1. DiwaWin: पास पर लिखा साथी
पति के बताने से पहले नैना ने टीम सूची में अपने बदले आए खिलाड़ी का नाम देख लिया। पिछली शाम उसने विरोधियों की बाजियाँ देखी थीं, अभ्यास के हाथ बनाए थे और टीम के दस्तावेज़ वाले बैग का टूटा बटन ठीक किया था। रात के खाने और नाश्ते के बीच उसका नाम गायब हो गया।
अखिल ने प्लेट के पास दर्शक पास रखा। नाम के नीचे लिखा था, साथ आने वाला व्यक्ति।
“विवेक संपर्क लाता है,” उसने कहा। “समझती हो ये चीजें कैसे चलती हैं।”
नैना बत्तीस साल की थी। उसने उन्हीं चयन मुकाबलों से जगह बनाई थी जिनसे बाकी पुरुष चुने गए थे। विवेक उनमें खेला ही नहीं था।
क्लब के भोज में अखिल ने बदलाव को परिवार का फैसला बताया। नैना पानी लेने भेजी गई थी और परोसने वाली मेज़ के पास खड़ी थी। लोगों ने उसकी कथित उदारता पर तालियाँ बजाईं।
“वह समझती है कि कप्तान को अपने घर से आगे सोचना पड़ता है।”
नैना ने जग रखा। “तो बताओ उसने किस मुकाबले से मेरी जगह कमाई?”
कमरा रुक गया। अखिल ने कसकर मुस्कुराते हुए तमाशा न करने को कहा। बाहर बोला कि उसने उसका अपमान किया है। नैना ने छाती पर लटकता पास देखा। उससे वह अपना काम दूसरों को इस्तेमाल करते देख सकती थी।
उस रात दो बैग लेकर निकली। स्टेशन पर याद आया कि छह महीने का अभ्यास रजिस्टर फ्लैट में है। सोने की जगह खोजने से पहले वह उसे लेने लौटी।
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2. DiwaWin कथा: तीन खाली कुर्सियाँ
चचेरी बहन ने भरे हुए कमरे के कोने में गद्दा दिया। नैना ने उसे रोमांच बताए बिना स्वीकार किया। वह दवा दुकान के माल की सूची संभालती, शहर के आरपार यात्रा करती और घुटनों पर स्टील का डिब्बा रखकर खाना खाती।
अखिल होश में लौटने वाले संदेश भेजता। क्लब के परिचित कहते सीजन खत्म होने तक उसका साथ दो। किसी ने नहीं पूछा कि जिस सीजन की तैयारी नैना ने की, उसमें उसका भी हिस्सा था या नहीं। उसने जवाब देना बंद किया।
पड़ोस के मनोरंजन केंद्र में तीन मुड़ने वाली मेज़ें थीं। काम के बाद रम्मी समूह मिलता था। आयोजक परवीन ने बुलाया। नैना आसान शाम सोचकर पहुँची और शांत अकाउंट सहायक बिनॉय से लगातार तीन अभ्यास डील हार गई। उसे नैना के पुराने क्लब से कोई मतलब नहीं था।
वह बहुत सारे अधूरे ऊँचे पत्ते रखकर घोषणा का पीछा करती रही। शर्म आने पर जल्दी डिस्कार्ड करती। योजना में एक संभावित सीक्वेंस को दो बार गिनती, जैसे एक पत्ता दो पूरे समूहों का हिस्सा हो सकता हो।
सत्र के बाद बिनॉय ने पत्ते फैलाए। “यह सात किस समूह का है?”
नैना देखती रही। फिर बिना खुशी एक बार हँसी।
केंद्र काल्पनिक थ्री टेबल्स लीग में टीम भेजना चाहता था। तीन खिलाड़ी, तीन अलग आमने सामने मुकाबले और एक टीम परिणाम। परवीन ने तैयारी में मदद पूछी।
“तभी जब मैं भी खेलूँ।”
“इसीलिए तो पूछा है।”
3. सबको गिनने वाली कप्तान
नैना, बिनॉय और फरीदा केंद्र की टीम बने। फरीदा ऑफिस शटल चलाती थी। याददाश्त तेज थी, मगर कभी याद किया हुआ डिस्कार्ड उसके हिसाब में दूसरे के हाथ की निश्चित जानकारी बन जाता। बिनॉय समूह अच्छी तरह समझता था, पर सामने वाला तेज बोल दे तो अच्छे हाथ भी छोड़ देता।
नैना व्यवस्था लाई। यह दावा नहीं लाई कि उसे सब पता है।
वे तेरह पत्तों की पूरी सही व्यवस्था का अभ्यास करते। कम से कम दो सीक्वेंस, जिनमें एक प्योर हो। सेट में अलग सूट जाँचते। संभावित और पूरे समूह अलग रखते ताकि उपयोगी पत्ता चुपके से दो काम न करने लगे।
नैना ने फरीदा से हर बात को नाम देना सिखाया। देखा हुआ। अनुमान। अनजान। खुला उठाया पत्ता देखा हुआ था। उसका संभावित उपयोग अनुमान था। बाकी हाथ अनजान था।
बिनॉय ने अधिकारी की देखरेख में ज्यादा बोलने वाले खिलाड़ियों के खिलाफ अभ्यास किया। टिप्पणी अभ्यास की सीमा पार करे तो बहस करने या हार मानने के बजाय अधिकारी से हस्तक्षेप माँगना सीखा।
खुद नैना निर्णय रजिस्टर रखती। ऊँचा पत्ता क्यों रोका, कब दंड का जोखिम कम करना चाहिए था और कौन सा डिस्कार्ड भावना के कारण जल्दी किया, सब लिखती।
पहली टीम बैठक दो घंटे चली। परवीन ने कप्तान पूछा तो बिनॉय और फरीदा ने नैना का नाम लिया। वह परिचित शर्त का इंतजार करती रही। जब तक कोई ज्यादा उपयोगी न आ जाए। कोई शर्त नहीं आई। परवीन ने नाम स्याही से लिख दिया।
4. तीन दरवाज़ों वाली लीग
चयन से पहले लीग का प्रारूप प्रकाशित था। हर टीम तीन खिलाड़ियों का क्रम देती। उसी क्रम के खिलाड़ी आपस में पाँच डील खेलते। कम कुल दंड वाला मेज़ जीतता। दो मेज़ जीतने से टीम मैच जीतती। बराबरी की स्थिति के लिए घोषित अतिरिक्त मुकाबला था।
घोषणा और ड्रॉप की शर्तें सबके लिए एक थीं। खिलाड़ी पहले साथ तैयारी कर सकते थे, मगर मुकाबले में अपने हाथ खुद खेलते। किसी की मुश्किल देखकर नैना पूरे कमरे में मदद फुसफुसा नहीं सकती थी।
इसी सीमा से अभ्यास बना। वह हर साथी से कठिन फैसला अकेले समझाने को कहती और बीच में टोके बिना सुनती। नेतृत्व का मतलब था कि उसकी आवाज़ न होने पर भी वे सक्षम रहें।
पहला लीग मैच हारे। बिनॉय अपनी मेज़ जीता। फरीदा थोड़े अंतर से हारी। नैना शानदार वापसी की भूख में ऐसा हाथ पकड़े रही जिसे दोबारा आँकना चाहिए था। वह बड़े अंतर से हारी। उसने केंद्र के बोर्ड पर परिणाम खुद लिखा।
अगले हफ्ते दो मेज़ जीते। उसके बाद फिर हारे। अलग अलग शर्म लेकर घर जाने की जगह निर्णायक डील जाँचने रुके।
परवीन ने केंद्र में परिणामों के पास टीम की तस्वीर लगाई। उसमें तीन साधारण वयस्क मुड़ने वाली मेज़ के पास थे। नैना ने लीग प्रवेश की पुष्टि के साथ पुराने क्लब को उसकी प्रति भेजी। अखिल ने हँसने वाला निशान भेजा। नैना ने जवाब नहीं दिया। अगला कार्यक्रम छापा और अभ्यास का कमरा बुक किया।
5. लौटाने को पेश की गई जगह
लीग के आखिरी महीने तक केंद्र की टीम दूसरों के लिए असुविधा बन गई थी। स्कोर हमेशा सुंदर नहीं थे। मगर वे हार से लौटते और एक भावुक फैसले से पूरा मुकाबला देना बंद कर चुके थे। नैना का पुराना क्लब फाइनल पहुँचा। उसकी नई टीम भी पहुँची।
उसी शाम अखिल का फोन आया। आवाज़ में वह गर्मजोशी थी जो तब आती जब वह तय कर चुका होता कि नैना को क्या चाहिए।
“विवेक भरोसेमंद नहीं निकला। अगले सीजन तुम्हारे लिए जगह हो सकती है।”
“मेरे पास टीम है।”
“समझ रही हो मेरा मतलब।”
वह समझ रही थी। वह जगह लौटाने की पेशकश ऐसे कर रहा था जैसे अपना नाम नैना ने खुद खोया हो।
केंद्र में फरीदा ऐसे विरोधी का अध्ययन कर रही थी जो ऊँचे पत्ते बहुत देर रखता था। बिनॉय ने कठिन शुरुआती हाथों का पन्ना तैयार किया था। नैना आई तो दोनों ने उसकी भागीदारी के लिए देखा, आज्ञाकारिता के लिए नहीं। उसने फोन शांत किया और बैठ गई।
फाइनल के लिए हर खिलाड़ी को सभी संभावित विरोधियों के लिए तैयार किया। दूसरी टीम का क्रम पहले से जानने का दिखावा नहीं किया। दोनों क्रम स्वतंत्र रूप से जमा होकर साथ खुलते।
अखिल ने खुद को पहले रखा। नैना ने भी। जोड़ी सार्वजनिक हुई तो आयोजक ने इसे कप्तानों का मुकाबला कहा। पहली बार किसी ने उसका परिचय किसी की पत्नी के रूप में नहीं दिया।
6. इस मेज़ पर दूसरी बातचीत नहीं
फाइनल नगरपालिका हॉल में तीन अलग खेल क्षेत्रों में था। अनुमति वाले विराम में नैना साथियों को देख सकती थी। उनके हाथ देखना या खेल बताना संभव नहीं था। अखिल सामने बैठा और बीच में पानी की बोतल रखी।
“तुम हमेशा पानी भूलती हो।”
“मेरे पास है।”
वह आहत दिखा, जैसे बोतल से टीम सूची वाला पूरा मामला हल हो गया हो।
पहली डील उसके पक्ष में गई। नैना की संरचना खेलने लायक थी, लेकिन अखिल पहले पूरा हुआ और उसे पर्याप्त दंड लगा। उसने वह निजी मुस्कान दी जिसका अर्थ कभी होता था कि वे एक दूसरे को समझते हैं।
“अब भी बहुत देर पकड़े रहती हो।”
बात लगी, क्योंकि थोड़ी पत्तों की थी और ज्यादा मेज़ के बाहर की जिंदगी की। नैना ने अधिकारी से बातचीत को खेल की प्रक्रिया तक रखने को कहा। फिर अपना पानी लिया और हाथ मन में जाँचा। उसने एक ऊँचा पत्ता उसकी उपयोगिता से ज्यादा देर रखा था। यह फैसला बदल सकती थी। विवाह की अखिल वाली कहानी उस डील में हल नहीं कर सकती थी।
दूसरी डील में उसने बेकार ऊँचे मूल्य जल्दी कम किए। अखिल ने फिर घोषणा की, मगर इस बार नैना को कम अंक लगे। वह दो बार जीत चुका था, फिर भी दूसरी जीत की कीमत नैना ने बहुत कम चुकाई थी।
पहली बार उसकी मुस्कान बनाए रखना मेहनत माँग रहा था। नैना ने अगली डील के लिए पत्ते साफ करके लौटा दिए।
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7. देखा, अनुमान लगाया, अनजान
तीसरी डील दो अलग रास्तों वाले जोड़ से शुरू हुई। नैना ने एक पत्ता दोनों रास्तों में नहीं बाँधा। व्यवस्था ऐसी रखी कि विकल्प साफ रहें। अखिल ने खुला छह उठाया और बाद में पास की रैंक छोड़ी। नैना ने घटनाएँ याद रखीं, लेकिन पत्तों की पीठ के पार देखने का दावा नहीं किया। वह रन पूरा कर रहा हो सकता था, योजना बदल रहा हो सकता था या उपयोग का उसका पहला अंदाज़ गलत हो सकता था।
देखा हुआ। अनुमान। अनजान।
उसने आकर्षक खुले पत्ते को नहीं लिया क्योंकि उसके लिए पूरा समूह तोड़कर संकरी संभावना पकड़नी पड़ती। कुछ बारी बाद बंद गड्डी का पत्ता उसके सुरक्षित रखे रास्ते को पूरा कर गया। प्योर सीक्वेंस, दूसरा सीक्वेंस और बाकी सेट जाँचकर घोषणा की।
घोषणा सही थी। अखिल ने अधूरे हाथ के अंक जोड़े।
विराम में तीनों मेज़ों का स्कोर दिखा। बिनॉय आगे था। फरीदा पीछे थी, मगर अंतर पार किया जा सकता था। नैना और अखिल पास आ गए थे। उसकी शुरुआती बढ़त घट चुकी थी।
अखिल ने दूसरी मेज़ें देखीं, फिर उसे। “तुमने उन्हें मेरी आदतें सिखाई हैं।”
“मैंने अपने फैसले जाँचना सिखाया है।”
अधिकारी ने अगली डील बुलाई। अखिल जवाब को घरेलू बहस बना सके, उससे पहले नैना कुर्सी पर लौट गई। बिसात नहीं थी, मगर सीमा स्पष्ट थी। इस तरफ उसके पत्ते थे और उन्हें खेलने का अधिकार उसी का था।
8. जिस हाथ को उसने नहीं बचाया
चौथी डील ने पुराना जाल रखा। कई दिलचस्प पत्ते, कम पूरे समूह और तुरंत मुकाबला बराबर करने की बेचैनी। नैना ने प्रकाशित ड्रॉप विकल्प देखे। निश्चित दंड की तुलना आगे खेलने की अनिश्चित कीमत से की और शुरुआत में डील छोड़ दी।
अखिल लगभग अपमानित दिखा। वह चाहता था कि नैना बैठी रहे और कुछ साबित करे। उसने दंड दर्ज किया और इंतजार किया। पाँचवीं डील से पहले वह पीछे थी, लेकिन वास्तविक वापसी की संभावना बची थी। दूसरा विकल्प कोई पक्की जीत नहीं था। वह ऐसा हाथ था जिसे केवल स्कोरबोर्ड नापसंद होने के कारण बचाना चाहती थी।
फरीदा की मेज़ पहले खत्म हुई। उसने वापसी की कोशिश की, मगर थोड़े अंतर से हारी। फिर बिनॉय ने अपना मुकाबला जीत लिया। टीम मैच एक एक मेज़ पर था। नैना की अंतिम डील निर्णय करने वाली थी।
अखिल ने कुर्सी ठीक की। अब अगले सीजन की बात नहीं थी। उसने अधिकारी से कुल अंक फिर पढ़ने को कहा। अधिकारी ने जोर से पढ़े।
नैना को अनुकूल अंतिम परिणाम चाहिए था। वह उसे बना नहीं सकती थी। सिर्फ जल्दबाज़ी से पत्तों की संभावना बिगाड़ना रोक सकती थी।
नया हाथ आया तो एक प्योर सीक्वेंस उपलब्ध था और बाकी जगह उपयोगी रास्ते थे। उसने समूह अलग किए, एक ही पत्ते पर दोहरी निर्भरता जाँची और मनचाहे स्कोर की जगह वास्तव में मिले हाथ को खेलना शुरू किया।
9. कप्तान की आखिरी घोषणा
अखिल का पहला सीक्वेंस जल्दी बना। नैना को वही पता था जो खुले खेल से दिखा। उसकी गति आत्मविश्वास बता रही थी। पुरानी नैना बराबर दिखने के लिए जल्दी करती। इस बार उसने अपना क्रम रखा।
उसके पास प्योर रन, एक उपयोगी रैंक से अधूरा दूसरा सीक्वेंस और दो आंशिक सेट थे। ऐसा पत्ता आया जो किसी भी सेट को सुधार सकता था। उसने साफ दिखने वाले विकल्प की जगह वह व्यवस्था चुनी जिसमें आगे अलग अलग पत्तों से पूरा होने के अधिक रास्ते बचे।
दो बारी बाद एक संभावना वास्तविक हुई। सेट पूरा किया और वह ऊँचा पत्ता छोड़ दिया जिसकी जगह अब उचित नहीं थी। अखिल ने डिस्कार्ड देखा, नहीं लिया और बंद गड्डी से उठाया। उसने घोषणा नहीं की।
नैना के अगले पत्ते से दूसरा सीक्वेंस पूरा हुआ। उसने हर पत्ता सही समूह में गिना। प्योर सीक्वेंस सुरक्षित होने की पुष्टि की और आखिरी डिस्कार्ड किया।
“घोषणा।”
अधिकारी ने व्यवस्था जाँची। सही थी।
अखिल ने हाथ खोला। वह करीब था, लेकिन करीब होने से बचे समूह पूरे नहीं हुए। उसका दंड उस बढ़त से ज्यादा था जो अंतिम डील से पहले थी।
नैना मेज़ जीत गई। उसकी टीम दो एक से मैच जीत गई। पहले फरीदा आई, फिर बिनॉय। हॉल के दूसरे छोर पर आयोजक ने स्क्रीन पर विजेता बदला। नैना ने अपने नाम के पास कप्तान लिखा देखा। नीचे कोई छोटा परिचय नहीं था।
10. घर लौटती ट्रेन
अखिल बाहर निकलने के पास इंतजार कर रहा था। क्लब अधिकारी उस ट्रॉफी के खाली डिब्बे के साथ आगे जा चुके थे जिसे वे घर नहीं ले जा रहे थे।
“हमें बात करनी चाहिए।”
“हाँ। इस हॉल के बाहर की बातों पर। दूसरे दिन।”
उसने बिनॉय और फरीदा को देखा। “तुम इनके साथ जा रही हो?”
“हमारी ट्रेन है।”
प्लेटफॉर्म पर फरीदा तीन कागज़ी कप में चाय लाई। बिनॉय ने बैगों के बीच ट्रॉफी रखी और उसके हैंडल की चिंता करने लगा। नैना अचानक इतनी खुलकर हँसी कि दोनों उसे देखने लगे।
महीनों से उसने अखिल को सुनाने के लिए सही भाषण सोचा था। जब अंततः बोल सकती थी, उसे गलत तरह पैक की गई ट्रॉफी वाली बातचीत ज्यादा पसंद आई।
अगली सुबह परवीन ने फोन करके पूछा ट्रॉफी कहाँ रखें। नैना ने टीम की तस्वीर के पास वाला शेल्फ चुना। फिर अंतिम स्कोर शीट जाँची, बिनॉय और फरीदा से अगले अभ्यास का समय पक्का किया और काम के लिए निकल गई।
मुकाबला जीतने से विवाह खुद ठीक नहीं हुआ। वह अलग कठिन बातचीत का विषय था। टीम की जगह को ऐसी अनिश्चितता नहीं थी। उसने कमाई थी, बचाई थी और उसी से नेतृत्व किया था।
अगले अभ्यास से पहले बैग में पुराना साथी वाला पास मिला। उसने डोरी काटकर काम आने के लिए रख ली। कार्ड फेंक दिया। फिर अपने नाम वाला खिलाड़ी कार्ड उसी जेब में रखकर केंद्र की ओर निकल गई।
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