निमंत्रण पर लिखा था—विशेष अतिथि।
होटल में नाम जाँच रहे आदमी ने निखिल सावंत की कलाई पर पीला बैंड बाँधा और सर्विस वाले गलियारे की तरफ इशारा किया।
“स्टाफ का खाना उधर है।”
निखिल ने कार्ड दिखाया।
आदमी ने पहले कार्ड देखा, फिर उसके बाएँ हाथ की उन दो उँगलियों को जो अब सीधी नहीं होती थीं।
“यहीं रुकिए। कोई लेने आ जाएगा।”
खुले दरवाज़ों से निखिल को हॉल में अपनी तस्वीर दिख रही थी।
तस्वीर में वह अस्पताल के बिस्तर पर लेटा था। बाँह पर पट्टी थी और विक्रम धर पास खड़े गुलदस्ता पकड़े हुए थे। तस्वीर इतनी बड़ी की गई थी कि धर की घड़ी लगभग निखिल के चेहरे जितनी लग रही थी।
नीचे लिखा था—हमारे लोग, हमारा परिवार।
निखिल ने कार्ड वापस लिफाफे में रख लिया।
आठ महीने पहले ऐसे कमरे में अपनी तस्वीर देखकर उसे गर्व होता।
आज उसे फाड़ देना चाहता था।
* * *
हादसा घाट नंबर सात पर हुआ था। निजी माल ढुलाई का वह घाट निखिल की ग्यारह साल पुरानी नौकरी की जगह था।
बारिश हो रही थी। भरी हुई ट्रॉली ढलान पर लुढ़कने लगी थी। मालिक का बेटा रोहन धर उसके रास्ते में खड़ा फोन देख रहा था।
निखिल चिल्लाया।
रोहन ने देर से सिर उठाया।
निखिल ने उसका कंधा पकड़कर किनारे धकेला। ट्रॉली और लोहे के खंभे के बीच निखिल की बाँह दब गई।
बाद में उसे रोहन का पास घुटनों पर बैठना याद था।
वह मदद नहीं कर रहा था। हिल भी नहीं रहा था।
बस कह रहा था, “पापा को मत बताना। प्लीज़।”
अस्पताल में फोटोग्राफर के सामने विक्रम धर ने निखिल का सही हाथ थामा।
“तुमने मेरे बेटे को बचाया। ऐसी बात हम भूलते नहीं।”
इलाज की व्यवस्था हुई। उसके अलावा कंपनी ने बारह लाख रुपये का पुरस्कार घोषित किया। पत्र में पहली बार निखिल का नाम भी ठीक लिखा था।
धर ने दूसरी तस्वीर के लिए वह पत्र उसके हाथ में पकड़ाया।
निखिल की पत्नी लीला गलियारे में रो पड़ी।
अब टपकती छत ठीक हो सकती थी। इलाज पूरा हो सकता था। हाथ कुछ सँभल गया तो शायद सबसे भारी काम वाली शिफ्टें छोड़ सकेगा।
उस शाम उसने लीला से वार्ड में बाँटने के लिए मिठाई लाने को कहा।
वह छोटा डिब्बा लाई।
उन्हें नहीं पता था कि कई महीनों तक उन बारह लाख में से उनके पास सिर्फ वही पत्र रहेगा।
* * *
पहले भुगतान मंजूरी का इंतज़ार कर रहा था।
फिर बताया गया, भेज दिया गया है।
फिर समायोजन की बात हुई।
निखिल पट्टियों समेत हिसाब विभाग पहुँचा।
प्रकाश नाम के कर्मचारी ने कंप्यूटर की स्क्रीन उसकी ओर घुमाई।
हिसाब पूरा।
“कहाँ पूरा?”
“आपकी बकाया रकम में समायोजित हुआ।”
“कौन-सी रकम?”
प्रकाश ने एक पन्ना निकाला। तीन भुगतान, तीन अलग नाम। कुल बारह लाख।
एक नाम पहचान में आया। महेश घाट के पास छोटा उधार का कारोबार करता था। दो साल पहले निखिल ने उससे बीस हजार लिए थे और लौटा दिए थे।
बाकी दोनों नाम अनजान थे।
“ये मेरे कर्ज़ नहीं हैं।”
प्रकाश ने आवाज़ धीमी की।
“यहाँ चिल्लाना मत शुरू करना।”
“मैं चिल्लाया नहीं।”
“तो चिल्लाना मत।”
अगली बार वह पहुँचा तो गार्ड को उसे दफ्तर तक न आने देने का आदेश था।
तीसरी बार तक पूरे घाट पर बात फैल गई थी।
निखिल ताश में पैसे हार गया।
थोड़े नहीं। सब।
उसे और चाहिए था। अच्छी-खासी रकम को बड़ा करने चला था। अब चाहता था कंपनी दो बार भुगतान करे।
जिन लोगों ने उसके डिब्बे से खाना खाया था, वे भी आँखें बचाने लगे।
एक सुपरवाइज़र ने दो मजदूरों के सामने कहा कि हाथ खराब होने का मतलब चरित्र खराब करने की छूट नहीं है।
निखिल लीला की सूची वाली दवा खरीदे बिना घर लौट आया।
* * *
लीला को अपनी बहन से पता चला।
बेटे के सोने तक उसने इंतज़ार किया।
“तुम हार गए थे?”
निखिल ने मेज़ से सिर उठाया।
“क्या?”
“पैसे।”
वह तुरंत समझ गया।
“नहीं।”
“तो हैं कहाँ?”
“बताया तो है। दिए ही नहीं।”
“वे कह रहे हैं तुम्हारा कर्ज़ चुकाया।”
“कौन वे?”
“इससे क्या फर्क पड़ता है?”
उसने कुर्सी पीछे खिसकाई। झटके से कलाई में दर्द उठा। दाँत भींचकर वह हाथ पर झुक गया।
लीला एक कदम बढ़ी, फिर रुक गई।
यह ज़्यादा चुभा।
एक हफ्ते तक दोनों सिर्फ खाने, दवा और स्कूल की बात करते रहे।
लीला सिलाई मशीन मुख्य कमरे में ले आई। रात को और देर तक काम करने लगी। वहीं बैठकर बेटे के पाठ पढ़ने की आवाज़ से कुछ ग्राहक परेशान होते।
निखिल नाश्ते से पहले घर छोड़ने लगा।
सुबहें वही फाइल लिए दफ्तरों के बाहर गुजरतीं।
मकान मालिक ने किराया पूछा तो लीला ने माँ की दी हुई बालियाँ बेच दीं।
निखिल को नहीं बताया।
उसने कानों पर बचे हल्के निशान देख लिए।
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* * *
घाट के गेट के पास बेंच पर यूसुफ कॉन्ट्रैक्टर ने उसे ढूँढ़ लिया।
यूसुफ तीस साल वहाँ माल की गिनती का काम कर चुके थे। सेवानिवृत्ति के बाद भी हर मैनेजर के कदमों की आवाज़ पहचानते थे।
“तुम्हारी पत्नी मेरे पास आई थी।”
निखिल सड़क देखता रहा।
“उसे लगता है मैं जुआ खेलता हूँ।”
“उसे लगता है उसके सवालों का कोई जवाब नहीं दे रहा।”
यूसुफ बैठ गए।
“दिखाओ।”
उन्होंने पुरस्कार का पत्र, भुगतान वाला पन्ना और निखिल की अनुत्तरित अर्जियों की प्रतियाँ पढ़ीं।
फिर महेश के बारे में पूछा।
अगले दिन निखिल पुरानी रसीद ले आया। उसमें अदायगी की प्रविष्टियाँ थीं। सबसे नीचे पूरा कर्ज़ चुकने की पुष्टि पर महेश के दस्तखत थे।
यूसुफ न मुस्कराए, न बोले कि मामला सुलझ गया।
“एक,” उन्होंने कहा। “बाकी दो भी देखने हैं।”
उन्होंने असली भुगतान संबंधी कागज़ माँगने की लिखित अर्जियाँ बनाने में मदद की। मजदूर सहायता कार्यालय से सलाह का इंतज़ाम भी किया।
कंपनी ने उत्तर दिया कि सारे भुगतान अनुमति से हुए हैं।
अनुमति की प्रति साथ नहीं थी।
निखिल ने फिर लिखा।
इस बार पुरस्कार पत्र पर दर्ज साझेदार संस्था—हार्बर सर्विसेज पार्टनरशिप—को भी प्रति भेजी।
पत्र मिलने की पुष्टि आई।
तीन दिन बाद निमंत्रण भी आ गया।
* * *
धर ने खुद फोन किया।
अस्पताल के बाद पहली बार।
“निखिल, सीधे मेरे पास आना चाहिए था।”
“कोशिश की थी।”
“अकाउंट्स वाले भी न। सुनो, शुक्रवार को सालाना कार्यक्रम है। आओ। ठीक से बात होगी।”
“पैसे की?”
“बिल्कुल। तुम हमारे खास मेहमान हो।”
निखिल ने यूसुफ को बताया।
यूसुफ के पास भी निमंत्रण था। कुछ पुराने कर्मचारियों को शाम की तीन पत्ती की मेज़ों पर बुलाया गया था।
“कागज़ ले जाना,” उन्होंने कहा। “असली किसी को मत दे देना।”
गुरुवार रात लीला ने निखिल की कमीज़ इस्त्री की।
नीली वाली, जो उसने उसके चचेरे भाई की शादी में पहनी थी। कॉलर मुलायम पड़ चुका था।
बिना बोले ढीला बटन टाँक दिया।
“मैं हारा नहीं था,” निखिल ने कहा।
इस्त्री से भाप निकली।
“जानती हूँ।”
उसने लीला को देखा।
“यूसुफ चाचा ने रसीद दिखाई।”
“मैंने कंपनी का पत्र दिखाया था।”
“उससे हर सवाल का जवाब नहीं मिला था।”
उसने इस्त्री खड़ी कर दी।
“मुझे तुमसे फिर पूछना चाहिए था। ठीक से।”
निखिल बिस्तर पर बैठ गया।
कुछ देर बाद उसने हाथ बढ़ाया।
निखिल ने अपना सही हाथ उसकी हथेली पर रख दिया।
* * *
होटल में आखिर एक जूनियर कर्मचारी उसे सर्विस वाले गलियारे में लेने आया।
“धर साहब स्टेज के पास बुला रहे हैं।”
“इसे उतार सकता हूँ?”
निखिल ने पीला बैंड उठाकर दिखाया।
लड़का असहज हो गया।
“इससे फर्क नहीं पड़ता।”
“पड़ता है।”
वह कैंची ले आया।
अंदर पेय की मेज़ के पास यूसुफ खड़े थे। उन्होंने प्रतियों वाली जेब छुई, फिर निखिल को निकलने की जगह दी।
धर मंच पर वफादारी की बात कर रहे थे।
पीछे अस्पताल वाली तस्वीर थी।
“हम सिर्फ माल नहीं सँभालते। जिम्मेदारी सँभालते हैं।”
तालियाँ बजीं।
फिर निखिल का नाम लिया गया।
वह तीन छोटी सीढ़ियाँ चढ़ा। बायाँ हाथ शरीर के पास था।
कैमरे के लिए धर ने उसके कंधे पर बाँह रख दी।
“इस आदमी ने मेरे बेटे को बचाया।”
फिर तालियाँ।
रोहन दूसरी पंक्ति में था। हादसे के बाद उसका वजन बढ़ गया था।
“हमने बारह लाख दिए, बेशक। आदमी को भरोसा होना चाहिए कि परिवार का खयाल रखा जाएगा।”
धर रुके।
कंधे पर उनकी पकड़ कस गई।
“दुर्भाग्य से अचानक आए पैसे सँभालना हर किसी के बस की बात नहीं। गलत संगत। गलत फैसले।”
तालियाँ थम गईं।
निखिल उनकी तरफ मुड़ा।
धर दर्शकों को देखते रहे।
“लेकिन गलती हो जाए तो हम अपने लोगों को छोड़ते नहीं।”
उन्होंने लिफाफा उठाया।
“दस हजार और। नई शुरुआत के लिए छोटी मदद।”
किसी ने हिचकते हुए ताली बजाई।
निखिल ने लिफाफा नहीं लिया।
धर उसके कान के पास झुके।
“ऐसा मत करो।”
“पहली रकम तो आपने दी नहीं।”
माइक्रोफोन दोनों के बीच था।
आवाज़ ऊँची करने की ज़रूरत नहीं पड़ी।
* * *
धर हँस दिए।
“अभी तक अकाउंट्स से बहस कर रहा है।”
“तो उनसे मेरी अनुमति दिखाने को कहिए।”
“अकेले में बात कर लेंगे।”
“मैंने पैसे गँवाए, यह आपने अकेले में नहीं कहा।”
सामने एक कुर्सी खिसकी।
धर ने लिफाफा नीचे किया।
रोहन खड़ा हुआ।
“पापा, बस—”
“बैठो।”
मंच के किनारे गहरे हरे रंग की साड़ी पहने महिला बोली।
“यह समायोजन समझना चाहूँगी।”
निमंत्रण पुस्तिका से निखिल को उनका नाम याद था। नंदिता राव, साझेदार संस्था की प्रतिनिधि।
धर माइक्रोफोन से हटे।
“पुराने कर्मचारी का मामला है। थोड़ा अप्रिय है, लेकिन निपट चुका है।”
“पुरस्कार की मंजूरी पर मैंने दस्तखत किए थे,” उन्होंने कहा। “श्री सावंत की भुगतान संबंधी शिकायत भी मेरे पास है।”
उस शाम पहली बार धर किसी को बिना मुस्कराए देख रहे थे।
“ज़रूरी रिकॉर्ड माँगने के लिए मामला आपके कार्यालय भेजा था। अभी तक मिले नहीं।”
प्रकाश पतली फाइल लेकर उनकी तरफ आ रहा था।
कागज़ थे।
बस निखिल के लिए नहीं थे।
* * *
धर ने बैठने का सुझाव दिया।
दफ्तर में नहीं। शाम के लिए लगी ताश की एक मेज़ पर।
शायद उन्हें लगा खेल के बीच बात कम गंभीर दिखेगी।
“अच्छी शाम खराब न करें। ये लोग मामला जानते हैं।”
तीन आदमी आकर बैठ गए।
उनमें महेश भी था।
वह निखिल के सामने बैठा और अपनी आस्तीन देखने लगा।
ताश के पास शाम की मेज़ों की छपी सूची थी। शामिल होने की कोई रकम नहीं थी। पुरस्कार मेजबानों ने रखे थे।
धर ने निखिल की तरफ गोटियों का ढेर सरकाया।
“हमारी तरफ से।”
निखिल ने हाथ नहीं लगाया।
यूसुफ कुर्सी खींचकर बैठ गए।
धर ने भौंहें चढ़ाईं।
“यह आपका मामला नहीं है।”
“अर्जी लिखने में मैंने मदद की।”
नंदिता मेज़ के सिरे पर बैठीं।
आसपास मेहमान दूसरी चीज़ों में दिलचस्पी होने का नाटक कर रहे थे।
संगीत कुछ देर बजता रहा। फिर किसी ने धीमा कर दिया।
प्रकाश ने फाइल खोली।
“श्री सावंत ने अपने लेनदारों को सीधे भुगतान करने को कहा था।”
“वह अर्ज़ी दिखाइए,” निखिल बोला।
प्रकाश ने दस्तावेज़ निकाला।
नीचे दस्तखत थे।
निखिल ने देखा।
“मेरे नहीं हैं।”
धर ने ज़ोर से साँस छोड़ी।
“अब यह भी होगा।”
नंदिता ने हाथ बढ़ाया।
“देख सकती हूँ?”
उन्होंने दस्तावेज़ और भुगतान सूची पढ़ी।
“किसे कितनी रकम मिली?”
प्रकाश बताने लगा।
यूसुफ ने पुरानी रसीद मेज़ पर रख दी।
“महेश से शुरू कीजिए।”
* * *
महेश ने चश्मा ढूँढ़ने में ज़रूरत से ज़्यादा समय लिया।
“यह दूसरा उधार था।”
“कब दिया?”
उसने एक महीना बताया।
निखिल ने सिर हिलाया।
“कहाँ दिए थे?”
“तुम्हारे घर।”
“कौन-से घर?”
“पुराने वाले।”
निखिल नौ साल से उन्हीं किराए के कमरों में था।
महेश ने प्रकाश की ओर देखा।
“बाज़ार के पास।”
“कितने दिए?”
उत्तर प्रकाश ने दिया।
नंदिता ने सिर उठाया।
“मैंने रकम पाने वाले से पूछा।”
महेश ने सूची में लिखी रकम बताई।
“पुराना उधार?” यूसुफ ने पूछा।
“चुक गया था।”
“फिर उसका रसीद नंबर यहाँ क्यों है?”
कोई नहीं बोला।
निखिल ने वह बात नहीं देखी थी। यूसुफ ने शाम से पहले प्रतियाँ मिलाते समय देख ली थी।
महेश ने कागज़ लेना चाहा।
यूसुफ ने दो उँगलियाँ रख दीं।
“यहीं पढ़ लीजिए।”
प्रकाश बोला, लिखने की गलती हो सकती है।
नंदिता ने नोटबुक में कुछ लिखा।
“तो मूल रिकॉर्ड चाहिए होंगे।”
दूसरे आदमी ने कहा कि सब बिचौलिये ने किया।
तीसरे ने कहा कि वह निखिल से कभी मिला ही नहीं।
धर झुँझलाए। कर्मचारी दूसरे लोगों के जरिए उधार लेते रहते हैं।
“बिल्कुल,” नंदिता ने कहा। “उसका रिकॉर्ड भी होना चाहिए।”
निखिल घायल हाथ मेज़ के नीचे रखे बैठा था।
उसने सोचा था वह चिल्लाएगा।
अभी वह सुन रहा था। जो आदमी उसके कर्ज़ को लेकर इतने निश्चित थे, हर सवाल के साथ कम निश्चित हो रहे थे।
* * *
रोहन पास आया।
“पापा, बहुत हो गया।”
धर उसकी तरफ मुड़े।
“तुम बीच में मत पड़ो।”
“इसने कुछ माँगा भी नहीं था।”
“कहा न, दूर रहो।”
निखिल ने रोहन को देखा।
ट्रॉली के पास वाली डरी आवाज़ याद आई।
पापा को मत बताना।
“जब मुझे चोट लगी,” निखिल बोला, “तुमने कहा था उन्हें मत बताना कि तुम रास्ते में खड़े थे।”
रोहन का चेहरा बदल गया।
धर कुछ बोलने लगे।
निखिल बेटे को देखते हुए कहता रहा।
“अखबार वाले को नहीं बताया। तुमसे पैसे नहीं माँगे। यह भी नहीं पूछा कि उसके बाद अस्पताल क्यों नहीं आए।”
“निखिल—”
“लेकिन मंच पर तुमने सुना। बैठे रहे।”
रोहन ने आँखें नीचे कर लीं।
मेज़ पर सब रुके रहे।
फिर वह नंदिता की तरफ मुड़ा।
“घाट की रिपोर्ट भी देखिए। मैं ट्रॉली के सामने था। इसने हटाया था।”
धर ने कुर्सी पीछे धकेल दी।
“अब तमाशा बन रहा है।”
निखिल ने अस्पताल की बड़ी तस्वीर देखी।
“मंच तो आपने लगवाया था।”
* * *
नंदिता ने निखिल को चेक नहीं पकड़ा दिया।
न किसी गिरफ्तारी की घोषणा की, न हॉल में किसी को नौकरी से निकाला।
प्रतियाँ माँगीं। विवादित कागज़ दर्ज किए। कहा कि साझेदार संस्था भुगतान की स्वतंत्र जाँच कराएगी।
उन्होंने यह भी कहा कि संस्था के नाम पर निखिल के कथित जुए के नुकसान की और बातें न की जाएँ।
धर ने शाम फिर शुरू करने की कोशिश की।
कुछ लोग दूसरी मेज़ों की ओर खिसक गए।
निखिल के सामने की गोटियाँ किसी ने नहीं छुईं।
बाहर निकलते समय महेश ने उसकी आस्तीन पकड़ी।
“मेरा वाला हिस्सा आपस में निपटा सकते हैं।”
निखिल उसके हाथ को देखता रहा। महेश ने छोड़ दिया।
“लिखकर भेजना।”
बाहर यूसुफ ने उसे ऑटो में बैठाया।
तभी निखिल काँपने लगा।
“लगा था हँसेंगे,” उसने कहा।
यूसुफ ने फाइल घुटनों पर रखी।
“हँसे थे।”
निखिल ने आँखें बंद कर लीं।
“हाँ।”
“फिर बंद हो गए।”
* * *
जाँच ग्यारह हफ्ते चली।
कागज़ माँगे गए। बातचीत हुई। तारीखें टलीं। दो सुबह ऐसी आईं जब निखिल को लगा कुछ नहीं होगा।
इलाज चलता रहा।
लीला सिलाई करती रही।
कुछ बताने लायक होता तो नंदिता का कार्यालय लिखित जानकारी भेजता। यूसुफ उस भाषा को पढ़ने में मदद करते जिसके सामने निखिल खुद को मूर्ख समझने लगा था।
नतीजे सिर्फ ताश की मेज़ वाली बातचीत पर निर्भर नहीं थे।
भुगतान के रिकॉर्ड, मूल दस्तावेज़ और पूछताछ से सामने आया कि पुरस्कार की रकम निखिल के वैध निर्देश के बिना दूसरी तरफ भेजी गई थी। पुराना उधार चुक चुका था। बाकी कथित देनदारियों का समर्थन नहीं मिला।
साझेदार संस्था ने पूरा पुरस्कार उसे दिलाने की व्यवस्था कराई। संबंधित लोगों और लेनदेन पर अलग प्रक्रिया शुरू हुई।
निखिल के खाते में पुष्टि के साथ भुगतान आ गया।
बारह लाख।
उसने तीन बार देखा।
फिर लीला को फोन किया।
कई पल दोनों नहीं बोले।
“दवा खरीद लेना,” उसने आखिर कहा।
निखिल हँस पड़ा।
लीला रोने लगी।
* * *
घाट नंबर सात की कर्मचारी बैठक में सुधार वक्तव्य पढ़ा गया।
निखिल यूसुफ के साथ पहुँचा।
कमरे में गीली रस्सी और चाय की गंध थी। कुर्सियाँ कम थीं, कुछ लोग पीछे खड़े थे।
लिखित वक्तव्य में कहा गया कि निखिल के पुरस्कार की रकम जुए में खोने की बातें निराधार थीं। रकम शुरू में उसे बताए गए ढंग से मिली ही नहीं थी।
निष्कर्षों पर आगे कार्रवाई के दौरान विक्रम धर अब घाट के ठेके की निगरानी नहीं कर रहे थे।
नोटिस बोर्ड से उनकी तस्वीर हट चुकी थी।
चरित्र पर भाषण देने वाला सुपरवाइज़र फर्श देख रहा था।
बाद में वह पास आया।
“बात गड़बड़ा गई थी।”
निखिल इंतज़ार करता रहा।
“मुझे वह नहीं कहना चाहिए था।”
“नहीं,” निखिल बोला। “नहीं कहना चाहिए था।”
उसने आदमी को घुटनों पर नहीं बैठाया। मारा नहीं।
बस वह आसान माफी नहीं दी जिसे लेने वह आया था।
* * *
होटल वाली शाम के छह महीने बाद निखिल एक डिस्पैच कार्यालय में काम कर रहा था, जहाँ उसके हाथ के अनुकूल काम था।
काम अलग था। वेतन भी। मुश्किल सुबहें अब भी आती थीं।
पुरस्कार से चोट गायब नहीं हुई थी।
लेकिन छत अब नहीं टपकती थी।
लीला की सिलाई मशीन के लिए अलग कमरा था। तैयार कपड़ों की अलमारियाँ ऊँची थीं, बेटे की स्कूल की चीज़ों से दूर।
उन्होंने बेची हुई बालियों की जगह नई लीं।
लीला ने अलग डिजाइन चुना।
एक रविवार रोहन उनके घर आया।
मिठाई लेकर बाहर खड़ा रहा। निखिल ने बुलाया, तब अंदर आया।
“डर गया था,” उसने कहा।
“हादसे में?”
“होटल में भी।”
निखिल ने सही हाथ से चाय डाली।
“मैं भी।”
रोहन ने सिर हिलाया।
तस्वीर नहीं खींची गई।
उसके जाने के बाद लीला दराज साफ करते समय मिला छोटा लिफाफा लाई।
निमंत्रण।
विशेष अतिथि।
“रखना है?” उसने पूछा।
निखिल ने कार्ड निकाला।
पीछे पीला बैंड भी था। उसे भी रख लिया था।
कुछ देर दोनों को देखा। फिर खाली लिफाफा बेटे को स्कूल के काम के लिए दे दिया।
कार्ड और बैंड सुधार वक्तव्य और भुगतान की पुष्टि वाली फाइल में गए।
दीवार पर नहीं।
नई अलमारियों के ऊपर लीला के जन्मदिन की पारिवारिक तस्वीर लगी थी।
निखिल बीच में बैठा था।
उसके दोनों हाथ दिख रहे थे।