निवेशक आई तो प्रिया घुटनों के बल बैठकर फर्श पर गिरी चाय साफ कर रही थी।
समर गीली जगह के ऊपर से निकल गया।
“इधर आइए,” उसने कहा। “सफाई हो रही है, ध्यान मत दीजिए।”
प्रिया ने सिर उठाया।
साथ की महिला ठिठकी।
“थोड़ा समय चाहिए?”
“नहीं,” समर बोला। “यह निपटा लेगी।”
आठ महीने से प्रिया शाम की कक्षाएँ पढ़ा रही थी। अभ्यास का समय तय करती थी। कमरे का किराया कम पड़ता तो पैसे ढूँढ़ती थी।
उसी सुबह किराए की बची हुई रकम भी भेज दी थी।
खाते में सप्ताहांत तक खाने और बस का खर्च था। उसके बाद दूसरी ड्यूटी ढूँढ़नी पड़ती।
वह कपड़ा पकड़े खड़ी हुई।
“मैं यहाँ कोच हूँ।”
समर ने कार्यालय के दरवाजे पर हाथ रखा।
“बैठक शुरू करने वाले हैं।”
“इस बैठक के लिए पढ़ाने की पूरी योजना मैंने बनाई है।”
वह निवेशक की तरफ मुस्कराया।
“जगह से बहुत लगाव है।”
आठ महीने की मेहनत को उसने एक वाक्य में समेट दिया था—जगह से लगाव है।
* * *
इस जगह की बात पहली बार सड़क किनारे चाय पीते हुए हुई थी।
समर उपकरण, संपर्क और प्रचार की व्यवस्था करता।
प्रिया वयस्क खिलाड़ियों के लिए तीन पत्ती की कक्षाएँ तैयार करती और अभ्यास कराती।
दोनों ने साथ मिलकर काम शुरू करने की बात की थी। लेकिन किसका कितना हिस्सा होगा, यह लिखा नहीं गया था।
समर ने कारोबार अपने नाम पर दर्ज करवाया। कहा था कि नियमित कमाई शुरू हो जाए, फिर प्रिया की भूमिका भी कागज पर तय कर देंगे।
प्रिया उसे ताश के आयोजनों के जरिए तीन साल से जानती थी। बत्तीस साल की उम्र तक कई कामों के समझौते कर चुकी थी। फिर भी समर से कागज माँगना उसे ऐसा लगा था जैसे पहले ही कह रही हो कि वह धोखा देगा। वह टालता रहा, और प्रिया मानती रही।
पहले कमरे में छह मेजें और शोर करता पुराना कूलर था। बारिश में दीवार पर सीलन गहरी हो जाती थी।
सफाई की जरूरत होती तो वह कर देती। पढ़ाना उसका काम था, वह भी करती।
कुछ शाम दोनों काम साथ होते। समर अच्छी रोशनी वाले इकलौते कोने में प्रचार का परिचय रिकॉर्ड करता रहता।
* * *
किराए की जिम्मेदारी धीरे-धीरे उसके सिर आ गई।
किसी ग्राहक ने देर की।
प्रायोजन की बात अटक गई।
समर ने सोमवार को पैसे भेजने को कहा।
प्रिया ने केटरिंग की पालियाँ लीं। एक स्कूल के पुराने रिकॉर्ड क्रम में लगाने का काम किया। सप्ताहांत में स्थानीय प्रिंटर के लिए सामग्री संपादित करती थी।
हर काम से मिली रकम का कुछ हिस्सा कमरे के खर्च में जाता।
समर ने इसे समर्पण कहा।
लिखित हिसाब माँगा तो अविश्वास कहा।
आखिर प्रिया खुद रिकॉर्ड रखने लगी।
कॉपी में तीन खाने थे। दिए पैसे। मिले पैसे। वादे।
तीसरा सबसे लंबा था।
उसे उम्मीद थी कि निवेशक के आने से यह सिलसिला बदलेगा।
प्रिया ने समय-सारणी, नमूना पाठ और मरम्मत की सूची तैयार की थी।
सोचा था बड़े बजट से कक्षाएँ बेहतर करने की बात होगी।
मगर वह दफ्तर के बाहर खड़ी रही। भीतर समर उस पूरी व्यवस्था को अपना बताकर समझा रहा था।
पतले दरवाजे के पार वही वाक्य सुनाई दिया जो उसने सुबह बोर्ड पर लिखा था।
सबसे कम बोलने वाले को पहले समझाने दो।
समर ऐसे बोल रहा था जैसे विचार उसके दिमाग में आया हो।
* * *
बैठक के बाद उसने शाम के समूह से पहले कमरा ठीक करने को कहा।
प्रिया ने कपड़ा सिंक के पास रखा।
“मेरी भूमिका क्या बताई?”
“शुरू मत करो।”
“मैंने सवाल पूछा है।”
“उन्हें पता है कि हमारे पास सहायक कर्मचारी हैं।”
“सफाई करती हूँ। पढ़ाती भी हूँ। पाठ भी मैं बनाती हूँ। वह हिस्सा कैसे हटा सकते हो?”
उसने कार्यालय का दरवाजा पीछे बंद किया।
“कारोबार का एक ही चेहरा होना चाहिए।”
“हर पोस्टर पर तुम्हारा है।”
“अब कोई पैसा लगाने को तैयार है।”
“उस काम में जो बताया कि तुम करते हो।”
समर शर्मिंदा नहीं, थका लगा।
वह ज्यादा चुभा।
उसे अपना व्यवहार असाधारण लग ही नहीं रहा था।
“वेतन चाहिए तो बात कर सकते हैं।”
“जो पहले दे चुकी हूँ?”
“सब हिसाब हो जाएगा।”
“कब?”
“अभी नहीं। पहले शांत हो जाओ।”
प्रिया ने बोर्ड देखा।
उसने चार रंगों से हफ्ते की समय-सारणी बनाई थी।
उसका नाम सिर्फ सफाई की बारी के पास था।
खुद लिखा था।
* * *
दो दिन बाद कार्यालय का ताला बदल गया।
समर ने संदेश भेजा कि काम की व्यवस्था बदली जा रही है। बकाया रकम के बारे में बाद में संपर्क करेगा।
प्रिया सामान लेने पहुँची।
नया सहायक उपकरणों की अलमारी के पास था।
समर ने कहा कि बाहर जाने वाली हर चीज देखे।
प्रिया ने अपनी कॉपियाँ, लिखने का सामान और मूल पाठ योजनाओं के फोल्डर कपड़े के थैले में रखे।
मेजें, कैमरे और कूलर छोड़ दिए।
कूलर किराए का था। कैमरे और मेजें कारोबार के सामान की सूची में दर्ज थे। प्रिया ने अपने निजी सामान की सूची से थैले की चीजें मिलाईं।
सहायक ने थैला दिखाने को कहा।
उसने खोल दिया।
फोल्डर पलटने पर पन्ना मिला: मंगलवार—वे सवाल जिन्हें पूछने से लोग डरते हैं।
उसे शर्मिंदगी हुई।
समर को नहीं।
“कक्षाओं की सूचियाँ छोड़ देना।”
“मेज पर हैं।”
“इसमें कोई तमाशा मत करना।”
प्रिया ने थैला बंद किया।
मन हुआ कि बिना पैसे किए हर घंटे को फर्श पर बिखरा दे। समर इस काम के ऊपर से भी उसी तरह निकलकर दिखाए।
फिर सीढ़ियाँ उतर गई।
बस स्टॉप पर फोन ने बताया कि शाम की कक्षा तीस मिनट में शुरू होगी।
उसने महीनों पहले यह रिमाइंडर लगाया था। कमरे की जाँच, सामान खरीदने और मकान मालिक से बात करने के रिमाइंडर भी थे। फोन पर अब भी उस जगह की सारी जिम्मेदारियाँ उसका इंतजार कर रही थीं।
एक-एक करके बंद किए।
फिर उस शाम के पाठ वाले नोट खोले।
उन्हें रखा।
पढ़ते हुए बस आई। जाने दी। अगली का इंतजार किया।
पास खड़ी महिला ने पूछा कि नंबर नहीं देख पाई?
प्रिया ने कहा, “देखा था।”
पहली बार जल्दी पहुँचकर किसी और की देरी सँभालने की जरूरत नहीं थी।
Telegram · WhatsApp Channel · WhatsApp Group
* * *
घर पर पर्स पलंग पर खाली किया।
राशन और आने-जाने के बाद मुश्किल से कुछ बचता।
आखिरी किराया उसने ऐसे कमरे का दिया था जहाँ अब घुस भी नहीं सकती थी।
दूसरे शहर में रहने वाली बहन को फोन किया।
“कुछ सप्ताह यहाँ आ जाओ।”
प्रिया ने सोचा।
फिर फोल्डर देखे।
“पहले समझ लूँ कि आगे क्या करना है।”
बहन ने खाने के पैसे भेजे। साथ लिखा कि यह मदद है; इसके बदले प्रिया को उसकी सलाह मानने की जरूरत नहीं।
प्रिया रो पड़ी।
अगली सुबह दो अलग सूचियाँ बनाईं।
कितने पैसे वापस लेने हैं।
कौन-सा काम अभी मिल सकता है।
एक स्थानीय कारोबारी सलाहकार की मदद से उसने भुगतान के रिकॉर्ड और संदेश क्रम में लगाए। रकम वापस माँगने की लिखित प्रक्रिया शुरू की। उसमें समय लगना था। फिलहाल उसे उन पैसों के बिना खर्च चलाना था।
दूसरी सूची में प्रिंटर का सप्ताहांत वाला काम था, दो लोग थे जिन्होंने निजी कक्षाएँ पूछी थीं, और स्कूल का दफ्तर था जहाँ कभी-कभी मदद चाहिए होती थी। पहले प्रिंटर को फोन किया। शनिवार का काम मिला। उससे किराया नहीं निकलता, मगर अगले हफ्ते का बस किराया निकल आता।
* * *
पहला फोन आशा का आया।
उनतालीस साल की दर्जी थी। चार महीने से पढ़ रही थी।
“बीमार हैं?”
“नहीं।”
“वहाँ कहा कि आप आ नहीं सकतीं।”
“अब वहाँ काम नहीं करती।”
आशा चुप हुई।
फिर पूछा, “पढ़ा कहाँ रही हैं?”
“कहीं नहीं।”
“तो कोई जगह ढूँढ़ते हैं।”
प्रिया लगभग हँस दी।
आशा मरम्मत की दुकान वाले को जानती थी। ऊपर का कमरा दोपहर बाद खाली रहता था।
छत नीची थी। खिड़कियों के सामने दीवार थी। एक मेज की जगह थी।
दोनों देखने गईं।
मालिक ने समय, जमा रकम और किराया बताया।
प्रिया ने लिखा।
मालिक ठीक से बात कर रहा था, फिर भी इस बार प्रिया ने हर शर्त साफ पूछी।
पूछा कि यहाँ वयस्क खिलाड़ियों की ताश की कक्षाएँ और अभ्यास चल सकते हैं क्या।
नीचे की मशीन की आवाज ऊपर आ रही थी। मालिक ने उधर देखा।
“इस शोर में पढ़ा पाओ तो मुझे कोई दिक्कत नहीं।”
आशा ने एक ताली बजाई।
आवाज गूँजी।
“जोर से बोल लेंगे,” आशा ने कहा।
* * *
पहली बैठक में प्रिया समेत छह लोग थे।
आशा मोड़ने वाली मेज लाई।
बस चलाने वाला फिरोज भाई की दुकान से अनुमति लेकर कुर्सियाँ लाया।
लेखा सहायक देव कॉपी लाया। सबसे पहले खर्च पूछा।
पल्लवी किराने का छोटा काउंटर चलाती थी।
इक्यावन साल का मनोज सुरक्षा की ड्यूटी करता था। अपना काम तय करने के लिए समय पहले चाहिए था।
सब वयस्क थे। पहले प्रिया से पढ़ चुके थे।
प्रिया अपनी योजना शुरू कर पाती, उससे पहले देव ने सवालों वाला पन्ना खोल लिया।
आशा को ग्राहक के कपड़े देने की तारीखों के अनुसार अभ्यास चाहिए था।
फिरोज को बस की ड्यूटी के बाद समय चाहिए था।
पल्लवी ने बिना पूछे प्रचार में चेहरा इस्तेमाल करने से मना किया।
मनोज हर शाम सीढ़ियाँ नहीं चढ़ सकता था।
देव जानना चाहता था कि पैसे फीस होंगे, उधार होंगे या मालिकाना हिस्सा?
प्रिया ने सबको देखा।
पुराने कमरे में ऐसे सवाल माहौल बिगाड़ते थे।
यहाँ उन्हीं सवालों से काम शुरू हो रहा था।
* * *
हस्ताक्षर करने से पहले तीन बैठकें हुईं और बाहर से सलाह ली गई। दूसरी बैठक में देव बदला हुआ हिसाब लाया। पल्लवी ने अपनी जमा रकम देखने के लिए और समय माँगा।
छहों की हिस्सेदारी थी। किसका कितना योगदान और क्या जिम्मेदारी होगी, यह हस्ताक्षर किए गए दस्तावेजों में लिखा गया।
प्रतिशत बराबर नहीं थे।
सिर्फ ऊँची आवाज वाले की बात अंतिम नहीं हो सकती थी।
छोटे बजट पर सहमति हुई। पढ़ाने का भुगतान कैसे होगा और किन फैसलों में सबकी मंजूरी चाहिए, तय हुआ।
पल्लवी ने दीवार पर छह नामों का पन्ना लगाया।
प्रिया का नाम न बड़ा था, न दूसरे रंग में।
नीचे किसी ने सफाई की बारी जोड़ी।
प्रिया ने मंगलवार लिया।
फिरोज ने गुरुवार।
पहला सत्र खत्म हुआ तो देव ने झाड़ू उठाई।
कोने की धूल निकालना बिल्कुल नहीं आ रहा था।
आशा ने दिखाया।
किसी को नहीं लगा कि इस सीख से दोनों में कोई कम महत्वपूर्ण हो गया।
प्रिया मेज समेटते हुए देखती रही। मदद माँगने से पहले मदद शुरू हो गई थी। उसे आदत डालनी थी कि हर काम उसके उठने का इंतजार नहीं करता।
* * *
पंद्रह दिन के भीतर समर को नए कमरे की खबर मिल गई।
उसने आरोप लगाया कि प्रिया उसके तैयार किए समूह को अपने साथ ले गई है।
प्रिया ने जवाब दिया कि लोगों ने अपना फैसला खुद किया है। बाकी कारोबारी सवाल उसी लिखित प्रक्रिया में भेजे जिसमें पुराने हिसाब पर बात चल रही है।
फिर समय-सारणी पर लौटी।
पहला महीना कठिन था।
दुकान के मालिक ने उनके बुक किए दो समयों में कमरा माँगा। दूसरे घंटे और उस महीने के किराए में कटौती पर सहमति हुई। फिर भी छहों को अपने कामों का समय दोबारा मिलाना पड़ा।
एक लाइट खराब हो गई।
मनोज की ड्यूटी बदली तो सप्ताह भर नहीं आया।
प्रिया को कभी अकेले फैसला कर लेने की तेजी याद आती थी। आधे घंटे का समय बदलने पर पूरी शाम चर्चा हो सकती थी। जिन लोगों को खुद साझेदारी में बुलाया था, उन्हीं पर कभी झुँझलाहट होती।
एक बार बिना पूछे सत्र का समय बदलने लगी।
पल्लवी ने समझौते की तरफ इशारा किया।
प्रिया ने माफी माँगी। पुराना समय वापस किया।
अकेले में शर्म आई।
फिर समझ आया कि समझौता इसी काम के लिए था। उसकी सुविधा के लिए बाकी पाँच लोगों के अधिकार नहीं बदल जाते।
अगली बैठक में उसने बताया कि बदलाव क्यों चाहा था। दो लोगों ने दूसरा उपाय सुझाया। काम हो गया। उसकी बात आखिरी न होने से कमरा टूटा नहीं था।
* * *
तीन महीने बाद वयस्क खिलाड़ियों की एक छोटी टीम प्रतियोगिता में नाम लिखवाया।
घोषित प्रारूप में हर टीम के तीन प्रतिनिधि थे। व्यक्तिगत स्थान से टीम के कुल अंक बनते।
अभ्यास के बाद आशा, देव और फिरोज चुने गए।
मनोज ने अभ्यास की समीक्षा और तैयारी में मदद की। पल्लवी ने बजट और सफर सँभाला। प्रिया कोच थी।
पुराने कमरे की टीम भी थी।
पोस्टर चमकदार थे। कमीजें एक जैसी थीं। समर ने मजबूत कप्तान नील को जोड़ा था।
आयोजन को अपनी अकादमी की बेहतर व्यवस्था दिखाने का मौका कह रहा था।
पंजीकरण पर अधिकारी ने प्रिया से बैनर पूछा।
“नहीं है।”
आशा ने नाम दर्ज होने वाला फोल्डर उठाया।
“यह है।”
अधिकारी मुस्कराया। प्रवेश कर दिया।
दूसरी तरफ समर ने साधारण कमीजें देखीं।
“अब भी हर काम मुश्किल तरीके से?”
प्रिया ने फिरोज से खाने का पूछा।
प्रतियोगिता से पहले समर को कहने लायक उपयोगी बात नहीं थी।
* * *
देव से शुरुआती गलती हुई।
विराम में आते ही माफी शुरू कर दी।
प्रिया ने बैठने को कहा।
वह समझाने लगा कि किस बात पर जल्दबाजी कर गया।
आशा पास खड़ी अपना सुझाव देने को तैयार थी।
प्रिया ने हाथ उठाया।
“पहले पूरा कहने दो।”
देव ने कहा।
फिर देखा।
“गुस्सा नहीं?”
“फैसला समझना है।”
उसने सिर हिलाया।
देव दो बार अपनी बात नए सिरे से शुरू करता रहा। प्रिया को लग रहा था कि गलती समझ आ गई है और सीधे बता दे। फिर भी उसने इंतजार किया।
सत्र के अंत तक देव ने वापसी करके दूसरा स्थान लिया।
फिरोज अपने हिस्से में तीसरा रहा।
अकेले किसी नतीजे से टीम का खिताब तय नहीं हुआ।
दोनों के अंकों से टीम खिताब की दौड़ में बनी रही।
पल्लवी ने आधिकारिक अंक दो बार देखे। फिर कॉपी बंद की।
इस बार किसी एक से सबकी उम्मीदें उठाने को नहीं कहा गया था।
आशा का खेल बाकी था।
वह बाल उसी रबर से बाँध रही थी जो कपड़ा काटते समय इस्तेमाल करती थी।
* * *
नील अच्छा था।
आशा उसका काफी खेल देख चुकी थी।
नील का व्यवहार भी अच्छा था। आशा को वह पसंद आया। उससे जीतने की इच्छा फिर भी कम नहीं हुई।
आखिरी सत्र से पहले पूछा कि पंखा दूसरी तरफ कर दे?
“हाँ, धन्यवाद।”
फिर खेले।
आशा पीछे हुई।
वापस आई।
एक फैसले पर प्रिया ने होंठ भींच लिए। वह दूसरी तरह खेलती। कुछ मिनट बाद सहज हुई। बाद में बात कर सकते थे। अगला फैसला आशा को लेना था।
दर्शक सामने चल रहा खेल देख रहे थे।
प्रिया दुकान बंद होने के बाद की शामें देख रही थी। ग्राहकों के नाप के बीच लिखे अभ्यास नोट देख रही थी।
यह भी कि सोचने का समय माँगने से पहले आशा ने माफी कहना बंद कर दिया था।
अंतिम हिसाब घोषित हुआ तो अपने हिस्से में आशा पहले स्थान पर थी।
टीम के कुल अंकों में नया समूह समर की अकादमी से ऊपर था।
नील ने हाथ मिलाया।
समर प्रचार वाले पर्दे के पास रहा।
फोटोग्राफर ने विजेता टीम के पास बुलाया।
उसने न सुनने का नाटक किया।
* * *
बस स्टैंड के पास ठेले से खाना लेकर जश्न मनाया।
ट्रॉफी स्टील की प्लेट और पानी की बोतल के बीच थी।
फिरोज ने कहा कि तस्वीर में इसे भी रखो। पहली तीन में सिर्फ खाना दिख रहा था।
प्रिया इतनी हँसी कि बैठना पड़ा।
हँसी से खुद चौंक गई।
महीनों से हर उपलब्धि बाकी देनदारी का हिसाब लेकर आती थी।
उस शाम आशा ने बहुत खराब मजाक सुनाया। हिसाब लगाने को कुछ नहीं था।
आयोजन का छोटा टीम पुरस्कार तय खाते में मिला। अपने समझौते के अनुसार दर्ज किया।
कुछ अगले महीने के खर्च के लिए गया।
कुछ अलग रखा।
पल्लवी ने जैकेटों की कीमत कमरे की जरूरी मरम्मत से मिलाई। उन्होंने पंखा खरीदा।
आया तो मनोज सीढ़ी पर दो पायदान चढ़ा। प्रिया ने पूछा कि आगे किसी और से करवाना चाहता है?
बिना माफी के हाँ कहा।
देव चढ़ा। प्रिया ने सीढ़ी पकड़ी।
* * *
अगले सप्ताह समर नए कमरे में आया।
प्रस्ताव लाया था।
अकादमी कार्यक्रम खरीद सकती थी। प्रिया को बड़ा पद मिलता। सब बेहतर जगह चले जाते।
वह ऐसे बोल रहा था जैसे दीवार के बाकी पाँच नाम सजावट हों।
“बड़ा सोचो।”
प्रिया ने पूरा बोलने दिया।
फिर नामों की तरफ इशारा किया।
“मालिकों को प्रस्ताव देना होगा।”
“दे रहा हूँ।”
“एक को।”
समर ने पन्ना देखा।
“अच्छे मौके को उलझाओ मत।”
“सुविधा हुई तो मुझे सहायक कर्मचारी कहा। अब इन्हें नहीं कह सकते।”
उसने लंबी साँस ली।
“बात करने आया हूँ।”
“तो सबके नाम लो।”
पीछे देव ने रसीदें छाँटना रोक दिया।
आशा मेज के पास थी।
समर इंतजार करता रहा कि प्रिया कोई आसान-सा रास्ता निकाल देगी। देव ने कुर्सी खींची। आशा नामों के पन्ने के पास खड़ी रही। आखिर समर ने नाम पढ़ने शुरू किए। फिरोज अपना नाम आने पर बैठ गया।
अब सच में बैठक शुरू हो सकती थी।
* * *
प्रिया ने सबकी तरफ से न हाँ की, न मना किया।
लिखित प्रस्ताव सबके पास गया। सवाल वापस भेजे गए। शर्तों पर बातचीत हुई।
प्रस्ताव की मौजूदा शर्तों में काम के फैसलों पर उनका अधिकार खत्म हो जाता।
सबने मिलकर मना किया।
प्रिया का पुराने पैसों का दावा अलग रहा। महीनों बाद कुछ रकम लिखित समझौते के तहत लौटी।
उसने उसे समर की उदारता नहीं कहा। वह उसका अपना पैसा था।
बाद में ऊपर के कमरे की जगह जमीन के तल पर एक साधारण कमरा लिया गया, जहाँ मनोज आसानी से आ सकता था।
नामों का पन्ना साथ ले गए।
पहली शाम नई मेज के पास चाय गिरी।
प्रिया ने कपड़ा उठाया।
आशा ने कुर्सियाँ हटाईं।
फिरोज पानी लाया।
किसी को समझाना नहीं पड़ा कि कौन क्या है।
बाद में देव ने किराए की रसीद दी।
प्रिया ने रकम जाँची। साझा रिकॉर्ड में दर्ज की। उस फोल्डर में रखी जिसे छहों देख सकते थे।
यह नए कमरे का पहला किराया था। रसीद रखकर प्रिया ने बत्तियाँ बंद कीं। सुबह दरवाजा खोलने की चाबी अब भी उसके पास होगी।