से खुश नहीं हुआ।
कार्ड अपने पास रखने के लिए शकुंतला ने उसके खुश होने का इंतजार नहीं किया।
वह अब भी उससे प्यार करती थीं। कुछ शामों को इसी वजह से ज्यादा दुख होता था।
रकम फिर भी वही रहती थी।
पहला भुगतान गुरुवार को आया।
महेश ने संदेश भेजा, देख लीजिए, अब तो आपको यही चाहिए।
उन्होंने रकम देखी। लिखी। जवाब दिया कि मिल गई है।
दस मिनट तक सोचा, कुछ नरम भी लिख दें। खाना खाया? काम ठीक है?
फिर फोन रख दिया।
यह पूछेंगी जब सचमुच जवाब जानना होगा। अपना पैसा वापस मिलने की कीमत के रूप में नहीं।
शाम को महेश अमरूद लाया। दो उनकी कुर्सी के पास रख दिए।
उन्होंने खाने के बाद एक खाया।
भुगतान का कागज फोल्डर में रखा रहा।
* * *
सफर से पहले मिली ने सामान की सूची मिलवाई।
चश्मा।
टिकट।
रोज की दवाएँ।
वही किताब जिसके लिए तीन सौ रुपये माँगने पड़े थे।
शकुंतला ने एक छोटी नई कॉपी भी रखी।
मिली ने पूछा, “खर्च लिखने के लिए?”
“जो याद रखना चाहूँ, उसके लिए।”
स्टेशन पर महेश ने उनका थैला उठाया।
उन्होंने धन्यवाद दिया।
उसने पूछा कि टिकट रखा है या नहीं। शकुंतला ने फोल्डर दिखाया और खुद अपने बैग में रख लिया।
नलिनी पहले हिस्से की यात्रा में साथ थी। उसने डिब्बे से आवाज दी।
शकुंतला उसकी तरफ चल पड़ीं।
हर दिन की हर बात उन्हें याद नहीं रहती थी।
कहाँ जाना है, यह उन्हें मालूम था।