1. EK7 कहानी: मेरी कुर्सी पर लिखा नाम
अधिकारी ने मेरी तस्वीर दो बार देखी, क्योंकि पास खड़े आदमी का चेहरा लगभग मेरे जैसा था। फिर भाई का पंजीकरण देखा, अलग बैज दिए और अलग कुर्सियों की ओर भेजा। प्रक्रिया तीन मिनट चली। मजाक बहुत देर तक।
“वास्तव में क्वालिफाई कौन हुआ था?” अगली मेज से नकुल ने पूछा।
“दोनों,” अधिकारी ने कहा। “प्रविष्टियाँ सत्यापित हैं।”
मेरा नाम समीर था। भाई का समर। हम इकतीस साल के थे। बचपन से अजनबी हमें पहेली बनाते आए थे। समर को पहेली हल करना अच्छा लगता था। उसने अपने बैज की तरफ इशारा किया। “जो आम तौर पर जीतता है, वह मैं हूँ।”
कुछ लोग हँसे। मैंने अपने असली नाम वाली कुर्सी ठीक की और बैठ गया।
इस काल्पनिक स्थानीय रमी आयोजन में दो हार पर बाहर होने वाला ढाँचा था। हर मैच अधिकतम तीन बाजियों का था; दो वैध जीत लेने वाला आगे जाता। एक मैच हारने पर निचले रास्ते में जाना पड़ता। दूसरी हार से अभियान समाप्त। निचले रास्ते का विजेता अपराजित फाइनलिस्ट को हरा देता तो दूसरा फाइनल होता, क्योंकि तब दोनों की एक-एक मैच हार होती।
आयोजक ने आखिरी नियम ध्यान से समझाया। समर ने ऐसे सिर हिलाया जैसे वह किसी और के लिए हो।
शुरुआती मैच में हम आमने-सामने थे। मैंने स्कोर पर्ची के पास बैज रखा। सीट बदलने, दूसरे के नाम से खेलने या समान चेहरे की आड़ लेने का कोई प्रश्न नहीं था।
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2. वह भाई जिसे सब याद रखते थे
समर ने मुझे दो बाजी बनाम एक से हराया। पहली सही हाथ बनाकर मैंने जीती। दूसरी में बड़े पत्तों की जोड़ी पकड़े रह गया। तीसरी में मेरे पूरा कर पाने से पहले उसकी बाकी सीक्वेंस पूरी हुई। पत्ते जाँचे गए। उसने मैच कमाया था।
उठते समय नकुल बोला कि नतीजे ने बैज से बेहतर पहचान बता दी। समर मुसकराया। मैं निचले रास्ते की पर्ची लेकर मेज पर गया और अपना अगला स्थान पूछा।
घर में तुलना हारने वाले को छोड़कर सबको हानिरहित लगती थी। समर जल्दी बोलता, जल्दी दोस्त बनाता और ऐसा आत्मविश्वास रखता जिसे देखने वाले मिलते। मैं रास्तों की योजना बनाने का काम करता था और समस्या पर बोलने से पहले समझना पसंद करता था। रिश्तेदार उसे होशियार जुड़वाँ और मुझे भरोसेमंद कहते, जैसे भरोसेमंद होना धीमे दिमाग का सांत्वना पुरस्कार हो।
परिवार के खेल के बाद वर्षों तक उसके जीते हाथ दोबारा बनाने में मदद करता रहा। किसी फैसले से असहमत होता तो पूछता कि परिणामों की तुलना करना चाहता हूँ क्या। धीरे-धीरे असहमति बोलना छोड़ दिया। वह खामोशी प्रतियोगिता में भी आई। परिचित बनावट इसलिए बचाता कि बदलना होशियार भाई को फिर सही मान लेने जैसा लगता।
शुरुआती हार इसलिए चुभी क्योंकि आलोचना का कुछ आधार था। आकर्षक जोड़ी ज्यादा देर रखता था। अपनी योजना को कितना समय देना चाहिए, यह किसी और की प्रतिष्ठा तय करने देती थी। चेहरे की बहस से इनमें से कोई आदत नहीं सुधरती।
3. परिवार के दर्शकों के बिना अभ्यास
आयोजन से तीन महीने पहले मैं सप्ताह के बीच वाले अभ्यास समूह में गया, जहाँ समर को कोई नहीं जानता था। पहली शाम सामान्य ढंग से पत्ते सजाए और चार बाजियाँ हारा। रेणु नाम की खिलाड़ी ने पूछा कि अलग शुरुआती पत्तों के बावजूद बार-बार एक जैसा हाथ क्यों बना रहा हूँ।
मैंने कहा, यह मेरी शैली है।
उसने पूछा, क्या पत्ते भी उस शैली से सहमत हैं?
सवाल इतना चुभा कि याद रह गया। पूरी बाजियों के हाथ कई तरीकों से दोबारा सजाने लगे। कभी बड़ी जोड़ी रखना उपयोगी था। कभी वह बेहतर रास्तों वाले जुड़े पत्तों की जगह खाती थी। कभी सही फैसला भी हारता था। अभ्यास पसंदीदा पत्तों को नहीं, हाथ के अनुसार दी गई वजह को महत्व देता था।
हर अभ्यास बाजी के बाद खुले ढेर से उठे और छोड़े पत्ते लिखता। खेल पूरा होने पर दूसरों की याद से मिलाता। पता चला कि नुकसान पहुँचाने वाला त्याग याद रहता था, उससे पहले योजना संकरी होने की सूचना भूल जाता था।
समूह ने समर का नाम लिए बिना हार समझाने को भी कहा। पहले लगा कि उन्होंने मेरे खेल की सबसे जरूरी बात हटा दी। चौथे सप्ताह समझा कि सुविधाजनक धुंध हटाई थी।
आयोजन की सुबह रेणु ने शुभकामना दी और कहा कि परिणाम जो भी हो, कोई कठिन फैसला लेकर लौटना। मैंने वादा किया। भाई से हारकर निचले रास्ते में खड़ा था तो आखिर ऐसा फैसला साथ ले जाने लायक मिला।
4. हॉल का दूसरा रास्ता
अगला मैच देविका के खिलाफ दो-एक से जीता। उसने आहत भाई की वापसी का अभिनय करने की जगह नहीं दी। पहली बाजी में मैं अधूरी जोड़ छोड़ने का निर्णय कर रहा था और वह पूरा कर चुकी थी। दूसरी में सरल बनावट से जवाब दिया। तीसरी में घोषणा से पहले हाथ दो बार जाँचकर जीत मिली।
निचले रास्ते के फाइनल में नकुल आया। ऊपरी रास्ते का अपना मैच हार चुका था। उसकी भी मेरी तरह एक हार थी। बैठने से पहले उसने मेरा बैज देखा और छोटी हरकत इतनी बड़ी की कि आसपास के लोग देख लें।
पहचान की जाँच अधिकारी पहले ही पूरी कर चुका था। मैंने पत्ते माँगे।
नकुल का पहला हाथ जल्दी आगे बढ़ा, लेकिन उसके अंतिम सेट से पहले मेरी प्राकृतिक सीक्वेंस तैयार हुईं। वैध घोषणा करके पहली बाजी ली। दूसरी में वह उम्मीद कर रहा था कि मैं अकेली बेगम बचाऊँगा, क्योंकि शुरुआती हार देख चुका था। जुड़े छोटे पत्ते से साफ रास्ता मिला तो मैंने बेगम छोड़ दी।
उसने बदलाव देखा। उससे मेरा पूरा हाथ नहीं दिख गया। उसने अपने फैसले बदले। कई बारी और चलीं, तब मैंने समाप्ति बनाई।
दो-शून्य। दूसरी मैच हार से नकुल का अभियान समाप्त हुआ।
हस्ताक्षर करते समय उसने बैज देखे बिना मेरा नाम सही लिखा। पर्ची लेकर मैं अधिकारी के पास गया। अगली कुर्सी समर के सामने थी। मैं बैठने से पहले स्कोर वाली पर्ची सीधी करता रहा। उस पर अब मेरे दो अलग मुकाबलों की जीत दर्ज थी।
5. एक फाइनल काफी नहीं था
समर ऊपरी रास्ते से अपराजित आया था। उसे आयोजन जीतने के लिए मेरे खिलाफ एक मैच जीतना था। मुझे उसे दो बार हराना था—पहले उसकी पहली मैच हार देना, फिर बराबर एक-एक हार के बाद नए निर्णायक फाइनल में जीतना। शुरू होने से पहले अधिकारी ने नियम दोहराया ताकि पहली जीत को कोई खिताब न समझे।
भाई पीछे झुका। “आज अभ्यास ज्यादा मिल गया तुम्हें।”
“हाँ,” मैंने कहा।
उसे शिकायत की उम्मीद थी। सीधे स्वीकार करने पर कहने को कुछ नहीं बचा।
पहले फाइनल की पहली बाजी मैं हारा। समर ने दो सीक्वेंस कुशलता से बनाईं और बाकी पत्ते अच्छे उपयोग किए। मेरे पूरे समूह सही थे, लेकिन पूरा हाथ तैयार नहीं था। उसने पहले घोषणा की। एक और बाजी जीतता तो आयोजन उसी का हो जाता।
छोटे विराम में उसके भाव के बजाय अपना आखिरी फैसला देखा। शुरुआती मैच वाली गलती नहीं हुई थी। योजना उचित थी, जरूरी समाप्ति समय पर नहीं आई। एक हार के कारण सब बदल देना भी उसी का असर मानना होता।
दूसरी बाजी में अलग समस्या थी। अच्छा लगता सेट लचीले सीक्वेंस वाले रास्ते से जगह माँग रहा था। मैंने मौजूदा पत्तों के अनुसार चुना, सुधार बंद कर चुकी जोड़ छोड़ी और समर से पहले सही घोषणा बनाई।
एक-एक। भाई फिर आगे झुका। उस दिन पहली बार उसने अधिकारी से चालू मैच का स्कोर पक्का करने को कहा।
6. उसकी पहली हार
पहले फाइनल की तीसरी बाजी हम दोनों की इच्छा से लंबी चली। मेरी शुद्ध सीक्वेंस जल्दी बनी। फिर तय करना था कि जोकर कहाँ लगाऊँ जिससे बाकी हाथ अटक न जाए। समर का खुले ढेर से उठाना एक संभावित जरूरत की जानकारी देता था; बाकी बारह पत्ते कल्पना में तय करने का अधिकार नहीं।
मैंने सोचा हुआ त्याग बदला। सुरक्षित विकल्प से मेरा निर्माण थोड़ा धीमा हुआ, लेकिन दो वास्तविक रास्ते खुले रहे। कई बारी बाद उनमें से एक पूरा हुआ। घोषणा से पहले सीक्वेंस, सेट के अलग निशान और तेरह पत्तों का कुल जाँचा।
हाथ वैध था। मैच दो-एक से मेरा हुआ।
दर्शकों के पीछे किसी ने आयोजन खत्म होने जैसी खुशी जताई। अधिकारी ने हाथ उठाकर नए फाइनल की घोषणा की। समर की अब एक मैच हार थी। मेरी पहले से एक थी। अगला अधिकतम तीन बाजियों वाला मैच खिताब तय करता।
भाई कंधे खोलने उठा। आत्मविश्वास चेहरे से गायब नहीं था, मगर अब उसे बनाए रखने में मेहनत दिखती थी। उसे भी सबके सामने खुद को सँभालना था, जैसे मुझे शुरुआती मैच के बाद पड़ा था।
पानी के पास उसने कहा, “हाथ अलग ढंग से सजा रहे हो।”
“हाथ अलग हैं,” मैंने कहा।
वह कुछ पल देखता रहा। छोटा सुधार था, लेकिन मेरी सीख और उसके सोचे चकमे में फर्क करता था। मैं उसे चौंकाने के लिए नई शैली नहीं पहने था। हर बाजी को उसका अपना सवाल पूछने दे रहा था।
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7. दोबारा फाइनल
नए फाइनल की पहली बाजी मैंने जीती। शुरुआत में साधारण दिखती छोटी सीक्वेंस पूरे हाथ का स्थिर आधार बनी। बाकी समूह पूरे किए और गिनने में जल्दी किए बिना घोषणा की। पहली बार मैं खिताब से केवल एक बाजी दूर था।
दूसरी में समर ने जवाब दिया। उसने ऐसी जोड़ी छोड़ी जिसे मैं समझ रहा था बचाएगा, नया रास्ता बनाया और मुझसे पहले पूरा किया। वर्षों पहले की अभ्यास चर्चा से मैंने फैसला पहचाना। जितना मानता था, उससे ज्यादा उसने सुना था। वह अब भी मजबूत खिलाड़ी था।
फिर एक-एक। इस बार नीचे जाने के लिए और रास्ता नहीं था।
अधिकारी ने छोटा विराम दिया। पानी लेते समय समर ने गलती से अपना बैज मेरे पास रखा, फिर देखा और वापस ले गया। कोई नहीं हँसा। कमरे के पास हमें अलग पहचानने के लिए चेहरे से ज्यादा रोचक बात आ गई थी।
मैंने शुरुआती हार, देविका का दबाव, नकुल की उठी भौंह और पहले फाइनल के छोटे फैसले याद किए। हर जगह अलग जवाब चाहिए था। पूरे दिन को एक वीर भावना बनाकर आखिरी हाथ से आज्ञा नहीं मनवा सकता था।
पत्ते आए तो धीरे फैलाए। भाई खुले ढेर को देख रहा था। मैं अपने पत्ते। हम इतने पास थे कि साँस सुन सकते थे, इतने अलग कि कोई दूसरे की चाल नहीं चुन सकता था। आखिरी बाजी अपनी पूरी कठिनाई के साथ सामने थी।
8. तीन प्राकृतिक रास्ते
आखिरी हाथ में छोटी चिड़ी की सीक्वेंस और लंबा ईंट वाला रास्ता था। दूसरी तरफ जुड़े हुकुम थे, गुलामों की जोड़ी थी जिसे सही निशान मिलकर सेट बनाता, और जगह माँगते अकेले पत्ते थे। मैंने पहले प्राकृतिक समूह जाँचे। समर को परिचित लगती योजना अपने आप गलत नहीं थी। उसे चौंकाने वाली अपने आप उपयोगी नहीं थी।
उसने ईंट की बेगम छोड़ी। पहले दिन बड़े जोड़ों की आदत के कारण शायद उसे देखता रहता। इस हाथ में वह किसी बचे रास्ते में काम नहीं थी। मैंने बंद गड्डी से उठाया।
अगली बारी में ईंट की सीक्वेंस छह, सात, आठ और नौ तक पहुँची। चिड़ी के इक्का, दो, तीन बने। इक्का छोटे सिरे पर था। गुलामों का सेट चिड़ी, ईंट और पान के तीन अलग निशानों से पूरा हुआ। हुकुम के चार और पाँच अधूरे थे।
इंतजार करते हुए एक अतिरिक्त असंबद्ध पत्ता था। समर ने खुले ढेर से लिया। उसके हाथ के सुधरने की दिखाई देने वाली सूचना थी। मेरी धड़कन बढ़ी। मुझे नहीं पता था कि वह एक पत्ते दूर है या कई। मुझे पता था कि अपने पत्ते कानूनी रूप से कैसे जोड़ सकता हूँ और कौन-सा पत्ता बाकी सीक्वेंस पूरी करेगा।
अगला जरूरी पत्ता बंद गड्डी से मिला—हुकुम का छह।
मैंने उसे मेज पर नहीं पटका। चार और पाँच के पास रखा, हर वास्तविक पत्ता एक बार गिना और जरूरी अतिरिक्त पत्ता छोड़ा।
9. दूसरा हस्ताक्षर
मैंने चिड़ी के इक्का-दो-तीन, ईंट के छह-सात-आठ-नौ, हुकुम के चार-पाँच-छह और तीन अलग निशानों के गुलाम रखकर घोषणा की। तीन प्राकृतिक सीक्वेंस और एक सही सेट। कुल तेरह पत्ते। अधिकारी ने जाँचकर पुष्टि की।
नया निर्णायक फाइनल दो-एक से मेरा था। समर की दूसरी मैच हार से मुकाबला समाप्त हुआ। खिताब मेरा था।
भाई ने खुले पत्ते देखे, फिर अपना अधूरा हाथ। हुकुम के छह को धोखा नहीं कहा। परिणाम पर हस्ताक्षर किए। मेरा नाम लिखने से पहले उसकी कलम एक पल रुकी, फिर पंक्ति पूरी हुई।
घोषक ने पूरा रास्ता पढ़ा। शुरुआती मैच हार, निचले रास्ते की दो जीत, नया फाइनल कराने वाली जीत और आखिरी निर्णायक मुकाबला। कमरे ने हर हिस्से पर तालियाँ बजाईं। उस हार पर भी जिसने मुझे हॉल के लंबे रास्ते पर भेजा था।
समर ने हाथ बढ़ाया। “आज पूरा दिन तुम बेहतर खेले।”
आखिरी पत्ते की तारीफ से ये शब्द कठिन थे। मैंने स्वीकार किए, उन्हें मजाक छोटा करने में मदद नहीं की।
नकुल प्रस्तुति की मेज के पास था। आयोजक ने विजेता की पट्टिका देने को कहा तो उसने मुझे देते हुए बिना झिझक नाम लिया।
तस्वीर के लिए मैंने पट्टिका उठाई। समर दूसरे स्थान पर पास खड़ा था। उसके परिणाम के नीचे उसका अपना नाम था। चेहरे समान थे। पीछे हस्ताक्षर की गई शीट अलग थीं।
10. परिवार का अलग तरह का खेल
उस शाम पिता ने समर से पूछा कि फाइनल कैसे हुआ। भाई ने बताना शुरू किया, रुका और फोन मुझे दे दिया।
“समीर से पूछिए। फैसले उसने किए थे।”
मैंने पहले दोबारा फाइनल का नियम समझाया, क्योंकि रास्ता जरूरी था। फिर हुकुम की जोड़ बचाने और ईंट की लंबी सीक्वेंस बनने की बात की। पिता ने इतना ध्यान दिया कि सवाल हाथ के बारे में आया, किस भाई को कौन-सी प्रतिभा मिली है उसके बारे में नहीं।
अगले सप्ताह समर अभ्यास समूह में आया। मैंने उसके अपने नाम से रेणु से परिचय कराया। वह दूसरे फाइनल का हारा हाथ लाया और पुरानी बारी दोहराने को कहा। रेणु ने वही निर्देश दिया जो मुझे दिया था—उस समय वास्तव में मिली जानकारी समझाओ।
उसने भाई की आदतें जानने का जिक्र करना चाहा। रेणु ने पूछा कि कौन-सा खुला पत्ता निष्कर्ष का समर्थन करता है। मैंने चेहरा स्थिर रखा। फिर ईमानदारी से स्थिति बनाने में मदद की।
हम ऐसे भाई बने रहे जो चाय ठंडी होने से पहले एक-दूसरे को चिढ़ा सकते थे। लेकिन मेज पर अब वह यह बताने से पहले कि मुझे क्या करना चाहिए था, पूछता कि मैंने क्या देखा था।
अगले स्थानीय आयोजन में अधिकारी ने दोनों के बैज एक-एक बार जाँचे और अलग सीटें दीं। समर ने अच्छे मैच की शुभकामना दी। मैंने भी। फिर हम अपने प्रतिद्वंद्वियों की ओर मुड़े और खेल शुरू किया।
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