तस्वीर के लिए रमेश को उठने को कहा गया। फिर उनकी कुर्सी उठाकर ले गए।
पवेलियन के किनारे से अनिकेत देख रहा था। पिता एक हाथ में कागज की प्लेट और दूसरे में छोटा निमंत्रण पकड़े खड़े रह गए। पहले कुर्सी ढूँढ़ी। फिर समझ आया कि उसे जानबूझकर हटाया गया है।
पहली कतार में कप्तान के ड्राइवर के लिए जगह थी। सत्ताईस साल से क्लब के बल्ले ठीक करने वाले आदमी के लिए अब नहीं थी।
अनिकेत ने उठने की कोशिश की। बाएँ घुटने के पीछे दर्द उठा और वह तेजी से वापस बैठ गया। माइक पर देवराज कह रहा था कि क्लब अब ईमानदारी के नए दौर में प्रवेश कर रहा है।
ईमानदारी कहने से पहले उसने अनिकेत की तरफ देखा था। काफी लोगों ने उसकी नजर का पीछा किया।
रमेश ने बिना खाया खाना पास की मुंडेर पर रखा। तालियाँ शुरू हुईं तो निमंत्रण मोड़कर जेब में रख लिया। बेटे की तरफ चले। चेहरे पर वही भाव था जो ग्राहक उनके काम में कोई गलती पकड़ ले तो आता था।
“सड़क पर भीड़ बढ़ने से पहले निकलते हैं,” उन्होंने कहा।
* * *
उस सर्दी तक अनिकेत उपयोगी स्थानीय क्रिकेटर था। इच्छा साधारण थी—एक और सीजन, बेहतर अनुबंध, इतने पैसे कि जबलपुर में घर के पीछे की कार्यशाला से पिता को निकाल सके।
रमेश कार्यशाला छोड़ना नहीं चाहते थे। ऐसी छत चाहते थे जिससे ग्रिप पर पानी न टपके। दोनों बिना गुस्से के बहस करते थे। मानते थे कि फैसला करने का समय अभी बहुत है।
फिर अनिकेत के घुटने में चोट लगी। अभ्यास छूटा, टीम में जगह गई और ठीक होने का उबाऊ काम शुरू हुआ। चोट की कोई आकर्षक तस्वीर नहीं बनती थी। सीढ़ियों पर जरूरत से ज्यादा समय लगता था। रात में गलत करवट लेने से नींद खुल जाती थी।
देवराज एक बार प्रायोजक के फोटोग्राफर के साथ आया। अनिकेत के कंधे पर हाथ रखकर वादा किया कि क्लब अपने लोगों का खयाल रखेगा।
रमेश ने तीनों मेहमानों को चाय दी। बाद में कप्तान का कप अलग से उठाया। सुबह चमकाई मेज पर गोल निशान छूट गया था। उन्होंने उसे मिटाया। तस्वीर वफादारी वाली पंक्ति के नीचे प्रकाशित हुई।
* * *
दो हफ्ते बाद टीम की निजी जानकारी सार्वजनिक घोषणा से पहले सट्टे से जुड़े एक बिचौलिए तक पहुँच गई। अनिकेत को पत्रकार के फोन से पता चला। सवालों का जवाब देने से पहले ही देवराज का वीडियो फैल रहा था।
कप्तान कह रहा था कि टीम के करीब रहने वालों को अपने निजी संपर्कों का हिसाब देना चाहिए। उसने अनिकेत का नाम लिया।
संपर्क पिता के एक ग्राहक को किया फोन था। उस आदमी ने स्थानीय टीम के लिए बल्ले की मरम्मत करवाई थी। बाद में सट्टे के लोगों में उसका नाम आने लगा। रमेश सामान खरीदने गए थे, इसलिए अनिकेत ने तैयार बल्ला ले जाने के बारे में फोन किया था।
देवराज कारण जानता था। आदमी का नाम विवाद में आने पर अनिकेत उसे बता चुका था। अब वह कह रहा था कि गंभीर सवाल उठते हैं।
खेल उपकरण के प्रचार का एक छोटा समझौता रद्द हो गया। दूसरे प्रायोजक ने संबंध की समीक्षा करते हुए बाकी भुगतान रोक दिया। क्लब की जाँच में अनिकेत के जानकारी देने की बात स्थापित नहीं हुई, लेकिन सावधानी से लिखी सूचना कप्तान के आरोप जितनी दूर नहीं पहुँची।
लोगों को नाम याद रहा। नतीजा कम लोगों को याद था।
* * *
कार्यशाला से दो स्कूलों की टीमें अधूरे बल्ले वापस ले गईं। एक शिक्षक लेते समय माफी माँग रहा था। दूसरे ने कहा, माता-पिता सवाल करेंगे। रमेश ने अग्रिम लौटाए और बची सामग्री शेल्फ पर सीधी रख दी ताकि मुड़े नहीं।
एक ग्राहक ने पूछा, सूचनाओं का लेन-देन यहीं होता था क्या?
रमेश ने मना किया। आदमी मुस्कराया।
“पूछ ही रहा हूँ।”
तीन दिन अनिकेत उसके पीछे जाना चाहता रहा। तीनों दिन घर के एक सिरे से दूसरे तक जाते समय किसी को उसके लिए स्टूल उठाना पड़ता था।
उसने देवराज को फोन किया। कप्तान बोला, आरोप कहाँ लगाया है? सवाल ही तो पूछे हैं। अनिकेत ने फोन का मूल कारण फिर भेजा। अंगूठा ऊपर वाला निशान मिला। कुछ और नहीं।
क्लब का निमंत्रण आया तो रमेश को लगा कि कोई गलती सुधारना चाहता है। कमीज खुद प्रेस की। अनिकेत ने उन्हें विश्वास करने दिया क्योंकि खुद भी करना चाहता था।
उसी शाम उनकी कुर्सी हटा दी गई।
* * *
वापसी समारोह से बुरी थी। रमेश ने बेटे को ऑटो की ज्यादा आराम वाली तरफ बैठाया। ट्रैफिक सिग्नल पर निमंत्रण खोला, कुछ पढ़ा और फिर मोड़ दिया।
अनिकेत ने पूछा, क्या देख रहे हैं?
“कुछ नहीं।”
घर पर कार्ड कार्यशाला के लैंप के पास पड़ा था। रमेश के नाम के नीचे विशेष अतिथि लिखा था।
अनिकेत ने एक बार फाड़ दिया। पिता ने रोक लिया।
“रहने दो।”
“क्यों?”
रमेश ने दोनों टुकड़े उठाकर दराज में रखे।
“क्या रखना है, मैं तय कर सकता हूँ।”
रात बारह के बाद कार्यशाला का दरवाजा खुलने की आवाज आई। बारिश से पहले पिता छत देख रहे थे। ऑर्डर चले गए थे। उन्हें बचाने की आदत नहीं गई थी।
* * *
तीन साल बीत गए। अनिकेत की याद में वह दृश्य छोटा नहीं हुआ। घुटना इतना सुधरा कि रोज का काम और कुछ प्रशिक्षण दे सके। पुराने सोचे करियर तक नहीं लौटा।
वह बल्ले ठीक करता, खेल की दुकान का हिसाब रखता और कभी भुगतान वाले अभ्यास सत्र लेता। लोग पूछते, खेलना छोड़ दिया क्या? कितना थका है, उसके हिसाब से अलग जवाब देता।
कम ऑर्डर के साथ पिता का काम चलता रहा। दाम, खाने का समय और हर देर के भुगतान को अपमान समझ लेने की अनिकेत की आदत पर दोनों में झगड़े होते।
बहन भावना ने कहा, गुस्से में उन लोगों के साथ लापरवाह होता जा रहा है जो अब भी उसके पास हैं। अनिकेत ने कहा, वह समझती नहीं।
फिर एक रसीद घंटे भर ढूँढ़ी। पिता पर खो देने का आरोप लगाया था। अपने बैग में मिली। उसने माफी माँगी। दबाव में होने की सफाई साथ नहीं जोड़ी।
एक हफ्ते बाद देवराज कार्यशाला में आया।
* * *
साधारण कार में आया था। प्रायोजक का फोटोग्राफर नहीं था। रमेश ने पहले देखा, लेकिन सामने रखे हैंडल पर लपेटना जारी रखा। हर घुमाव पिछले से ठीक मिलाते रहे। खत्म होने तक देवराज रुका।
“अंकल, अनिकेत से बात करनी है।”
दरवाजे से अनिकेत बोला, “इनका नाम है।”
देवराज मुड़ा।
“जानता हूँ।”
“तो उसी से बुलाओ।”
नई जाँच के चलते कप्तान को क्लब के प्रतिनिधि पद से फिलहाल हटा दिया गया था। एक तस्वीर उसी सट्टा बिचौलिए के साथ निजी मुलाकात का प्रमाण बताकर फैलाई गई थी। साथ के विवरण में मुलाकात का समय बरसों पहले हुए धन जुटाने वाले कार्यक्रम का बताया गया था।
अनिकेत को वह शाम याद थी। पुनर्वास कक्ष की मदद के लिए सामुदायिक भवन में आयोजन हुआ था। मुफ्त मरम्मत की मदद देने पर पिता का धन्यवाद किया गया था। भावना ने न आ सके रिश्तेदारों के लिए भाषण रिकॉर्ड किए थे।
देवराज को वही मूल रिकॉर्डिंग चाहिए थी।
* * *
फैलाई तस्वीर में वह आदमी से लिफाफा ले रहा था। कटी हुई तस्वीर और उसके साथ का विवरण लेन-देन को निजी बना रहे थे। अनिकेत को मेज, बैनर और सुन सकने की दूरी पर खड़े दूसरे लोग याद थे। लिफाफा आयोजकों के सामने दिया गया था।
कहीं और किसी ने कुछ गलत किया था या नहीं, वह अलग सवाल था। लेकिन उस खास घटना को जैसा बताया जा रहा था, वैसी नहीं थी। मूल रिकॉर्डिंग संदर्भ दिखा सकती थी। आयोजकों का हिसाब बता सकता था कि क्या मिला था। इसके लिए अनिकेत को देवराज की पूरी जिंदगी का फैसला नहीं देना था।
“भावना के पास फाइल है,” उसने कहा।
देवराज ने साँस छोड़ी।
“अच्छा। आज भेज दो। मेरे वकील बाकी देख लेंगे।”
इतनी सहजता से आदेश सुनकर अनिकेत का मन हुआ कि उसके मुँह पर दरवाजा बंद कर दे। तीन साल अपनी अर्जियाँ उसी आदमी के फोन में भेजता रहा था। सब गायब हो गई थीं। अब जरूरत पुरानी आवाज साथ लेकर लौट आई थी।
* * *
देवराज रमेश की तरफ बढ़ा। लाई हुई मिठाई मेज पर रखी और घुटने मोड़ने लगा। रमेश ने पैर पीछे किए।
“क्या कर रहे हो?”
“गलतियाँ हुई हैं। ठीक से माफी माँग लेने दीजिए।”
अनिकेत ने मेज का किनारा पकड़ा, कप्तान को नहीं।
“खड़े हो जाओ।”
देवराज आधा झुका रहा। जैसे उस हरकत के असर का इंतजार हो।
“यहाँ कैमरा नहीं है,” अनिकेत बोला। “साधारण तरीके से बात कर सकते हो।”
वह सीधा हुआ। एक पल चेहरा सख्त हुआ। फिर सँभाल लिया।
“बताओ क्या चाहिए।”
अनिकेत ने पिता को देखा। उन्होंने तैयार हैंडल मिठाई से आगे, बहुत ध्यान से रख दिया था।
“मेरे बारे में जो कहा था, उसे ठीक करो। उन लोगों के सामने जिन्होंने सुना था।”
देवराज ने पूछा, पहले अकेले में माफी माँग सकता है?
“हमारा घर ढूँढ़ लिया,” अनिकेत बोला। “क्लब ढूँढ़ना मुश्किल नहीं होगा।”
* * *
उसके जाने के बाद रमेश ने पूछा, अगर देवराज मना करे तो अनिकेत रिकॉर्डिंग रोक लेगा क्या?
कुछ सेकंड अनिकेत हाँ कहना चाहता था। उसके डर की समय-सीमा तय करना चाहता था। देखना चाहता था कि वह भी वैसे फोन जाँचे जैसे उनका परिवार जाँचता रहा है।
आखिर कहा, “नहीं।”
“तो उसे यह सोचने भी मत दो कि रोकोगे।”
अनिकेत ने भावना को फोन किया। दोनों ने मूल फाइल सुरक्षित रखने और रिकॉर्ड बनाने के उसके विवरण के साथ सीधे जाँच करने वालों को देने का इंतजाम किया। देवराज के प्रतिनिधि को जमा किए जाने की सूचना मिली।
पुराने आरोप सुधारने की माँग अलग संदेश में भेजी। मूल जाँच का नतीजा और अनसुनी अर्जियाँ साथ लगाईं। दोनों अलग मामले थे। बोलने से ज्यादा समय यह लिखने में लगा।
रमेश ने मिठाई तभी खोली जब पता कर लिया कि भावना आ रही है या नहीं। मिठाई से बातचीत खत्म नहीं होने देंगे, लेकिन उसे बरबाद करने का कारण भी नहीं दिखता था।
* * *
जाँच करने वालों ने रिकॉर्डिंग दूसरी सामग्री से मिलाई और आयोजकों से बात की। सार्वजनिक लेन-देन उसी चंदे वाले कार्यक्रम से संबंधित था। हिसाब मौजूद था, जिसे नए आरोप में छोड़ दिया गया था।
नतीजा तस्वीर वाले खास दावे का उत्तर था। देवराज के जीवन के हर संपर्क का प्रमाणपत्र नहीं। क्लब ने उस आरोप से संबंधित सूचना सुधारी।
शाम को देवराज का फोन आया।
“यह नहीं भूलूँगा।”
अनिकेत ग्रिप नापकर काट रहा था।
“पहले भूले हो।”
देवराज ने कहा, आने वाले सालाना आयोजन में समिति से बोलने का समय माँगा है। चाहता है अनिकेत और रमेश वहाँ हों।
अनिकेत ने पूछा, क्या कहेगा? मसौदा आया। गलतफहमियाँ, कठिन दौर और दबाव के बावजूद बची दोस्ती।
उसने पिता को पढ़कर सुनाया। रमेश ने कहा, वह हिस्सा फिर पढ़ो जिसमें बताया है कि उसने किया क्या था।
ऐसा हिस्सा था ही नहीं।
* * *
अगली बातचीत में शिष्टता नहीं बची। देवराज ने कहा, सार्वजनिक सुधार से उसका काम जा सकता है। अनिकेत ने पूछा, अपने खोए हुए किस काम से तुलना करे?
कप्तान बोला, तीन साल पहले का हर शब्द याद नहीं। अनिकेत ने पुराने साक्षात्कार की रिकॉर्डिंग भेजी। वह भी रखी थी।
जिस बात का गवाह नहीं था, उस पर पक्का दावा करने को नहीं कहा। जिस बात का पक्का ज्ञान कभी था ही नहीं, उस पर दावा छोड़ने को कहा।
“नाम तुमने लिया,” अनिकेत बोला। “फोन का कारण जानते थे। फिर भी कहते रहने दिया कि पापा की कार्यशाला से खबरें जाती हैं।”
देवराज चुप रहा।
“सोचा था बात आगे बढ़ जाएगी।”
“हमारे घर में आकर बैठ गई।”
अगले मसौदे में अनिकेत का नाम था। आरोप का समर्थन नहीं मिला था और कप्तान ने उसे स्थापित तथ्य जैसा बनाया था। उस समय मिली सफाई का भी उल्लेख था।
रमेश ने एक बदलाव और माँगा। कार्यशाला का नाम था। उनका भी।
* * *
आयोजन वाली शाम अनिकेत देर से पहुँचना और बयान के तुरंत बाद निकलना चाहता था। पिता ने मना कर दिया।
“शुरू होने से पहले मेरा काम है वहाँ।”
अनिकेत उन्हें देखता रह गया। रमेश ने मरम्मत वाला बल्ला उठाया। मालिक पैसे दे चुका था। वहाँ पहुँचाने को कहा था। अनिकेत ने कहा, कोई और पहुँचा देगा।
“मैंने कहा है कि दूँगा।”
दोनों साथ पहुँचे। दरवाजे पर समिति के सदस्य ने भाषण तक अलग कमरे में बैठाने की पेशकश की। रमेश ने पूछा, दूसरे मेहमान कहाँ बैठे हैं? आदमी ने बताया।
“तो वहीं बैठेंगे।”
इस बार फोटोग्राफर को रास्ता चाहिए था तो रमेश कुर्सी पर बैठे रहे। केवल पैर हटाए ताकि वह निकल सके। अनिकेत चुपचाप देखता रहा।
मरम्मत किया बल्ला कागज में लिपटा कुर्सी के नीचे था।
* * *
देवराज माइक पर आया। पास में कोई ट्रॉफी नहीं थी। हाल के आरोप और उसे सुधारने में काम आई सामग्री से शुरुआत की। फिर एक पल कागज से नजर उठाई।
“तीन साल पहले मैंने अनिकेत राठौर के साथ वह निष्पक्षता नहीं दिखाई जो उसने इस महीने तथ्यों के साथ दिखाई है।”
पीछे कहीं चम्मच प्लेट से टकराया। अनिकेत ने आवाज सुनी।
देवराज ने फोन का जिक्र किया। मिली हुई सफाई बताई। बिना आधार बनाई गई धारणा का नाम लिया। कहा, क्लब की पुरानी जाँच में अनिकेत का जानकारी देना स्थापित नहीं हुआ था। नतीजा आने पर उसे अपनी टिप्पणियाँ सुधारनी चाहिए थीं।
उसने रमेश राठौर और कार्यशाला का नाम लिया। कहा, किसी के भी सट्टे की जानकारी पहुँचाने में शामिल होने का संकेत देने का उसके पास आधार नहीं था।
गलतफहमी शब्द नहीं आया।
रमेश के हाथ घुटनों पर थे। अँगूठे के नाखून पर काम का दाग लगा था। अनिकेत उसी अँगूठे को देखता रहा, जब तक ऊपर देखने की हालत नहीं हुई।
* * *
समिति ने बयान रिकॉर्ड किया और साथ में सुधार जारी किया। पुरानी सूचना से जोड़ा गया ताकि एक तक पहुँचने वाले को दूसरा भी मिले। शाम खत्म होने से पहले अनिकेत को प्रति मिल गई।
पुराने प्रायोजक का प्रतिनिधि पास आया। बोला, सबके लिए मुश्किल समय था। रमेश ने पूछा, कार्यशाला की नई दरें चाहिए या बस बातचीत कर रहे हैं?
आदमी ने दरें माँगीं। रमेश ने कार्ड दिया। फिर उस ग्राहक को ढूँढ़ा जिसका बल्ला लाए थे। पवेलियन की रोशनी में कागज खोलकर दोनों ने मरम्मत देखी।
देवराज कुछ दूर अकेले में बात करने का इंतजार कर रहा था। अनिकेत ने कहा, सुलह की तस्वीर नहीं होगी। उसने उसके लिए सहमति नहीं दी है।
कप्तान ने फोन रख लिया। उसी कमरे में रहने से उसे मनचाहा अंत पाने का हक नहीं मिल जाता था।
* * *
सुधार ने घुटना ठीक नहीं किया। खोए तीन सीजन भी नहीं लौटाए। क्लब ने ऐसा खिलाड़ी अनुबंध नहीं दिया जिसे सही साबित न कर सके।
उसने वयस्क अभ्यास सत्रों में भुगतान वाले सहायक प्रशिक्षक पद के लिए अनिकेत का आवेदन जरूर दोबारा देखा। पुराने आरोप उस पर लटके हुए छोड़ दिए गए थे। रिकॉर्ड सुधरने पर अनुभव, काम की सिफारिशें और आजमाइशी सत्र अपनी योग्यता पर देखे गए।
तीन महीने का अनुबंध मिला। घंटे और भुगतान लिखे थे। स्वीकार करने से पहले भावना से शर्तें साथ पढ़ने को कहा। रमेश ने पूछा, इस समय में कार्यशाला की डिलीवरी करने के लिए कौन बचेगा?
उन्होंने बारी तय की। विजयी वापसी की कल्पना जितनी सुखद नहीं थी। सोमवार की सुबह उससे कहीं ज्यादा काम की थी।
क्लब में देवराज की सदस्यता रही, लेकिन प्रतिनिधि पद का अगला कार्यकाल नहीं मिला। अनिकेत ने चाय बनाते समय दूसरे व्यक्ति से सुना। जवाब देने से पहले चाय बनाकर पूरी की।
* * *
पहले सत्र में एक व्यक्ति ने पूछा, सिर्फ घंटे भर अभ्यास करना है तो शुरुआती तैयारी जरूरी है क्या? अनिकेत ने कहा, सत्र का हिस्सा है। फिर बताया कि क्या करेंगे और सवाल को अपमान बनाने के बजाय आदमी की चिंता सुनी।
अभ्यास क्षेत्र के बाहर रमेश दो ठीक किए बल्ले दे चुके थे। घर जा सकते थे। इसके बजाय बेंच पर बैठकर समूह को जमते देखते रहे।
अनिकेत उपस्थिति के पन्नों वाली फाइल लाया था। उसमें सार्वजनिक सुधार की प्रति भी थी। पिता को एक बार और दिखाने का मन था।
विराम में उसके बजाय दो चाय लेकर गया। रमेश ने बैग हटा दिया ताकि उसके लिए जगह हो।
“अगले हफ्ते कितने?”
“देखते हैं कितने लौटते हैं।”
पिता ने सिर हिलाया। मैदान के पार से एक व्यक्ति ने अगले अभ्यास के बारे में पूछा। अनिकेत ने कप रखा और काम पर लौट गया।
उसके वापस आने तक पिता के पास की जगह खाली रही।