Ind Bingo — जिस सीट के पैसे उसने दिए थे
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Ind Bingo — जिस सीट के पैसे उसने दिए थे

काल्पनिक कहानी · पात्र और घटनाएँ कहानी का हिस्सा हैं।

रचना ने औरत को पहचानने से पहले सीटों के नंबर पहचान लिए। ब्लॉक सी। ग्यारहवीं कतार। तेईस और चौबीस। तृषा की डाली हुई तस्वीर में भूरे हैंडबैग से दो टिकट बाहर…

रचना ने औरत को पहचानने से पहले सीटों के नंबर पहचान लिए।

ब्लॉक सी। ग्यारहवीं कतार। तेईस और चौबीस।

तृषा की डाली हुई तस्वीर में भूरे हैंडबैग से दो टिकट बाहर झाँक रहे थे। बैग के पीछे साकेत शोर में कुछ कहने के लिए उसकी तरफ झुका था। उसका हाथ तृषा की सीट की पीठ पर रखा था।

उन दो टिकटों के लिए रचना ने दस महीने तक हर महीने अठारह सौ रुपये अलग रखे थे।

अपने बिस्तर पर नीली कमीज पड़ी थी। साकेत ने वही पहनने को कहा था, भीड़ में पहचानना आसान रहेगा। दो बजे पहनी, तीन बजे गर्मी के कारण उतार दी। फिर उसका संदेश आया कि बस पहुँच रहा है, तो दोबारा पहन ली।

अब चार बजकर सत्रह मिनट हो रहे थे। दूसरे कमरे के टेलीविजन पर टीमें मैदान में उतर रही थीं।

* * *

उसने एक बार फोन किया। साकेत ने काट दिया। दूसरी बार उठाया तो माइक पर हाथ रख लिया। रचना उस दबी हुई आवाज को जानती थी। वह ग्राहक से ऐसी बात करते समय यही करता था जो बाकी कमरे को नहीं सुनानी हो।

“कहाँ हो?”

“अंदर। बताया तो था, ट्रैफिक बहुत था।”

“चौबीस पर कौन बैठी है?”

उसने तुरंत जवाब नहीं दिया। फिर बोला, “अभी शुरू मत हो जाना।”

रचना ने तस्वीर फिर देखी। तृषा ने लिखा था—कुछ सरप्राइज इंतजार के लायक होते हैं। जन्मदिन की पोस्ट के लिए ऐसे शब्द चुनने में रचना पहले साकेत की मदद करती रही थी।

“उस सीट के पैसे मैंने दिए हैं।”

“और टिकट मुझे दिए थे।”

“हमारे लिए।”

पीछे भीड़ की आवाज उठी। उसने कहा, सुनाई नहीं दे रहा। फिर फोन काट दिया, जबकि रचना ने आगे कुछ कहा ही नहीं था।

* * *

क्षेत्रीय फाइनल का मैदान घोषित होने के बाद से साकेत वहाँ जाना चाहता था। विज्ञापन निर्माण के काम में था। क्रिकेट के आसपास छोटे कार्यक्रम और साक्षात्कार करवाता था। घर पर सब देखता—मैच, सट्टे पर बहस, भविष्यवाणियों पर झगड़े और भविष्यवाणी करने वालों से झगड़ते लोग।

रचना को खेल पसंद था, उसके आसपास का सारा शोर नहीं। उसे मैच से पहले काम करते मैदान के कर्मचारी, शटर उठाते दुकानदार और टिकट कसकर पकड़े बच्चे कैमरे में लेने अच्छे लगते थे।

शादी से पहले स्कूलों के कार्यक्रम खींचती और शादियों में दूसरे फोटोग्राफरों की सहायक होती थी। बाद में ज्यादातर काम घर पर दूसरों की तस्वीरें ठीक करने का रह गया। साकेत कहता, उसके बदलते समय के साथ यही सुविधाजनक है।

पुराने कैमरे का लेंस बदलना था। पहले उसी के लिए बचत शुरू की थी। फिर साकेत ने कहा था कि इस फाइनल की याद बुढ़ापे तक रहेगी।

रचना ने पैसे रखने वाले लिफाफे पर लिखा नाम बदल दिया। लेंस की जगह टिकट। उसे लगा था, यह फैसला वे दोनों साथ कर रहे हैं।

* * *

सास कुसुम मटर का कटोरा लेकर कमरे में आईं।

“अंदर पहुँच गया? अच्छा हुआ। नहीं तो शुरुआत छूट जाती।”

रचना ने फोन आगे कर दिया। कुसुम ने देखा। फिर गौर से देखा।

“यह तो उसके दफ्तर की लड़की है।”

“पता है।”

“तो परेशान क्यों हो? उनके काम में यह सब होता है।”

रचना ने पूछा, उसकी जगह किसी और को ले जाना भी काम में होता है क्या?

कुसुम ने कटोरा बिस्तर पर रख दिया। एक मटर तकिए की तरफ लुढ़का। जवाब देने से पहले उसे पकड़ लिया।

“कम से कम मैच तो खत्म होने दो। कितने समय से जाना चाहता था।”

बैठक में किसी ने टेलीविजन की आवाज बढ़ा दी। कुसुम ने पूछा, चिकन तैयार कर दिया है? साकेत लौटेगा तो भूखा होगा।

* * *

रचना ने रसोई में फ्रिज खोला। शादी के बाद खरीदे स्टील के डिब्बे में मसाला लगा चिकन रखा था। पास में पानी की दो छोटी बोतलें थीं, जिन्हें रास्ते के लिए ठंडा किया था। उसने एक निकाली और खड़े-खड़े पानी पी लिया।

फिर दोस्त शबनम को फोन किया।

“तुम्हारे यहाँ आ सकती हूँ?”

“अभी?”

“हाँ।”

“आ जाओ।”

शबनम ने किसी सुविधाजनक विराम तक इंतजार करने को नहीं कहा।

रचना ने कपड़े, अपने कागज और कैमरा रखा। नीली कमीज ऊपर रखने पर बैग बंद नहीं हुआ। उसने कमीज निकाली, पहन ली और जिप खींच दी।

कुसुम दरवाजे पर खड़ी थीं।

“एक क्रिकेट मैच पर घर छोड़ रही हो?”

रचना ने एक बार समझाने की कोशिश की। वह तैयार होकर इंतजार कर रही थी। उसके पति ने उसी के पैसों की सीट पर दूसरी औरत बैठा दी थी।

कुसुम ने कहा, पड़ोसियों को इतना फर्क नहीं समझ आएगा। रचना बैग लेकर उनके पास से निकल गई।

* * *

ऑटो में तृषा का आवाज वाला संदेश आया। शुरुआत में कहा कि साकेत ने समझाने को कहा है। कोई गलतफहमी हुई है। रचना की तबीयत खराब थी, ऐसा उसे बताया गया था। एक अतिरिक्त टिकट था।

रचना ने उसी दोपहर दो बजे की तस्वीर भेजी। नीली कमीज में, मैच पर जाने को तैयार। साकेत कहाँ तक पहुँचा है, पूछते समय उसे भेजी थी।

साथ में अपनी बात भी रिकॉर्ड की। तृषा ने सुन ली। फिर लिखा—यह बात उन्हीं से सुलझा लो। मैं तो यहाँ आ चुकी हूँ।

रचना ने टाइप करना बंद कर दिया। ड्राइवर ने पूछा, शबनम की इमारत के किस दरवाजे पर जाना है? उसने नंबर बताया। दुकान की खिड़की के पीछे टेलीविजन पर वही भीड़ दिख रही थी जिसमें वह खुद को सोचती रही थी।

अगला संदेश आने से पहले फोन अपनी गोद में उलटा रख दिया।

* * *

मैच के बाद साकेत शबनम के घर आया। साथ में कार्यक्रम की पुस्तिका लाया था। बोला, उसके लिए उठाई थी। मेज पर ऐसे रखी जैसे उससे शाम ठीक हो जानी चाहिए।

रचना ने छुआ नहीं।

पहले उसने कहा, तृषा को ले जाना काम की मजबूरी बन गई थी। फिर कहा, रचना को भीड़ हमेशा बुरी लगती है। फिर कहा, जानता था वह ऐसे ही करेगी, इसलिए सीधे नहीं बताया।

“मतलब जानते थे कि मैं इंतजार कर रही हूँ।”

उसने माथा रगड़ा।

“जानता था तुम मुश्किल कर दोगी।”

रचना ने तृषा की कुर्सी पर रखे हाथ का पूछा। बोला, एक तस्वीर की कहानी बना रही है। शबनम ने उसके पास पानी रखा। उसने उतनी सहज गर्मजोशी से धन्यवाद दिया जितनी उन लोगों के लिए बचाता था जिनकी अच्छी राय चाहिए हो।

वह आवाज सुनकर रचना अचानक बहुत थक गई।

“आज घर नहीं आऊँगी।”

“तो कल।”

“कल भी नहीं कहा मैंने।”

* * *

अगला हफ्ता फैसला महँगा पड़ने की बातें सुनते बीता। किराया, जमा रकम, रिश्तेदार क्या कहेंगे, बरसों घर पर रहने के बाद काम कैसे मिलेगा। दस महीने की छोटी बचत कोई नहीं गिनता था क्योंकि टिकट इस्तेमाल हो चुके थे।

उसने खुद गिने। कमरे के खर्च और खाते में बची रकम के साथ एक पन्ने पर लिखे।

साकेत ने अठारह हजार लौटाने की पेशकश की, अगर वह लोगों को घटना बताना बंद कर दे। रचना ने कहा, रकम लौटाना और चुप रहना अलग बातें हैं। उसने पेशकश वापस ले ली।

अलग रहने और पैसों के बारे में सलाह लेना शुरू किया। कागज थे, खर्च था, लंबा समय था जिसमें कुछ आगे बढ़ता नहीं दिखता था। एक पारी के बीच निकल जाने से तलाक नहीं हो गया। उसमें समय लगा और कई ऐसी बातचीत हुईं जिनसे वह डरती थी।

उस दोपहर इतना बदल गया था कि अब साकेत उसे घर पर इंतजार करवाकर यह तय नहीं कर सकता था कि उसकी जगह कहाँ है।

* * *

काम पर ले जाते समय कैमरा याद से ज्यादा भारी लगा। अल्ताफ, जिनके साथ वह बरसों पहले काम कर चुकी थी, को स्कूल के खेल दिवस के लिए दूसरा व्यक्ति चाहिए था। उन्होंने हाल की तस्वीरें माँगीं। रचना ने पुराना काम भेजा और साफ लिखा कि कब लिया गया था।

एक भुगतान वाला मौका मिला। पूरे करियर का वादा नहीं।

जगह बदलते समय एक दौड़ का अंत छूट गया। एक पिता की तस्वीर अच्छी आई, जो बेटी के जूते पकड़े खड़े थे क्योंकि प्रदर्शन वाली दौड़ में वह नंगे पैर भागना चाहती थी। अच्छी तस्वीर अच्छी थी। छूटा हुआ दृश्य फिर भी मायने रखता था।

अल्ताफ ने तय पैसे दिए और दोनों बातें बताईं।

“ऐसा काम और करना है तो चयन आज रात भेज देना।”

वह रात एक बजे तक काम करती रही। शबनम ने रसोई में प्लेट ढककर रख दी। इस बार आयोजन पर जाने वाले के लिए उसे खाना बनाने को नहीं कहा गया।

* * *

कुछ समय काम में कोई चमक-दमक नहीं थी। स्कूल की तस्वीरें, स्टेशनरी की दुकान के सामान की तस्वीरें, एक शादी जहाँ कोई चाचा बार-बार कैमरा रखकर कुर्सियाँ लगवाने को कह रहे थे।

उसने आयोजन स्थल के कर्मचारियों की तरफ इशारा किया और काम करती रही। बाद में आवाज काँपी, जब किसी को सुननी नहीं थी।

एक भुगतान से लेंस नहीं बदला जा सकता था। जिस काम में खर्च उचित होता, उपकरण किराए पर लेती। खर्च लिखती। दो बार उम्मीद से कम बचा। एक काम मना किया क्योंकि फीस से उसकी जरूरतें भी पूरी नहीं होतीं।

किसी दोस्त से साकेत को स्कूल वाले काम का पता चला। उसने लिखा—इतना सब करके बच्चों की तस्वीरें?

रचना ने संदेश तब पढ़ा जब एक अभिभावक प्रिंट चुन रहा था। उसने छह तस्वीरें लीं, पैसे दिए और दूसरे कार्यक्रम की उपलब्धता पूछी।

रचना ने सामने खड़े व्यक्ति को जवाब दिया।

* * *

क्रिकेट का पहला काम मैदान के बाहर मिला। छोटी पत्रिका को मैच वाले दिनों के अस्थायी कारोबार की तस्वीरें चाहिए थीं। रचना ने कैमरा निकालने से पहले दो सुबह दुकानदारों से बात की।

नींबू पानी बेचने वाली महिला ने पूछा, हर फोटोग्राफर उसे थकी हुई क्यों दिखाना चाहता है?

रचना ने कैमरा नीचे किया।

“आप कैसी तस्वीर चाहती हैं?”

“पहले लगाने तो दो सब।”

तैयार होने पर वह व्यवस्थित काउंटर के पास खड़ी हुई। साफ कपड़ा था। हाथ से लिखा दाम का बोर्ड था। रचना ने उसकी पसंद की तस्वीर ली। फिर पेय तैयार करते हाथों की तस्वीर की अनुमति माँगी।

संपादक पारोमिता ने दोनों इस्तेमाल कीं। तीन अधिक नाटकीय तस्वीरें खारिज भी कीं, क्योंकि उनके नीचे का विवरण रचना ने ठीक से जाँचा नहीं था।

छपी सामग्री पर उसका नाम था। अल्ताफ को प्रति भेजी। जवाब में टेढ़े क्षितिज की बात आई। नीचे लिखा था—अच्छा काम। करती रहो।

* * *

उस फाइनल के चौदह महीने बाद पारोमिता ने उसी मैदान में नया टूर्नामेंट तैयार करने वाले लोगों पर फीचर दिया। आयोजक के जरिए जल्दी प्रवेश की व्यवस्था थी, लेकिन कार्यक्रम की अनुमति प्रक्रिया पूरी करनी थी।

रचना ने जरूरी चीजें भेजीं और पुष्टि होने से पहले कोई योजना नहीं बनाई। स्वीकृति का ईमेल अपने किराए के कमरे में पढ़ा। तब तक अलगाव की प्रक्रिया तलाक तक पहुँच चुकी थी। कैमरे का लेंस शुरू में चाहा हुआ नहीं था, लेकिन अपना था और काम करता था।

कई मिनट उसने मना करने के बारे में सोचा। पुरानी तस्वीर देखे बिना सीट नंबर दिख जाते थे। साकेत के फोन के पीछे भीड़ सुनाई देती थी। कुसुम की आवाज आती थी—मैच तो खत्म होने दो।

फिर काम का विवरण खोला। पारोमिता को बारह अंतिम तस्वीरें और सही जानकारी चाहिए थी। फीस, तारीखें और प्रवेश की सीमाएँ लिखी थीं।

रचना ने उस काम का जवाब दिया जो उसे मिला था।

* * *

मैदान पर उसके नाम का पहचान-पत्र मिला। संयोजक ने बताया कहाँ काम कर सकती है, कहाँ नहीं। वह व्यक्तिगत था, किसी को दिया नहीं जा सकता था और उससे मेहमानों का प्रवेश नहीं मिलता था।

उसने नियम काम के विवरण वाली जेब में रख लिए। स्टैंड में कर्मचारी सीटों की धूल साफ कर रहे थे। बिना ढूँढ़े ब्लॉक सी मिल गया। ग्यारहवीं कतार खाली थी। तेईस नंबर की पीठ पर छोटा निशान था, जो तृषा की तस्वीर में दिख ही नहीं सकता था।

उसने उसकी तस्वीर नहीं ली।

सफाई कर्मचारी ने पूछा, बाल्टी हटानी है? रचना ने मना किया। फीचर समझाया और काम करते हुए तस्वीर लेने की अनुमति माँगी। वह तैयार था, लेकिन पहले टोपी पहनना चाहता था। रचना रुकी रही।

उस मैदान के अंदर उसकी पहली तस्वीर में बाल्टी, टोपी और सुबह की रोशनी की पट्टी थी। उसमें कोई साकेत का इंतजार नहीं कर रहा था।

* * *

दो दिन बाद उसका फोन आया। रचना शायद नहीं उठाती, लेकिन काम की व्यवस्था के लिए दूसरे नंबरों से कॉल आ रहे थे। नाम ठीक से पढ़ने से पहले उठा लिया।

“सुना टूर्नामेंट कर रही हो।”

उसने कहा, फीचर पर काम कर रही है। उसने पूछा, कहाँ तक जाने की अनुमति है? रचना ने जरूरी बात बताई—केवल अपने काम के लिए।

“आराम से। पूछ ही रहा हूँ।”

उसने कहा, ग्राहक आखिरी मैच देखना चाहता है। टिकट की उम्मीद थी, इंतजाम बिगड़ गया। शायद रचना किसी से बात कर सके।

“मैं टिकट नहीं दिलाती।”

“वहाँ लोगों को जानती तो होगी अब।”

“तस्वीरें लेने जाती हूँ।”

झुँझलाहट की छोटी हँसी के साथ उसने फोन बंद किया। रचना ने संयोजक को लिखकर स्पष्ट कर दिया कि उसके काम के तहत कोई सहायक या मेहमान नहीं आ रहा। फिर पारोमिता के पूछे तस्वीरों के विवरण पर लौट गई।

* * *

काम के आखिरी दिन किराए के उपकरणों का दूसरा बैग लेकर पहुँची। अनुमति जाँचने वाली मेज के पास साकेत खड़ा था। साथ में करीने से इस्तरी की हुई लिनन कमीज पहने आदमी था।

रचना आधे सेकंड को रुकी। साकेत ने देखकर हाथ उठा दिया।

“आ गईं। हम साथ काम करते हैं।”

आदमी राहत से मुस्कराया। कर्मचारी ने सूची देखी।

“आपके साथ दो लोग आने वाले हैं?”

“नहीं।”

साकेत पास आ गया।

“बस ठीक करवा दो। इतनी दूर से आए हैं।”

आदमी दोनों को देख रहा था। रचना समझ रही थी कि साकेत उससे कौन-सी सफाई चाहता है। छोटी गलती, आपसी समझ, मदद करती औरत, जब तक असुविधाजनक तथ्य गायब न हो जाएँ।

उसने भारी बैग नीचे रख दिया, ताकि बोलते समय साँस न सँभालनी पड़े।

* * *

“ये मेरे साथ काम नहीं करते,” उसने कर्मचारी से कहा। “मेरे काम के तहत कोई मेहमान नहीं है।”

साकेत ने अलग बात करने को कहा। रचना ने कहा, कर्मचारी को सूची के बारे में सही जवाब चाहिए। वह जवाब निजी नहीं है।

उसने आवाज धीमी की।

“दस मिनट पास दे दो। तुम बाद में आ जाना।”

कर्मचारी ने सुन लिया। फिर समझाया कि पहचान-पत्र उधार नहीं दिया जा सकता। जो वैध टिकट विकल्प हों, उनके लिए सार्वजनिक काउंटर पर जाने को कहा।

रचना ने नियमित जाँच के लिए अपनी पहचान दी। साकेत अब ऊँची आवाज में कहने लगा कि शुरुआत में उसने रचना की मदद की थी। ग्राहक ने पूछा, उनका प्रवेश वास्तव में किसी से तय किया भी था?

इस बार रचना अगली कहानी सुनने को नहीं रुकी। कर्मचारी ने पहचान वापस कर दी। उसने बैग उठाया और अपने लिए निर्धारित प्रवेश से अंदर चली गई।

* * *

अंदर हाथ इतने काँप रहे थे कि एक ही सेटिंग दो बार जाँची। अधिकृत कार्यक्षेत्र में बैग रखा, पानी पिया और बाकी तस्वीरों की सूची पढ़ी। झगड़े की तस्वीरें नहीं बनाईं। उसे पूर्व पति की बहस हारने की घटना दर्ज करने का काम नहीं मिला था।

दूसरे लोग उसके काम करने का इंतजार कर रहे थे।

बाहर के अनुमति प्राप्त हिस्से में नींबू पानी वाली ने पहचान लिया। खाना पूछा। रचना ने पेय खरीदा और कहा, विराम में खाएगी।

“सब यही कहते हैं। फिर बर्फ पिघल जाती है और दिन निकल जाता है।”

रचना ने आगे काम करने से पहले खाना खरीदा। फोन में साकेत के संदेश थे। उसने उस बातचीत की सूचनाएँ बंद कीं और एक अपुष्ट विवरण के बारे में पारोमिता को फोन किया।

* * *

फीचर अगले हफ्ते छपा। पारोमिता ने रोशनी से भरे रास्ते में बाल्टी लिए सफाई कर्मचारी की तस्वीर शुरुआत में चुनी। रचना को दूसरी तस्वीर की उम्मीद थी। संपादक ने वजह समझाई। रचना ने फिर देखा और समझ गई।

भुगतान आ गया। उपकरण के किराए और बाकी खर्चों के बाद कमरे का किराया भर सकती थी, अगले महीने के लिए कुछ अलग भी रख सकती थी। कर्मचारी और नींबू पानी वाली को वादे की प्रतियाँ भेजीं।

अल्ताफ ने दूसरे काम के लिए फोन किया। तारीख माता-पिता से मिलने की योजना से टकरा रही थी। रचना ने दूसरा दिन सुझाया। उन्होंने मान लिया।

शाम को दराज के पीछे नीली कमीज मिली। एक बटन ढीला था। कम काम वाले किसी दिन के लिए छोड़ने के बजाय ठीक से सिल दिया।

अगली सुबह नए ग्राहक से मिलने वही पहनकर गई। उसने रविवार के कार्यक्रम की तस्वीरें लेने को पूछा तो रचना ने डायरी खोली। वहाँ पहले से लिखा था—शबनम के साथ मैच देखना है।

दोनों का एक-एक टिकट। दोनों ने अपना खुद खरीदा था।

“शनिवार खाली है,” रचना ने कहा।

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