DiwaVIP: वह दर्जिन जिसने जीत का चित्र बनाया
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DiwaVIP: वह दर्जिन जिसने जीत का चित्र बनाया

काल्पनिक कहानी · पात्र और घटनाएँ कहानी का हिस्सा हैं।

DiwaVIP की मौलिक कैरम कहानी: काम की जगह खोने के बाद एक दर्जिन लगातार अभ्यास करती है और अपने हाथों का अपमान करने वाले खिलाड़ी से फाइनल खेलती है।

1. DiwaVIP: वे हाथ जिन्हें छिपाने को कहा गया

कुणाल नई जैकेट का कफ देख रहा था। सरला कैरम बोर्ड के पास बिल लेकर खड़ी थी।

“अँगूठे पर चॉक लगा है,” उसने कहा। “बोर्ड मत छूना।”

तीन बार बिजली जाने के बीच उसने वह जैकेट सिली थी। दुकान मालिक ने कहा था कि ग्राहक फिटिंग मानेगा तो भुगतान होगा। अब कुणाल ने आस्तीन ठीक की, काँच में खुद को देखा और बिल रिसेप्शन पर छोड़ने को कहा।

उनचास वर्षीय सरला मजदूर का पैसा टालने के बहुत तरीके सुन चुकी थी। इस बार दर्शक भी थे।

मेज पर कैरम अभ्यास की शीट दिखी। दो सफेद गोटियाँ और टक्कर का संकरा कोण बना था। शुरुआत के पास छोटा क्रॉस उसने पहचान लिया।

“दूसरा क्रम आजमाया?” उसने पूछा।

कुणाल ने ऊपर देखा। “ये प्रशिक्षण नोट हैं।”

“दिख रहा है।”

“तो समझोगी कि बिना सोचे टिप्पणी के लिए नहीं हैं।”

एक साथी मुस्कराया। सरला ने बिल सुबह वाली सिलवट पर मोड़ दिया।

वह चित्र उसने सिलाई मशीन के पीछे वाले कमरे में बनाया था। कुणाल तक पहुँची स्कैन प्रति से उसके नाम वाला पन्ना गायब था।

बस में उसने चॉक वाला अँगूठा देखा। वर्षों उपयोगी बातें सिखाईं थीं। सीखने वाले ज्ञान के कहीं से भी आने की कल्पना कर सकते थे, सिवाय उस औरत के जो सिलाई का बिल लेने आती है।

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2. दो तालों वाली दुकान

महीने के अंत में सिलाई दुकान अचानक बंद हुई। मालिक ने संदेश दिया कि कुछ भुगतान आने के बाद हिसाब होगा। शटर पर दो नए ताले थे। सरला की मशीन भीतर थी।

नौ साल उसने वहाँ कोना किराए पर लिया था। जमा राशि और दो महीने का तैयार काम भी तालों के पीछे रह गया।

छोटे भाई ने फ्लैट में गद्दा दिया। हर शाम जगह की कमी याद दिलाता। मेहमान आने से पहले उसकी पत्नी सरला के तह किए कपड़े दरवाजे के पास रखने लगी। एक मेहमान ने पूछा कि घर के काम में मदद करती हैं क्या।

सरला ने हाँ कहा। यह समझाने से आसान था कि परिचय बहन के रूप में क्यों नहीं दिया जाता।

रात में हाथ से छोटी मरम्मत करती। दिन में पत्र और नियुक्तियों से मशीन तथा बकाया काम का पीछा करती। प्रक्रिया धीमी थी। अभ्यास इस वादे पर नहीं बन सकता था कि जल्द कोई न्यायपूर्ण हो जाएगा।

उसने सप्ताह के हिसाब से मशीन किराए पर ली और दूसरी दुकान का काम लिया। अभ्यास के लिए पुराने सामुदायिक हॉल लौटी।

बंद होने के बाद देखभाल करने वाले ने उसे अकेले बोर्ड के पास पाया।

“घर?” उसने पूछा।

“एक मिनट में।”

उसने दूर की बत्तियाँ बंद कर दीं। उसकी मेज के ऊपर वाली जलती छोड़ी। छोटे प्रकाश में सरला ने गोटियाँ फिर सजाईं।

3. घूमता हुआ चित्र

सरला की अभ्यास शीट वयस्क शुरुआती खिलाड़ियों की मदद से शुरू हुई थीं। चित्र साफ बनाती थी, क्योंकि बिना तस्वीर टक्कर समझाते समय अक्सर बहस होती कि किस गोटी की बात है।

दोस्त पन्ने स्कैन करके भेजते। हर कॉपी पर नहीं, मूल कॉपी में हस्ताक्षर करती। धीरे-धीरे उसके छोटे क्रॉस ऐसे कमरों में पहुँचे जिन्हें उसने देखा भी नहीं था।

लोग इस्तेमाल करते तो खुशी होती। कुणाल ने उन्हीं नोट की प्रशंसा करते हुए उसका सवाल सुनने से मना किया, तो एहसास बदल गया।

हॉल में उसने मूल अभ्यास का दूसरा क्रम खोला। सीधा पॉकेट आकर्षक था, मगर स्ट्राइकर दूसरी सफेद बिगाड़कर अगला शॉट कठिन कर सकता था। संयुक्त टक्कर का दूसरा रास्ता था: पहली सफेद से दूसरी को पॉकेट की ओर भेजना और पहली को खुद उपयोगी लाइन में रोकना।

यह संभावना बनाना उसे भरोसेमंद तरीके से मारने से आसान था।

सरला ने इतना अभ्यास किया कि कुर्सी के आसपास फर्श पाउडर से हल्का पड़ गया। दूसरी गोटी चूकती, पहली बहुत दूर जाती, या दोनों सही जातीं लेकिन स्ट्राइकर अनचाहे पॉकेट में।

उसने हर नतीजा चित्र के पास लिखा।

जिस चित्र को कुणाल विशेषज्ञ सलाह मानता था, उसके नीचे असफलताएँ भर गईं। सरला ने पन्ना नहीं फाड़ा। सुंदर चित्र और हाथ से सचमुच हो सकने वाले शॉट का अंतर समझना जरूरी था।

4. आधे नाखून का अंतर

अभ्यास में वह सिलाई वाली फीता लगाकर दूरी का छोटा अंतर लिखती। असली बोर्ड खेलने से पहले सारे निशान हटा देती। संपर्क में आधे नाखून का फर्क उपयोगी टक्कर को बिखराव बना सकता था।

अब केवल गोटी गिरने से कोशिश नहीं परखती। पहली सफेद कहाँ रुकी? अपनी बेसलाइन से आगे खेल सकती है? स्ट्राइकर खतरे से बाहर रहा?

हॉल के नियमित खिलाड़ी अनिल ने मदद की। जब सरला दूसरी ओर देखती तो स्थिति बदल देता। तिरपन साल का वह अधीर आदमी था और गलत विचार पर उसे हराने को पूरी तरह तैयार। उसका विरोध अभ्यास को उपयोगी बनाता था।

कुछ रात सिलाई वाला हाथ दुखता। दर्द को इच्छा की ताकत का प्रमाण बनाने के बजाय सत्र छोटा करती। अगली बार नई कोशिश से पहले छूटे शॉट देखती।

दुकान बंद होने के बाद पहली छोटी प्रतियोगिता में जल्दी हार गई। जहाँ सरल कट बेहतर था, वहाँ संयुक्त टक्कर आजमाई। अनिल ने शानदार चित्र के बगल में साधारण रास्ता बनवाया।

“अपने चित्र से प्यार हो गया है,” उसने कहा।

वाक्य पसंद नहीं आया। चित्र रखा।

अगले महीने सरला वास्तविक स्थिति से शॉट चुनने लगी। कभी संयुक्त टक्कर ठीक थी। कभी आसान पॉकेट बेहतर था, जिससे आगे दूसरी रुकावट बनाए बिना खेल सके।

इसी फर्क के साथ नतीजे सुधरने लगे। अभ्यास की खूबसूरती से ज्यादा उसका सही समय महत्वपूर्ण हुआ।

5. उसके नीचे लिखा नाम

जिला ओपन की क्वालिफाइंग सूची में कुणाल ने अपने नीचे सरला का नाम देखा। पंजीकरण पर ऐसी मुस्कान लेकर आया जो आश्चर्य को उदारता दिखाना चाहती थी।

“गंभीरता से खेलती हो?”

“हाँ।”

“क्लब वाले नोट से प्रेरणा मिली होगी।”

उसने पहनी जैकेट देखी। छोटी की हुई आस्तीन कलाई पर बिल्कुल सही बैठ रही थी।

“शायद बाद में बात करेंगे।”

सरला दो क्वालिफाइंग सत्रों के रास्ते आई थी। पहले में जरूरी स्थान से थोड़ा चूकी। दूसरे में फिनिश सुधारे और उन पॉकेटों से स्ट्राइकर बचाया जिनसे पहले बोर्ड गए थे।

चैम्पियनशिप में तीन गेम तक का प्रकाशित प्रारूप था। गेम तय अंक या निर्धारित बोर्ड सीमा पर खत्म होते। उसने शर्तें पढ़ीं और अपरिचित बोर्ड पर अनुमति वाले अभ्यास स्ट्रोक पूछे।

क्वार्टर फाइनल से पहले भाई का फोन आया। मेहमानों के लिए खाना बनाने जल्दी लौट सकती है क्या।

“नहीं। कल समय बताया था।”

वह घर की व्यवस्था पर शिकायत करने लगा। सरला ने पूरा सुना, फिर लौटने का समय दोहराया।

बोर्ड पर हाथ स्थिर थे। बातचीत दुखी करने वाली थी, मगर समाप्त हो चुकी थी। प्रतिद्वंद्वी स्ट्राइकर लेकर इंतजार कर रहा था। बाकी जीवन आरामदेह होने तक उसे रोकने का सरला का इरादा नहीं था। उसने कुर्सी ठीक की और खेल के लिए तैयार हुई।

6. आसान रास्ते का चैम्पियन

कुणाल सटीक खिलाड़ी था। फाइनल में सामने बैठकर सरला ने इसे सीधे जाना।

पहला गेम वह पच्चीस-चौदह जीता। लगातार साफ अगले शॉट चुनता रहा, जबकि सरला मुश्किल स्थिति से अधिक करने की कोशिश करती रही। उसकी क्षमता से हार को टालना कठिन और समीक्षा उपयोगी हुई।

विराम में उसने कागज पर एक खराब शॉट बनाया। बंद सफेद को ऐसे कोण से निकालना चाहा था जिसमें नियंत्रित कर सकने से अधिक जोर चाहिए था। रिबाउंड से कुणाल की दो काली खुल गई थीं।

दूसरे गेम में ऐसे मौके देना बंद किया।

आसान सफेद निकालीं। क्वीन के कवर रास्ते देखे। जब लापरवाह प्रयास विरोधी को ज्यादा मदद करता, कठिन स्थिति को कठिन रहने दिया। कुणाल को अपने रास्ते खुद बनाने पड़े।

एक बोर्ड में उसने क्वीन डाली, लेकिन जरूरी कवर चूका। क्वीन लौटी। बाद में अपनी वैध बारी में सरला ने उसे सुरक्षित किया। बोर्ड पूरा किया, पूरे गेम को उसी एक नतीजे पर नहीं रखा।

कई कठिन बोर्ड और खेले। दूसरा गेम सरला पच्चीस-उन्नीस जीत गई।

मैच बराबर था।

कुणाल ने पानी माँगा। उसका साथी बैरियर के बाहर से कुछ समझाने लगा। अंपायर ने रोक दिया।

सरला ने कुर्सी वापस बोर्ड की ओर की। अगला उत्तर वहीं से मिलना था। उसने अपने सामने खाली बेसलाइन पर नजर रखी और अगली व्यवस्था लगने का इंतजार किया।

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7. बाईस बनाम चौबीस

निर्णायक गेम में कुणाल का धैर्य दिखा। कठिन स्थितियाँ सँभालीं और केवल दर्शक होने के कारण हमला करने से बचा।

सरला एक बोर्ड जीती, फिर दो हारी। कई सटीक फिनिश से वापस आई। उनमें वह बैक कट भी था जो पिछले महीने बार-बार चूका था। स्कोर करीब आए।

सात बोर्ड के बाद सरला के बाईस अंक थे। कुणाल के चौबीस।

उसे एक अंक चाहिए था। सरला को तीन।

मौजूदा बोर्ड में क्वीन कुणाल पहले ही डालकर कवर कर चुका था। लाल रंग अब सतह पर नहीं था। सरला बोर्ड जीतती तो बचे काले कैरममैन के अंक मिलते। उसे क्वीन का लाभ नहीं मिलता।

दोनों की तीन-तीन गोटियाँ बची थीं।

सरला की एक सफेद दूसरी के पीछे बंद थी। तीसरी विपरीत किनारे के पास लंबे कोण पर थी। कुणाल की काली कठिन थीं, असंभव नहीं। उसे कई बारियाँ और मिलने का भरोसा नहीं था।

उसने सावधान कट आजमाया और बहुत कम अंतर से चूका। सरला को अवसर मिला, तैयार फिनिश नहीं।

उसने स्ट्राइकर रखकर पास की दो सफेद देखीं। चित्र जैसा ढाँचा था, लेकिन दूरी अलग।

शुरुआती जगह बदली। याद किया चित्र रास्ता दिखा सकता था। इस बोर्ड को हाथ से अभी हल करना बाकी था। उसने आँख से दोनों सफेद के किनारे की दूरी दोबारा मापी।

8. पहली सफेद नहीं गिरती

स्ट्राइकर पास वाली सफेद के केंद्र से थोड़ा हटकर लगा।

उस सफेद ने दूसरी को दूर के पॉकेट की तरफ भेजा। पहली धीमी होकर नई लाइन में आई। कुछ पल दोनों चल रही थीं। सरला जो गति दे चुकी थी उसे वापस नहीं ले सकती थी।

दूसरी सफेद गिर गई।

बारी जारी रही।

पहली उतनी दूर नहीं गई थी जितना चाहती थी। अगला शॉट था, मगर अभ्यास से कम जगह थी। उसने बेसलाइन की दूसरी वैध जगह पर स्ट्राइकर रखा और वहाँ से लाइन देखी।

कुणाल चुप रहा। उसे ढाँचा याद था। चित्र पढ़ा था, हालांकि उसमें सरला द्वारा अभी किया छोटा सुधार नहीं था।

कट हल्का था। सफेद पॉकेट के किनारे को छूकर भीतर गई।

एक सफेद बची। तीन काली अब भी बोर्ड पर थीं।

अंतिम सफेद का सीधा रास्ता नहीं था। काली गोटी स्पष्ट लाइन रोक रही थी। रुकावट पर जोर से मारने से बहुत कुछ नियंत्रण के बाहर जाता। दूर के कुशन से लौटने वाला रास्ता दिखा, यदि सफेद तक पहुँचते समय स्ट्राइकर में सही मात्रा की ताकत बचे।

उसने मेज के नीचे उँगलियाँ एक बार मोड़ीं, फिर सही तरह रखीं।

बोर्ड इतना शांत था कि हाथ से छूटते स्ट्राइकर की छोटी क्लिक सुनाई दी। इस बार पूरी बारी तीन अलग संपर्कों की एक ही कड़ी थी। पहला सही हो चुका था, दूसरा भी। तीसरा अभी रास्ते में था।

9. क्वीन के बिना तीन अंक

स्ट्राइकर कुशन से लगा और वापस आया। सफेद की उसी तरफ संपर्क हुआ जिसे सरला ने चुना था। कैरममैन कोने की ओर गया और धीरे होता गया।

वह उसके पीछे झुकी नहीं। आँखें उस पर रहीं।

सफेद गिर गई।

स्ट्राइकर सतह पर था। फिनिश बिगाड़ने वाला फाउल नहीं हुआ।

अंपायर ने बची तीन काली गिनीं और तीन अंक दिए। सरला के बाईस से पच्चीस हुए। कुणाल चौबीस पर रहा। निर्णायक गेम और पूरा मैच दो-एक से सरला जीती।

क्वीन ने अंतिम स्कोर में कोई योगदान नहीं दिया। निकाली गई तीन सफेदों ने जरूरत का काम किया था।

कुणाल ने खाली सफेद जगहों से उसके हाथ की ओर देखा। फिर उस छोटे तिरछे निशान को देखा जो अभ्यास विचार लिखते समय वह कॉपी में बनाती थी।

“वो शीट...” उसने कहा।

सरला ने मूल चित्र वाला पन्ना खोला। तारीखें, असफल कोशिशें और सुधार किनारों पर भरे थे। कवर के अंदर पूरा नाम था।

उसने दर्शकों की तरफ नहीं बढ़ाया। कुणाल अपनी कुर्सी से देख सकता था।

उसने एक पन्ना पलटा, फिर दूसरा। जिस ज्ञान को दूर के विशेषज्ञ से आया समझा था, वह सामने बैठी औरत का था, जिसका सिलाई बिल रिसेप्शन पर छोड़ दिया था।

उसने सावधानी से कॉपी बंद की और दोनों हाथों से लौटाई।

10. मशीन घर आती है

अँगूठे के पास चॉक हल्का दिख रहा था जब सरला ने कप लिया। अनिल के अभ्यास खेल और बंद होने के बाद रोशनी रखने वाले हॉल का धन्यवाद किया।

कुणाल प्रस्तुति खत्म होने तक रुका। बिल पर लिखे सामान्य तरीके से बाकी सिलाई भुगतान किया। पूछा कि उसके नाम के साथ अभ्यास शीट इस्तेमाल करता रह सकता है क्या।

“हाँ। नई कॉपी बनाने से पहले पूछना।”

उसने माना। क्लब की बातचीत से यह छोटी और अधिक उपयोगी बातचीत थी।

दो सप्ताह बाद अलग से किए पत्राचार और नियुक्तियों के बाद सिलाई मशीन मिली। सरला छोटे किराए के कमरे में गई जहाँ खिड़की से दोपहर की पर्याप्त रोशनी आती थी। कप मशीन के ऊपर शेल्फ पर रखा।

भाई मेज उठाने में मदद करने आया। चारों ओर देखकर पूछा कि अकेली सँभाल लेगी क्या।

“मदद चाहिए होगी तो बताऊँगी।”

शाम को सरला ने ब्लाउज पूरा किया, मशीन ढकी और कॉपी निकाली। एक युवा वयस्क खिलाड़ी ने संयुक्त टक्कर पर सवाल भेजा था।

उसने पहली सफेद, दूसरी सफेद और पॉकेट बनाए। फिर दूसरा चित्र जोड़ा कि संपर्क थोड़ा गलत हो तो पहली गोटी कहाँ रुक सकती है।

इस बार भेजने से पहले दोनों पन्नों पर हस्ताक्षर किए। उसने पन्ने रोशनी के नीचे रखकर तस्वीर ली। नाम साफ आया। गोटियों के रास्ते भी। कमरे के बाहर किसी के मेहमान आने की आहट नहीं थी जिसके लिए उसे अपना सामान समेटना पड़ता।

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