सुनीता पकौड़ों की आखिरी प्लेट लेकर बैठक में आईं तो उनकी कुर्सी पर पिस्ते के छिलकों का कटोरा रखा था।
कोई मेहमान नहीं बैठा था।
छिलके बैठे थे।
वह प्लेट पकड़े खड़ी रहीं। भाँजा पत्ते गिन रहा था।
“वह कटोरा हटाओ,” उन्होंने कहा। “मैं बैठूँगी।”
ऋषि ने सिर उठाया।
“बस एक बार और तल दो, मौसी। ये खत्म हो जाएँगे।”
“छह बजे से तल रही हूँ।”
“आपसे अच्छा कौन बनाता है?”
तारीफ पर सब हँसे।
कटोरा किसी ने नहीं हटाया।
तिरसठ साल की उम्र तक सुनीता सीख चुकी थीं कि तारीफ से भी किसी को खड़ा रखा जा सकता है।
* * *
त्योहार पर परिवार की ताश वाली शाम थी।
खिलाड़ी सभी वयस्क थे। बच्चों को ऊपर फिल्म देखने भेज दिया गया था। अच्छे कुशन न छूने की सख्त हिदायत साथ गई थी।
सुनीता की बहन कमला अपने पति विनोद के पास बैठी थी। उनका बेटा ऋषि छोटे स्टैंड पर फोन लगा चुका था।
उसकी पत्नी पूजा मेज के नीचे काम के संदेश का जवाब देने की कोशिश कर रही थी।
दो रिश्तेदार और आए थे।
कुर्सियाँ पर्याप्त थीं।
तब तक पर्याप्त थीं जब तक किसी ने तय नहीं किया कि खाने को भी सुविधाजनक जगह चाहिए।
सुनीता ने प्लेट रख दी।
ऋषि ने कैमरा उनकी तरफ घुमाया।
“हमारा गुप्त हथियार,” दर्शकों से कहा। “मौसी खिलाती भी हैं और सबको हराने की धमकी भी देती हैं।”
“तुम्हें गिनती आने से पहले खेलती थी।”
“देखा? पूरा आत्मविश्वास।”
वह फिर मेज की तरफ मुड़ गया।
सुनीता इंतजार करती रहीं।
कमला बोली, “हरी चटनी करीब खत्म है।”
सुनीता रसोई में चली गईं।
पीछे पहला हाथ शुरू हो गया।
* * *
पति की मृत्यु के बाद कमला ने कुछ सप्ताह साथ रहने को कहा था।
नौ साल बीत गए थे।
सुनीता को अपनी पुरानी दफ्तर की नौकरी से छोटी पेंशन मिलती थी। कुछ बचत भी थी।
किराने में पैसा देतीं। डॉक्टर की तारीखें याद रखतीं। सामान मँगवातीं। बीमारी, काम की अंतिम तारीखों और रिश्तेदारों के आने के बीच घर चलातीं।
कोई पूछता कि आजकल क्या करती हैं, तो कमला कहती, “हमारे साथ हैं।”
जवाब सुनने में अपनापन था।
दिन का अधिकतर हिस्सा गायब था।
एक बार सुनीता ने सुधारा था।
“काफी काम करती हूँ।”
विनोद मुस्कराए।
“हाँ, खुद को व्यस्त रखती हैं।”
उन्हें समझ नहीं आया था कि जवाब कैसे दें। कहीं ऐसा न लगे कि सब्जी धोने के लिए पदक चाहती हैं।
मुश्किल यही थी।
हर काम इतना छोटा था कि उसे गिनना अजीब लगता।
सब मिलकर पूरा जीवन घेर लेते थे।
त्योहार वाली रात गरम तेल अँगूठे के नीचे गिरा।
उन्होंने हाथ पानी के नीचे रखा।
बैठक से ऋषि की आवाज आई, “मौसी, इस दौर के बाद चाय!”
उन्होंने लाल निशान देखा।
फिर चूल्हा बंद कर दिया।
* * *
अगली सुबह ऋषि का वीडियो रिश्तेदारों में घूम रहा था।
उनके गिनती सीखने से पहले खेलने वाले वाक्य के नीचे मजाकिया संगीत लगा था।
ऊपर लिखा था कि परिवार की रसोई की रानी नया करियर आजमा रही हैं।
सुनीता ने कमला के फोन पर देखा।
“लोग तुम्हें पसंद कर रहे हैं,” बहन बोली।
“मेरा मजाक बना रहे हैं।”
“इतना बुरा मत मानो।”
वीडियो के आखिर में सुनीता चाय लेकर दरवाजे पर आतीं और ऋषि पत्ते छिपाने का नाटक करता।
कुर्सी माँगने वाला हिस्सा उसने नहीं दिखाया था।
उससे मजाक कम आरामदेह हो जाता।
नाश्ते पर सुनीता ने हटाने को कहा।
“अपमान तो नहीं है।”
“मुझे पसंद नहीं।”
“मौसी, किसी को आपका पूरा नाम भी नहीं पता।”
इससे उन्हें तसल्ली होनी चाहिए थी।
वह कमरे में गईं और दरवाजा बंद कर लिया।
करीब एक घंटा बिना कोई उपयोगी काम किए बैठी रहीं।
इतना अपरिचित लगा कि लगभग उठकर कपड़े तह करने लगीं।
फिर खुद को रोक लिया।
* * *
दोस्त फरीदा ने सामुदायिक हॉल की सूचना के बारे में फोन किया।
साठ वर्ष से ऊपर के खिलाड़ियों का तीन पत्ती आयोजन था। सामाजिक प्रतियोगिता, घोषित तरीका और सीमित जगहें।
फरीदा नाम लिखवाना चाहती थीं।
“आ रही हो?”
सुनीता ने कपड़ों की टोकरी देखी।
“कौन सा दिन?”
“शनिवार।”
“दोपहर का खाना—”
“शनिवार का खाना बाकी दिनों से अलग होता है?”
सुनीता हँस पड़ीं।
फिर हँसी रुक गई।
उन्होंने खुद नाम लिखवाया।
शाम को परिवार को बताया कि सुबह दस बजे से शाम तक बाहर रहेंगी।
कमला ने पूछा कि दोपहर का खाना कौन बनाएगा।
“फ्रिज में क्या है, लिख दिया है।”
“यह नहीं पूछा।”
“जानती हूँ।”
ऋषि ने फोन से सिर उठाया।
“सच में हिस्सा ले रही हो?”
“हाँ।”
“बढ़िया वीडियो बनेगा।”
“मेरा वीडियो नहीं बनाना।”
उसने झुककर नकली प्रणाम किया।
बरसों से सुनीता उस झुकने को स्नेह मानती आई थीं। यह तय करने से आसान था कि और क्या हो सकता है।
* * *
शनिवार को हमेशा वाले समय पर जाग गईं।
शरीर को नहीं पता था कि दूसरे काम तय किए गए हैं।
नहाईं। तैयार हुईं। रसोई के दरवाजे पर आकर खड़ी हो गईं।
फ्रिज में आटा था। सब्जियाँ आ चुकी थीं। गैस भरी थी।
चार सक्षम वयस्कों के खुद खाना बनाने में कोई बाधा नहीं थी।
फिर भी उनका हाथ तवे की तरफ बढ़ा।
फोन बज गया।
फरीदा नीचे ऑटो में थीं।
सुनीता ने थैला उठाया।
कमला गलियारे में आई।
“इन्हीं चप्पलों में जा रही हो?”
“आरामदेह हैं।”
“नई वाली पहन लो।”
“काटती हैं।”
वह आरामदेह चप्पलों में निकल गईं।
ऑटो में फरीदा ने कागज का छोटा पैकेट दिया।
“नाश्ता।”
सुनीता ने खोला।
कुछ पल याद नहीं आया कि पिछली बार किसी ने उनके कहने से पहले खाना लाने का कब सोचा था।
धीरे-धीरे खाया। साड़ी पर टुकड़े न गिरें, इसका ध्यान रखा।
फरीदा रास्ते के जाम को बुरा कह रही थीं। सुनीता को उस सुबह थोड़ी देर और ऑटो में बैठना बुरा नहीं लग रहा था।
* * *
पहला दौर खराब गया।
फोन बार-बार ध्यान खींच रहा था।
कमला को जीरा नहीं मिल रहा था।
पूजा पूछ रही थी कि नीले डिब्बे की सब्जी पकी हुई है या नहीं।
विनोद ने बिना सवाल के प्रेशर कुकर की तस्वीर भेजी।
सुनीता ने तीनों को जवाब दिए।
फिर एक घोषणा नहीं सुनी।
सामने बैठी महिला ने इंतजार किया। अधिकारी ने दोबारा समझाया।
“फोन बंद कर सकती हैं,” महिला बोली।
“घर से है।”
“एक घंटे बाद भी घर रहेगा।”
सुनीता को बुरा लगा।
महिला ने बहस नहीं की। चश्मा ठीक किया और अगले हाथ के लिए तैयार हो गई।
विराम में सुनीता ने परिवार को एक संदेश भेजा।
मैं खेल रही हूँ। खाना सँभाल लीजिए। निकलते समय फोन करूँगी।
फिर फोन शांत कर दिया।
वह अचानक शानदार खिलाड़ी नहीं बन गईं।
दो गलतियाँ हुईं। कुछ भरपाई की। आखिर में इतना अच्छा स्थान मिला कि दिन की चयन प्रक्रिया से आगे पहुँच गईं।
फरीदा नहीं पहुँचीं।
फिर भी दोनों की चाय उन्होंने खरीदी।
“अगली बार,” बोलीं।
सुनीता को एहसास हुआ कि अपनी खुशी मनाना संभव है, बिना किसी और की निराशा का दोष अपने ऊपर लिए।
* * *
घर में रसोई ऐसी थी जैसे अलमारियों पर शक करने वाले लोगों ने तलाशी ली हो।
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काटने वाला बोर्ड फर्श पर गीला पड़ा था।
प्लेट में दो जली रोटियाँ थीं। चावल इतना बचा था कि एक और समय चल सकता था।
कमला सिंक के पास खड़ी थी।
“अब देख लिया?”
“क्या?”
“ऐसे निकल जाओ तो क्या होता है।”
सुनीता ने थैला रखा।
ऋषि सोफे पर था।
“आखिर में बाहर से मँगवा लिया।”
पूजा कमरे से निकली।
“मैंने कोशिश की। आपकी माँ हर काम गलत बता रही थीं।”
कमला मुड़ी।
“अब मेरी गलती?”
सुनीता ने चारों को देखा।
पुराना समाधान उनके हाथों में आने लगा। प्लेटें समेटो। बोर्ड धोओ। चाय बनाओ। सबका मूड ठीक होने तक चुप रहो।
उन्होंने बचे चावल फ्रिज में रखे।
फिर रुक गईं।
“अपना सामान रखती हूँ। यहाँ आप लोग पूरा कर लीजिए।”
कमरे की तरफ जाते हुए पीछे बहस सुनाई देती रही।
घर का पहला झगड़ा था जिसे भोजन से सुलझाना उनकी जिम्मेदारी नहीं बनाया गया था।
* * *
ऋषि ने एक और वीडियो डाल दिया।
इस बार हॉल के बाहर सुनीता की तस्वीर थी। साथ में जली रोटियों की क्लिप।
मजाक था कि ताश के करियर ने परिवार की रसोइया छीन ली।
एक रिश्तेदार ने हँसते चेहरों के साथ भेजा।
सुनीता ने रिश्तेदार को जवाब नहीं दिया।
ऋषि को बैठने को कहा।
वह खड़ा रहा।
“मना किया था मुझे इस्तेमाल करने से।”
“कोई बड़ी फिल्म थोड़े है। घर का मजाक है।”
“तो अजनबियों को क्यों दिखता है?”
“आप समझती नहीं हो यह कैसे चलता है।”
“मना करना समझती हूँ।”
वह ऐसे साँस छोड़ने लगा जैसे कोई कागजी परेशानी पैदा कर दी हो।
पहली बार सुनीता ने कहा कि दोनों पोस्ट उनके सामने हटाए।
उसने बहस की।
वह इंतजार करती रहीं।
आखिर हटाईं। फोन पर हर बार उँगली ऐसे रखी जैसे एहसान कर रहा हो।
बाद में उन्होंने उसे पूजा से कहते सुना कि मौसी मुश्किल हो गई हैं।
हैरानी हुई कि शब्द कितना कम चुभा।
बरसों आसान रही थीं।
उससे एक कुर्सी नहीं मिली थी।
* * *
अगला दौर तीन सप्ताह बाद था।
वह सप्ताह में दो बार फरीदा और लता के साथ अभ्यास करतीं।
लता सेवानिवृत्त नर्स थीं। लंबी माफी सुनने का धैर्य नहीं था।
छोटे आँगन वाले घर की मालिक थीं। एक कमरा फरीदा को किराए पर दिया था। दूसरा अगले महीने खाली होना था।
कप रखते समय यह बात बताई।
सुनीता चुप रहीं।
रात को कॉपी खोली।
पेंशन लिखी। बचत लिखी। नियमित खर्च और कमला के घर में दिया जाने वाला हिस्सा लिखा।
फिर कमरे का किराया लिखा।
संख्या से जाना बिल्कुल आसान नहीं हो गया।
संभव हो गया।
दिन में कमरा देखने गईं। बाथरूम देखा। पानी, ताले, बिल और मेहमानों के बारे में पूछा।
लता ने हर सवाल का जवाब दिया।
शर्तें लिखने पर सहमति हुई।
खाना और सफाई बारी से होती।
“पकाना पसंद है तो ज्यादा दिन चुन सकती हो,” लता बोलीं। “लेकिन इसलिए मत चुनना कि वरना हम तुम्हें पसंद नहीं करेंगे।”
सुनीता ने उनकी तरफ देखा।
लता ने कंधे उचकाए।
“लोगों के साथ रही हूँ।”
* * *
जमा रकम देने से पहले उन्होंने कमला को बताया।
बहन पहले हँसी।
फिर समझ गई।
“लोग क्या कहेंगे?”
“कि मैं रहने की जगह बदल रही हूँ।”
“इस उम्र में?”
“तिरसठ की हूँ। अपना थैला उठा सकती हूँ।”
“यह तुम्हारा घर है।”
सुनीता ने रसोई की तरफ देखा।
“फिर एक दिन बाहर जाने के लिए अनुमति क्यों चाहिए?”
कमला की आँखों में पानी आ गया।
“अकेली थीं तब साथ रखा।”
“पता है।”
“भूल गईं?”
“नहीं।”
आभार सच था।
नौ साल भी सच थे।
सुनीता समझ नहीं पा रही थीं कि दोनों बातें साथ कैसे कहें, ताकि एक से दूसरी मिटाई न जाए।
आखिर बोलीं, “पति के जाने पर तुमने मदद की। तब से मैंने यहाँ मदद की। सिर्फ एक ही बात हुई हो, ऐसा मानना जरूरी नहीं है।”
कमला पहले से तह तौलिया फिर तह करने लगी।
सुनीता ने कमरे की लिखित शर्तें अपनी मेज पर रख दीं।
पहली बार निर्णय बताने से पहले उसे छिपाकर परिवार को सहज करने की कोशिश नहीं की।
* * *
वह वरिष्ठ खिलाड़ियों के फाइनल तक पहुँचीं।
आठ लोग थे।
सुनीता न सबसे बड़ी थीं, न सबसे छोटी, न सबसे अनुभवी।
एक आदमी दूसरे शहर से आया था। हॉल का खाना पसंद नहीं था, इसलिए अपना डिब्बा लाया था।
वह उन्हें तुरंत अच्छा लगा।
परिवार की दिलचस्पी बढ़ने लगी।
विनोद ने समय पूछा।
कमला रिश्तेदारों को बताने लगी कि सुनीता हमेशा से प्रतिभाशाली थीं।
ऋषि ने अच्छा वीडियो बनाने की पेशकश की।
“नहीं।”
उसके चेहरे पर चोट खाया भाव आया।
“अब मदद कर सकता हूँ।”
“पहला वीडियो हटाने को कहा था, तब भी कर सकते थे।”
आयोजन की टीम फाइनलिस्ट और उनके परिवारों पर छोटी रिकॉर्ड की गई बातचीत करना चाहती थी।
सुनीता को बुलावा आया।
ऋषि फिर उत्साहित हो गया।
परिवार का साथ दिखेगा। अच्छी बात होगी। लोगों को पसंद आएगा।
सुनीता ने निमंत्रण पढ़ा।
फिर खुद निर्माता को फोन किया।
सवालों के बारे में एक अनुरोध था।
* * *
रिकॉर्डिंग के दिन कमला ने खास मौकों वाली साड़ी पहनी।
विनोद ने काली खिड़की में बाल देखे।
ऋषि आते ही तीन सुझाव देने लगा कि कौन कहाँ बैठे।
पूजा काम से देर से पहुँची। कमरे में घुसते ही सामान्य तौर पर माफी माँग दी।
प्रस्तोता ने सुनीता का परिचय दिया। पूछा कि फाइनल तक पहुँचने में किस सहयोग ने मदद की।
ऋषि आगे झुका।
उसके बोलने से पहले प्रस्तोता ने कहा, “सुनीता चाहती थीं कि बात ठोस हो। हर वयस्क बताएगा कि घर के कौन से काम नियमित करता है?”
ऋषि मुस्कराया।
“परीक्षा है क्या?”
“नहीं,” सुनीता बोलीं। “परिचय।”
विनोद ने कहा कि जरूरी काम देखते हैं।
“इस सप्ताह कौन से?” प्रस्तोता ने सहजता से पूछा।
उन्होंने एक बिल बताया।
दो बार याद सुनीता ने दिलाया था। उन्होंने यह बात नहीं जोड़ी।
कमला ने कहा कि घर की निगरानी करती हैं।
पूजा ने अपनी नौकरी और रविवार को धोए जाने वाले कपड़ों के बारे में बताया।
फिर बोली, “रोज का खाना करीब पूरा मौसी बनाती हैं।”
कोई नहीं हँसा।
* * *
ऋषि की बारी आई।
उसने हाथ फैलाए।
“कहती हैं तो मदद कर देता हूँ।”
सुनीता ने देखा।
“आखिरी बार कब बिना मेरे कहे दिखा था कि कुछ करना है?”
उसने कैमरे की तरफ नजर की।
“क्या मौसी।”
कमरा छोटा था। असहजता सुनाई देने लगी।
सुनीता हर पुरानी गलती की सूची लेकर नहीं आई थीं।
एक साधारण दिन बताया।
चाय। नाश्ता। दोपहर के खाने की तैयारी। किराना। सामान की डिलीवरी। विनोद के डॉक्टर को फोन। रात का खाना। उसके बाद रसोई।
फिर ताश वाली शाम बताई।
“कुर्सियाँ पूरी थीं। छिलकों के पास एक थी।”
ऋषि ने नीचे देखा।
प्रस्तोता ने चुप्पी रहने दी।
कमला कहने लगी कि सुनीता को व्यस्त रहना अच्छा लगता है।
पूजा ने धीमे से रोका।
“अच्छा लगने का मतलब पूरा उन्हीं का काम होना नहीं है।”
सुनीता उसकी तरफ मुड़ीं।
माफी नहीं थी।
लेकिन उस दिन परिवार की तरफ से आया पहला उपयोगी वाक्य था।
* * *
बातचीत पूरे संदर्भ के साथ जारी हुई।
कुछ दर्शकों को अपने घर दिखे। कुछ को लगा कि सुनीता ने रिश्तेदारों को शर्मिंदा किया।
उन्होंने सप्ताह दोनों समूहों को जवाब देने में नहीं बिताया।
सामान बाँधना था।
फाइनल में दूसरा स्थान आया।
करीब एक घंटे तक निराश रहीं।
फिर फरीदा ने पूछा कि लौटने से पहले चाय पिएँगी?
हाँ कहा।
परिवार तस्वीरों के लिए देर से पहुँचा। ऋषि चाहता था कि पदक ऊँचा पकड़ें।
उन्होंने आयोजन वाली तस्वीर खिंचवाई।
फिर पदक थैले में रखा और फरीदा के साथ चली गईं।
शाम को कमला का फोन आया।
“इंतजार नहीं कर सकती थीं?”
“साथ में सवारी थी।”
“तुम्हारे लिए आए थे।”
“अगली बार खत्म होने से पहले आना।”
फोन रखकर सामान की सूची देखी।
पास में पुरस्कार का लिफाफा था।
काम आने वाले पैसे थे।
जाने का निर्णय उनके मिलने से पहले लिया जा चुका था।
* * *
घर बदलने के दिन पूजा ने बिस्तर तह करवाया।
पूछा कि मिलने आ सकती है?
“हाँ।”
“कुछ चीजें बनाना सिखाएँगी?”
“हाँ। आओ तो लिख लेना।”
पूजा मुस्कराई।
कमला दरवाजे पर खड़ी थी।
“प्रेशर कुकर भी ले जा रही हो?”
“मेरा है।”
“रोज इस्तेमाल करते हैं।”
“जानती हूँ।”
सुनीता ने कुकर डिब्बे में रखा।
बहन देखती रही। फिर रास्ते से हट गई।
लता के घर में कमरे से साबुन की महक आ रही थी। आँगन की मिट्टी गीली थी।
पहले सप्ताह की काम की बारी पढ़ी गई।
सुनीता मंगलवार और शुक्रवार को खाना बनातीं।
शनिवार लता का था।
वह बार-बार उसी पंक्ति को देखती रहीं।
पहले शनिवार जल्दी आँख खुली। रसोई में किसी की आवाज आई।
उठकर बैठ गईं। पूछने वाली थीं कि क्या चाहिए।
फिर लेट गईं।
बाद में ऋषि का फोन आया। मेहमान आने वाले थे। क्या वह घर आ सकती हैं?
सुनीता फरीदा के साथ सिनेमाघर के बाहर थीं।
“आज नहीं।”
“खिलाएँ क्या?”
“मेहमानों से पूछो, क्या पसंद है।”
वह अगला वाक्य शुरू करने लगा।
दरवाजे खुल गए।
सुनीता ने कहा कि फिल्म शुरू हो रही है और फोन रख दिया।
अगले दो घंटे उनसे कोई चटनी नहीं माँग सकता था।
फरीदा से अपना टिकट लिया।
इस बार सीट उनकी थी।