1. Gold Rummy कहानी: दरवाज़े के पास रखी कुर्सी
देवेंद्र ने जूतों के पास अलग कुर्सी रखवाई थी। बाकी मेहमान झूमर के नीचे रमी की मेज़ के चारों ओर बैठे थे।
“वीरेन आज देखेगा,” उसने कहा। “जो आदमी अपनी माँ की पेंशन पर रहता हो, उससे ज़िम्मेदारी समझने की उम्मीद कैसे करें?”
वीरेन का वेतन देर से आया था, इसलिए उस महीने बिजली का बिल माँ ने भरा था। पत्नी की आख़िरी बीमारी में उनका पुराना घर बिक गया था। देवेंद्र दोनों बातें जानता था। उसे यह भी पता था कि छत्तीस वर्षीय वीरेन पिछले एक साल से जीवन सँभालने के साथ उसकी बेटी ईशा से शादी की बात कर रहा था।
ईशा खिड़की के पास खड़ी थी। सगाई की अंगूठी एक तश्तरी में रखी थी।
“पापा को लगता है हम जल्दी कर रहे हैं,” उसने कहा।
“चौदह महीने से यही बात चल रही है।”
उसने वीरेन की जगह अंगूठी को देखा।
देवेंद्र ने अपने पत्ते उठाए। “कुछ लोग अपना घर सँभालने से पहले दूसरा परिवार तलाश लेते हैं।”
किसी ने विरोध नहीं किया। एक रिश्तेदार ने वीरेन की कुर्सी से अपना बैग हटा लिया, जैसे बैठने की जगह मिलना ही उसके लिए पर्याप्त सम्मान हो।
वीरेन ने माँ की शाल उठाई। माँ सब सुन चुकी थी। सीढ़ियों पर वह बिजली के बिल की सफ़ाई देने लगी, हालाँकि उसकी कोई गलती नहीं थी। वीरेन ने उसे बीच में रोक दिया।
अगली सुबह शहर की वयस्क रमी लीग की सूची आई। उसमें उसका नाम देवेंद्र के ठीक नीचे था। वीरेन कई सप्ताह पहले पंजीकरण करा चुका था। परिवार के समूह में किसी ने उस सूची के साथ हँसता हुआ चेहरा भेज दिया।
ऐप लिंक और मौजूदा ऑफ़र की जानकारी चाहिए? नीचे अपनी पसंद की कम्युनिटी चुनें।
टीजी चैनलWhatsApp चैनलWhatsApp ग्रुप
2. वह नाम जो वापस नहीं लिया गया
वीरेन लगभग प्रतियोगिता छोड़ चुका था। वह फिर किसी शाम का तमाशा नहीं बनना चाहता था। प्रिंटिंग की दुकान के बाहर कबीर ने उसे नाम वापस लेने का संदेश लिखते देखा। सामने खड़ी गाड़ी ने धूप रोक दी थी। वीरेन की उँगलियों के बीच फोन काँप रहा था।
“नाम वापस लेने से सगाई जुड़ जाएगी?” कबीर ने पूछा।
“नहीं।”
“फिर पत्तों का फैसला अलग करो।”
वे पहले रविवार को रमी खेला करते थे। दोस्तों की याद में वीरेन अच्छा खिलाड़ी था, और वह उसी याद पर भरोसा कर रहा था। लीग के पहले अभ्यास ने वह भरोसा तोड़ दिया। उसने महँगे पत्ते बहुत देर तक पकड़े रखे, कमज़ोर जोड़ पूरे करने की ज़िद की और सोचा कि प्रिंटेड जोकर हर कमी भर देगा।
आयोजक फ़ारूक ने एक ख़राब फैसले के बाद उसके पत्ते खोल दिए।
“प्योर सीक्वेंस दिखाओ।”
वीरेन ने जोकर वाले क्रम की ओर इशारा किया।
“जोकर के बिना।”
ऐसा क्रम था ही नहीं। कमरे में चुप्पी छा गई। यह अपमान देवेंद्र के घर वाले अपमान से अलग था। इसकी वजह सामने रखी थी, और उसे ठीक किया जा सकता था।
उस रात कबीर अभ्यास के सवालों की पुस्तिका लाया। वीरेन ने उसमें से एक सवाल अपनी कॉपी में उतारा: डिक्लेयर करने के लिए हाथ कब तैयार होता है? नीचे उसने तेरह खाली खाने बनाए। अगले तीन दिन वह जीतने की बातें छोड़कर उन्हीं खानों में सही समूह बनाता और हर घोषणा से पहले दोबारा जाँचता रहा।
3. तेरह पत्ते, कोई बहाना नहीं
लीग के लिखित नियमों के अनुसार तेरह पत्तों में कम से कम दो सीक्वेंस चाहिए थे, जिनमें एक प्योर होना आवश्यक था। बाकी पत्तों के वैध सीक्वेंस या सेट बनने थे। फ़ारूक ने सबसे कहा कि किसी शादी में सुनी हुई बहस की जगह प्रतियोगिता के अपने नियम पढ़ें।
वीरेन का पहला अभ्यास छोटा और तकलीफ़देह था। कबीर ऐसे हाथ बाँटता जिनमें एक आकर्षक जोड़ और एक बुनियादी कमी होती। वीरेन को आकर्षक पत्तों की बात करने से पहले कमी बतानी होती। दो क्वीन शानदार दिख सकती थीं, लेकिन वे गायब प्योर सीक्वेंस की जगह नहीं ले सकती थीं।
एक बार उसके पास हुकुम नहीं, दिल का चार और छह था। डिस्कार्ड में दिल का पाँच आया। उसने उसे नहीं उठाया, क्योंकि फिर उसे अपनी पसंद की एक क्वीन छोड़नी पड़ती। कबीर पहले समाप्त हो गया।
उन्होंने पत्ते बदले बिना वही फैसला दोहराया। इस बार वीरेन ने पाँच उठाया और चार, पाँच, छह का प्योर सीक्वेंस अलग रखा। अब बाकी हाथ पर काम करना आसान था। वह क्वीन, जो पहले अवसर लगती थी, अब बेकार जगह घेरती दिखी।
वह काम के बाद अभ्यास करता। नाखूनों में छपाई की स्याही रह जाती। कॉपी खेल के बीच बाहरी सहायता के लिए नहीं, बाद की समीक्षा के लिए खुलती। माँ ने ईशा के बारे में पूछना बंद कर दिया। कुछ रातों में वह अब भी उसी के बारे में सोचता था। उन्हीं रातों की समीक्षा में सबसे अधिक अनावश्यक जोखिम दिखाई देते थे।
4. पसंदीदा खिलाड़ी के दर्शक
देवेंद्र पहली लीग बैठक में तीन समर्थकों और मिठाई के डिब्बे के साथ आया। उसने पहली डील से पहले ही मिठाई बाँट दी।
“आत्मविश्वास,” उसने मेज़ पर कहा।
वीरेन ने मिठाई नहीं ली। देवेंद्र ऐसे मुस्कराया जैसे इस इनकार ने कोई कमज़ोरी साबित कर दी हो।
पहला सामना वीरेन के लिए बुरा रहा। देवेंद्र ने वैध घोषणा की और वीरेन के पास कई महँगे बेमेल पत्ते रह गए। अगली डील में उसने पिछला नुकसान तुरंत मिटाना चाहा। उसके फैसले तेज़ होते गए और खराब भी।
देवेंद्र के समर्थक ने स्कोर की तस्वीर ली। घर पहुँचने से पहले वह परिवार के समूह में आ चुकी थी। माँ भी उसे देख चुकी थी। उसने झूठा दिलासा नहीं दिया। खाना रखकर पूछा कि क्या वीरेन समझ पाया कि हुआ क्या था।
वह समझ गया था। पहली हार कठिन हाथ की थी। दूसरी हार उन लोगों को जवाब देने की कोशिश में हुई जो मेज़ पर बैठे ही नहीं थे।
अभ्यास में उसने कबीर से कहा कि खेलते समय उसे परेशान करे। कबीर ने व्यक्तिगत अपमान से इनकार किया, लेकिन ऊँची आवाज़ में अपनी जीत मनाने और ध्यान भटकाने वाली बातें करने पर सहमत हुआ। वीरेन ने रुकना, पत्ते जमाना और सामने के निर्णय पर लौटना सीखा।
फ़ारूक ने हर डिस्कार्ड के बाद समीक्षा में केवल एक कारण माँगा। बुरी किस्मत पर भाषण नहीं। पहली बार वीरेन अपनी हार समझाते समय देवेंद्र के चेहरे का ज़िक्र किए बिना बात पूरी कर सका।
5. सब कुछ बचाए रखने की कीमत
अगले महीने वीरेन की स्थिति धीरे और असमान ढंग से सुधरी। एक बैठक में वह जीता, दूसरी में लगभग सबसे नीचे रहा। एक शनिवार उसने केवल यह समझने में लगाया कि लचीले दिखने वाले हाथ बार बार जाल क्यों बन जाते हैं।
वह बहुत सारी संभावनाएँ बचाए रखता था। हर पत्ता किसी ऐसे भविष्य का हिस्सा था जिसकी उसे उम्मीद थी। कम पत्ते ऐसे हाथ का हिस्सा थे जिसे वह वास्तव में पूरा कर सकता था।
कबीर ने उसे हर अभ्यास वाला हाथ दो अलग तरीकों से सजाने को कहा। कभी अधूरा आकर्षक रन तोड़ने से जोकर दूसरे उपयोगी समूह में लग सकता था। कभी मामूली दिखने वाला छोटा पत्ता साफ़ व्यवस्था रोकता था। हर बदलाव के बाद वे पत्ते गिनते। सुंदर तर्क के पीछे भी अवैध हाथ छिप सकता था।
वीरेन ने विरोधियों के उठाए पत्तों के बारे में वही लिखना शुरू किया जो सचमुच दिखा था। किसी ने सात उठाया, तो सात में उसकी रुचि दिखाई दी। इससे पूरा हाथ मालूम नहीं हो जाता था।
“ध्यान देना उपयोगी है,” फ़ारूक ने कहा। “बिना प्रमाण पूरा यक़ीन बना लेना नुकसान करता है।”
इसी बीच ईशा का फोन आया। वह अपने घर की उस शाम पर बात किए बिना दोस्त बने रहना चाहती थी।
“तुम्हारी सुविधा के लिए मैं उस शाम को मिटा नहीं सकता,” वीरेन ने कहा।
उसने कहा कि वह बदल गया है। वीरेन ने बिस्तर पर सजे तेरह पत्तों को देखा। “हाँ,” उसने जवाब दिया और अधूरे अभ्यास पर लौटने से पहले फोन रख दिया।
6. फ़ाइनल तक छह डील
सेमीफ़ाइनल में छह डील थीं। हर मेज़ से सबसे कम कुल पेनल्टी वाला खिलाड़ी आगे जाता। अगले शफ़ल से पहले हर स्कोर जाँचा जाता था। वीरेन को यह स्पष्टता पसंद आई। खराब डील महत्वपूर्ण थी, मगर वह अपने आप पूरा दिन नहीं बन जाती थी।
शुरुआत खराब हुई। दूसरे खिलाड़ी की वैध घोषणा के समय उसके पास बेमेल पत्तों का उलझा हाथ था। बैरियर के पीछे कबीर हाथ बाँधे बैठा रहा। उसने कोई संकेत नहीं दिया।
दूसरी डील में वीरेन ने पसंदीदा ऊँचे पत्तों का अधूरा जोड़ जल्दी छोड़ दिया। तीसरी में पहले प्योर सीक्वेंस बनाया, फिर जोकर के आसपास बाकी हाथ जमाया। वह तीसरी डील भी नहीं जीता, लेकिन अधूरे पत्तों की कीमत बहुत कम रही।
पाँचवीं डील तक वह मामूली अंतर से आगे जाने की स्थिति में था। एक खिलाड़ी तेजी से पत्ते फेंककर बाकी मेज़ को बेचैन करने लगा। वीरेन ने उसकी रफ़्तार को अपनी रफ़्तार नहीं बनने दिया। उसने हर बार हाथ देखा, निर्णय लिया और फिर पत्ता छोड़ा।
छठी डील में उसका हाथ पूरा हुआ। स्कोर लिखने वाले ने सभी समूह जाँचे, परिणाम दर्ज किया और कागज़ खिलाड़ियों की ओर घुमा दिया। वीरेन साफ़ अंतर से फ़ाइनल में पहुँच चुका था।
बाहर देवेंद्र इंतज़ार कर रहा था। वह दूसरी मेज़ से पहुँचा था।
“सुधार हुआ है,” उसने कहा। “उम्मीद है सुधार करने और इस स्तर का होने का अंतर समझते हो।”
वीरेन ने अपना केस बंद किया। “अभी तो उनके बीच एक फ़ाइनल है।”
नई गतिविधियों और ऐप अपडेट के लिए अपना पसंदीदा चैनल देखें।
टीजी चैनलWhatsApp चैनलWhatsApp ग्रुप
7. पहली पंक्ति की खाली जगह
वीरेन ने माँ से फ़ाइनल देखने आने को कहा। उसने पहले मना किया। वह उन लोगों के बीच फिर नहीं बैठना चाहती थी जिन्होंने उसके बेटे का अपमान चुपचाप देखा था।
“कबीर के पास बैठना,” उसने कहा। “तुम मुझे देखने आ रही हो।”
माँ उसी शाल में आई जिसे वह देवेंद्र की सीढ़ियों से उतरते समय लाई थी। वीरेन ने देखा, लेकिन कुछ नहीं कहा।
फ़ाइनल में चार खिलाड़ी और छह तय डील थीं। कुल पेनल्टी परिणाम तय करती। देवेंद्र ने मेज़बान की तरह सबका स्वागत किया। फिर इतनी ऊँची आवाज़ में वीरेन को निराशा से बचने की सलाह दी कि पहली पंक्ति सुन सके।
पहली डील शांत स्वभाव के मेहुल ने जीती। देवेंद्र की पेनल्टी सीमित रही। वीरेन की उससे कुछ अधिक थी।
दूसरी डील में वीरेन के पास दो आकर्षक संभावित रन थे। दोनों बचाए रखने पर प्योर सीक्वेंस अधूरा रहता। उसने पुराना लालच तुरंत पहचान लिया। एक विकल्प तोड़ा, उससे मिली जगह का इस्तेमाल जरूरी संरचना पूरी करने में किया और कुछ चालों बाद वैध घोषणा कर दी।
अधिकारी की जाँच के बाद देवेंद्र ने उसके समूह देखे।
“तुमने अच्छा पत्ता फेंक दिया था।”
“मैंने वह पत्ता छोड़ा जिसकी मुझे जरूरत नहीं थी।”
जवाब धीमा था। आगे बैठे कुछ लोग सुनने को झुके। माँ नहीं झुकी। वह पहले से पूरे ध्यान से सुन रही थी। अब मेज़ पर उसके बेटे के निर्णय की बात हो रही थी, उसके घर की मजबूरी की नहीं।
8. वह हाथ जिसके पीछे वह नहीं भागा
चौथी डील तक देवेंद्र और वीरेन के बीच पेनल्टी का बहुत छोटा अंतर था। बाकी दोनों खिलाड़ी भी मुकाबले का परिणाम बदल सकते थे। उन्हें केवल दर्शक समझने की गुंजाइश नहीं थी।
देवेंद्र ने खुला पत्ता उठाया और जानबूझकर संतोष से पीछे टिक गया। वीरेन के भीतर पुरानी बेचैनी उठी। पहले वह उस हावभाव में सामने वाले की पूरी जीत देख लेता। इस बार उसने अपने पत्ते देखे।
उसके पास एक पूरा सीक्वेंस, एक उपयोगी समूह और कई ऐसी संभावनाएँ थीं जो अलग दिशाओं में खींच रही थीं। वह चमकदार पूर्णता के पीछे भाग सकता था या किसी और के पहले समाप्त होने की स्थिति में नुकसान सीमित कर सकता था। उसने दूसरा रास्ता चुना और उचित अवसर पर एक महँगा बेमेल पत्ता छोड़ दिया।
दो बारी बाद मेहुल ने घोषणा कर दी। वीरेन का हाथ पूरा नहीं था, मगर उसकी पेनल्टी सीमित रही। देवेंद्र की अधिक थी। इसका मतलब यह नहीं था कि वीरेन को मेहुल के पत्ते पता थे। उसने ऐसा फैसला किया था जो समय का अनुमान गलत होने पर भी टिक सकता था।
पाँचवीं डील में देवेंद्र ने उत्कृष्ट घोषणा के साथ अंतर घटाया। वह जीत का हकदार था। वीरेन ने दर्शकों की ओर देखे बिना उसे बधाई दी।
आख़िरी डील से पहले वीरेन थोड़ा आगे था। एक लापरवाह हाथ अब भी सब बदल सकता था। देवेंद्र ने कंधे घुमाकर पत्ते माँगे। कमरे के उस पार माँ ने अपनी शाल गोद में तह कर ली।
9. हुकुम की क्वीन
आख़िरी हाथ उपयोगी बनने के बहुत करीब था, और इसी कारण खतरनाक भी। वीरेन के पास दिल का तीन, चार, पाँच; चिड़ी का सात और आठ तथा प्रिंटेड जोकर; अलग सूट की तीन क्वीन; हुकुम का नौ, दस, जैक; और चिड़ी का किंग था।
उसने पत्ते गिने। तेरह। दिल वाला क्रम प्योर था। चिड़ी वाला समूह जोकर के साथ इम्प्योर सीक्वेंस बन सकता था। तीन क्वीन का सेट था। हुकुम का रन भी प्योर था। अतिरिक्त किंग हाथ पूरा होने से रोक रहा था।
उसे ऐसा पत्ता चाहिए था जो किसी उचित समूह को बढ़ा दे, जिसके बाद वह किंग छोड़ सके। जरूरत होने से गड्डी पर वह पत्ता देने की कोई बाध्यता नहीं आती।
कई बारियाँ गुज़रीं। देवेंद्र ने डिस्कार्ड उठाकर पत्ते बराबर किए। वीरेन ने अनुपयोगी पत्ता उठाया, व्यवस्था फिर जाँची और उसे छोड़ दिया। केवल सक्रिय दिखने के लिए वह पूरा समूह नहीं तोड़ने वाला था।
फिर उसे हुकुम की क्वीन मिली। उसने उसे हुकुम के जैक के बाद रखा। वहाँ चार पत्ते, दिल के तीन, जोकर सहित चिड़ी के तीन और तीन क्वीन। चिड़ी का किंग छोड़ने के बाद तेरह सही पत्ते।
घोषणा से पहले उसने एक बार और गिना। अधिकारी ने हर समूह जाँचा। हाथ वैध था। देवेंद्र के अधूरे हाथ की पेनल्टी ने फ़ाइनल का फैसला कर दिया। परिणाम में वीरेन का नाम पहले पढ़ा गया। उसी क्षण उसने माँ की लंबी, काँपती साँस सुनी।
10. वह निमंत्रण जो स्वीकार नहीं हुआ
तालियाँ खत्म होने से पहले देवेंद्र ने हाथ बढ़ाया। “परिवार को साथ खुशी मनानी चाहिए।”
वीरेन ने एक बार हाथ मिलाया। “इस तस्वीर में मेरी माँ आएँगी।”
कबीर ने बैरियर खोला। देवेंद्र थोड़ा ही हटे, फिर फोटोग्राफर ने बीच की जगह खाली करने को कहा। जहाँ वह थे, वहाँ वीरेन की माँ आईं। साथ कप उठाते समय उनका शॉल बेटे की कलाई से लगा।
कबीर ने परिवार के चैट में पूरा परिणाम भेजा। वीरेन की पुरानी हार के नीचे नई तस्वीर आई। अपनी पुरानी टिप्पणियों तक पहुँचने से पहले रिश्तेदारों को विजेता का कुल स्कोर पार करना था।
ईशा ने बधाई दी। वीरेन ने धन्यवाद कहा, सगाई की बात फिर नहीं खोली।
तीन दिन बाद देवेंद्र ने घर के कार्यक्रम में बुलाया। संदेश में उसके लिए ठीक जगह का वादा था। माँ फ्रेम चुन रही थीं जब वीरेन ने उन्हें दिखाया।
“हम जा रहे हैं?” उन्होंने पूछा।
“आप जाना चाहती हैं?”
उन्होंने दो फ्रेम साथ रखकर छोटे वाले को चुना। “मैं चाहती हूँ कि तुम्हारी अगली शिफ्ट से पहले यह घर पहुँच जाए।”
वीरेन ने निमंत्रण ठुकराया और दुकानदार को पैसे दिए। माँ पैक तस्वीर खुद उठाकर बाहर आईं।
शाम को देवेंद्र का अगला संदेश आया—निमंत्रण देखा था क्या? उसके ठीक ऊपर चैट में वही तस्वीर थी, जिसके बीच से उन्हें हटना पड़ा था।
आगे जानना चाहते हैं? ऐप की जानकारी और साझा ऑफ़र की शर्तें चैनल पर देखें।
टीजी चैनलWhatsApp चैनलWhatsApp ग्रुप