1. EVER 777 कहानी: उसकी थाली के ऊपर हुआ फैसला
सोनल खाना खत्म करती, उससे पहले परिवार उसका भविष्य बाँटने लगा था। बुआ को प्रशिक्षण संस्थान के साथ वाला हॉस्टल पता था। चचेरे भाई का परिचित नौकरी दे सकता था, यदि वह शतरंज के लिए बाहर जाना बंद करे। छोटे भाई नितिन को ठीक मालूम था कि उसकी शादी क्यों टूटी।
“तुम फैसले गलत करती हो,” उसने कहा। “फिर परिणाम बाकी लोगों को सहने पड़ते हैं।”
सोनल ने चम्मच रख दिया। वह तैंतीस की थी। नितिन सत्ताईस का। जिन निजी बातचीतों का सार वह खाने की मेज़ पर सुना रहा था, उनमें कभी मौजूद नहीं था।
पिता ने दोनों से आवाज कम करने को कहा। नितिन से आरोप वापस लेने को नहीं कहा।
भाई ने उसका फोन उठाना चाहा। स्क्रीन पर शहर की रैपिड नॉकआउट प्रतियोगिता में प्रवेश की पुष्टि थी। “एक और शानदार फैसला। कह दूँ कि तुम्हें शर्मिंदा होने से बचा लें?”
सोनल ने फोन उससे पहले पकड़ लिया।
नितिन मज़बूत स्थानीय क्लब में खेलता था। बचपन में दोनों ने एक ही पुरानी शतरंज पुस्तक पढ़ी थी। बड़े होने पर वह उसे ऐसी खिलाड़ी बताता था जिसमें कभी संभावना थी। उस रात बोला कि काश ड्रॉ में दोनों आमने-सामने आएँ। तब परिवार सही तरह फैसला परखा जाता देख सकेगा।
सोनल थाली रसोई में ले गई। इतनी देर तक धोती रही कि पीछे बातचीत दोबारा शुरू हो गई। घर लौटती बस में उसने प्रतियोगिता की पुष्टि फिर खोली। तारीख जाँची। छह सप्ताह बचे थे।
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2. लाल रंग में लिखी चार हार
उसने रेलवे में काम करने वाले वयस्क क्लब साथी महेश से अभ्यास की बाज़ियाँ माँगीं। उसने आसान शुरुआत सुझाई। सोनल ने कहा कि वे स्थितियाँ लें जिनमें वह सबसे अधिक विफल होती है।
महेश ने पूरा समय रखा, तारीख लिखी और अपने चुनाव नरम किए बिना खेला। सोनल हारी। अगली शाम फिर हारी।
सप्ताह के अंत तक कॉपी के पहले पन्ने पर चार लाल परिणाम थे। मन हुआ पन्ना फाड़ दे। महेश ने कहा कि जब तक चारों हार का अलग कारण न बता सके, पन्ना सामने रहने दे।
“एक शब्द चार बाज़ियों की व्याख्या नहीं करता,” उसने कहा।
सोनल ने चारों के सामने लापरवाही लिखा था। चारों जगह शब्द काट दिया।
उन्होंने तय किया कि कुछ दिन के अंतर पर एक बाज़ी फिर देखेंगे। बीच में सामान्य पूरी बाज़ियाँ भी होंगी। कोई स्थिति केवल हराने वाली चाल याद करके हल नहीं मानी जाएगी। महेश बचाव बदलता। कभी मोहरों की व्यवस्था इतनी बदल देता कि पुराना उत्तर गलत हो जाए।
सोनल ने परिवार के समूह में जीत की तस्वीर भेजना बंद किया। किराये के कमरे की मेज़ पर चार हार की प्रतियाँ काँच के पेपरवेट के नीचे रखीं। प्रवेश की पुष्टि फोन में थी। नितिन ने उसके नीचे हँसता चेहरा भेजा तो सोनल ने स्क्रीन नीचे कर दी और पहली स्थिति बिछा ली।
3. पहली हार: वह जवाब जो पूछा ही नहीं
पहली अभ्यास हार में सोनल ने हमला इसलिए शुरू किया था क्योंकि उसके तीन मोहरे विरोधी राजा की ओर थे। अपने हमलावर दो बार गिने थे। बचाव करने वाले के संभावित शह एक बार भी नहीं गिने थे।
महेश की बीच की शह ने उसका राजा हटाया। फिर क्वीन का ढीले हाथी से संपर्क टूट गया। हाथी गया और जिस हमले की वह प्रशंसा कर रही थी, वह उपयोगी रूप में बचा ही नहीं।
समीक्षा में वह अपनी योजना समझाना चाहती थी। महेश ने पूरी बात सुनी। फिर विरोधी मोहरा शह वाले खाने पर रख दिया।
“अब क्या होता है?”
दोनों ने पहले शह देखीं, फिर मार और सीधे खतरे। उसकी इच्छित चाल केवल एक निष्क्रिय बचाव के खिलाफ चलती थी। दो सक्रिय जवाब उसे तोड़ देते थे। उसने मनचाहा प्रतिद्वंद्वी बनाया और असली प्रतिद्वंद्वी की कुर्सी पर बैठा दिया था।
अगले सप्ताह वह अपनी उम्मीदवार चाल बोलती, फिर फैसला करने से पहले बोर्ड घुमा देती। दूसरी तरफ से देखने पर वह विकर्ण दिखने लगा जिसे बार-बार भूलती थी।
शुक्रवार की पूरी बाज़ी में उसने मिलता-जुलता हमला छोड़ दिया। महेश ड्रॉ बचा गया, मगर सोनल का हाथी बोर्ड पर रहा। उसने पहले लाल परिणाम के पास सही फैसले का निशान लगाया। पुरानी हार नहीं बदली। केवल वह प्रश्न लिखा जो अंततः पूछना सीख गई थी।
4. दूसरी हार: गलत पक्ष की मदद करने वाली अदला-बदली
दूसरी बाज़ी शांत दिखती थी। क्वीन हट गईं तो सोनल ने मान लिया कि खतरा भी चला गया। उसने सक्रिय ऊँट को घोड़े के बदले दे दिया। बराबर मूल्य के मोहरे उसे आसान अंत का वादा लग रहे थे।
इस अदला-बदली के बाद महेश का राजा सक्रिय हुआ। सोनल का बचा ऊँट अपने जमे हुए प्यादों के पीछे फँसा रहा। महेश ने एक तरफ निशाना बनाया, उससे रक्षा कराई, फिर दूसरी तरफ घुस गया। अंतिम पंद्रह चालों में सोनल उपयोगी खाने गायब होते देखती रही।
अब उन्होंने ऊँट बचाकर स्थिति दोहराई। सोनल प्रवेश के खानों को चुनौती दे सकती थी। अंत में काम बाकी था, मगर उसके मोहरे भाग ले सकते थे।
महेश ने कोई अदला-बदली किए बिना तीन संभावनाएँ तुलना करने को कहा। किसका मोहरा बेहतर होगा? कौन सा प्यादा कमजोर पड़ेगा? किस राजा को रास्ता मिलेगा?
सोनल ने प्रतिलिपि पर तीर बनाए। केवल आसान करो नहीं लिखा। उस एक शब्द ने बहुत कुछ छिपा रखा था।
परिवार की अगली मुलाकात में नितिन ने शुरुआती जाल दिखाना चाहा। सोनल ने पूछा कि काले मोहरे लालच न लें तो कैसा अंत मिलेगा।
वह हँसा। बोला कि सीधी बात जटिल बना रही है।
सोनल चाय खत्म करके समय पर निकली। घर में दोनों तरफ से ऊँट वाला अंत खेला। आधी रात से पहले रुकी, ताकि थकान हर चाल को अनुमान न बना दे।
5. तीसरी हार: गलत प्रश्न पर नौ मिनट
तीसरी बाज़ी की पर्ची में एक काली लकीर थी जहाँ लिखावट बिगड़ गई थी। सोनल ने हाथी के दो उचित खानों में से चुनने में नौ मिनट खर्च किए थे। फिर असली निर्णायक स्थिति एक मिनट से कम समय में खेली।
महेश ने हर जगह तेजी करने को नहीं कहा। पूछा कि पहली बार बाज़ी का स्वरूप कहाँ बदल सकता था। बीच के प्यादे का धक्का दोनों राजाओं के पास फाइल खोलता। उस फैसले को समय मिलना चाहिए था। समान तैयारी वाली चालों में समय खत्म हो गया।
अभ्यास के बाद वे सरल समीक्षा करते। लंबी सोच कहाँ हुई और उससे क्या मिला? देरी से डरने के बाद कभी सोनल बहुत कम समय देने लगी। वे गलतियाँ धीमे फैसलों के पास लिखीं।
धीरे-धीरे निर्णायक केंद्रीय धक्के पर उसके पास उपयोग करने लायक समय रहने लगा। स्थिति खुलते ही धड़कन अब भी बढ़ती थी, मगर पहली आकर्षक लाइन के आगे गणना संभव थी।
प्रतियोगिता से एक सप्ताह पहले नितिन ने साथ ले जाने को फोन किया। फिर जोड़ा कि बाहर होने पर जल्दी लौटने को तैयार रहना।
“मेरे आने-जाने का इंतज़ाम है,” उसने कहा।
“हर बात कठिन करती हो।”
सोनल ने नौ मिनट वाली प्रविष्टि देखी। “सीख रही हूँ कि समय कहाँ देना चाहिए।”
नितिन ने उत्तर को झगड़ा समझा। सोनल वापस बाज़ी पर लौट गई।
6. चौथी हार: गलती के बाद की चाल
चौथी अभ्यास बाज़ी में सोनल ने प्यादा खोया था। उस प्यादे से उसकी स्थिति नहीं टूटी थी। अगली चाल से टूटी थी।
उसने बेकाबू हमला किया। मानो अपमान का हिसाब महेश से लेना हो। महेश ने हमलावर मोहरा बदला, राजा सुरक्षित किया और बेहतर अंत में पहुँच गया। समीक्षा में तीन ऐसे रास्ते मिले जिनसे बचाव संभव था। उसने उन पर ठीक से विचार तक नहीं किया था।
उन्होंने स्थिति फिर खेली, इस बार प्यादा पहले से कम रखकर। सोनल को मौजूद स्थिति से उपयोगी खेल खोजना था। हाथी सक्रिय किया, सुरक्षित दूरी से शह दीं और महेश से काम करवाया। एक प्रयास हारी, दूसरा ड्रॉ किया, तीसरे में अनावश्यक प्यादा धक्का देकर बचाव बिगाड़ा।
तीसरा प्रयास सबसे अधिक चुभा। सीख समझने के बाद भी अधीर होने पर उसे छोड़ सकती थी। उसने स्थिति फिर अभ्यास की। यह मान लेने का सुख नहीं लिया कि परेशानी हमेशा के लिए समाप्त हो गई।
प्रतियोगिता की सुबह चारों स्कोर प्रतियाँ बैग में रखीं। बस की प्रतीक्षा करते समय पिता का फोन आया।
“कुछ भी हो, भाई के साथ तमाशा मत करना।”
“उससे भी यही कहिए।”
कुछ देर चुप्पी रही। फिर उन्होंने कहा कि भवन आएँगे।
सोनल पानी, दो केले और चार हार लेकर बस में बैठी। अब उन हारों का कारण लापरवाही कहे बिना बता सकती थी।
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7. भाई के सामने की सीट
नॉकआउट मुकाबलों में दो रैपिड बाज़ियाँ थीं। बराबरी बचती तो छोटे समय की बाज़ियाँ होतीं। सोनल ने पहला दौर शुरुआती ड्रॉ के बाद दूसरी बाज़ी जीतकर पार किया। क्वार्टरफाइनल में कठिन स्थिति बचाई, फिर दूसरी बाज़ी तब जीती जब प्रतिद्वंद्वी ने प्यादे के पीछे अपना राजा कमजोर किया।
नितिन उनके हिस्से की दूसरी ओर से सेमीफाइनल पहुँचा। जोड़ी घोषित होते ही उसने तस्वीर परिवार के समूह में भेज दी।
पिता पहली बाज़ी के दौरान आए। सोनल ने बाधा के पास उनका कोट देखा और ध्यान वापस बोर्ड पर लाई। नितिन ने ऐसी लाइन चुनी थी जिसमें प्यादे के बदले महत्त्वाकांक्षी हमला मिल सकता था। पुरानी सोनल निमंत्रण स्वीकार करती, क्योंकि मना करना डर लगता।
उसने नितिन के मजबूर करने वाले जवाब गिने। आकर्षक बलिदान के बाद बचाव में अदला-बदली और फिर शह से हमला टूटता था। उसने मोहरा बचाया, विकास पूरा किया और केंद्र पर मुकाबला किया।
अपेक्षित बलिदान न आने पर नितिन का चेहरा बदला। वह खतरनाक बना रहा। दबाव कमजोर प्यादे की तरफ ले गया। सोनल ने समान विकल्पों पर घड़ी खर्च किए बिना रक्षा की।
दोनों संतुलित अंत में पहुँचे। ड्रॉ हुआ।
दूसरी बाज़ी के लिए मोहरे रखते समय नितिन ने धीमे कहा, “सुरक्षित खेलना हमेशा नहीं बचाएगा।”
सोनल ने मोहरे शुरुआती खानों में रखना जारी रखा।
8. विकर्ण खुलता है
दूसरी बाज़ी में नितिन ने दबाव बढ़ाया। उसकी क्वीन प्यादे पर हमला करने केंद्र से बाहर गई। सोनल का ऊँट लंबे विकर्ण को देख रहा था, जिसके रास्ते में उसका अपना घोड़ा था। घोड़ा हटे तो क्वीन पर हमला खुल सकता था। लेकिन अधिकतर घोड़े की चालों के बाद नितिन अपना खतरा पहले पूरा कर सकता था।
सोनल ने मजबूर करने वाली चालें खोजीं। घोड़े की एक छलाँग शह देती थी। उससे ऊँट की लाइन खुलती और तत्काल राजा की सुरक्षा का जवाब देना पड़ता।
उसने घोड़ा नहीं छुआ। जाँचा कि क्या उसे आसानी से मारा जा सकता है, शह बीच में रोकी जा सकती है या नितिन उससे बड़ा खतरा दे सकता है। महत्त्वपूर्ण मार वाली लाइन में शह का उत्तर होने के बाद भी ऊँट क्वीन लेता। राजा हटने वाली लाइनों में भी विकर्ण खुला रहता। बचाने वाली जवाबी शह नहीं थी।
उसने घड़ी देखी। केवल पहली रोमांचक चाल नहीं, अदला-बदली के बाद का अंत जाँचने का समय भी था।
घोड़ा कूदा।
नितिन पीछे हुआ, फिर आगे झुका। उसने राजा हटाया। सोनल ने नए खुले विकर्ण से क्वीन ले ली। अगली मजबूर अदला-बदलियों के बाद सामग्री में स्पष्ट लाभ रहा। नितिन के सक्रिय मोहरे और व्यावहारिक अवसर फिर भी थे।
बाधा के पीछे पिता हिले। कमरा संयोजन का जश्न मनाने को तैयार लगता था।
सोनल ने चाल दर्ज की और नितिन की अगली शह देखी।
9. वह खेलता रहा, सोनल भी
क्वीन खोने के बाद नितिन ने हार नहीं मानी। शह खोजीं, ढीले प्यादों पर हमला किया और सोनल के मोहरों से एक साथ बहुत काम करवाना चाहा। सोनल का पहला आवेग दिखाने का था कि जीत स्पष्ट है। उसने चौथी हारी बाज़ी से उस इच्छा को पहचान लिया।
दूसरा प्यादा लेने से पहले राजा का आश्रय सुधारा। नितिन ने ऐसी अदला-बदली दी जिससे उसकी शह के अवसर घटते थे। सोनल ने तभी स्वीकार किया जब बचा अंत अनुकूल जाँच लिया। पास हुए प्यादे को रोकने वाला सक्रिय मोहरा बचाया और दूसरा खेल में लाई।
दर्शकों की उम्मीद से बाज़ी लंबी चली। नितिन ने पिता की तरफ देखा, शायद परिचित आश्वासन खोजते हुए। पिता बोर्ड देख रहे थे।
सोनल ने आखिरी खतरनाक प्यादा रोककर ऐसा खतरा बनाया जिसका उत्तर नहीं था। नितिन ने राजा धीरे से किनारे झुकाया। फिर सीधा करके हाथ बढ़ाया।
डेढ़ के मुकाबले आधे अंक से मुकाबला सोनल का था।
स्कोर की मेज़ पर आयोजक ने नितिन से पुष्टि माँगी। उसने हस्ताक्षर किए, फिर सोनल को देखा।
“सोचा था तुम जल्दी करोगी।”
“चार साल तुमने कहा कि मैं फैसला नहीं कर सकती,” सोनल बोली। “मैंने इन स्थितियों को छह सप्ताह दिए।”
उसने बैग उठाया। अभी फाइनल खेलना बाकी था।
10. दूसरा स्थान, पहला जवाब
फाइनल में सोनल पैंतीस वर्ष की शिक्षिका कविता से हारी। पहली बाज़ी ड्रॉ रही। दूसरी में कविता ने छोटे स्थितिगत लाभ को जीत में बदला। सोनल उसे दूर नहीं कर सकी। बाद में बोर्ड पर रुककर महत्त्वपूर्ण प्यादे की अदला-बदली पूछी।
कविता ने विश्लेषण बोर्ड पर लाइन दिखाई। नितिन आया, सुनता रहा और बातचीत खत्म होने की प्रतीक्षा की।
पुरस्कार के समय सोनल उपविजेता की जगह खड़ी हुई। दोनों फाइनलिस्ट को अगले शहर आयोजन का निमंत्रण मिला। पिता ने पूरे मंच की तस्वीर ली। फिर आयोजक से बेटी के साथ उनकी एक तस्वीर लेने को कहा।
नीचे उतरते समय नितिन ने फोन दिया। परिवार के समूह में सेमीफाइनल का परिणाम उसने खुद भेजा था। नीचे लिखा था कि सोनल ने बेहतर गणना की और जीत की हकदार थी।
“उस रात खाने पर...” उसने शुरू किया।
“तुम्हें उसकी व्याख्या करने का अधिकार नहीं था।”
उसने सिर हिलाया। इस बार कोई मज़ाक नहीं जोड़ा।
घर लौटते समय बुआ का हॉस्टल वाला संदेश आया। सोनल ने उत्तर दिया कि रहने की जगह तय कर ली है। जाने की व्यवस्था होने पर पता भेज देगी। फिर कविता से हारी बाज़ी के लिए नया पन्ना खोला।
ऊपर प्यादे की अदला-बदली, घड़ी का समय और वह प्रश्न लिखा जिसका सही उत्तर नहीं मिला था। उसके नीचे अगली प्रतियोगिता की तारीख लिख दी।
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