1. Dream55 कहानी: वह कुर्सी जो मैंने रोक रखी थी
बेटी के आने से पहले ही मैंने अपने पास वाली कुर्सी रोक ली थी। उसकी पीठ पर स्वेटर डाला, सामने पानी रखा और दूसरे खिलाड़ियों से कहा कि मैं समझा दूँगा तो ऋतु को मेज की चाल समझ आ जाएगी। वह बत्तीस साल की थी। चार वर्षों से प्रतिस्पर्धी रमी खेल रही थी। फिर भी मेरे मन में वही पुरानी तस्वीर थी—मेरी कोहनी के पास बैठी बच्ची, मुझसे सीखती हुई।
वह अपना स्कोर वाला फोल्डर लेकर आई। स्वेटर देखकर उसने पूछा कि सीटों की पर्ची में उसका स्थान कहाँ आया है। मैंने हँसकर कहा कि परिवार के लिए इतना फेरबदल कोई बुरा नहीं मानेगा। आयोजक ने मना किया। ऋतु मेरे सामने बैठी।
हमारी इस काल्पनिक मोहल्ला लीग में छह मुकाबले होने थे। हर आमने-सामने के मुकाबले में अधिकतम पाँच बाजियाँ थीं; पहले तीन जीतने वाला विजेता। सभी खिलाड़ी पूरा सत्र खेलते। अंत में अंकतालिका के सबसे ऊपर के दो खिलाड़ियों के बीच अलग फाइनल होता, उसी पाँच बाजियों वाले ढाँचे में।
मैं उसे अपने पास चाहता था क्योंकि वह तस्वीर मुझे समझ में आती थी। सामने बैठकर वह मुझे हरा सकती थी।
पहली बाजी से पहले मैंने दर्शकों को बताया कि उसे सब कुछ मैंने सिखाया है। ऋतु ने फोल्डर रख दिया।
“आपने नियम सिखाए थे,” उसने कहा। “अब मुझे खेलने दीजिए।”
तब मुझे उसमें बदतमीजी सुनाई दी थी। अब याद करता हूँ तो थकान सुनाई देती है। वह यह बात पहले अकेले में, फिर संदेशों में और फिर आना कम करके समझाने की कोशिश कर चुकी थी।
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2. शुरुआती दो हार
हमारे बीच दूरी आने की कोई एक नाटकीय तारीख नहीं थी। उसकी माँ और मैं अलग रहने लगे, तो मैंने ऋतु की हर मुलाकात को पक्ष चुनने जैसा मान लिया। वह माँ के साथ खाना खाती तो मैं शामें गिनता। रविवार के अभ्यास में नहीं आती तो पूछता कि अब कौन अधिक जरूरी हो गया। अनुवाद के उसके काम में समय सीमा बदलती रहती थी। मैं उन समय सीमाओं को बहाना कहता।
लीग के पहले मुकाबले में हम दोनों हारे। मुझे यूसुफ ने हराया। वह धैर्य से खेल रहा था, जबकि मैं बार-बार दूसरी मेज की ओर देख रहा था कि बेटी मुझे देख रही है या नहीं। ऋतु कविता से हारी। हमारी बहस उसकी शुरुआती बाजियों तक चली गई थी। दोनों प्रतिद्वंद्वी अच्छी रमी खेल रहे थे; हम उन्हें अपने पारिवारिक झगड़े का छोटा हिस्सा बना रहे थे।
स्कोर पर हस्ताक्षर के बाद ऋतु मेरे पास आई। मैंने बताना शुरू करना चाहा कि उसे दूसरी बाजी में क्या बचाकर रखना चाहिए था।
“आपने मेरे पत्ते देखे ही नहीं,” उसने कहा।
“तुम्हारी आदतें जानता हूँ।”
“सत्रह साल की उम्र की आदतें जानते हैं।”
उस रात वह खाने पर नहीं आई। मैं दो थालियाँ लगाकर बैठा रहा और सोचता रहा कि उसने मुझे सजा दी है। कई हफ्ते बाद समझ पाया कि मैंने निमंत्रण के साथ भाषण जोड़ दिया था और उसी भाषण को प्यार कह रहा था।
अंकपत्र पर दो सामान्य हार थीं। मैं उनमें बहुत बड़ा पारिवारिक कारण ढूँढ़ रहा था। यूसुफ की सही घोषणा और कविता के लगातार अच्छे फैसले बता रहे थे कि हमने सामने के पत्तों पर ध्यान देना छोड़ दिया था।
3. एक कॉपी जिसमें मेरा नाम नहीं था
दूसरे मुकाबले के दिन ऋतु जल्दी आई और कविता के साथ अभ्यास की दो बाजियाँ खेलीं। मैंने देखा कि उसने एक बेकार बादशाह को दो उपयोगी छोटे पत्तों से अलग कर दिया। बरसों पहले मैंने उसे सिखाया था कि बड़े पत्तों की जोड़ी जल्दी मत छोड़ो। अब वह उस सलाह को बिना सोचे नहीं मान रही थी।
खेल के बाद वह पानी लेने गई तो फोल्डर खुला रह गया। सामने के पन्ने पर लिखा था: फैसला करते समय मुझे क्या पता था। नीचे तीन खाने थे—दिखे हुए पत्ते, मेरे विकल्प, नतीजा। उसमें यह खाना नहीं था कि पापा क्या करते।
मैंने अगला पन्ना नहीं पलटा। इतना छोटा संयम भी मुझे शर्मनाक हद तक कठिन लगा।
मेरे अपने अभ्यास में ज्यादातर वही बाजियाँ लौटती थीं जो मैं जीता था। उस सप्ताह मैंने एक हारी हुई बाजी दोबारा बनाई। तब पता चला कि जो जरूरी पत्ता थोड़े से अंतर से नहीं मिला, वह मुझे याद था; लेकिन एक अटकी हुई जोड़ को बचाए रखने में गँवाई तीन बारी याद नहीं थीं। स्मृति मुझे बदकिस्मत बना रही थी। लिखे हुए क्रम में मेरी जिम्मेदारी दिख रही थी।
अगले अभ्यास में मैंने यूसुफ से पूरी हो चुकी बाजी के दो पुराने मोड़ समझने को कहा। पत्ते खेल खत्म होने पर खोले और देखा कि उस समय वास्तव में क्या जानकारी उपलब्ध थी। कभी फैसला ठीक था, नतीजा खराब। कभी मैं जिद कर रहा था और अच्छा पत्ता मिल जाने से बच गया था।
दोनों बातें अलग थीं। अपने पक्ष में होने पर मैं वर्षों से दोनों को अनुभव कहता आया था।
4. दो अलग रास्ते
ऋतु ने दूसरा और तीसरा मुकाबला जीता। मैंने दूसरा जीता, तीसरा हारा और किसी नतीजे की सफाई देने के लिए उसे फोन नहीं किया। हम अलग मेजों पर ऐसे प्रतिद्वंद्वियों से खेल रहे थे जिनकी अपनी योजनाएँ थीं। हमारा पूरा सत्र केवल दो रिश्तेदारों की खटपट नहीं था।
अभ्यास में ऋतु की सबसे बड़ी समस्या जरूरत से ज्यादा संभावनाएँ बचाकर रखना थी। तेरह पत्तों में हर आकर्षक जोड़ी नहीं रखी जा सकती थी। वह पूछने लगी कि कौन-सी अधूरी जोड़ पूरी होने का उपयोगी रास्ता रखती है, कौन-सा पत्ता एक से ज्यादा रास्तों में मदद करता है और किसे वह केवल इसलिए पकड़े है क्योंकि देखने में अच्छा लगता है।
मेरी समस्या उलटी थी। एक बार पत्ते सजा लेता तो उसी बनावट की रक्षा करता रहता। यूसुफ ने खेल खत्म होने पर हाथ की तस्वीर लेकर उसे दूसरे क्रम में सजाने का अभ्यास दिया। एक व्यवस्था में सेट का हिस्सा बना पत्ता दूसरी में सीक्वेंस में काम आ सकता था। हर हाथ बच नहीं जाता था, लेकिन मुझे अपनी बंद नजर दिखाई देने लगी।
चौथे मुकाबले से पहले हम छज्जे के नीचे मिले। बारिश किनारे से बह रही थी। मैंने पूछा कि उसने खाना खाया या नहीं। उसने हाँ कहा। लगभग बोल दिया कि मेरा इंतजार करना चाहिए था।
इसके बजाय पूछा कि उसका प्रतिद्वंद्वी कैसा खेला।
उस सत्र में पहली बार उसने एक वाक्य से लंबा जवाब दिया। हम टपकते पानी के पास खुले ढेर पर छोड़े गए एक पत्ते की चर्चा करते रहे। मैं भीगकर घर लौटा, लेकिन साथ कोई नई शिकायत नहीं थी।
5. हमारे बीच की अंकतालिका
छह मुकाबलों के बाद ऋतु के पाँच मैच जीते हुए थे और एक हारा हुआ। मेरे चार जीत और दो हार थे। पाँचवें मुकाबले में हमारी सीधी भिड़ंत हुई थी। उसने मुझे तीन बाजी बनाम दो से हराया। मैंने पूरी कोशिश की थी। निर्णायक बाजी में छोड़े गए एक पत्ते से उसे मदद मिली, जिसकी मुझे निश्चित जानकारी नहीं हो सकती थी। उसने भी यह दिखावा नहीं किया कि मैंने जानबूझकर उपहार दिया है।
घोषित अंकतालिका के अनुसार हम फाइनल में पहुँचे। मुझे बिना किसी शर्त के खुश होना चाहिए था। लेकिन एक परिचित ने कहा कि मेरी शिक्षा ने आखिर एक योग्य उत्तराधिकारी तैयार कर दिया है, तो मैंने सिर हिला दिया। ऋतु सुनने की दूरी पर थी।
उसने हंगामा नहीं किया। फोल्डर बंद किया और चली गई। उसके बाद की खामोशी बहस से ज्यादा बुरी थी, क्योंकि मुझे पता था कि मैंने क्या किया है।
उस शाम मैंने संदेश लिखा: तुमने अपने खेल पर जितनी मेहनत की है, मैंने उसका बड़ा हिस्सा देखा भी नहीं। मुझे उसका श्रेय नहीं लेना चाहिए था।
अगला वाक्य मिटा दिया। वह “लेकिन तुम्हें भी समझना चाहिए” से शुरू हो रहा था।
अगली दोपहर उसका जवाब आया। धन्यवाद। फाइनल चार बजे है। समय पर आइएगा।
वह सजाकर दी गई माफी नहीं थी। एक सामान्य व्यवस्था थी, और मैं सामान्य व्यवस्था करने का अधिकार भी खोने के करीब आ गया था। साढ़े तीन बजे मैं पत्ते, चश्मा और अपना सामान लेकर हॉल पहुँच गया। किसी और की कुर्सी रोकने वाला स्वेटर इस बार साथ नहीं था।
6. वह बाजी जो मैंने ठीक से जीती
फाइनल शुरू होने से पहले प्रारूप सबको बताया गया। पहले तीन वैध जीत हासिल करने वाला मुकाबला जीतेगा। हर घोषणा की जाँच होगी, उसके बाद परिणाम दर्ज होगा।
पहली बाजी मैंने जीती। मेरी शुद्ध सीक्वेंस जल्दी बन गई थी, लेकिन दो जोड़ अधूरी थीं। ऋतु ने खुले ढेर से जो पत्ता उठाया, उससे अपने एक संभावित त्याग पर मुझे दोबारा सोचना पड़ा। उससे उसका पूरा हाथ नहीं दिख गया था। मैंने दूसरा पत्ता छोड़ा, अपना रास्ता थोड़ा धीमा होने दिया और उसके घोषणा कर पाने से पहले बाकी सीक्वेंस पूरी कर ली।
मेरी वैध घोषणा के बाद उसने जाँच के लिए अपने पत्ते फैलाए। वह बहुत करीब थी। मन हुआ कि कहूँ, धैर्य रखना मैंने ही सिखाया था। वाक्य अपने आप ऊपर आ गया, जैसे उँगलियों की कोई खराब आदत।
इसके बजाय मैंने कहा, “इस हाथ को रोककर खेलना मुश्किल था।”
उसने सिर हिलाया। “आपने सही पत्ता छोड़ा।”
उस जवाब से जो खुशी हुई, वह माँगी हुई तारीफ से अलग थी। वह ऐसे प्रतिद्वंद्वी से बात कर रही थी जिसके निर्णय का सम्मान करती थी।
विराम में मैंने उसकी गलतियाँ निकालने के बजाय अपनी आखिरी तीन बारी देखीं। एक बाजी की बढ़त हमारे पूरे अतीत का फैसला नहीं थी। अधूरे मैच में उपयोगी बढ़त थी। कमरे के दूसरी ओर ऋतु पानी पीकर कुछ पल आँखें बंद किए रही। वापस आई तो उसके चेहरे पर सुधार सुनने के लिए तैयार बेटी का भाव नहीं था। वह अगली बाजी खेलने आई थी।
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7. उसके जवाब में तीन बादशाह थे
दूसरी बाजी में मैंने परिचय को जानकारी मान लिया। ऋतु ने पत्ते उसी छोटे पंखे की तरह पकड़े थे जैसे कभी हमारे खाने की मेज पर पकड़ती थी। मुझे याद आया कि वह अधूरी सीक्वेंस एक किनारे रखती थी। मैंने कल्पना बना ली कि उसे क्या चाहिए होगा।
उसके पत्ते पकड़ने का ढंग भरोसेमंद प्रमाण नहीं था। खिलाड़ी व्यवस्था बदल सकता था। पुरानी आदत बनी भी रहे तो उससे पत्तों के चेहरे नहीं दिखते। खुले ढेर से लिए और उस पर छोड़े गए पत्ते ही साफ सार्वजनिक जानकारी थे।
उसने एक बादशाह छोड़ दिया, जिसे मैं समझ रहा था कि वह जरूर सँभाले रखेगी। कुछ बारी बाद उसने दो सही सीक्वेंस और सेट के साथ घोषणा की। हाथ खुला तो दिखा कि चौथा बादशाह रखने से उपयोगी सीक्वेंस का पत्ता बाहर हो जाता। उसके सेट के लिए तीन बादशाह पर्याप्त थे।
मैं अपनी यादों वाली बेटी के परिचित निर्णय का इंतजार कर रहा था। सामने बैठी स्त्री ने सामने के हाथ के लिए बेहतर निर्णय लिया था।
स्कोर एक-एक हो गया।
जाँच पूरी होने पर ऋतु ने दर्शकों की तरफ नहीं देखा। उसने आयोजक से अगली बाजी शुरू करने को कहा। उसकी वह सीधी व्यस्तता किसी विजयी भाषण से ज्यादा मेरे अहंकार को लगी। मेरी प्रतिक्रिया उसकी जीत का केंद्र नहीं थी। उसे अभी दो बाजियाँ और जीतनी थीं।
मैंने पानी का गिलास उठाया और पहली बार साफ देखा कि उसकी एकाग्रता मुझे अपमानित करने के लिए नहीं थी। वह अपने खेल को पूरा महत्व दे रही थी।
8. वह पत्ता जिसे उसने जाने दिया
तीसरी बाजी हम दोनों के लिए उलझी हुई थी। मैंने शुद्ध सीक्वेंस बना ली, लेकिन एक अकेला इक्का जरूरत से ज्यादा देर रखा क्योंकि मुझे शानदार अंत चाहिए था। ऋतु ने कई बारी से अटके खाली स्थान वाली जोड़ छोड़ दी। उसकी नई बनावट एक साथ तैयार नहीं मिली। दो काम के पत्तों और एक समझदार त्याग से उसने हाथ में आपस में टकराती संभावनाएँ कम कीं।
वह बाजी भी जीती। दो-एक।
चौथी में मैंने हर हरकत शांत दिखाने की कोशिश की। मेज के नीचे पैर लगातार हिल रहा था। ऋतु की पहली उपयोगी बनावट छोटे ईंट वाले पत्तों की सीक्वेंस थी। उसने उसे चार पत्तों तक बढ़ने दिया। यह नहीं माना कि तीन काफी हैं तो चौथा हमेशा बेकार ही होगा।
अलग पान की सीक्वेंस बन गई। उसके तीन बादशाह तीन अलग निशानों के थे। बाकी समस्या चिड़ी के दस और गुलाम में थी। वह जुड़े हुए ये दो पत्ते रख सकती थी, या अकेली ईंट की बेगम से कोई नई जोड़ बनने की आशा सँभाल सकती थी।
उसने अकेली बेगम छोड़ दी। यह अगले पत्ते की भविष्यवाणी नहीं थी। उसने सुंदर दिखते अकेले पत्ते के बजाय साफ दिखाई दे रहे रास्ते को जगह दी थी।
मैंने बंद गड्डी से पत्ता उठाया, लेकिन अपना हाथ पूरा नहीं कर पाया। उसने अगली बारी बिना जल्दी किए पत्ता उठाया। उसकी आँखें एक बार समूहों पर गईं, फिर दोबारा। मुझे उसकी कॉपी में दर्ज जाँच की प्रक्रिया याद आ गई।
9. तेरह पत्ते, कोई विरासत नहीं
चिड़ी की बेगम ने उसके दस और गुलाम की सीक्वेंस पूरी कर दी। चौदहवाँ पत्ता छोड़ने के बाद ऋतु ने घोषणा की। उसने मेरी स्वीकृति खोजे बिना समूह सामने रखे।
ईंट के दो, तीन, चार और पाँच। पान के सात, आठ और नौ। चिड़ी के दस, गुलाम और बेगम। तीन अलग निशानों के तीन बादशाह। चार और तीन और तीन और तीन—कुल तेरह पत्ते। सीक्वेंस अपने असली पत्तों से बनी थीं। कोई एक वास्तविक पत्ता दो समूहों में नहीं गिना गया था।
आयोजक ने हाथ जाँचा और परिणाम पक्का किया। ऋतु ने फाइनल तीन बाजी बनाम एक से जीत लिया था।
दर्शकों की तालियों के बीच मेरे पास अपने अधूरे पत्ते देखने का समय था। उनमें कोई छिपा अन्याय नहीं था। सामने के खिलाड़ी ने पूरे मैच में ज्यादा उपयोगी फैसले लिए थे, पहली हार के बाद वापसी की थी और अपने कमाए हुए अंत को ध्यान से जाँचा था।
उसे मेरा उत्तराधिकारी कहने वाला परिचित झुककर बोला, “आपने जो बनाया, उस पर गर्व होगा।”
इस बार ऋतु को जवाब देने की जरूरत पड़ने से पहले मैंने कहा।
“मेहनत उसने की है। चौथी बाजी के बारे में उससे पूछिए।”
वह थोड़ा चौंका। ऋतु ने मुझे देखा, फिर समझाने लगी कि उसने चिड़ी के जुड़े हुए पत्ते क्यों बचाए थे। उसे मेरी सुविधा के लिए बात नरम नहीं करनी पड़ी। मैं हस्ताक्षर किए परिणाम के पास बैठा रहा और अपनी बेटी से ऐसा फैसला समझता रहा जो मैंने उसे नहीं सिखाया था।
10. वह निमंत्रण जिसके लिए मैंने पूछा
ट्रॉफी ऋतु के रोजमर्रा वाले कंधे के बैग में आ गई। उसने उसे दुपट्टे में लपेटा ताकि स्कोर के फोल्डर से न टकराए। बाहर सब्जी वाला अपनी छतरी नीचे कर रहा था। गली में सामान्य शाम थी। मेरे भीतर बरसों से चली आ रही एक गलत जिद चुप हुई थी।
मैंने पूछा कि क्या उसका अगला मैच देखने आ सकता हूँ। उसने हाँ कहा, बशर्ते उसकी कुर्सी के पीछे खड़े होकर लगातार टिप्पणी न करूँ। अगले महीने के पहले मुकाबले के बाद खाने का कार्यक्रम बना। जगह उसने चुनी।
उस खाने पर ऋतु ने एक कठिन अनुवाद की बात की। मैंने समस्या को तुरंत निर्देश में बदले बिना सुना। उसने माँ को मैच के बारे में अपनी सुविधा से बताया। जब काम की नई समय सीमा से हमारी एक शाम बदली, तो हमने मिलकर दूसरी शाम तय की। निमंत्रण अब ऐसी चीज हो गया था जिसे वह अपनी इच्छा से स्वीकार कर सकती थी।
अगले आयोजन में मैं ऋतु से पहले पंजीकरण पर पहुँचा। अधिकारी ने पहचानकर पूछा, क्या उसका कोच बनकर आया हूँ? वर्षों तक मैं उसके सुनने से पहले ही यह परिचय स्वीकार कर लेता।
“पिता,” मैंने कहा। “अपना प्रवेश वह खुद सँभालती है।”
मैं डेस्क से हट गया। ऋतु आई तो अधिकारी ने फॉर्म सीधे उसे दिया। उसने पढ़ा, हस्ताक्षर किए और मुझे दर्शकों के आने का समय बताया। तब तक बाकी अभिभावकों के साथ रुका। दरवाज़े से उसे मेज़ का नंबर जाँचते देख सकता था। उसने मेरी मंजूरी देखने के लिए पीछे नहीं देखा।
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