“पहले चाय,” अंबिका ने कहा। “अगली तस्वीर लेखक की है।”
मीरा हार पर लिखा अपना पन्ना पकड़े थी।
छपी किताब नहीं। नमूने का पन्ना था, जो विमोचन की मेज पर फूलों के पास रखा था। उसका पहला वाक्य मौजूद था। वह उदाहरण भी था जिसे बिजली जाने पर फोन की रोशनी में काटकर दोबारा लिखा था।
ऊपर उसके पति का नाम था।
सिर्फ उसका।
अंबिका ने कपों की तरफ इशारा किया।
एक मेहमान ने पूछा कि मीरा कौन है। प्रचार सँभालने वाली अंबिका मुस्कुराई।
“घर में मदद करती हैं।”
राघव ने सुना।
इतना पास था कि बिना आवाज ऊँची किए सुधार सकता था।
इसके बजाय उसने सीने से लगी किताब सीधी की, ताकि कैमरे में शीर्षक साफ आए।
मीरा ने पन्ना रख दिया।
कप दो साफ कतारों में थे।
सुबह उसने खुद गिने थे।
* * *
पाँच साल से कॉपियाँ शयनकक्ष की अलमारी के सबसे निचले खाने में रखी थीं।
नीले कवर। पन्नों पर नंबर। मीरा की छोटी, ढलती लिखावट में तारीखें।
कुछ पन्ने राघव के अभ्यास के थे। कुछ उसके अपने। कुछ दोनों की बहसें थीं, जिन्हें स्थानीय क्लब में वयस्क इंडियन रमी की एक और शाम के बाद सुधारा गया था।
मीरा शादी से बहुत पहले खेलती थी। रिकॉर्ड रखने में धैर्य था। उन कहानियों में धैर्य नहीं था जिनमें बाद में हर जीत तय बताई जाती।
राघव लोगों के सामने अच्छी तरह बोलता था।
साथ में ये गुण उपयोगी लगे थे।
किताब का प्रस्ताव आया तो मीरा ने कई अध्याय लिखे और उसके अध्याय व्यवस्थित किए। शुरुआती रूपरेखा पर दोनों के नाम थे। प्रकाशक को भेजे संदेश में साझा काम कहा गया था।
बाद में राघव बोला कि एक नाम का प्रचार आसान होगा।
मीरा ने मना किया।
फिर कहा कि कवर सिर्फ डिजाइन का प्रयोग है।
मीरा ने अंतिम प्रूफ माँगा।
कहा गया कि प्रकाशक देर से चल रहा है।
विमोचन पर उसने देखा कि पर्याप्त लोग निर्भर हो जाएँ तो झूठ कितनी ठीक समय पर पहुँच सकता है।
* * *
एक मेहमान ने हार की समीक्षा वाला पन्ना खोला और सवाल पूछा।
राघव से पहले मीरा ने जवाब दिया।
उसने समझाया कि मतलब क्या था। खिलाड़ी को वही जानकारी लिखनी चाहिए जो उस समय उसके पास थी। बाद का परिणाम देखकर यह नहीं जताना चाहिए कि सब पहले से स्पष्ट था।
अंबिका ने बीच में टोका।
“मुझे लगता है राघव की बात इससे सरल है।”
मीरा ने उसे देखा।
“यह हिस्सा मैंने लिखा है।”
मेहमान ने पन्ना नीचे किया।
अंबिका हल्का हँसी।
“टाइप करने में मदद की थी, हाँ?”
राघव ने कहा, “अभी नहीं, मीरा।”
कमरा खामोश नहीं हुआ। होता तो याद रखना आसान होता। बातचीत चलती रही। चम्मच कप से टकराया। किसी ने पूछा कि तस्वीर के लिए कहाँ खड़ा होना है।
मीरा मेज के पास खड़ी रही। उसका अपना काम ऐसी बात बन गया था जिसका उल्लेख अशिष्ट था।
प्रकाशक के साथ तस्वीर के लिए अंबिका ने राघव की बाँह थाम ली।
तस्वीर के बाद भी हाथ वहीं रहा।
मीरा कई सप्ताह से उस हाथ को देख रही थी।
उस शाम उसने यह नाटक बंद कर दिया कि उसका मतलब नहीं समझती।
* * *
घर में राघव ने विमोचन खराब करने का आरोप लगाया।
मीरा ने कॉपियाँ माँगीं।
“यहीं हैं।”
“ले जाना चाहती हूँ।”
“कहाँ?”
“बहन के पास।”
वह अलमारी के सामने खड़ा हो गया।
कंधे के पार नीले कवर दिख रहे थे। एक पर फटा हिस्सा जोड़ने के लिए भूरी टेप लगी थी।
“लगता है मेरे बिना किताब छपवा लोगी?”
“लगता है अपना लिखा रख सकती हूँ।”
उसने टेप वाली कॉपी निकाली और कोई पन्ना खोला।
बाथरूम के पास प्लास्टिक की बाल्टी जैसी छोटी चौड़ी टब रखी थी। कार्यक्रम से पहले मीरा ने उसमें कपड़े भिगोए थे।
राघव ने कॉपी उसमें गिरा दी।
एक पल कवर तैरा।
फिर रंग गहरा हुआ।
“ले जाओ। देखते हैं मेरे बिना क्या हो।”
मीरा घुटनों पर बैठी और दोनों हाथों से उठाया।
कपड़ों पर पानी बहा। पन्ने चिपक गए।
राघव बोलता रहा। मीरा कॉपी रसोई की मेज तक ले गई।
अगला वाक्य याद नहीं रहा।
कलाई पर बहती नीली स्याही याद रही।
* * *
बहन नंदिनी आधी रात से पहले पहुँच गई।
बाकी कॉपियाँ, कपड़े, पहचान के कागज और मीरा की अपनी बचत का छोटा लिफाफा रखा।
राघव सोफे से देखता रहा।
बोला कि अस्थायी गुस्से में स्थायी फैसला ले रही है।
नंदिनी ने टब देखा। बहस नहीं की।
उसके फ्लैट में खाने की मेज पर साफ कागज फैलाए। जितने पन्ने अलग कर सकते थे, ध्यान से किए। कुछ बच सकते थे। कुछ नरम, अपठनीय धब्बे बन गए थे।
मीरा को एक वाक्य मिला जिसका आखिरी शब्द याद रखना था।
उससे पहले सब मिट चुका था।
वह एक बार तेज हँसी। फिर रोना रुक नहीं पाया।
नंदिनी पास बैठी रही। शाम को सीख में बदलने की कोशिश नहीं की।
रात तीन बजे मीरा को स्कैन की प्रतियाँ याद आईं।
सभी कॉपियाँ नहीं थीं।
काफी थीं।
महीनों पहले फोन में जगह खत्म होने की चेतावनी से चिढ़कर फाइलें बाहरी ड्राइव पर रखी थीं। समय लगने की शिकायत की थी।
अब बैग में खोजती रही जब तक ड्राइव मिल नहीं गई।
* * *
स्कैन से सब नहीं सुलझा।
उनसे बचाने के लिए कुछ निश्चित मिला।
स्वतंत्र सलाह लेकर उसने काम का रिकॉर्ड बनाया। तारीख वाले मसौदे, शुरुआती साझा रूपरेखा, अध्यायों पर संदेश, स्कैन किए पन्ने और ईमेल से भेजे संस्करण।
अपने लिखे हिस्से राघव के लिखे से अलग किए। साझा तैयार हिस्सों को अलग चिह्नित किया।
गुस्सा चाहता था कि हर पन्ना अपना कह दे।
सही बात पर टिकने के लिए रुकी।
नाम वापस चाहिए था तो बताना था कि वह किस काम पर होना चाहिए।
प्रकाशक की संपादक कविता ने शिकायत मिलने की पुष्टि की। पुराने पत्राचार की जाँच के लिए समय माँगा।
मीरा ने अगली जानकारी की स्पष्ट तारीख तय की।
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यह भी कहा कि उसका पक्ष केवल राघव के जरिए न सँभाला जाए।
उत्तर सीधे उसे आया।
बदलाव छोटा था। फिर भी उसने प्राप्तकर्ता वाली पंक्ति दो बार पढ़ी।
वर्षों से उसके वाक्य छाप सकने वाले लोगों तक पहुँचने से पहले पति से गुजरते थे।
अब एक सवाल उसके अपने नाम पर आया था।
* * *
जाँच चलती रही। मीरा खेलने लौटी।
पहली शाम खराब थी।
स्थानीय वयस्क अभ्यास समूह में एक सामान्य बात भूल गई। ध्यान टूटा। इतनी बार माफी माँगी कि पास बैठी महिला ने आखिर कहा, “दोबारा बताने को कह सकती हो।”
मीरा ने कहा।
उन्होंने दोहराया।
किसी ने मुश्किल स्वभाव की नहीं कहा।
वह वर्षों से राघव के साथ अपने सत्र भी लिखती थी। लेकिन हाल में खाली समय उनके काम का उसका सार्वजनिक रूप तैयार करने में गया था।
अभ्यास छूटा था। वह नई खिलाड़ी नहीं थी।
यह फर्क तब जरूरी था जब एक खराब शाम को उसके सही होने का प्रमाण मानने लगती।
नंदिनी के घर के पास स्टेशनरी की दुकान में अंशकालिक काम मिला। मालिक को ऑर्डर सँभालने और किस स्कूल को कौन सा कागज चाहिए, यह याद रखने वाला चाहिए था।
पैसे कम थे। ध्यान लगता था।
मीरा को अच्छा लगता कि दिन खत्म होने पर किए कामों की सूची थी जिन्हें राघव की उपलब्धि नहीं कहा जा सकता था।
रात में अभ्यास करती या पन्ना सुधारती।
कभी दोनों नहीं करती।
* * *
एक शाम नंदिनी लौटी तो खाने की मेज फिर कागजों से ढकी थी।
उसके कुछ कहने से पहले मीरा माफी माँगते हुए समेटने लगी।
“खाने के लिए आधी मेज चाहिए,” नंदिनी बोली। “पूरा कमरा वापस नहीं माँग रही।”
कागज एक तरफ किए।
मीरा को उम्मीद रहती कि मदद कभी भी इस शिकायत में बदल जाएगी कि वह कितनी जगह घेर रही है।
नंदिनी शिकायत करती भी थी। बिस्तर पर गीले तौलिये पसंद नहीं थे। सिंक के पास छोड़े कप पसंद नहीं थे।
लेकिन शिकायत तौलिये और कप की रहती।
उससे यह साबित नहीं करती थी कि मीरा को वहाँ रहने का अधिकार नहीं है।
कई सप्ताह बाद मीरा ने हर रात कॉपियाँ बैग में भरना बंद किया। पहले ऐसे रखती थी जैसे कभी भी जाने को कहा जा सकता हो।
उस रात एक कॉपी मेज पर रह गई।
सुबह भी वहीं थी।
* * *
राघव ने फूल भेजे।
फिर संदेश कि अंबिका ने बात गलत समझी थी।
फिर कि मीरा वह किताब खराब कर रही है जिससे दोनों का खर्च चल सकता था।
मीरा ने केवल जरूरी सवालों के जवाब दिए।
अलग होने की व्यावहारिक व्यवस्था उसके चुने सहायक लोगों के जरिए अलग चल रही थी। पांडुलिपि के विवाद में उसे नहीं मिलाया।
राघव ने वही वाक्य इस्तेमाल किया जो उसे गंभीरता से लेने को कहने पर बोलता था।
“हमेशा बात को उससे बड़ा बना देती हो।”
मीरा ने नई कॉपी में लिख लिया।
समझदारी भरा वाक्य समझकर नहीं। अगली बार आने पर पहचानने के लिए।
नीचे जाँचे जा सकने वाले तथ्य लिखे।
साझा प्रस्ताव।
अकेला नाम।
पानी में पन्ना।
सूची ने नहीं बताया कि क्या महसूस करे।
उसने किसी और को यह बताने से रोका कि हुआ ही कुछ नहीं।
* * *
विमोचन के छह महीने बाद खुली इंडियन रमी प्रतियोगिता घोषित हुई।
मीरा के पास हाल का इतना अभ्यास था कि प्रवेश पर विचार कर सके। दुकान के समय से कार्यक्रम मिलाया। प्रकाशित प्रवेश शुल्क मनोरंजन के लिए रखी रकम से दिया और यात्रा तय की।
प्रतिभागियों में राघव का नाम था।
वह लगभग हट गई।
नंदिनी ने पूछा कि वजह प्रतियोगिता है या आदमी।
मीरा ने कहा, नहीं जानती।
“तो तय करने से पहले पता करो।”
अगले अभ्यास में दोस्त से वे वाक्य कहने को कहा जिनसे वह अस्थिर होती थी। जल्दी रोक दिया। सुरक्षित कमरे में भी उसके शब्द सुनना अच्छा नहीं था। उससे कोई जादुई इलाज नहीं हुआ।
मदद सरल चीज से मिली।
उसने अभ्यास किया कि कोई खिलाड़ी निजी बातों से खेल बिगाड़े तो अधिकारी से सहायता माँगेगी।
खुद को याद दिलाया कि बातचीत छोड़ सकती है, प्रतियोगिता छोड़े बिना।
आयोजन की सुबह कागज और खाने का डिब्बा रखा।
भीगी कॉपी घर में रही।
हर चोट साथ ले जाने की जरूरत नहीं थी ताकि याद रहे कि लगी थी।
* * *
राघव पंजीकरण के पास मिला।
एक पल खुश लगा, जैसे उसका आना उसकी दुनिया में लौट आने का प्रमाण हो।
“अच्छा है। बात करनी चाहिए।”
“किताब की बात आयोजन के बाद लिखकर भेजना।”
“हमारी बात कर रहा था।”
“यहाँ नहीं।”
उसने बाकी खिलाड़ियों की तरफ देखा।
“अब भी मुश्किल कर रही हो?”
वाक्य पूरा होने से पहले मीरा ने ढाँचा पहचान लिया।
वह प्रवेश जाँच रहे अधिकारी की तरफ चली गई।
राघव पीछे नहीं आया।
पहला सत्र असमान रहा। एक लापरवाही हुई। उसे पूरे दिन का फैसला नहीं बनने दिया।
दोपहर में नंदिनी ने दुकान की बिल्ली की तस्वीर भेजी। लिफाफों के डिब्बे में सो रही थी।
मीरा हँसी, खाया और लौटी।
वह आगे पहुँची।
राघव भी पहुँचा।
अंतिम चरण में एक समूह में थे।
वह सामने बैठा और पुरानी निजी मुस्कान दी। जैसे मीरा के सोचने से पहले जानता हो कि वह क्या करेगी।
मीरा ने बैग कुर्सी के नीचे रखा।
फिर अधिकारी की तरफ देखा।
* * *
पहली निजी टिप्पणी जल्दी आई।
“कोई जल्दी न करवाए तो पूरा दिन सोचती रहोगी।”
मीरा को परिचित इच्छा हुई कि साबित करे, जल्दी कर सकती है।
हाथ स्थिर रखे।
फिर अधिकारी से टिप्पणी पर ध्यान देने को कहा।
अधिकारी ने मेज को याद दिलाया कि बातचीत आयोजन के व्यवहार नियमों के भीतर रखी जाए।
राघव ने हाथ उठाए जैसे निर्दोष मजाक गलत समझा गया हो।
मीरा ने कमरे को अपनी शादी नहीं समझाई।
अगला हाथ खेला।
मुकाबला साफ प्रतीक जैसा नहीं था। अच्छे हिस्से थे, बुरे हिस्से थे। राघव सक्षम खिलाड़ी था। इससे पुराना दुख आसान नहीं, कठिन होता था।
उसके बोल देने से वह ढह नहीं गया।
एक समय कुल में आगे था।
मीरा ने अपना रिकॉर्ड जाँचा और बचे खेल पर ध्यान दिया।
जीतकर डूबे पन्ने वापस नहीं ला सकती थी। यह खेल खत्म कर सकती थी, उसे अपने सोचने की रफ्तार चुने बिना।
अंतिम परिणाम पक्का हुआ तो उसका नाम पहले था।
उसने पढ़ा।
फिर अंक बताने वाले से दोबारा नाम कहने को कहा।
“मीरा।”
अपना नाम अच्छे अर्थ में अपरिचित लगा।
* * *
कविता का अंतिम जवाब ग्यारह दिन बाद आया।
प्रकाशक ने जमा सामग्री की तुलना मीरा के तारीख वाले रिकॉर्ड और साझा प्रस्ताव के पत्राचार से की थी।
राघव ने उसकी भूमिका लिपिकीय सहायता बताई थी। दस्तावेज पर्याप्त लेखकीय योगदान दिखाते थे।
प्रकाशक ने गलत नाम वाला संस्करण वापस लिया और अपने माध्यमों पर सुधार जारी किया।
समाधान में प्रभावित सामग्री और पक्षों के बीच बाकी भुगतान का मामला भी शामिल था।
इससे किताब का हर वाक्य मीरा को नहीं मिल गया। राघव का काम उसका रहा। साझा विकसित हिस्सों पर अलग सहमति चाहिए थी।
स्वीकार करने से पहले मीरा ने अपने सलाहकार के साथ शर्तें पढ़ीं।
उस पल की तस्वीर नहीं थी।
नंदिनी काम पर थी। केतली साफ करनी थी। ऊपर कोई फर्नीचर खिसका रहा था।
मीरा ने सुधार की प्रति छापी।
चैंपियनशिप प्रमाणपत्र के पास रखी।
दो अलग चीजें थीं।
कोई दूसरी की जगह नहीं ले सकती थी।
फिर दोनों अपने पूरे नाम वाले फोल्डर में रख दिए।
* * *
अपनी किताब में एक साल और लगा।
वह पुराने काम का नया कवर नहीं था।
अपने अधिकार वाले रिकॉर्ड और अब भी उपयोगी लगने वाले सवालों से निबंध दोबारा बनाए।
कुछ अध्याय वयस्क इंडियन रमी पर थे। कुछ याद, गलतियों और बाद में सुनाई उन कहानियों पर जिनसे अनिश्चितता भी कौशल लगती थी।
जिन बातों पर अब विश्वास नहीं था, हटाईं।
संपादन करने वाले ने एक पसंदीदा वाक्य पर सवाल किया। मीरा ने बहस की, दोबारा पढ़ा और बदल दिया।
कवर पर नाम होने से हर शब्द अच्छा नहीं हो जाता था।
संपादक के सवाल अलग फोल्डर में रखे। पहली बार काटने के सुझाव से असहमत हुई तो उत्तर में चिढ़ की उम्मीद की। इसके बजाय संपादक ने वजह बताई और दूसरा रूप माँगा। मीरा ने दो लिखे। साथ मिलकर दूसरा चुना। किसी और ने काम बेहतर करने में मदद की, फिर भी उस पर नाम उसका रहा। सीख रही थी कि दोनों बातें एक साथ हो सकती हैं।
उसे बेहतर बनाने की जिम्मेदारी उसकी हो सकती थी।
शीर्षक था, व्हाट आई रोट डाउन।
छपने से पहले अंतिम प्रूफ उसके पास आया।
शीर्षक पन्ना, आभार और लेखक का नाम देखा।
फिर एक बार और देखा।
रिलीज की सुबह नंदिनी ने लेखक प्रतियों के पास सूखी नीली कॉपी रखी।
“नए पन्ने।”
मीरा ने खोली।
पहला पन्ना खाली था।
इस बार वह नुकसान जैसा नहीं लगा।
* * *
हस्ताक्षर का आयोजन छोटी किताबों की दुकान में हुआ।
बड़े फूल नहीं थे। मंच नहीं था। कप तस्वीर से हटाने का निर्देश नहीं था। चाय बगल की मेज पर थी। लोग खुद ले सकते थे।
मीरा की जगह पर उसके नाम का कार्ड था।
पाठक ने हार वाले हिस्से पर सवाल किया।
मीरा ने उत्तर दिया।
किसी ने पुरुष लेखक का असली मतलब बताने के लिए बीच में नहीं टोका।
कतार आधी बढ़ी थी जब राघव दरवाजे पर दिखा।
किताब पकड़े कतार से बाहर था। अंबिका साथ नहीं थी।
नजर मिली तो उसने किताब हल्की उठाई, जैसे पुराने रिश्ते से प्रतीक्षा अनावश्यक हो जाए।
दुकानदार ने पास जाकर कतार का अंत दिखाया।
राघव ने कुछ कहा जो मीरा सुन नहीं सकी।
दुकानदार ने फिर वही दिशा दिखाई।
मीरा सामने की पाठिका की तरफ लौटी। वह काटे हुए वाक्यों से भरी कॉपी पकड़े थी।
“बार-बार विचार बदलती हूँ,” महिला ने कहा। “इसका मतलब लिखने लायक नहीं जानती?”
मीरा मुस्कुराई।
“वाक्य दिखाइए।”
महिला ने कॉपी खोली।
पीछे कतार एक-एक व्यक्ति आगे बढ़ती रही।
मीरा ने फिर देखा तो राघव दरवाजे पर नहीं था।
उसे नहीं पता था कि कतार में लगा या घर चला गया।
सामने का पन्ना ज्यादा दिलचस्प था।
वह उसकी तरफ झुकी और सुनने लगी।