बेंच के पास बच्चों की गाड़ी नहीं आ रही थी।
अदिति ने घुमाई, स्वागत कक्ष जाते आदमी से माफी माँगी और दीवार की तरफ कर दी।
दस महीने का कबीर सो रहा था।
वह वयस्क इंडियन रमी समूह में वापसी की बात करने आई थी। बच्चे को खेल में लाने नहीं। अभ्यास से पहले प्रशासन ने मिलने का समय दिया था। पति को वहीं आकर बेटे को घर ले जाना था।
बीस मिनट देर थी।
कार्यालय से कोच ने शीशे के पार गाड़ी देखी।
फिर आवेदन अलग रखा।
“उपलब्धता का जवाब मिल गया।”
अदिति खड़ी रही।
“पूछा ही नहीं।”
“भरोसेमंद खिलाड़ी चाहिए।”
“प्रशिक्षण के समय देखभाल तय की है।”
उसने खिड़की पर उँगली रखी।
“आज?”
फोन काँपा।
प्रतीक का संदेश था, कॉल लंबी है। तुम सँभालो।
कोच ने उसे पढ़ते देखा।
और कहने की जरूरत नहीं थी।
* * *
कबीर से पहले अदिति स्थानीय वयस्क आयोजनों में नियमित खेलती थी।
प्रसिद्ध नहीं थी। अच्छे परिणाम थे, खराब थे और नोटों का फोल्डर था जिसे सबसे अच्छी तरह खुद समझती थी।
उनतीस साल की उम्र में अंशकालिक लेखा काम करती थी। लंबे विराम के बाद काम और गंभीर अभ्यास दोनों फिर चाहती थी।
प्रतीक समर्थन कहता था।
खाने की मुलाकातों में।
उसकी माँ से।
पुराने अभ्यास समूह की पोस्ट की तस्वीर के नीचे।
जो नहीं करता था, वह था तय समय पर वादा की देखभाल अपने हाथ लेना।
कॉल लंबी हो जाती। ग्राहक आता। भूल जाता कि बुधवार का मतलब बुधवार है, भले सुबह याद न दिलाए।
हर चूक समझाने लायक छोटी थी।
साथ मिलकर सप्ताह भर देती थीं।
अदिति कबीर की हर संभव जरूरत साथ रखने लगी। छोटी खरीदारी पूरी दोपहर बन सकती थी।
अभ्यास कॉपी बच्चे के सामान वाले बैग की बाहर की जेब में थी।
कम खुलती थी।
* * *
मुलाकात के बाद पास के आँगन में बैठी।
कबीर जागा। ध्यान चाहिए था।
उसका काम किया, फिर कोच का संदेश खोला।
वापस आने वाले खिलाड़ियों के मूल्यांकन के लिए अनुपलब्ध लिखा था।
मूल्यांकन नहीं हुआ था।
जमा की देखभाल व्यवस्था नहीं देखी गई।
एक देर का हस्तांतरण पूरी तरह उसके जैसी व्यक्ति का फैसला बन गया।
प्रतीक चालीस मिनट बाद कॉफी लाया।
“अच्छा गया?”
अदिति ने कप देखा।
“सूची में नहीं हूँ।”
वह नाराज हुआ।
“अन्याय है। समझाना चाहिए।”
“समझाने आई थी।”
“फिर फोन करो।”
पूछना चाहती थी कि उसके छूटे काम भी करते हुए कितने लोगों को मना सकती है।
इसके बजाय गाड़ी लेने को कहा।
उसने ली।
कबीर रोया।
प्रतीक तुरंत पीछे मुड़ा।
“तुम्हें चाहता है।”
अदिति ने क्षण भर आँखें बंद कीं।
“तुम भी चुप करा सकते हो।”
* * *
घर में दोपहर की बात करनी चाही।
प्रतीक कोच को गलत मान गया।
इससे बात कठिन हुई।
पति क्यों नहीं आया पूछने के लिए कोच को गलत सिद्ध नहीं करना था।
“मेरी कॉल जानती हो।”
“अपनी कितनी रद्द होती हैं, जानती हूँ।”
“अभ्यास काम जैसा नहीं।”
“लेखा की पाली काम है। पिछले सप्ताह वह भी छूटी।”
उसने उदाहरण जमा करने को कहा।
कर रही थी।
बिना उदाहरण समस्या भावना हो जाती। उसे शांत कर सकता था, कुछ बदले बिना।
ज्यादा मदद का वादा किया।
अदिति ने घंटे पूछे।
“जब चाहिए बता देना।”
वह बैठ गई।
बताती रही थी।
व्यवस्था में अब भी ध्यान रखना, योजना, याद दिलाना और उसके असुविधा कहने पर उपलब्ध रहना उसी का था।
साथी चाहिए था।
ऐसा सहायक मिल रहा था जो शायद आए नहीं।
* * *
मेघा दो मंजिल नीचे रहती थी।
इकतीस की थी। दस्तावेज अनुवाद करती थी। अठारह महीने की बेटी ईरा थी।
आँगन की दोपहरों से जान-पहचान थी। दोनों के पास नाश्ता, कपड़े और ऊपर भूली चीज याद आने वाला चेहरा होता।
मेघा ने मूल्यांकन की बात सुनी।
इसे माँ बनने का आनंद लेने का संकेत नहीं बताया।
कौन से घंटे चाहिए, पूछा।
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शुरुआत घरों में दो परीक्षण आदान-प्रदान से की। बच्चे दोनों वयस्कों को जानते थे।
अदिति के अभ्यास में मेघा दोनों सँभालेगी। मेघा के तय ग्राहक काम में अदिति दोनों लेगी।
खाना, दिनचर्या, संपर्क और बच्चे के बीमार होने या किसी के सुरक्षित रूप से न सँभाल सकने की बात की।
पहले छोटी दोपहर आजमाई। फिर बढ़ाई।
काम था।
पैसा न बदलने से मुफ्त नहीं था।
दोनों समझती थीं, इसलिए स्पष्ट बात आसान हुई।
* * *
पहली बार शानदार प्रशिक्षण नहीं हुआ।
अदिति बीस मिनट फोन देखती रही।
खुला समूह मिला था जो मौजूदा खेल जाँचेगा। मेज पर ध्यान मुश्किल था।
संयोजक सुजाता ने पूछा कि घर में तत्काल समस्या है क्या?
“नहीं।”
“पाँच मिनट लो। जरूरी जाँच करो। तैयार होकर लौटो।”
मेघा ने लिखा कि बच्चे व्यस्त हैं। जरूरत हुई तो फोन करेगी।
अदिति लौटी।
खराब खेली।
सुजाता ने माताओं की क्षमता पर चर्चा किए बिना समीक्षा की।
“फैसले जल्दी ले रही हो। एक शाम में पूरे विराम की भरपाई चाहती हो।”
अदिति दुखी हँसी।
“इतना दिखता है?”
“हाँ।”
सलाह चुभी।
खेल की सलाह थी।
लौटना चाहती थी।
* * *
दो दिन बाद मेघा के काम की बारी थी।
दोपहर उम्मीद से कठिन थी। ईरा चित्र दिखाना चाहती थी। कबीर को ध्यान चाहिए था। नीची मेज पर पानी गिरा।
अदिति ने खुद को बच्चे से उसी थकी आवाज में इंतजार कहता पाया जो दूसरों से सुनना नापसंद था।
रुकी। साफ किया। गतिविधि बदली।
मेघा लौटी तब तक वह लगभग कोई अतिरिक्त घरेलू काम नहीं कर पाई थी जिसे बच्चों के बीच करने की कल्पना थी।
मेघा ने समय की लंबाई पूछी।
“सँभल गया। लेकिन दूसरा काम भी करने का दिखावा था।”
“पहली बार मेरा भी।”
कुछ साथ पड़ता समय छोटा किया। बच्चों की दिनचर्या से व्यवस्था बेहतर मिलाई। उसे खाली समय कहना भी बंद किया।
अगले सप्ताह मेघा के घर बीमारी से व्यवस्था रद्द हुई। अदिति ने अभ्यास छोड़ा और सुजाता को तुरंत बताया।
निराश थी। धोखा नहीं हुआ था।
फर्क जरूरी था।
परिस्थिति बदलने से देखभाल रुक सकती है। जरूरी नहीं कि किसी ने उसके समय को कम माना हो।
प्रतीक ने सुना और कहा, “इसीलिए लचीला होने को कहता हूँ।”
अदिति ने पूछा कि उस शाम वह कौन सा विकल्प दे सकता है?
कैलेंडर देखा।
कोई नहीं था।
अदिति ने कहा, सत्र छूटेगा। अगला करेगी। इससे पूरी व्यवस्था मूर्खतापूर्ण नहीं हो गई।
रात कबीर सोया तो नोट का एक पन्ना पढ़ा और रुक गई। चाहा अभ्यास नहीं था। शाम इतना देती थी।
कठिन दिन को महत्वाकांक्षा रखने का स्थायी फैसला नहीं बनाया।
व्यवस्था लौटी तो मेघा ने कई सप्ताह से अटका ग्राहक काम पूरा किया। जमा होने की तस्वीर भेजी।
अदिति ने बधाई दी।
दो वयस्कों की जिंदगी चल रही थी। यह याद रखना जरूरी था जब एक का आने वाला आयोजन दूसरे की साधारण अंतिम तारीख से ज्यादा जरूरी सुनाई दे।
* * *
आदान-प्रदान भी अभ्यास से सुधरा।
मेघा ने कबीर का पसंद का कप सीखा। अदिति ने जाना कि ईरा अधूरा चित्र पूरा होने से पहले प्रशंसा नहीं चाहती।
किसी ने दूसरे को अंतहीन आपातकाल सेवा नहीं माना।
चयन से पहले अदिति ने अतिरिक्त सत्र पूछा। मेघा ने अंतिम तारीखें देखकर दो घंटे दिए, चार नहीं।
अदिति ने स्वीकार किया।
बाकी समय अलग तय किया। उसमें प्रतीक का निश्चित समय था।
इस बार तय घंटे एक बार भेजे और पूरे समय की जिम्मेदारी की पुष्टि माँगी।
उसने दी।
दिन पर अतिरिक्त कपड़े पूछने को फोन किया।
बताए।
फिर पूछा कि वॉशिंग मशीन रुक सकती है क्या?
“रुक सकती है।”
इंतजार की निगरानी के लिए घर नहीं लौटी।
लौटने पर फ्लैट बिखरा था। कबीर सोया था।
प्रतीक थका दिखा।
तय समय निभाने का धन्यवाद किया।
ऐसे बधाई नहीं दी जैसे वह काम किया हो जिसकी सामान्य उम्मीद नहीं की जा सकती।
* * *
प्रशिक्षण किस्मत से बचने वाले एहसान के बजाय सप्ताह का हिस्सा बनने लगा।
व्यवस्था न बने तो सत्र अब भी छूटते। जल्दी बताती और विशेष परिणाम माँगे बिना भरपाई करती।
सुजाता वही भागीदारी माँगती जो बाकी वयस्क खिलाड़ियों से।
पहले ही तय कर देना कि वह कभी पूरी नहीं कर सकेगी, अलग था।
पुराने कोच को नया समूह पता चला।
संदेश भेजा कि धैर्य रख सकती थी।
अदिति ने अस्वीकृत मूल्यांकन की तारीख देखी।
फिर संदेश रखा।
महीनों इंतजार कर चुकी थी कि दूसरों को उसके कहीं जाने का विचार सहज लगे।
अगले सत्र में आयोजन समय पूछा। पैसे देने से पहले देखभाल जाँची।
व्यवस्था आदर्श नहीं थी।
मौजूद थी।
असल फैसला करने को पर्याप्त था।
* * *
कई महीने बाद खुली प्रतियोगिता के अंतिम चरण में पहुँची।
संदेश ईरा और कबीर के साथ फर्श पर बैठते आया।
मेघा ऊपर ग्राहक की ऑनलाइन बैठक में थी।
अदिति ने पढ़ा, मुस्कुराई और फोन पहुँच से दूर रखा।
ईरा को दूसरा कागज चाहिए था।
कबीर का खिलौना सोफे के नीचे था।
दोनों बातें अब भी जरूरी थीं।
मेघा लौटी तो परिणाम दिखाया।
कबीर अभी सोया था, इसलिए धीरे खुश हुईं।
फिर अंतिम सप्ताहांत देखा।
आयोजन सामान्य आदान-प्रदान से लंबा था। मेघा एक हिस्सा कर सकती थी। प्रतीक दूसरा। परिवार की परिचित देखभाल करने वाली के साथ एक निश्चित अवधि की भुगतान व्यवस्था भी की।
यात्रा से पहले खर्च और समय पक्के किए।
काफी काम था।
चयन की तस्वीर में कुछ नहीं दिखता था।
* * *
अंतिम मुकाबले से पिछली रात प्रतीक ने बताया कि सहकर्मी सप्ताहांत कारोबारी खाने पर चाहता है।
अदिति ने फ्रिज का कार्यक्रम देखा।
“कबीर तुम्हारे साथ है।”
“ले जा सकता हूँ।”
“उसके और तुम्हारे लिए चलेगा?”
प्रतीक ने लंबा रेस्तराँ खाना बताया जहाँ लोग मेजों के बीच जाएँगे।
अदिति रुकी।
उसने कार्यक्रम फिर देखा।
“मना कर दूँगा।”
उसने सिर हिलाया।
लड़ाई नहीं हुई।
उम्मीद से ज्यादा भावुक हुई।
अगली सुबह प्रतीक ने बैग लिया। अंदर सब फिर बताने को नहीं कहा। खुद जाँचा था।
अदिति ने कबीर को चूमा और निकली।
बाहर याद आया अभ्यास की कलम भूली।
रास्ते में दूसरी खरीदी।
इस बार भूली चीज सिर्फ उसकी अपनी थी।
* * *
अंतिम चरण में खेल असमान रहा।
पहले सत्र ने गंभीर मैदान से दूरी याद दिलाई। दूसरे ने वापसी के बाद किया वास्तविक अभ्यास दिखाया।
विराम में कबीर की तस्वीर आई। प्रतीक के कंधे पर सो रहा था।
कोई सवाल नहीं था।
वह मुस्कुराकर नोट पर लौटी।
सामने वालों ने उसके बाधित साल की छूट नहीं दी। वह चाहती भी नहीं थी।
एक महिला इतनी शांत खेलती कि अदिति चिढ़ती। वह शांति खुद चाहती थी। दूसरी ने गलती की और उसे असफलता की कहानी बनाए बिना सँभल गई।
अदिति ने देखा। सीख सकी तो सीखा। अपने फैसलों पर ध्यान रखा।
अंत की तरफ असली मौका दिखा।
विचार डरावना था।
फिर अगला सत्र शुरू हुआ।
खेला।
अंतिम परिणाम पक्का हुआ तो नाम पहला था।
इतनी गहरी साँस ली कि पास सुजाता ने ठीक होने को पूछा।
“हाँ।”
फिर हँसने लगी।
* * *
तय देखभाल करने वाली को कबीर सौंपकर प्रतीक प्रस्तुति पर आया।
गर्व था।
अदिति साफ देख सकती थी।
गले लगाया। तस्वीरें माँगीं। लोगों को उसकी मेहनत बताई।
उसे अच्छा लगा।
हर खुश पल में छिनने का प्रमाण नहीं खोजना चाहती थी।
फिर स्थानीय खेल बैग बेचने वाले के प्रतिनिधि ने भुगतान वाले प्रचार कार्यक्रम पर बात पूछी।
प्रतीक पहले बोला।
“बिल्कुल। मुझे विवरण भेजिए।”
अदिति मुड़ी।
प्रतिनिधि ने नंबर पूछा।
प्रतीक ने अपना दिया।
अदिति बोली, “मुझे भेजिए। प्रस्ताव पढ़कर तय करूँगी।”
आदमी ने माफी माँगी और उसका संपर्क लिया।
अकेले होने तक प्रतीक रुका।
“मदद कर रहा था।”
“इरादा जानती हूँ। फिर भी मेरी तरफ से जवाब दिया।”
उसने घर पर बात करने को कहा।
इस बार घर पर बात हुई।
* * *
अगले दिन प्रस्ताव आया।
छोटा शुल्क, दो कार्यक्रम और चुनी तस्वीरों का इस्तेमाल था। एक विकल्प परिवार की तस्वीर का था।
प्रतीक उत्साहित था।
अदिति ने तारीखें पढ़ीं।
दोनों समय वह सामान्यतः कबीर सँभालती थी।
“यह समय कौन देखेगा?”
“कर लेंगे।”
“कौन सी व्यवस्था?”
उसने साँस छोड़ी।
“पहले अच्छी खबर का आनंद नहीं ले सकते?”
अदिति ने प्रस्ताव देखभाल कार्यक्रम के पास रखा।
“सहमति समझें तो अच्छी खबर रहेगी।”
उस दोपहर स्वीकार नहीं किया।
दुकान से दायरा स्पष्ट करवाया। बच्चे की भागीदारी अपने समझौते में शामिल नहीं बताई।
कंपनी ने बहस नहीं की।
काम की बातचीत परिवार से आसान थी।
उसने देखा।
फिर कबीर के सोने के बाद प्रतीक को सप्ताह की वास्तविक व्यवस्था देखने बैठने को कहा।
* * *
वादों से नहीं, घंटों से शुरू किया।
भुगतान वाला काम। यात्रा। देखभाल। खाना। कपड़े। मुलाकातें। अभ्यास। ऐसा समय जिसमें आराम हो, किसी और के संभावित एहसान के लिए खुला न रहे।
प्रतीक ने देखा कि उसकी खाली शाम अक्सर इसलिए थी क्योंकि अदिति की नहीं थी।
बचाव करने लगा।
अदिति नाराज हुई।
विराम लिया। अगली रात जारी रखा।
नियमित देखभाल अवधि उसकी जिम्मेदारी हुई, तैयारी और समेटना भी। बदलाव के लिए बातचीत जरूरी थी। कॉल लंबी होने की घोषणा पर्याप्त नहीं थी।
पुरस्कार और भविष्य के भुगतान कार्यक्रम की रकम भी घर के उस पैसे से अलग की जिसे बिना सहमति उपलब्ध मान लेते थे।
साझा खर्च में योगदान समझी व्यवस्था से होगा।
उसके नाम से अनुबंध नहीं करेगा।
लिखना रोमांटिक नहीं लगा।
अदिति को स्वर से ज्यादा चलने की परवाह थी।
* * *
सब ठीक नहीं चला।
दूसरे सप्ताह प्रतीक अपनी देखभाल अवधि का बाहर का काम भूला। अदिति से ठीक करने को कहा।
उसने याद दिलाया कि खुद फोन करके बदल सकता है।
उसने किया।
दूसरे दिन अदिति तय समय से देर हुई। मेघा से माफी माँगी। प्रतियोगिता को दूसरों का काम रुकने की वजह नहीं बताया।
आदान-प्रदान चला क्योंकि दोनों ईमानदारी से सुधारती रहीं।
अदिति ने आखिर सीमित संशोधित प्रचार प्रस्ताव लिया जो समय में बैठता था। शुल्क उसे मिला। दिन से पहले व्यवस्था तय थी।
सामान्य लेखा काम भी करती रही।
जीतने से कमाने, सँभालने, सोने और बात करने की जरूरत नहीं गई।
ऐसा परिणाम मिला जिससे खुश थी।
एक शुक्रवार ग्राहक ने छोटा लेखा काम पूछा। काम परिचित था। अंतिम तारीख ऐसे सप्ताह में थी जिसे पहले अपने आप खाली रखती, शायद किसी को जरूरत पड़ जाए।
स्वीकार करने से पहले तय देखभाल अवधि देखी।
प्रतीक ने पूछा कि अभ्यास छूटेगा क्या?
“नहीं। काम गुरुवार है। अभ्यास शुक्रवार।”
उसने कैलेंडर देखा। फिर अपना बाहर का काम देखभाल अवधि से हटाया।
गुरुवार अदिति ने काम पूरा किया। शुक्रवार अभ्यास बीस मिनट पहले समाप्त हुआ।
पहला विचार तुरंत घर भागने का था। कहीं कोई न कहे कि जरूरत से ज्यादा समय ले लिया।
फिर याद आया कि जल्दी आने को किसी ने नहीं कहा।
अभ्यास कक्ष के पास छोटी चाय दुकान पर बैठी। कप गरम रहते पीया। बीस मिनट घरेलू संदेशों का उत्तर देने या दूसरा खेल देखने में नहीं लगाए।
तय समय घर पहुँची तो कबीर पिता के पास खेल रहा था। प्रतीक तौलिया खराब तरीके से मोड़ रहा था।
“जल्दी खत्म हुआ?”
“थोड़ा। चाय पी।”
उसने सिर हिलाया और सत्र पूछा।
बात इतनी छोटी थी कि शाम किसी को नहीं बताई।
लेकिन अगली बार अपने हर मिनट को अच्छे उपयोग के प्रमाण से भरने का मन हुआ तो वह कप याद आया।
समय केवल काम के बदले काम लेने की मुद्रा नहीं था। उसमें कभी बैठना भी संभव होना चाहिए था। इस बात पर उन्होंने नया भाषण नहीं किया। कैलेंडर में तय अवधि निभाई गई और उसी से जगह बनी। अदिति ने उस दिन रात को मेघा से फोन पर उसके ग्राहक का हाल पूछा। अपनी जीत के बारे में नहीं बताया। दोस्त का काम भी आगे बढ़ रहा था।
अगले अभ्यास में सिर्फ अपना बैग था।
सुजाता ने अंतिम मुकाबला देखने को पूछा।
“हाँ।”
“बीच वाली गलती से शुरू करो।”
अदिति हँसी।
बैठ गई।
बाहर अपनी मौजूदगी का औचित्य बताती बच्चों की गाड़ी नहीं थी।
कबीर पिता के साथ घर था। पिता जानता था कि वह कब लौटेगी।