इंटरव्यू लेने वाले ने पूछा कि ईशान पर खर्च किए गए पैसे वसूल हुए या नहीं।
कैमरे के पीछे मैनेजर ने हाथ से लिखा कार्ड उठा दिया।
मैंने सबको निराश किया है।
ईशान की बाँहों पर अब भी मेज का किनारा महसूस हो रहा था। दस मिनट पहले शुरुआती सत्र में छठे स्थान पर आया था। अब प्रायोजक के फूलों के पास खड़ा होकर अपने पूरे मूल्य का हिसाब देना था।
उसने करण की तरफ देखा।
कार्ड थोड़ा और ऊपर गया।
“आज उतना अच्छा नहीं खेला जितना खेलना चाहिए था,” ईशान बोला।
करण ने सिर हिलाकर मना किया।
इंटरव्यू लेने वाला इंतजार करता रहा।
ईशान ने सीधे कैमरे में देखा।
“आज यही हुआ।”
बाद में करण उसे पीछे के गलियारे में ले गया और दरवाजा बंद कर दिया।
“एक वाक्य बोलना था।”
“सवाल का जवाब दिया।”
“अपनी पसंद के सवाल का।”
बाहर कोई खाली गिलासों की ट्रॉली ले जा रहा था। पतली खिड़की में हैंडल चलता दिखाई दिया।
ईशान ऐसी जगह होना चाहता था जहाँ उसके चेहरे से कुछ कम काम लिया जाए।
* * *
उनतीस साल की उम्र तक वह करीब दस साल नौकरी और वयस्कों की ताश प्रतियोगिताओं के बीच समय बाँट चुका था।
अधिकतर वर्षों में नौकरी पहले रही।
दवाओं के थोक विक्रेता के गोदाम में माल रखता, डिलीवरी जाँचता और छुट्टी की शाम छोटे समूह के साथ तीन पत्ती का अभ्यास करता।
अभ्यास करवाने वाले भास्कर ने अपने फैसले ईमानदारी से देखना सिखाया था।
“उस समय क्या सोचा, लिखो,” कहते थे। “अब समझदार दिखने के लिए क्या कहना है, वह नहीं।”
ईशान की कॉपियाँ बिखरी हुई, सच्ची और निजी थीं।
करण को बहुत पसंद आईं।
उसने इन्हें गंभीर करियर की बुनियाद बताया।
इंटरव्यू तय किए। आयोजनों में आने का भुगतान तय करवाया। टेलीविजन पर दिखने वाली मनोरंजन लीग में जगह दिलवाई, जहाँ घोषित प्रारूप और टूर्नामेंट काउंटरों से खेल होता था।
पहली बार यात्रा का खर्च कमाने से पहले टिकट बुक हो गया।
करण ने अग्रिम रकम को निवेश कहा।
ईशान ने होटल की लॉबी में प्रतिनिधित्व का समझौता किया। पास से वेटर कप उठाता रहा।
उसने पन्ने पढ़े थे।
निकलना कितना महँगा हो सकता है, नहीं समझा था।
* * *
भास्कर को शुरुआती सत्र में आना था।
अतिथियों की सूची से नाम गायब था।
करण ने कहा कि प्रसारण क्षेत्र में सीमित जगह है।
करण के फोटोग्राफर के लिए जगह थी। संभावित ग्राहक के लिए थी। एक ऐसे आदमी के लिए थी जिसका परिचय नहीं हुआ।
भास्कर बाहर इंतजार करते रहे। ईशान ने प्रवेश के पास पाया।
“वीडियो देख लूँगा,” उन्होंने कहा।
“इतनी दूर आए।”
“तुम भी आए हो। जाओ, खेलो।”
ईशान चला गया।
मुकाबले में आदित्य उसके खेल की गति बदलने पर कुछ ज्यादा सहज लग रहा था। सिर्फ इससे कुछ साबित नहीं होता। अच्छे खिलाड़ी बातें पकड़ते हैं। खराब दिन में साधारण फैसलों में भी साजिश दिख सकती है।
फिर विराम में आदित्य बोला, “नीले पन्ने वाला अभ्यास अच्छा था।”
ईशान मुड़ा।
“क्या?”
“जिसमें नतीजा देखे बिना आखिरी हाथ की समीक्षा की थी। तुम्हारे मैनेजर ने प्रशिक्षण पैकेज में भेजा।”
नीला पन्ना सिर्फ एक था।
सफेद कागज खत्म हो गया था, इसलिए इस्तेमाल किया था।
उसमें ऐसी गलती का हिसाब था जिस पर बोलते हुए उसे शर्म आती थी।
* * *
ईशान ने मेज पर आदित्य से झगड़ा नहीं किया।
उसके बिना ही सत्र काफी खराब रहा।
इंटरव्यू के बाद करण से पूछा कि कौन सा प्रशिक्षण पैकेज भेजा था।
करण ने पानी की बोतल खोली।
“विकास की सामग्री।”
“मेरी?”
“हमारे समझौते के दौरान बनी सामग्री।”
“मेरी निजी समीक्षा मेरे खिलाफ खेलने वाले को भेजी?”
“अपने नतीजे का दोष किसी और पर मत डालो।”
गुस्सा गले में अटक गया।
ईशान पर इस्तेमाल करने के लिए सही आरोप था। भास्कर बरसों से सिखाते आए थे कि खराब फैसले की जिम्मेदारी कमरे पर मत डालो।
करण जानता था।
“गलतियाँ कीं,” ईशान बोला। “इससे मेरे सवाल का जवाब नहीं मिलता।”
करण ने बोतल बंद की।
“व्यावसायिक साझेदारी थी। लोग जानकारी साझा करते हैं।”
“मुझसे पूछा?”
“प्रचार के इस्तेमाल की अनुमति दी थी।”
“वह प्रचार नहीं था।”
करण ने गलियारे के दरवाजे की तरफ देखा।
“अच्छी चीज बर्बाद करने से पहले शांत हो जाओ।”
ईशान को कैमरे के पास उठा कार्ड याद आया।
अच्छी चीज किसके लिए थी, अभी तय नहीं हुआ था।
* * *
रात को शुरुआती सत्र की क्लिप फैलने लगीं।
कुछ लोगों ने खेल की आलोचना की।
कुछ उसके आयोजन में आने की फीस ऐसे गिन रहे थे जैसे अपनी जेब से दी हो।
करण ने जवाब का मसौदा भेजा।
शुरू में माफी थी। आखिर में भरोसा बनाए रखने के लिए मैनेजमेंट का धन्यवाद।
ईशान ने जवाब नहीं दिया।
फिर बिल आया।
यात्रा का अग्रिम खर्च। रहने का। निर्माण का। प्रबंधन के खर्च।
नीचे समझौते की जल्दी छोड़ने वाली शर्त याद दिलाई गई थी।
ईशान ने फोन किया।
“छोड़ने को कहा नहीं है।”
“तो समस्या नहीं।”
“आज रात क्यों भेजा?”
“स्पष्टता के लिए।”
ईशान होटल के पलंग पर जूते पहने बैठा रहा।
कमरा एजेंसी ने बुक किया था।
वापसी का टिकट भी।
अपना थैला ही कमरे में ऐसी चीज लगा जो साफ तौर पर उसकी थी।
भास्कर को फोन किया।
पहले बिल समझाने लगा।
फिर रुक गया।
“मेरी कॉपी उसे दे दी।”
* * *
भास्कर ने सुना।
नहीं कहा कि लीग बेकार है। यह भी नहीं कहा कि हस्ताक्षर कभी करने ही नहीं चाहिए थे।
पूछा कि खाना खाया?
“नहीं खा सकता।”
“थोड़ा कोशिश करो।”
अगली सुबह आयोजन से दूर कैफे में मिले।
ईशान ने समझौता और संदेश दिखाए।
भास्कर ने समझौता वापस कर दिया।
“पत्तों में मदद कर सकता हूँ। इसके लिए इसे समझने वाला ढूँढ़ो।”
पुराने खिलाड़ी ने व्यावसायिक समझौतों का काम करने वाली वकील से संपर्क करवाया।
उन्होंने पूरे कागज, मूल फाइलें और घटनाओं का सीधा विवरण माँगा।
एक अनुच्छेद की तस्वीर देखकर नतीजा नहीं बताया।
प्रचार की अनुमति, प्रशिक्षण पैकेज और खर्च के बिल को साथ देखना था।
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कुछ खर्च सचमुच देने हो सकते थे।
कुछ दावों के समर्थन में रिकॉर्ड चाहिए थे।
शुक्रवार तक आसानी से छुटकारा न मिलने की बात ईशान को पसंद नहीं आई।
सच बताया जाना पसंद आया।
* * *
उस दोपहर पुराने थोक विक्रेता को फोन किया।
मालिक ने पूछा कि पुरानी ड्यूटी वापस चाहिए?
“कुछ दिन, जगह हो तो।”
“सुबह जल्दी?”
“हाँ।”
आदमी सूची देखने लगा।
ईशान ने इस फोन को असफलता मान लेने जैसा सोचा था। लीग, बिल और नीले पन्ने की सफाई तैयार की थी।
मालिक ने पूछा कि गोदाम की चाबी अब भी है?
“वापस कर दी थी।”
“कल ले लेना। साढ़े छह बजे।”
बस इतना।
किसी ने चेहरे के साथ जुड़ी कीमत का हिसाब नहीं माँगा।
अगली सुबह नौ बजे तक डिब्बे गिने। हाथों की धूल धोई। फिर वकील के पास गया।
सलाह की फीस अपनी कमाई से थी।
कागजों का बोझ कम नहीं हुआ था। फिर भी कुर्सी पर बैठते समय पहली बार लगा कि हर अगला कदम करण के दिए पैसों से नहीं उठाना पड़ेगा।
* * *
आयोजन कार्यालय के जरिए आदित्य से संपर्क किया। पूछा कि मिली सामग्री की पहचान करवाने में मदद करेगा?
वह राजी हुआ।
उसे पैकेज अधिकृत प्रशिक्षण सामग्री बताकर बेचा गया था। नहीं बताया गया कि दूसरे प्रतियोगी की गोपनीय आत्मसमीक्षा है।
उसने अपनी रसीद और खरीद से जुड़ी बातचीत दी। संबंधित हिस्से वकील और आयोजन अधिकारियों के साथ साझा करने की अनुमति दी।
ईशान उसे अचानक पसंद नहीं करने लगा।
लेकिन यह कल्पना बंद हुई कि हर सामने बैठा आदमी दुश्मन है।
फाइल में कॉपी के कई पन्ने और बंद अभ्यास सत्र की रिकॉर्डिंग थी।
कैमरा खुद ईशान ने लगाया था।
करण ने कहा था कि इंटरव्यू तैयार करने में मदद मिलेगी।
पैकेज में इंटरव्यू नहीं था।
एक कीमत थी।
रसीद पर ईशान के नाम के नीचे।
वह देर तक उस पंक्ति को देखता रहा।
कीमत उसकी कल्पना से कम थी। इससे और बुरा लगा। उसे लगता था कि किसी का भरोसा बेचने के लिए बहुत बड़ा प्रस्ताव चाहिए होगा। इतना बड़ा कि कम से कम फैसले का कारण समझ आए। यहाँ साधारण बिल का नंबर था। करण के लिए शायद सामान्य काम का दिन रहा होगा। उसके बाद खाना खाया होगा, किसी और को फोन किया होगा।
करण ने उसकी निजी गलती से भी कमाई की थी। और अब उसी को सार्वजनिक माफी का कार्ड दिखा रहा था।
* * *
अगला लीग सत्र चार दिन बाद था।
पहले का नतीजा जुड़ना था। आगे जाने के लिए दोनों सत्रों के संयुक्त हिसाब में पहले चार में आना जरूरी था।
ईशान छठे स्थान पर था।
करण ने वापसी का प्रचार सुझाया।
नई जैकेट। गंभीर तस्वीर। आलोचकों को जवाब देने वाली पंक्ति।
ईशान ने कहा कि कोई सार्वजनिक बयान होगा तो लिखित रूप से मंजूर करेगा।
फिर भास्कर के साथ अभ्यास करने गया।
पुराने कोच ने बीस मिनट देखा।
“कोई तुम्हें पढ़ न पाए, इसके लिए दूसरा आदमी बनने की कोशिश कर रहे हो।”
“सब देख चुके हैं।”
“जो किया वह देखा। अब क्या कर रहे हो, यह अभी तय करना है।”
अभ्यास बदला।
कैमरे के लिए पूरे सत्र कम हुए। उस क्षण को देखना ज्यादा हुआ जब गलती तुरंत ठीक करने की चाह में ध्यान छूट जाता था।
कोई गुप्त चाल नहीं सिखाई गई।
ठीक से खाना खिलाया गया। सोने को कहा गया। अगले दिन लौटना था।
ईशान को यह शर्मनाक ढंग से अपर्याप्त लगा।
फिर पाया कि कठिन हाथ याद करते समय इंटरव्यू वाले की आवाज सुनाई नहीं दे रही।
* * *
तीसरी दोपहर करण आ गया।
दरवाजे पर नई जैकेट पकड़े खड़ा था।
“दस मिनट चाहिए।”
ईशान ने भास्कर को देखा।
कोच पत्ते समेटने लगे।
“जाने की जरूरत नहीं,” ईशान बोला।
करण मुस्कराया।
“व्यवसाय की बात है।”
“तो सुन सकते हैं।”
मुस्कान हट गई।
करण ने बताया कि प्रायोजक चिंतित हैं। लीग पेशेवर व्यवहार चाहती है। ईशान ने सहायता ली और अब सहायता देने वालों को सजा देना चाहता है।
ईशान ने पूछा कि प्रशिक्षण पैकेज की आगे बिक्री बंद हुई या नहीं।
सीधा जवाब नहीं मिला।
“तुम्हारी वकील हमारे लोगों से बात कर ले।”
“कर रही हैं।”
“तो करियर पर ध्यान दें।”
ईशान ने जैकेट देखी।
पीछे बड़े अक्षरों में उसका नाम था।
पहले कभी इतना कम भरोसा नहीं लगा था कि नाम उसका अपना है।
“आज तस्वीर नहीं।”
करण जैकेट कुर्सी पर डालकर चला गया।
दोनों खिलाड़ियों ने उसे नहीं छुआ।
* * *
दूसरे सत्र की सुबह वकील के जरिए लिखित जवाब आया।
एजेंसी समझौते की उसकी व्याख्या से असहमत थी।
बातचीत के दौरान विवादित प्रशिक्षण सामग्री का वितरण रोकने को तैयार थी।
लीग ने शिकायत मिलने की पुष्टि की और पैकेज से जुड़े व्यवहार की समीक्षा शुरू की थी।
अंकतालिका तुरंत रद्द नहीं होने वाली थी।
ईशान ने अपनी खराब चालें मिटाने को नहीं कहा था।
चाहता था कि नुकसान पहुँचाने वाली चीज जाँचे जाने तक रुक जाए।
उसने जो संक्षेप साझा किया, भास्कर ने पढ़ा।
“ठीक है।”
“ठीक है?”
“मेज पर बैठना है तुम्हें।”
आयोजन के तय संपर्क से भास्कर का पास सीधे बनवाया गया था।
ईशान ने नाम जाँचा।
फिर हाथ धोने गया।
शीशे में कोई खास भाव बनाने का अभ्यास नहीं किया।
चेहरा जैसा था, रहने दिया।
* * *
शुरुआत उम्मीद से खराब हुई।
नुकसान बढ़ा।
कमेंट्री में पहले नतीजे का जिक्र हुआ। दर्शकों में किसी ने कहा कि जैकेट महँगी रही होगी।
ईशान ने वह पहनी नहीं थी।
आँखें मेज पर रखीं।
काम का बदलाव छोटा था। गलती के बाद अगला हाथ नया हाथ रहने दिया।
कैमरे के लिए नाटकीय वापसी बनाने की कोशिश नहीं की।
कुछ फैसलों में नुकसान हुआ।
कुछ से भरपाई हुई।
विराम तक आगे जाने वाली जगहों से बाहर था।
करण फोन लेकर आया।
“सवाल आ रहे हैं। कुछ बोलना चाहिए।”
“विराम में कुछ नहीं कहना।”
“चुप्पी खराब लगती है।”
ईशान ने थैले से केला निकाला।
भास्कर दो रख गए थे। भूल गए थे कि उसे पसंद नहीं।
उसने एक खा लिया।
करण इंतजार करता रहा।
इस बार ईशान ने उस इंतजार को माफी से नहीं भरा।
* * *
आखिर के पास अंकतालिका करीब आ गई।
आदित्य सुरक्षित स्थान पर था। दो दूसरे खिलाड़ी और ईशान इतने पास थे कि आखिरी मुकाबले जरूरी हो गए।
बीच में कमरा शोर करता। फैसलों के समय शांत हो जाता।
ईशान को जल्दी करने की इच्छा हुई।
पहचान लिया।
पहचानने से इच्छा गायब नहीं हुई।
पैर जमीन पर सीधे रखे। अधिकारी ने बाकी क्रम स्पष्ट किया तो सुना।
सामने आए हाथ खेले।
संयुक्त हिसाब की पुष्टि हुई तो तीसरे स्थान पर था।
एक पल लगा गलत सुना।
तीसरा।
अगले चरण में।
पहले सत्र के छठे स्थान के बाद घोषित नतीजों के आधार पर।
भास्कर अवरोध के उस पार मिले।
ईशान ने हाथ बढ़ाया।
कोच ने अनदेखा करके गले लगा लिया। एक बाँह बीच में अजीब तरह फँसी थी।
“केले रख दिए थे,” ईशान ने कंधे के पास कहा।
“भूल गया।”
“पता है।”
कैमरा आया तो दोनों हँस रहे थे।
* * *
करण इंटरव्यू वाली जगह पर आ गया।
इस बार हाथ में कार्ड नहीं था।
बताने लगा कि कठिन शुरुआत के बाद एजेंसी ने ईशान का भरोसा कैसे वापस बनाया।
इंटरव्यू लेने वाला ईशान की तरफ मुड़ा।
“भास्कर ने मेरे साथ काम किया,” ईशान बोला।
करण ने ऐसे सिर हिलाया जैसे उसका मतलब भी वही था।
मैनेजमेंट के मामले का पूछा गया।
ईशान ने निजी विवाद की हर बात सीधे प्रसारण में नहीं उड़ेली।
कहा कि उसकी समझ में दी गई अनुमति से बाहर निजी प्रशिक्षण सामग्री बाँटी गई, मामला औपचारिक रूप से उठाया गया है और नतीजे पर अनुमान नहीं लगाएगा।
फिर सत्र के बारे में बोला।
सबसे ज्यादा साझा हुई क्लिप जवाब से छोटी थी।
भास्कर ने मेरे साथ काम किया।
बरसों करण तय करता रहा था कि ईशान के पास कौन खड़ा होगा।
अब एक वाक्य ने वह व्यवस्था असुविधाजनक कर दी थी।
* * *
छोड़ने में फिर भी समय लगा।
कागज देखने थे। रकम पर सवाल करने थे। सही अग्रिम खर्च लौटाने थे।
ईशान काम और खेल जारी रखे रहा। बातचीत उन लोगों के जरिए चली जिन्हें ध्यान से पढ़ने का भुगतान मिलता था।
आदित्य की रसीद और संदेश काम आए। अभ्यास की रिकॉर्डिंग माँगते समय लिखा मूल उद्देश्य भी।
अंतिम समझौते में प्रतिनिधित्व समाप्त हुआ। शर्तें ऐसी थीं जिन्हें ईशान पूरा कर सकता था।
विवादित पैकेज हटाना था। उसके नाम और सामग्री के आगे इस्तेमाल की व्यवस्था लिखी गई।
जितनी रकम वापस चाही थी, सारी नहीं मिली।
अंत लिखित में मिला।
एजेंसी ने प्रशिक्षण सामग्री के विवरण में सुधार जारी किया।
करण का निजी संदेश बाद में आया।
मैंने तुम्हें लोगों के सामने पहुँचाया।
ईशान ने बस स्टॉप पर पढ़ा।
पहला टिकट याद आया। गंभीर खिलाड़ी के रूप में परिचय होने की खुशी भी।
फिर निजी गलती के पास लिखी कीमत याद आई।
जवाब नहीं दिया।
* * *
अगले सत्र में दूसरी एजेंसी से सीमित दायरे का समझौता किया।
घर पर पढ़ा था।
वकील ने देखा था।
बदलाव हुए थे।
छोटी घोषणा के समय आयोजकों ने पूछा कि तस्वीर में साथ किसे रखना है?
“भास्कर।”
“पुरानी टीम से कोई?”
“नहीं।”
आवाज ऊँची नहीं हुई। लंबा बदला लेने वाला भाषण नहीं था।
कोच साधारण थैला लेकर आए। चाय ज्यादा मीठी होने की शिकायत की।
ईशान हँसा।
कागज तैयार हुए तो हाथ के नीचे आभार का बयान नहीं सरकाया गया।
उसने अपना नाम लिखा।
तस्वीर के बाद भास्कर ने पूछा कि नई कॉपी शुरू की?
“हाँ।”
“अब भी जो हुआ वही लिखते हो?”
“कोशिश है।”
लौटते समय स्टेशनरी की दुकान पर रुका। सफेद कागज का पैकेट माँगा।
दुकानदार ने उसी कीमत पर नीला भी दिखाया।
ईशान ने सोचा।
फिर दोनों ले लिए।
शाम को खराब खेले गए एक हाथ का विवरण लिखा।
खाना बनाने गया तो विवरण अधूरा छोड़ दिया।
कॉपी वहीं रही जहाँ रखी थी।
कैमरा नहीं।
पैकेज नहीं।
उसकी अपनी गलती थी। उसके लौटकर सीखने का इंतजार करती हुई।