GoGo Rummy — वह निमंत्रण जो उसने छिपा दिया
GoGo Rummy

GoGo Rummy — वह निमंत्रण जो उसने छिपा दिया

काल्पनिक कहानी · पात्र और घटनाएँ कहानी का हिस्सा हैं।

चुनी न जाने पर पति ने अच्छी तरह सँभाला था। अलका ने उसका शुक्रिया भी किया था। बाद में उसे सबसे ज्यादा यही बात याद आने वाली थी। गायब लिफाफा नहीं। चयन वाले दिन…

चुनी न जाने पर पति ने अच्छी तरह सँभाला था। अलका ने उसका शुक्रिया भी किया था।

बाद में उसे सबसे ज्यादा यही बात याद आने वाली थी।

गायब लिफाफा नहीं। चयन वाले दिन जल्दी खाना बनाना भी नहीं, ताकि प्रणव समय पर निकल सके।

वह शुक्रिया।

प्रणव प्रतिभागी वाला बैज लेकर लौटा था। अलका ने कोशिश की कि उधर नजर न जाए।

“शायद अभी तैयार नहीं थी,” उसने कहा था।

उसने उसके कंधे पर हाथ रख दिया।

“इन चीजों में समय लगता है। मुझसे अपनी तुलना मत किया करो।”

अलका उससे लग गई थी। अच्छा लगा था कि उसने दुख और नहीं बढ़ाया।

बिस्तर के पास की दराज में, पुराने मिक्सर के गारंटी कार्ड के नीचे, उसके नाम का निमंत्रण पड़ा था।

प्रणव नौ दिन पहले उसे खोल चुका था।

* * *

अलका बत्तीस साल की थी। वडोदरा में चिकित्सा सामग्री बाँटने वाली छोटी कंपनी के गोदाम का हिसाब देखती थी।

देर से आने वाला सामान, गत्ते के डिब्बों की गिनती, बिना दस्तखत की रसीद को पूरी डिलीवरी मान लेने वाले लोग—उसके काम में यह सब था।

घर में प्रमाण माँगते हुए उतना भरोसा नहीं रहता था।

प्रणव ने दो साल पहले उसे आयोजित रमी प्रतियोगिताओं से परिचित कराया था। उसे समझाना पसंद था। शुरू में अलका को उससे सीखना अच्छा लगता था।

दोनों खाने के बाद अभ्यास करते थे।

जब वह बेहतर होने लगी तो उसने कहा, जल्दी सीखती हो।

जब उससे आगे निकलने लगी तो कहा, घर में तो ऐसे ही खेलते हैं।

वयस्कों के एक स्थानीय आयोजन में अलका उससे ऊपर रही।

वापसी के ऑटो में उसने विस्तार से समझाया कि यह नतीजा दोनों की असली क्षमता नहीं दिखाता।

अलका सड़क देखती रही और हामी भरती रही।

इतनी-सी बात मान लेने में क्या जाता था।

* * *

दोनों ने अगले चयन कार्यक्रम के लिए आवेदन दिया।

उस बार आयोजक डाक से निमंत्रण भेज रहे थे। हाजिरी की पुष्टि के लिए फोन नंबर लिखा होता था। आवेदन में दिया पता इस्तेमाल होना था।

दोनों ने घर का एक ही पता लिखा।

प्रणव का निमंत्रण पहले आया।

उसने तारीख फ्रिज के पास लगा दी।

अलका का उस समय आया जब वह काम पर थी।

लिफाफे पर नाम साफ था। प्रणव ने लिया, खोला और पढ़ा कि उसे भी जगह मिली है।

रात में अलका ने पूछा, कोई डाक आई थी?

“बस बिजली का नोटिस।”

फिर नमक आगे करने को कहा।

बाद में उसने फोन देखा। शायद कार्यक्रम वालों का संदेश आया हो।

कुछ नहीं था।

उसने खुद को समझाया कि आवेदन दे देने से चयन जरूरी नहीं हो जाता।

प्रणव ने उसे फोन रखते देखा।

कुछ नहीं कहा।

* * *

अगले पखवाड़े वह असामान्य रूप से नरम रहा।

पसंद के बिस्कुट लाया। रिश्तेदारों को बताया कि अलका कुछ समय प्रतियोगिताओं से दूरी रख रही है, जबकि उसने ऐसा कुछ नहीं कहा था।

एक चाची ने पूछा कि चयन न होने से बुरा लगा क्या।

प्रणव ने जवाब दिया।

“इसकी ज्यादा बात करो तो परेशान हो जाती है।”

अलका का चाय का कप बीच रास्ते रुक गया।

चाची ने विषय बदल दिया।

फोन के बाद अलका ने कहा, उससे यह कहने को नहीं कहा था।

“तुम्हें बचा रहा था।”

पहले उसे गुस्सा आया। फिर गुस्सा होने पर शर्म आई। कोई उसकी रक्षा करने की कोशिश कर रहा था।

उसने तीखे स्वर के लिए माफी माँग ली।

प्रणव ने स्वीकार कर ली।

लिफाफा दराज में रहा।

* * *

चयन का दिन आया।

अलका जल्दी उठी। प्रणव की नीली कमीज़ पर इस्तरी करनी थी।

जेब के पास की सिलवट सीधी नहीं हो रही थी। उसने थोड़ा पानी लगाया। फिर कोशिश की।

पहनते समय प्रणव बोला कि कॉलर अभी गर्म है।

दरवाजे पर कहा, लौटकर बताएगा कि सत्र कैसा रहा।

उसके निकलने के बाद रसोई में खड़ी अलका को लगा कि आज शाम अभ्यास नहीं करना चाहती।

अगली शाम भी नहीं।

उसने अपनी कॉपी पुराने बिलों के पीछे रख दी।

सहकर्मी मीनल ने आवेदन का पूछा तो कहा, नहीं हुआ।

मीनल ने काम के बाद चाय की बात की।

अलका ने मना कर दिया। किसी और की सहानुभूति मिलने से पहले घर पहुँच जाना चाहती थी।

* * *

तीन हफ्ते बाद फोन आया।

कार्यक्रम की एक स्वयंसेवक अगले दौर से पहले उन निमंत्रणों का विवरण जाँच रही थी जिनकी पुष्टि नहीं हुई थी।

“अलका देसाई जी? आपके पते की पुष्टि करनी थी।”

अलका ने पता दोहरा दिया।

“हाँ, हमारी डाक पहुँचने का दर्ज है। आपने हाजिरी की पुष्टि नहीं की, इसलिए जगह आगे देनी पड़ी। तारीख में कोई परेशानी थी क्या?”

वह गोदाम में खड़ी थी। एक डिब्बा कमर से टिकाया हुआ था।

“कौन-सा निमंत्रण?”

महिला ने जानकारी दोहराई।

अलका ने तारीख पूछी। प्राप्त करने वाले का नाम पूछा।

फिर डिब्बा नीचे रख दिया। हाथ काँपने लगा था।

पुष्टि का समय निकल चुका था। जगह वापस नहीं मिल सकती थी। महिला ने उलझन के लिए खेद जताया और अगले खुले चयन की जानकारी देने को कहा।

अलका ने कहा, उसके अपने ईमेल पर भेज दे।

पता दो बार बोलकर लिखवाया।

* * *

घर पहुँचकर उसने तुरंत सवाल नहीं किया।

पहले वह दराज खोली जहाँ आने वाले कागज रखे जाते थे।

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कुछ नहीं।

टीवी के पास की शेल्फ देखी। पुरानी सूची-पुस्तिकाएँ, बिना ढक्कन का पेन, जूतों की रसीद।

फिर याद आया कि प्रणव ने बिस्तर वाली दराज में चीजें न हिलाने को कहा था। उसने व्यवस्थित की थी।

मिक्सर के कागजों के नीचे लिफाफा था।

उसका नाम।

सही पता।

वही तारीख जिसके लिए उसने उसकी कमीज़ पर इस्तरी की थी।

लिफाफा साफ ढंग से खोला गया था।

अलका पलंग के किनारे बैठ गई। शुरू से अंत तक पढ़ा।

फिर दोबारा पढ़ा।

सामान्य बातें थीं। बधाई। पहुँचने का समय। साथ लाने वाले कागज। पुष्टि की आखिरी तारीख।

उसकी नजर बार-बार बधाई पर लौट रही थी।

* * *

प्रणव आया तो मेज पर लिफाफा दिख गया।

पहली बात उसने कही, “मेरी दराज क्यों देख रही थीं?”

“इस पर मेरा नाम है।”

“अलग रखा था।”

“तुमने कहा था कुछ नहीं आया।”

“भूल गया।”

अलका उसे देखती रही।

भूलना वह समझती थी। जन्मदिन भूली थी। चूल्हे पर दूध भूली थी। अपनी कॉपी कहाँ रखी, भूल चुकी थी।

यह भूल तब भी बनी रही होगी जब वह इंतजार कर रही थी।

जब उसने पूछा था।

जब प्रणव रिश्तेदारों को उसकी निराशा समझा रहा था।

जब उसने धन्यवाद दिया था।

अलका ने एक-एक बात कही।

प्रणव की घड़ी उतारती उँगलियाँ रुक गईं।

“तुम इसे हम दोनों का मुकाबला बना देतीं।”

“चयन कार्यक्रम था।”

“जानती हो मेरा मतलब।”

वह जानती थी।

यह जानना लिफाफे से भी बुरा था।

* * *

उसने कहा कि एक चीज अपनी रखना चाहता था।

अलका ने पूछा, उसका आवेदन उसकी चीज कब हो गया।

उसने कहा, बातों का गलत मतलब निकाला जा रहा है।

अलका ने पूछा, उसे कमीज़ पर इस्तरी करते कैसे देखता रहा।

उसने नजर हटा ली।

कमरा अचानक बहुत छोटा लगने लगा।

ऊपर पड़ोसी की कुर्सी खिसकी। रसोई में फ्रिज की आवाज बंद हुई।

प्रणव बोला, “नहीं सोचा था तुम इतनी दूर ले जाओगी।”

इस वाक्य में कहीं भी वह आदमी नहीं था जिसे कुछ पता ही नहीं था।

अलका उठी।

उसने कलाई पकड़नी चाही। अलका के पीछे हटते ही छोड़ दी।

“कहाँ जा रही हो?”

“मीनल के यहाँ।”

“घर की बात बाहर ले जा रही हो।”

अलका ने निमंत्रण उठाया।

“मुझे पता चलने से पहले ही तुमने इसे घर की बात बना दिया था।”

* * *

मीनल के पास अतिरिक्त गद्दा था। हल नहीं था।

उसने चादर बिछाई। पूछा, खाना चाहिए?

अलका ने मना किया। फिर सामने रखने पर दो रोटियाँ खा लीं।

कई रात वही दृश्य लौटते रहे।

बिस्कुट।

कंधे पर हाथ।

चाची का बात बदल देना।

कौन-सी नरमी सच में नरमी थी और कौन-सी चुप रखने का तरीका, समझ नहीं आ रहा था।

यह अनिश्चितता किसी चीखने वाले झगड़े से ज्यादा थका रही थी।

प्रणव के संदेश आए।

कहा, घबरा गया था। कहा, दूर रहकर अलका उसे चोट पहुँचा रही है।

अपने बनाए खाने की तस्वीर भेजी।

उसने घर से जुड़े जरूरी सवालों के जवाब दिए। कहा, रिश्तेदारों से उसके खेलने के फैसलों पर बात करना बंद करे।

फिर अगले चयन वाला ईमेल खोल लिया।

* * *

कोई जगह उसके इंतजार में आरक्षित नहीं थी।

अगला रास्ता खुली चयन प्रतियोगिता से था। उन लोगों के साथ उतरना था जिन्होंने पहले आवेदन भी नहीं किया था।

अलका ने तारीखें काम से मिलाईं।

कार्यक्रम की छुट्टी मिल सकती थी। हर अतिरिक्त अभ्यास की नहीं।

एक सहकर्मी ने शनिवार बदल लिया। बदले में अलका ने उसकी दो असुविधाजनक पालियाँ ले लीं।

प्रवेश शुल्क अपनी कमाई से दिया।

प्रणव के बिना पहला अभ्यास खराब रहा।

बार-बार लगता कि उसकी आवाज कंधे के पीछे से आने वाली है।

एक खिलाड़ी ने किसी निर्णय का कारण पूछा तो सवाल से पहले आलोचना सुनाई दी।

उसने बचाव में तीखा जवाब दिया।

घर लौटते हुए खिलाड़ी पर गुस्सा थी।

सुबह तक समझ गई कि माफी उसे माँगनी है।

दूसरी बैठक बेहतर रही।

अच्छी नहीं। बेहतर।

* * *

और कपड़े लेने घर गई तो पुरानी कॉपी पलंग पर मिली।

प्रणव ने निकालकर रखी थी।

“पता था जरूरत होगी।”

उसने बैग में रख ली।

प्रणव इंतजार करता रहा।

“धन्यवाद भी नहीं बोल सकती?”

अलका ने कॉपी देखी।

दो साल से वही ताश लाता था। आयोजकों को जानता था। बताता था कहाँ पहुँचना है।

उसने शायद इस भूमिका को यह तय करने का अधिकार समझ लिया था कि अलका को वहाँ होना भी चाहिए या नहीं।

“निकालकर रखने के लिए धन्यवाद,” उसने कहा। “जो हुआ, उसका जवाब यह नहीं है।”

उसका चेहरा सख्त हुआ।

“माफी माँग चुका हूँ।”

“सुना है।”

अलका ने बैग बंद किया।

इस बार बातचीत इसलिए खत्म हुई कि उसे निकलना था। इसलिए नहीं कि प्रणव ने कोई ऐसा वाक्य ढूँढ़ लिया था जिसका जवाब उसके पास नहीं था।

* * *

चयन के दिन वह लगभग रिपोर्टिंग डेस्क तक देर से पहुँची।

भवन के दो प्रवेश द्वार थे। गलत वाले से चली गई थी।

घबराहट के बीच विचार आया, प्रणव को मालूम होता।

फिर उसने एक कर्मचारी से पूछा।

उसने रास्ता दिखा दिया।

बस इतना करना था।

दिन में और छोटी समस्याएँ आईं।

पेन बंद हो गया। खाना देर से मिला। एक निर्देश गलत समझा तो दोबारा पूछ लिया।

इनमें से किसी के लिए पति की जरूरत नहीं पड़ी।

सुबह का खेल अस्थिर था। बाद में ज्यादा सँभलकर खेली।

अंतिम सूची लगी तो नाम था।

वह इतनी देर खड़ी रही कि एक खिलाड़ी ने पूछा, किसी का नाम ढूँढ़ने में मदद चाहिए?

“नहीं।”

उसने फिर सूची देखी।

“मिल गई।”

* * *

सीजन के फाइनल का निमंत्रण उसके कहने पर ईमेल से आया।

दफ्तर में निजी पन्ना निकालने की अनुमति लेकर प्रिंट किया।

मीनल ने खुशी मनाने को कहा।

बस स्टॉप के पास से खाना खरीदा। रसोई में कागज के डिब्बों से खाया।

प्रणव भी पहुँच गया था।

प्रकाशित प्रतिभागी सूची से अलका को पता चला।

उस रात फोन आया।

“साथ चलना चाहिए। नहीं तो लोग बातें बनाएँगे।”

उसने बताया कि अपना सफर तय कर लिया है।

“मुझे नीचा दिखाना चाहती हो?”

अलका ने खिड़की के पास सूखता पन्ना देखा। कोने पर चाय की बूँद गिर गई थी।

“समय पर पहुँचना चाहती हूँ।”

खाना ठंडा होने से पहले फोन रख दिया।

* * *

फाइनल में तय सत्रों के नतीजे जोड़कर स्थान तय होना था।

अलका और प्रणव अलग मेजों पर थे।

एक ही प्रतियोगिता में थे, मगर ऐसी सुविधाजनक भिड़ंत नहीं मिलने वाली थी जिसमें वह सीधे सामने बैठकर उसे हरा दे।

स्थल पर बैग देखते समय प्रणव आया।

“पहला सत्र अच्छा जाए तो बहक मत जाना।”

अलका लगभग पूछ बैठी कि किस बात का ध्यान रखना चाहिए।

पुरानी आदत से सवाल उठा था।

उसने कहा कि सीट तक जाना है।

प्रणव ने धीमी आवाज में नाम लिया। पास से गुजरने वाले को प्यार भरा लग सकता था।

वह मुड़ी।

“सीखने में मदद तो मैंने की थी।”

“हाँ,” उसने कहा। “की थी।”

एक पल उसके चेहरे पर राहत आई।

फिर अलका बोली, “और फिर चिट्ठी छिपाई थी।”

वह दोनों बातें उसके पास छोड़कर चली गई।

* * *

पहला नतीजा अच्छा रहा।

प्रणव का उससे बेहतर था।

अंक सूची पर ऊपर उसका नाम देखकर घबराहट उठी। तुलना को इतनी जगह देने पर खुद से चिढ़ हुई।

विराम में मीनल ने फोन किया। अतिरिक्त चाबी कहाँ रखी है?

अलका ने बताया।

“खाना खाया?”

“हाँ।”

“ठीक से?”

“मीनल।”

“अच्छा, बाद में करना।”

इस फोन में कुछ साबित नहीं करना था। खत्म होने तक साँस पहले जैसी हो गई।

अलका कमरे में लौट गई।

अगला सत्र मुश्किल था। एक गलती का नुकसान हुआ। जितना ठीक कर सकती थी, किया। आगे खेलती रही।

आखिरी विराम में उसने प्रणव को नहीं ढूँढ़ा।

* * *

दो खिलाड़ियों का अंतर कम था, इसलिए कुल अंक दो बार जाँचे गए।

अलका पानी की मशीन के पास खाली कप लिए खड़ी थी।

प्रणव कमरे के दूसरे हिस्से में बैठा था।

आते-जाते लोगों के बीच दिख रहा था। थका हुआ लग रहा था। दिन खराब जाने पर नाक के ऊपरी हिस्से को ऐसे ही मलता था।

एक पल उसके पास जाने का मन हुआ।

तभी आयोजक ने अलका का नाम लिया।

पहला स्थान।

वह खड़ी रही।

समापन देखने पहुँची मीनल ने कोहनी छुई।

“तुम्हीं हो।”

अलका हँस पड़ी। अपनी आवाज सुनकर खुद चौंकी।

आगे चली गई।

उसकी तरफ से अनुमति माँगने की जरूरत किसी को नहीं पड़ी।

* * *

तस्वीरों से पहले प्रणव बधाई देने वालों में आ गया।

पीठ के पास हाथ रखा। किसी से कहा कि उसे हमेशा से पता था, अलका कर सकती है।

अलका आधा कदम हट गई।

“पहले मेरी अकेले ले लीजिए।”

तस्वीर खिंची।

फिर उसने मीनल को बुलाया।

प्रणव तस्वीर के बाहर रहा।

उसने पूरे कमरे को छिपे निमंत्रण की कहानी नहीं सुनाई।

रात कहाँ सोना है, यह तय करने से पहले अजनबियों से विवाह पर फैसला नहीं चाहिए था।

एक पत्रकार ने पूछा कि तैयारी में क्या बदला।

उसने कहा कि दूसरे लोगों से सवाल पूछना और आखिरी निर्णय खुद करना सीखा है।

प्रणव ने सुना।

इस बार वह उससे पहले जवाब नहीं दे सका।

* * *

अगली दोपहर बाकी कपड़े लेने घर गई।

काम के पास कमरा तय किया था।

छोटा था। एक शेल्फ टेढ़ी थी। मेज के पास एक कुर्सी रखने भर जगह थी।

जमा रकम उस बचत से दी जिसे फाइनल से पहले अलग करना शुरू कर दिया था।

जाना जीत पर निर्भर नहीं था।

प्रणव उसे कुर्ता तह करते देख रहा था।

“हार जातीं तो भी यह करतीं?”

“हाँ।”

नतीजे से ज्यादा चोट इस जवाब से लगी लगती थी।

उसने काम के जूते रखे। माँ का दिया स्टील का डिब्बा रखा। कॉपी रखी।

प्रणव ने कहा, साथ जिंदगी बनाई है।

अलका रुक गई।

“मालूम है।”

इसीलिए दुख था।

अच्छे साल झूठ नहीं हो गए थे। कमरा छोड़ने के लिए उन्हें मिटाना जरूरी नहीं था।

* * *

निकलने से पहले उसने दो कागज निकाले।

पहले निमंत्रण पर मोड़ था। प्रणव ने वापस लिफाफे में रखते समय किया था।

दूसरे पर चाय का हल्का धब्बा था।

उसने दोनों मेज पर साथ रख दिए।

दोनों पर उसका नाम था।

प्रणव देखता रहा।

“यह क्यों छोड़ रही हो?”

“क्योंकि तुम बार-बार कहते हो, बस एक चिट्ठी थी।”

उसने बैग उठाया।

प्रणव कागजों की तरफ नहीं बढ़ा।

नए कमरे में पर्दे की छड़ बीच से झुक रही थी। अलका ने ठीक की। ठीक नहीं हुई। नीचे उतारकर फिर कोशिश की।

गुरुवार को मीनल दो कप लेकर आई। चाय लाना भूल गई।

दोनों हँसीं।

अलका ने पानी चढ़ाया।

फोन पर अभ्यास समूह का संदेश आया। अगले हफ्ते कौन-कौन आएगा?

उसने अपनी ड्यूटी देखी।

फिर अपना जवाब खुद लिखा।

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