1. DiwaX कथा: वह चाबी जो अब नहीं लगी
नंदिनी ने चाबी तीन बार घुमाने की कोशिश की। तब सुरक्षा कर्मी ने कहा कि नए ताले को खरोंचना बंद करे।
पिता का घर बिक चुका था। अंदर वही परदे थे जिन्हें उसने धोया था, माँ की साड़ियों वाली अलमारी थी और वह कैरम बोर्ड जिस पर उसने और रिया ने खेलना सीखा था। दोनों बहनें अलग शहरों में काम करती थीं। संपत्ति के कागज़ चचेरे भाइयों के पास थे। संजय ने इसे अस्थायी व्यवस्था कहा था।
अब वह गेट के पीछे खड़ा कह रहा था कि उन्हें ध्यान से पढ़ना चाहिए था।
रिया एक घंटे बाद आई। बहन को गले लगाने के बजाय पूछा कि उसने संजय पर भरोसा क्यों किया।
“क्योंकि तुम यहाँ नहीं थीं।”
वाक्य ठीक वहीं लगा जहाँ लगाना था। उनका झगड़ा कपड़ों के उन दो बैगों के पास हुआ जिन्हें संजय ने बाहर रख दिया था। उसने बरामदे से देखा, फिर दरवाज़ा बंद कर दिया।
ग्यारह महीने बहनें सिर्फ कागज़ों के बारे में छोटे संदेशों से बात करती रहीं। तैंतीस साल की रिया सहकर्मी के खाली कमरे में सोती थी। उनतीस साल की नंदिनी अस्पताल के पास हॉस्टल में रहने लगी। दोनों को लगता था कि दूसरी ने बचने का कोई आसान रास्ता खोज लिया होगा।
फिर परिवार के समूह में तस्वीर आई। पुराने कैरम बोर्ड के पास संजय और उसका भाई रितेश खड़े थे। ज़िला डबल्स चैंपियनशिप में प्रवेश की घोषणा थी।
“हमारे परिवार के चैंपियन।”
नंदिनी ने तस्वीर रिया को भेजी। नीचे लिखा—इन्हें हमने ही सिखाया था।
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2. कमरे के नहीं, बोर्ड के आमने-सामने
वे उधार के उपकरण वाले सामुदायिक हॉल में मिलीं। रिया पहले पहुँची। नंदिनी आई तो वह स्ट्राइकर का किनारा जाँचने का दिखावा करने लगी।
किसी ने तुरंत माफ़ी नहीं माँगी। पहला साझा काम था हिलते स्टैंड को बराबर करना।
रिया ताकत से खेलती थी। नंदिनी ऐसे खेलती जैसे हर चूकी गोटी की कीमत बाद में उससे वसूली जाएगी। पंद्रह मिनट में फिर बहस हो गई।
“तुम सब कुछ मेरे खत्म करने के लिए छोड़ देती हो,” रिया बोली।
“और तुम स्थिति बनाने से पहले हर चीज़ मार देती हो।”
दोनों बातें बोर्ड की थीं। सिर्फ बोर्ड की नहीं थीं।
प्रतियोगिता चार महीने बाद थी। डबल्स की साथी आमने-सामने बैठतीं। चल रहे बोर्ड में शब्द या इशारे से सलाह नहीं दे सकती थीं। हर स्ट्रोक को पारिवारिक चर्चा बनाए बिना उपयोगी स्थिति पहचाननी थी।
नंदिनी ने प्रयोग सुझाया। अभ्यास ऊपर से रिकॉर्ड करेंगे और चुपचाप देखेंगे। जब भी किसी को दूसरी का शॉट आसान लगेगा, वीडियो रोककर उसी खिलाड़ी की तरफ से स्थिति देखेंगे।
तीन बार रिया का आसान पॉकेट दूसरी गोटी के पीछे छिपा निकला। दो बार नंदिनी के सुरक्षित स्ट्रोक ने प्रतिद्वंद्वी को सीधा फिनिश दे दिया।
अंत तक बहस करने का मन नहीं रहा।
रिया ने रिकॉर्डिंग सहेजी। नंदिनी ने तारीख और पहली विवादित स्थिति का विवरण जोड़ा।
ग्यारह महीने में पहली बार दोनों ने साथ कुछ बनाया था।
3. सौ स्ट्रोक जिन्हें कोई नहीं देखता
अभ्यास काम के समय के बीच मुश्किल से बैठता था। नंदिनी कभी अस्पताल की शिफ्ट के बाद थकी आँखों से आती। ग्राहक कॉल के बाद रिया की आवाज़ में चिड़चिड़ापन रहता।
वे सीधी गोटियों से शुरू करतीं। फिर वही शॉट अलग ताकत से दोहरातीं। गोटी गिरना ही पर्याप्त नहीं था। स्ट्राइकर और आसपास की गोटियाँ कहाँ रुकतीं, यह भी देखना था।
रिया को ताकत कम करना पसंद नहीं था। उसे नरमी हिचक लगती थी। नंदिनी को लगातार आक्रामक रन का अभ्यास बुरा लगता था। अधूरा फिनिश उसे प्रमाण लगता कि कोशिश ही नहीं करनी चाहिए थी।
इसलिए दोनों ने जिम्मेदारियाँ बदलीं।
रिया को बाकी गोटियाँ बिखेरे बिना फँसी गोटी खोलनी थी। नंदिनी को बचाव में लौटने से पहले उपलब्ध तीन गोटियाँ लगातार डालनी थीं।
पहले सप्ताह अहंकार चोटिल हुआ और आँकड़े खराब रहे। दोनों दर्ज किए गए।
फिर छोटा बदलाव दिखा। रिया स्ट्राइकर वहीं रोकने लगी जहाँ चाहती थी। नंदिनी पहला स्ट्रोक लेने से पहले दूसरा सोचने लगी।
उन्होंने क्वीन के फैसले भी दोहराए। लाल गोटी डालना पर्याप्त नहीं था। कवर उपलब्ध होना चाहिए था। हर आसान गोटी पहले खत्म करने के बजाय अपनी एक सुलभ गोटी बचाना सीखा।
कवर चूकता तो स्थिति फिर लगातीं। भाषण नहीं होता। यह नहीं कहा जाता कि एक बहन हमेशा से भरोसे लायक नहीं थी।
एक शाम नंदिनी छह बार चूकी। रिया चुपचाप कैमरा पास लाई। “देखते हैं उँगली कहाँ जा रही है।”
यह पहली मदद थी जिसमें ताना नहीं छिपा था।
4. पुराना घाव सबके सामने
पहली अभ्यास प्रतियोगिता में वे दो कॉलेज शिक्षकों से हार गईं। निर्णायक गलती रिया की थी।
उसने अंदाज़ से क्वीन डाली, फिर कवर चूक गई। क्वीन वापस बोर्ड पर आई। दो टर्न बाद विरोधियों ने उसे सुरक्षित किया और बोर्ड खत्म कर दिया।
संजय दूसरा मुकाबला देखने आया था। परिणाम की मेज़ के पास रुका।
“अभी भी सोचने से पहले प्रदर्शन?” उसने रिया से पूछा। फिर नंदिनी से कहा, “तुम्हें अधिक स्थिर साथी खोजनी चाहिए।”
एक पल नंदिनी को पुराना आसान रास्ता दिखाई दिया। उससे सहमत हो जाए। रिया को मुश्किल व्यक्ति बताए। कमरे को सहज रहने दे।
उसने बैग उठाया। “हम मैच साथ देखकर समीक्षा करेंगे।”
बाहर दस कदम चलने के बाद रिया बोली। “शॉट का बचाव करने की जरूरत नहीं थी। खराब था।”
“मैंने शॉट का बचाव नहीं किया।”
वे सीढ़ियों पर बैठकर रिकॉर्डिंग देखने लगीं। रिया ने आसान शॉट छोड़ा था जो भरोसेमंद कवर बचाता। उसने रोशनी का बहाना जोड़े बिना माना।
नंदिनी ने पुरानी बात मानी। उसने संजय पर इसलिए भी भरोसा किया था क्योंकि फिर परिवार से भिड़ने की ताकत नहीं बची थी।
रिया ने सड़क देखी। “मैंने तुम्हें दोष दिया क्योंकि खुद के वहाँ न होने को सह नहीं पा रही थी।”
इन वाक्यों ने घर नहीं लौटाया। माँ की अलमारी नहीं मिली।
लेकिन उठते समय बोर्ड के केस का एक हैंडल रिया ने लिया और दूसरा नंदिनी ने। अब वजन दोनों तरफ बँटा था।
5. किसी और के लिए छोड़ी स्थिति
एक महीने बाद उन्होंने पहला क्वालिफाइंग मुकाबला जीता। निर्णायक क्रम में कोई शानदार रिबाउंड नहीं था।
रिया ने फँसी गोटी खोली और वहाँ छोड़ी जहाँ सामने बैठी नंदिनी उसे ले सकती थी। विरोधी उसे बिगाड़ नहीं पाया। नंदिनी की बारी आई तो उसने वह गोटी डाली और दो साफ शॉट और पूरे किए।
बोर्ड के दौरान बहनें कुछ नहीं बोलीं। समझ अभ्यास में बनी थी, जहाँ एक ही स्थिति को चारों तरफ से बार-बार देखा था।
अगले दौर ने अलग परीक्षा ली। प्रतिद्वंद्वी आसान समूह तोड़ते और मुश्किल कोण बनाते रहे। रिया का मन हुआ ताकत से जवाब देकर बोर्ड खोल दे। स्ट्राइक से पहले उसने वही पुरानी इच्छा पहचान ली।
उसने सिर्फ एक रास्ता खोला। बाकी छोड़े।
अवसर आने पर नंदिनी ने रास्ता लिया। अगला शॉट चूका, लेकिन चूक से सामने वाले को आसान फिनिश नहीं मिला। टर्न चलते रहे। अंत में रिया ने महीनों से दोहराया संकरा कट पूरा किया।
वे आगे बढ़ गईं।
उसी चैंपियनशिप की सूची में संजय का नाम था। उसने संदेश भेजा कि रात के खाने पर परिवार की शर्मिंदगी समाप्त कर सकते हैं।
रिया ने संदेश नंदिनी को भेजा और इंतज़ार किया। इस बार किसी ने अकेले जवाब नहीं दिया।
उत्तर छोटा था—कागज़ ईमेल पर। मुकाबला बोर्ड पर।
फिर फोन अलग रखकर संकरे कट का अभ्यास किया। एक बार सफल हो जाना उसे अपने आप होने वाला शॉट नहीं बनाता था।
6. वह बुलावा जिसे वापस नहीं लिया जा सकता था
दो कठिन मुकाबलों से बहनें फाइनल में पहुँचीं। सेमीफाइनल में अंत के पास नंदिनी ने सीधी गोटी चूकी। पुरानी शर्म तेजी से लौट आई।
सामने रिया के हाथ स्थिर रहे। न आह, न उठी भौंह, न कोई संकेत। खामोशी में आरोप के बजाय भरोसा था।
अपनी बारी आई तो रिया ने असंभव बचाव की कोशिश नहीं की। विरोधी की आखिरी गोटी का सीधा रास्ता रोका और कठिन शॉट मजबूर किया। वह चूका। नंदिनी को फिर मौका मिला और उसने खत्म किया।
सूची के दूसरी तरफ संजय और रितेश थे। उनकी जीतें स्पष्ट थीं। वे केवल घमंडी नहीं थे, अच्छे खिलाड़ी भी थे। बहनों के जाने के बाद उसी पारिवारिक बोर्ड पर वर्षों खेले थे।
फाइनल तीन गेम में से दो जीतने का था।
स्थल पर रिश्तेदार भाइयों के आसपास जुटे थे, जैसे परिवार की तस्वीर के लिए ट्रॉफी पहले ही तैयार हो। एक बुआ ने बहनों को हटने को कहा ताकि साफ फोटो ले सके।
रिया हट गई। नंदिनी भी। किसी ने बहस नहीं की।
कुछ मिनट बाद आयोजक ने चारों फाइनलिस्ट बुलाए। बहनें सामने की सीटों पर बैठीं। चचेरे भाइयों ने दूसरे दोनों तरफ जगह ली।
अब कोई उन्हें हटने को नहीं कह सकता था।
अंपायर ने उपकरण जाँचे, औपचारिकताएँ पूरी कीं और खेल शुरू कराया।
संजय का पहला ब्रेक तेज और कारगर था। वह उन्हें आने का पछतावा कराना चाहता था।
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7. पहला गेम गया
भाइयों ने पहला गेम 25–12 से जीता। रितेश के कोण वाले शॉट उम्मीद से साफ थे। संजय बार-बार ऐसी स्थिति में पहुँच रहा था जहाँ बिना टर्न छोड़े गोटियाँ डालता रहता।
रिया को लगा कहानी फिर पुरानी दिशा में जा रही है। सफल चचेरे भाई। भावुक बहनें। जरूरत पड़ने पर ही बुलाई जाने वाली औरतें।
ब्रेक में उसने और आक्रामक तरीका सुझाना शुरू किया।
नंदिनी ने सिर हिलाया। “हम उन्हें खुले बोर्ड पहले ही दे रहे हैं। सब बिखरता है तो वे अच्छा खत्म करते हैं।”
रिया ने पिछला बोर्ड याद किया। उसके जोरदार स्ट्रोक ने अपनी गोटी को बचाने वाली रुकावट हटाई थी। संजय ने रास्ता तुरंत इस्तेमाल किया।
लौटने से पहले उन्होंने बदलाव तय किया। सिर्फ जरूरी रास्ता खोलेंगे। भाइयों को स्थिति हल करने देंगे, साफ पॉकेट की कतार नहीं देंगे।
दूसरे गेम में रिया ने नियंत्रित रिबाउंड से एक गोटी ढीली की, पड़ोस नहीं बिखेरा। नंदिनी ने क्वीन लेने से पहले कवर बचाया। भाइयों ने बचे समूह को ताकत से खोलना चाहा तो अपनी गोटियाँ कुशन के पास असुविधाजनक जगह छोड़ दीं।
बहनें कुछ बोर्ड हारीं भी। बदलाव जादू नहीं था। लेकिन खेल उस रूप में धीमा हुआ जिसका उन्होंने अभ्यास किया था।
इक्कीस पर रहते हुए रिया ने ऐसा बोर्ड पूरा किया जिसने उन्हें जीत के अंक तक पहुँचा दिया।
एक-एक गेम।
बुआ ने फोन नीचे कर लिया। अब दूसरी तस्वीर भी लेनी पड़ती। रिया ने उस ओर नहीं देखा। उसे आखिरी गेम खेलना था।
8. वह बोर्ड जो सब खत्म कर सकता था
निर्णायक गेम में भाई तेईस पर पहुँच गए। बहनें बीस पर थीं। अगला बोर्ड मुकाबला खत्म कर सकता था।
बहनों की सफेद गोटियाँ थीं। शुरुआती टर्न के बाद बोर्ड भरा हुआ था। नंदिनी ने क्वीन पर लुभावना शॉट छोड़ा क्योंकि उसके बाद भरोसेमंद कवर नहीं दिखाई दे रहा था।
संजय मुस्कराया। उसे लगा वह डर गई है।
नंदिनी ने सफेद गोटी डाली। अगले स्ट्रोक से समूह में फँसी दूसरी गोटी खोली। वह पॉकेट में नहीं गई। टर्न चला गया, लेकिन स्थिति पहले से बेहतर थी।
भाइयों ने कई काली गोटियाँ साफ कीं। रिया ने दो सफेद डालकर जवाब दिया। फिर नियंत्रित स्ट्रोक से एक बची सफेद गोटी नंदिनी की तरफ सुलभ छोड़ी और दूसरी को विरोधी की सीधी लाइन से बाहर रखा।
उसने अनुमोदन के लिए बहन की ओर नहीं देखा। निगाह भी संकेत बन सकती थी। बोर्ड पर चुप्पी जरूरी थी।
रितेश कठिन कोण चूक गया। बारी घूमकर फिर आई।
दो काली गोटियाँ बची थीं। बहनों की तीन सफेद और क्वीन संभालनी थी। नंदिनी ने लाल गोटी देखी। फिर उपलब्ध कवर। फिर उसके बाद बचने वाली आखिरी सफेद।
दिन में पहली बार पूरा रास्ता एक साथ बैठ रहा था।
उसका हर हिस्सा खुद खत्म करना जरूरी नहीं था। यही बात चार महीने पहले वह समझ नहीं पाती।
उसने स्ट्राइकर रखा, उँगली स्थिर की और पहली सफेद गोटी पॉकेट में डाल दी। अब अगला स्ट्रोक उसी का था।
9. जो शॉट उसने नहीं लिया
नंदिनी के अगले स्ट्रोक पर क्वीन गिरी। उसने तुरंत इंतज़ार कर रही सफेद से उसे कवर किया। आखिरी सफेद कुशन के पास थी। उसकी तरफ से कठिन, रिया की तरफ से बेहतर।
एक सफल स्ट्रोक सब खत्म कर सकता था। जोरदार रिबाउंड सफेद तक पहुँचता, उसे डालता और हर तस्वीर की नायिका नंदिनी बन जाती।
लेकिन चूकता तो भाइयों की दोनों काली गोटियाँ खुल सकती थीं और आसान फिनिश मिल जाता।
चार महीने उसने इसी प्रलोभन का अभ्यास किया था।
नंदिनी ने नरम स्थिति बनाने वाला स्ट्रोक चुना। सफेद अपनी रुकावट से निकली, लेकिन पॉकेट के बाहर रही। स्ट्राइकर सुरक्षित रुका। उसका टर्न खत्म हो गया।
दाहिनी तरफ बैठा संजय आगे झुका। उसे खुला बोर्ड चाहिए था। उसे मुश्किल कोण मिला था। पहली काली सिर्फ संकरे रास्ते से पहुँच सकती थी। दूसरी अभी भी खराब जगह थी।
उसने जरूरत से अधिक जोर लगाया। काली पॉकेट के किनारे से टकराई और वापस बोर्ड पर आ गई।
अब रिया की बारी थी।
आखिरी सफेद वहीं थी जहाँ नंदिनी ने छोड़ी थी। रिया ने शॉट, गति और कुशन के पास की छोटी गुंजाइश पहचानी। दोनों तरफ से इतने वीडियो बनाए थे कि वह दो अलग समस्याएँ लगना बंद हो गई थी।
स्ट्राइकर सफेद से टकराया। गोटी आखिरी इंच पार करके गायब हो गई।
दो काली बचीं। सही कवर की गई क्वीन के साथ पाँच अंक मिले। बीस पच्चीस हो गया।
रिया ने पहली खुशी की आवाज़ नहीं सुनी। वह नंदिनी को देख रही थी।
10. अब बोर्ड कोई अकेला नहीं उठाता
अंपायर ने परिणाम घोषित किया। संजय आखिरी पॉकेट देखता रहा, जैसे इंतज़ार करने से सफेद लौट आएगी।
रितेश ने कुर्सी पीछे की। फिर याद आया कि नतीजे पर हस्ताक्षर बाकी हैं। वह दोबारा बैठ गया।
औपचारिकताएँ पूरी होने के बाद ही बहनें उठीं। रिया पहले नंदिनी तक पहुँची। दोनों के हाथ में स्ट्राइकर होने से आलिंगन अटपटा था। फिर भी किसी ने जल्दी नहीं छोड़ा।
पुरस्कार में भाइयों की जगह उपविजेता वाली थी। जिस बुआ ने हटने को कहा था, अब बहनों को तस्वीर के बीच बुला रही थी।
वे पहले से वहीं थीं।
बाद में संजय आया। “कम से कम अब परिवार को बँटा हुआ दिखाना बंद कर सकते हैं।”
नंदिनी ने मेज़ से ट्रॉफी उठाई। “मैच खत्म है। कागज़ों का जवाब अभी बाकी है।”
स्वर समतल था। रिया साथ खड़ी थी। एक बहन से अलग वादा करके दूसरी को दूसरी कहानी नहीं सुनाई जा सकती थी।
बुआ ने परिवार के समूह में भेजने के लिए परिणाम की प्रति माँगी। संजय ने हाथ बढ़ाया, मगर नंदिनी ने सीधे बुआ को दे दी। हस्ताक्षर वाली शीट पर दोनों बहनों के नाम भाइयों से ऊपर थे।
शाम को खाना खरीदकर उन्होंने अभ्यास की रिकॉर्डिंग खोली। आखिरी स्थिति बनाने वाला स्ट्रोक दो बार देखा। हँसी आई कि वीडियो में वे कुछ सेकंड कितने लंबे लग रहे थे।
फिर रिया ने अगला अभ्यास समय बुक किया।
हॉल के दरवाज़े पर नंदिनी ने बोर्ड के केस का एक हैंडल उठाया। रिया ने दूसरा लिया।
इस बार किसी को कहना नहीं पड़ा।
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