Game Rummy — आखिरी बिस्तर सामान के लिए था
Game Rummy

Game Rummy — आखिरी बिस्तर सामान के लिए था

काल्पनिक कहानी · पात्र और घटनाएँ कहानी का हिस्सा हैं।

कमरे में चार बिस्तर थे। संदीप ने फर्श पर सोने को कहा तो आरिफ ने फिर गिने। एक खिड़की के पास। दो लंबी दीवार के साथ। एक बाथरूम के पास, जिस पर उनके बैग रखे थे।…

कमरे में चार बिस्तर थे।

संदीप ने फर्श पर सोने को कहा तो आरिफ ने फिर गिने।

एक खिड़की के पास। दो लंबी दीवार के साथ। एक बाथरूम के पास, जिस पर उनके बैग रखे थे।

“ये कहाँ रख दूँ?” आरिफ ने पूछा।

“रहने दो।”

सफर से पहले कमरे का अपना हिस्सा दे चुका था।

संदीप जूते उतार रहा था।

“सामान सूखा रहना चाहिए।”

फर्श सूखा था। आरिफ ने बिस्तर के नीचे की जगह देखी। फिर तकिए पर पड़े सूटकेस को देखा।

रोहित ने टीवी चला दिया।

दिनेश बोला, “पहले ही दौरे पर बात मत बनाओ।”

आरिफ ने होटल का दिया पतला कंबल मोड़ा और दीवार के पास बिछा दिया।

ऊपर किसी बैग की चेन खुली।

संदीप को चार्जर चाहिए था।

वह उस बिस्तर पर रखे बैग में था जिस पर कोई नहीं सोने वाला था।

* * *

आरिफ अट्ठाईस साल का था। नाशिक में कूरियर गोदाम पर काम करता था। डिलीवरी वैन में जाने से पहले पार्सल जाँचता था।

वयस्क खिलाड़ियों की पंजीकृत भारतीय रमी टीम में जाना ऐसे कमरे में प्रवेश जैसा लगा था जिसे अब तक बाहर से देखता आया था।

टीम का नाम वेस्ट रोड था।

कप्तान संदीप ने स्थानीय प्रतियोगिता के बाद बुलाया था। कहा, ध्यान अच्छा रहता है। नियमित प्रतियोगिता मिले तो और बेहतर होगा।

आरिफ ने तय टीम शुल्क दिया। छुट्टी का इंतजाम किया। ऐसी कमीज़ खरीदी जिस पर गोदाम का नाम नहीं था।

जाने से पहले माँ ने उसका ढीला बटन सिला।

“खुशी में नींद मत छोड़ देना,” उन्होंने कहा।

उसने वादा किया।

होटल के फर्श पर वही कमीज़ मोड़कर सिर के नीचे रखी।

माँ को यह हिस्सा नहीं बताया।

* * *

पाँच बजकर चालीस मिनट पर दिनेश बाथरूम जाने के लिए उसे लाँघकर निकला।

चप्पल की एड़ी कंबल में अटक गई।

“थोड़ा खिसक।”

आरिफ खिसक गया।

छह बजे संदीप ने चाय लाने को कहा।

छह बीस पर नाश्ता ऊपर चाहिए था।

दो बार नीचे गया। पहली बार लौटने तक रोहित ने ऑर्डर बदल दिया था।

इंतजार करते-करते खाने की जगह भर गई। ऊपर आया तो बाकी अपना सामान देख रहे थे।

“वहाँ खा लेना,” संदीप ने कहा।

आयोजन स्थल पर लगभग देर हो गई।

आरिफ ने पंजीकरण कराया। टीम का फोल्डर उठाया। बिना खाए अपनी सीट खोजी।

पहला नतीजा खराब रहा।

संदीप ने पूछा, हुआ क्या है?

आरिफ ने कहा, नींद कम हुई।

“थके सब हैं।”

* * *

पूरा आयोजन उसकी वजह से नहीं हारे थे।

नतीजों में साफ था।

मगर लौटते समय संदीप उसकी गलतियाँ ऐसे गिना रहा था जैसे बाकी तीन सिर्फ उसे असफल होते देखने गए थे।

चर्चा के बीच रोहित सो गया।

दिनेश ने अपनी पानी की बोतल आरिफ को पकड़ा दी।

आरिफ सुनता रहा। बेहतर तैयारी का वादा किया।

घर में माँ ने पूछा, होटल आराम का था?

उसने कहा, ठीक था।

फिर दोपहर के खाने तक सोता रहा।

उठा तो संदीप का संदेश था। अगली बार अतिरिक्त पेन, चार्जिंग तार, समय-सारणी की छपी प्रतियाँ और मेज पोंछने का छोटा तौलिया लाना।

काम पर जाते समय आरिफ ने पेन खरीद लिए।

* * *

दूसरे दौरे में व्यवस्था पक्की हो गई।

चार वयस्क। चार बिस्तर।

तीन लोग बिस्तरों पर।

चौथे पर उनका सामान।

आरिफ ने पूछा कि कमरा मिलने के बाद बैग हटा सकते हैं क्या।

संदीप बोला, बहुत संवेदनशील होता जा रहा है।

“सबसे नया तू है। सब अपना हिस्सा करते हैं।”

आरिफ ने कमरे को देखा।

खड़ा सिर्फ वही था।

खाने पर रोहित ने बताया कि कप्तान एक बार भीड़ भरी बस में टीम की ट्रॉफी लेकर आया था। शुरुआत में सबको मेहनत करनी पड़ती है।

आरिफ को ट्रॉफी और तकिए का संबंध समझ नहीं आया।

धीरे-धीरे खाता रहा। डर था कि बोलेगा तो आवाज गिड़गिड़ाने जैसी निकलेगी।

रात को होटल से एक और कंबल माँगा।

रिसेप्शन वाले ने कहा, कमरे में चार बिस्तर हैं।

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“मालूम है,” आरिफ बोला।

* * *

काम आने के छोटे इनाम मिलते थे।

बिना कहे कुछ ले आए तो संदीप भरोसेमंद कहता।

बुकिंग का समय ठीक कर दे तो दिनेश कहता कि व्यवस्थित आदमी साथ हो तो अच्छा है।

आरिफ जल्दी पहुँचने लगा ताकि सबके टिकट ले सके।

फोल्डर उठाता, क्योंकि नहीं उठाता तो भूल जाता था।

सोचता था, एक बार भरोसा जम जाए तो बाकी भी बदल जाएगा।

इसके बजाय काम बढ़ते गए।

अभ्यास के बाद सफाई।

आयोजन में खाने की लाइन।

एतराज करे तो याद दिलाया जाता कि टीम में सहयोग जरूरी है।

अच्छा खेले तो संदीप कहता, व्यवस्था का लाभ है।

खराब खेले तो व्यवस्था का कोई संबंध नहीं रहता था।

* * *

चोट सस्ते लॉज की सीढ़ियों पर लगी।

लिफ्ट खराब थी।

आरिफ अपना बैग और उपकरणों का एक केस उठा रहा था।

संदीप ने एक और छोटा बैग पकड़ा दिया। बोला, बस तार हैं।

दूसरे मोड़ पर पट्टा खिसका।

केस दीवार से न टकराए, इसलिए आरिफ मुड़ा। पैर सीढ़ी के किनारे पर गलत पड़ा।

टखने में तेज दर्द हुआ।

वह बैठ गया।

ऊपर से संदीप बोला, “केस मत गिराना।”

सबसे पहली बात यही कही गई।

दिनेश बैग लेने वापस आया।

रोहित ने पूछा, देर तो नहीं होगी?

आरिफ टखना देखता रहा। किसी दूसरे सवाल का इंतजार किया।

वह नहीं आया।

* * *

क्लिनिक में जाँच से हड्डी टूटने की बात नहीं निकली। चोट को आराम देने और बताए समय पर दोबारा दिखाने को कहा गया।

पूछा गया कि सोने की ठीक जगह है?

आरिफ अपने को रोकने से पहले हाँ कह चुका था।

बाहर संदीप देर होने की शिकायत कर रहा था।

आरिफ ने कागज घुटने पर रखे।

“आज बिस्तर चाहिए।”

“कंबल है।”

“बिस्तर के पैसे दिए हैं।”

“पैसे सबने दिए हैं।”

इस जवाब पर उसने सिर उठाया।

कई हफ्तों से साधारण चीज की जरूरत समझा रहा था।

अब साधारण सच कप्तान ने खुद कह दिया था।

सबने पैसे दिए थे।

आरिफ ने रिसेप्शन पर दूसरा कमरा पूछा।

छोटा अकेला कमरा उपलब्ध था।

वापसी के लिए रखे पैसों से भुगतान किया। फिर भाई को फोन करके लौटने का किराया उधार माँगा।

* * *

बाद में संदीप ने दरवाजा खटखटाया।

“कल की बात करनी है।”

आरिफ बैठा रहा।

“क्लिनिक का कागज भेज दिया है। कल नहीं खेल सकता।”

“पंजीकृत रिजर्व लगाना पड़ेगा।”

“वह इसी के लिए है।”

संदीप देखता रहा।

पहली बार आरिफ ने जवाब के बाद उसे नरम बनाने की कोशिश नहीं की थी।

कप्तान बोला, टीम को मुश्किल में छोड़ना याद रखा जाएगा।

आरिफ ने अपने नीचे के साधारण बिस्तर को देखा।

चादर साफ थी। तकिए पर फीका नीला खोल था। कुछ भी शानदार नहीं था।

उसे इतना गुस्सा है, यह तब समझ आया जब गुस्से को आराम से बैठने की जगह मिली।

“जाते समय दरवाजा बंद कर देना,” उसने कहा।

* * *

घर पहुँचकर माँ को कमरों के बारे में बताया।

उन्होंने यह नहीं पूछा कि होने क्यों दिया।

पूछा, भुगतान वाले संदेश रखे हैं?

रखे थे।

भाई ने अलग कमरे के पैसे पूछे।

आरिफ ने रसीद दिखा दी।

वे बैठकर संदीप को सजा देने की योजनाएँ नहीं बनाने लगे।

भाई को सुबह काम पर जाना था। माँ को दाल भिगोनी थी।

बात बताने के आसपास सामान्य काम होते रहे।

इससे मदद मिली।

आरिफ ने तारीखों, कमरे के अपने योगदान और आखिरी सफर के खर्चों के साथ लिखित विवरण टीम प्रशासक को भेजा।

पूछा, सूची से नाम कैसे हटेगा और अगली अनुमत अवधि में दूसरी टीम कैसे ले सकती है।

फिर टखना दोबारा दिखाने का समय देखा।

इस बार खेल इंतजार कर सकता था।

* * *

संदीप ने एहसानफरामोश कहा।

रोहित ने संदेश दिया कि फर्श पर सुलाने का मतलब अपमान नहीं था।

दिनेश ने लिखा, सबको लगता था आरिफ वहीं सोना पसंद करता है।

आखिरी संदेश तीन बार पढ़ा।

बैग हटाने को कहा था, याद था।

दूसरा कंबल माँगा था, याद था।

रिसेप्शन वाले का चार बिस्तर कहना याद था।

उसने कमरे के भुगतान की तारीखें और पुराने अनुरोध भेज दिए।

फिर समझाना बंद किया।

प्रशासक ने शिकायत और टीम रिकॉर्ड देखे।

कुछ यात्रा खर्च लौटाने पर सहमति हुई। कुछ पर विवाद रहा।

आरिफ ने इन सवालों को टीम बदलने की प्रक्रिया से अलग रखा।

वहाँ से जाने के लिए पुराने साथियों का हर रात के दुख को मानना जरूरी नहीं था।

* * *

टीम तुरंत नहीं बदली।

मौजूदा चरण पूरा होना था। हटने का अनुरोध दर्ज होना था। नया पंजीकरण लीग की अगली तय अवधि में हो सकता था।

इस बीच आरिफ दोबारा जाँच के लिए गया। सलाह के अनुसार सामान्य गतिविधियों में लौटा।

तैयार होने पर स्थानीय अभ्यास किया।

खुद के प्रति वफादारी साबित करने के लिए घायल होकर प्रतियोगिता में नहीं पहुँचा।

दूसरी वयस्क टीम लेक रोड के संयोजक शैलेश को पता चला कि वह जगह खोज रहा है।

उन्होंने एक अभ्यास में आने को कहा।

आरिफ समय से पहले छपी समय-सारणी लेकर पहुँचा, जो किसी ने माँगी नहीं थी।

शैलेश ने धन्यवाद दिया। फिर पहले से मौजूद प्रतियों में से एक उसे पकड़ा दी।

“ये अपने लिए रख सकते हो।”

आरिफ को समझ नहीं आया कि हाथ कहाँ रखे।

* * *

अभ्यास कोई उद्धार समारोह नहीं था।

बिजली का काम करने वाले मनोज ने उसके एक निर्णय पर सवाल किया।

पढ़ाने वाले नवीन ने कहा कि उसके लिखे नोट समझना मुश्किल है।

कुछ हिस्से में अच्छा खेला। दूसरे में खराब।

शैलेश ने पूछा कि कार्यक्रम के लिए समय दे सकता है क्या।

सहमति से पहले टीम का योगदान, जिम्मेदारियाँ और रहने की व्यवस्था तय हुई।

हर व्यक्ति का अलग काम होगा।

खर्च बताए अनुसार बाँटेंगे।

कमरों की बुकिंग में वास्तव में सोने वाले लोगों की गिनती होगी।

आरिफ ने बिस्तर पूछे।

शैलेश ने विवरण देखा।

“चार लोगों के लिए दो कमरे। दोनों में दो अलग बिस्तर।”

“मेरा मतलब, क्या—”

वह रुक गया।

शैलेश ने बिना मुस्कराए इंतजार किया।

फिर कहा, “हाँ। हर व्यक्ति के लिए बिस्तर।”

आरिफ ने ऐसे सिर हिलाया जैसे निकलने का समय पूछा हो।

* * *

पहले दौरे पर टीम का फोल्डर उसने उठाया।

यह उसका तय काम था।

उपकरणों का केस मनोज के पास था। नवीन यात्रा देख रहा था। शैलेश कमरे सँभाल रहे थे।

होटल में आरिफ ने आदत से मनोज का बैग पकड़ना चाहा।

“मैं ले लूँगा,” मनोज बोला।

कोई भाषण नहीं था। वह कमरे का नंबर देख रहा था।

कमरे में दो पतले बिस्तर थे।

मनोज ने अपना बैग अपने बिस्तर के नीचे रखा। फोन लगाया।

आरिफ दरवाजे में खड़ा था।

“कौन-सा?”

मनोज ने देखा।

“यह लिया है। खिड़की वाला चाहिए?”

आरिफ ने कहा, कोई भी ठीक है।

“तो वह तुम्हारा।”

उसने धीरे-धीरे बैग खोला।

किसी ने तकिए से हटाकर उपकरणों के लिए जगह बनाने को नहीं कहा।

* * *

पहली रात आराम से नहीं बीती।

वह जागता रहा। जैसे कोई आकर बताएगा कि गलत समझ लिया है।

पाँच चालीस पर मनोज बाथरूम गया।

आरिफ उठ बैठा।

“चाय चाहिए?”

मनोज ने पलकें झपकाईं।

“अभी?”

“ले आ सकता हूँ।”

“फिर सोने जा रहा हूँ।”

उसने बाथरूम की बत्ती बंद की और बिस्तर में चला गया।

आरिफ लेट गया।

कुछ देर चुप्पी भी ऐसा काम लगी जिसका तरीका नहीं बताया गया था।

फिर सो गया।

नाश्ते में उसके लिए किसी ने ऑर्डर तय नहीं किया था।

अपनी पसंद चुनी। गर्म रहते खाया।

नवीन ने कार्यक्रम माँगा।

आरिफ ने फोल्डर दे दिया।

बिना भूखा रहे भी काम आया जा सकता था।

* * *

रातोंरात टीम का सबसे अच्छा खिलाड़ी नहीं बना।

पहले आयोजन में एक मुश्किल सत्र के बाद गलती हुई।

इंतजार किया कि बाकी दिन उसकी सजा बन जाएगा।

शैलेश ने पूछा, क्या हुआ था?

आरिफ ने माफी से शुरू किया।

“पहले क्रम बताओ।”

उन्होंने देखा। मनोज ने अपनी पिछली गलती बताई।

नवीन विश्लेषण के एक हिस्से से सहमत नहीं था। कारण समझाया।

खेल की बात हो रही थी।

आरिफ इंतजार करता रहा कि चर्चा उसके कमरे, यात्रा या कुर्सी के लायक होने पर पहुँच जाएगी।

नहीं पहुँची।

शाम को मेज के लिए पानी लाने की उसकी बारी थी।

लौटा तो खाना रखा था।

साथी भी इंतजार कर रहे थे।

* * *

श्रृंखला में लेक रोड बेहतर हुई।

कुछ योगदान आरिफ के बढ़े ध्यान का था। कुछ दूसरों का।

कभी उसने मुश्किल सत्र सँभाला। कभी किसी और ने टीम को सँभाला।

उसने सीखा कि खराब नतीजे के बाद भी जगह बनी रह सकती है।

यह सीखने में समय-सारणी सीखने से ज्यादा वक्त लगा।

पुरानी टीम के प्रशासक ने आखिर अलग कमरे का कुछ खर्च लौटाना स्वीकार किया।

आरिफ ने रकम दर्ज की। बाकी केवल दस्तावेज वाले खर्चों पर बात जारी रखी।

वे संदेश अब हर शाम नहीं घेरते थे।

ध्यान में इतनी जगह बची कि मालूम हुआ नवीन सत्र से पहले गुनगुनाता है।

मनोज हमेशा कहता है कि इस बार कम सामान ले जाएगा।

दोनों बातें साथियों को झेलने से संबंधित नहीं थीं।

* * *

अंतिम मुकाबले में लेक रोड के सामने वेस्ट रोड आई।

प्रकाशित कार्यक्रम से आरिफ को पता चला।

इस क्षण की इतनी बार कल्पना की थी कि कागज पर उसका साधारण दिखना अजीब लगा।

दो टीमों के नाम।

पहुँचने का समय।

गलियारे में संदीप पास आया।

“नए लोगों के साथ आराम है?”

आरिफ ने हाँ कहा।

“आज के बाद देखेंगे कितना आराम रहता है।”

एक पल लॉज की सीढ़ियों की गंध लौट आई।

तभी मनोज आया। नवीन से बहस चल रही थी कि रसीदें रखने की बारी किसकी है।

संदीप को देखकर दोनों रुके।

आरिफ ने कहा, रिपोर्ट करना है।

उनके साथ चल दिया।

रास्ते में सारे बैग उसे नहीं पकड़ा दिए गए।

* * *

मुकाबला करीबी था।

एक सत्र में आरिफ पीछे हुआ। चेहरा गर्म हो गया।

दूसरी तरफ रोहित की किसी बात पर संदीप मुस्करा रहा था।

आरिफ ने अपने कागज देखे।

विराम में शैलेश ने पूछा, ठीक से खाया?

इतने अलग आदमी के मुँह से जाना-पहचाना सवाल सुनकर लगभग हँसी आ गई।

“हाँ।”

“अच्छा। हमें तुम्हारा ध्यान चाहिए। उनके चेहरे पढ़ने की जरूरत नहीं।”

वह वापस मेज पर गया।

अगला सत्र बेहतर रहा।

मनोज का भी।

अंतिम हिस्से तक लेक रोड थोड़ी आगे थी।

जाँचे हुए अंतिम कुल अंकों तक बढ़त बनी रही।

वेस्ट रोड हार गई थी।

आरिफ ने नतीजा पढ़ा।

फिर बैठ गया। पैर काँप रहे थे।

नवीन ने पानी पास रख दिया।

किसी ने नहीं कहा कि काँपना असफल होने की निशानी है।

* * *

पुरस्कार के बाद संदीप आया।

बोला, अनुशासन उसी के पास सीखा था।

आरिफ ने नतीजों वाला फोल्डर बंद किया।

“यह सीखा कि क्या नहीं मानूँगा।”

रोहित ने दूसरी तरफ देखा।

फोटोग्राफर इंतजार कर रहा था।

संदीप ने पुरानी और नई टीम की साथ तस्वीर की बात की।

आरिफ ने कहा कि लेक रोड के साथ तय टीम फोटो में रहेगा।

रहा।

फिर भीड़ से बाहर आ गया।

शैलेश ने खाने चलने को पूछा।

“थोड़ी देर बाद, अगर ठीक हो।”

“कहाँ जा रहे हो?”

“कमरे पर।”

शैलेश ने दूसरी चाबी दे दी।

इतनी ही बातचीत हुई।

* * *

होटल की रिसेप्शन वाली ने टीम का बैज पहचाना।

“बधाई।”

आरिफ ने धन्यवाद दिया।

ऊपर कमरा वैसा था जैसा छोड़ गए थे।

मनोज का बैग उसके बिस्तर के नीचे।

आरिफ के जूते दीवार के पास।

अतिरिक्त कंबल कुर्सी पर तह किया हुआ।

माँ को लिखा कि जीत गए हैं और वह आराम करने जा रहा है।

फिर फोन शांत किया।

बैज उतारा।

तकिए के खोल पर सिलवट थी।

एक हाथ से सीधी की।

संदीप को क्या जवाब देना चाहिए था, इसका अभ्यास नहीं किया।

तस्वीर के लिए ट्रॉफी नहीं सजाई।

लेट गया।

बाहर के किसी दौरे पर पहली बार यह हिसाब लगाए बिना सोया कि किसी को फर्श चाहिए तो कितनी जल्दी उठ सकता है।

* * *

अँधेरा होने के बाद आँख खुली।

छोटी मेज पर ढकी प्लेट थी।

मनोज ने पर्ची छोड़ी थी। नीचे खाना गर्म हो सकता है।

गलियारे में कोई पहियों वाला सूटकेस खींच रहा था।

आरिफ ने समय देखा। कई घंटे सो चुका था।

माँ का जवाब था। उठकर खाना खा लेना।

वह बिस्तर के किनारे बैठा। चप्पल पहनी।

कोई उसके ऊपर खड़ा नहीं था।

कमरे में अब भी दो बिस्तर थे।

एक उसका था।

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