IND SLOTS — लाइट बंद करने के लिए चैंपियन रुका
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IND SLOTS — लाइट बंद करने के लिए चैंपियन रुका

काल्पनिक कहानी · पात्र और घटनाएँ कहानी का हिस्सा हैं।

चौथे पन्ने तक पहुँचकर आदिल की मुस्कराहट रुक गई। उससे पहले रकम देखकर वह खुश होने से खुद को रोक नहीं पा रहा था। महीने के चालीस हजार रुपये। तय कार्यक्रमों में…

चौथे पन्ने तक पहुँचकर आदिल की मुस्कराहट रुक गई।

उससे पहले रकम देखकर वह खुश होने से खुद को रोक नहीं पा रहा था।

महीने के चालीस हजार रुपये।

तय कार्यक्रमों में काम का मेहनताना।

मेरिडियन क्लब में अभ्यास का नियमित समय।

एसी वाला कमरा और ऐसी कुर्सियाँ जिन पर बैठने से पहले पैर हिलाकर नहीं देखने पड़ते।

फिर दूसरे समूहों से जुड़े रहने पर रोक वाली शर्त सामने आई।

उसने पूछा, बाजार के पास शाम वाला पुराना कमरा भी शामिल है?

प्रतिनिधि रितेश ने सिर हिलाया, जैसे राहत हुई हो कि आदिल बात समझ गया।

“खासकर वह जगह।”

आदिल की उँगली पन्ने पर रही।

“अभ्यास करता हूँ वहाँ।”

“करते थे। अब चैंपियन हो।”

काँच के बाहर सहायक पानी की बोतलें लगा रहा था। हर लेबल सामने था।

आदिल को पुराने कमरे का नल याद आया। बंद करने के बाद हैंडल थोड़ा वापस घुमाओ तभी टपकना रुकता था।

प्रतियोगिता जीतने से बहुत पहले वह उस नल का तरीका सीख गया था।

* * *

आदिल तैंतीस साल का था। दुकानों के बोर्ड पेंट करता था।

काम पसंद था, मगर कभी बहुत ऑर्डर आते और कभी कई दिन इंतजार करना पड़ता।

नियमित भुगतान वाला काम मिलने से महीने का खर्च तय करना आसान होता।

हाल में उसने इंडियन रमी की क्षेत्रीय प्रतियोगिता जीती थी।

अब तक का उसका सबसे अच्छा नतीजा था।

पुरस्कार की रकम काम आई थी। उसके बाद लोगों का ध्यान भी गया था।

यह नहीं सोचा था कि इसी पहचान के साथ कोई तय करने लगेगा कि वह कहाँ जाता दिख सकता है।

मेरिडियन में प्रशिक्षण में मदद करनी थी, प्रदर्शन सत्र लेने थे और तय कार्यक्रमों में जाना था। समझौते में भुगतान के साथ जिम्मेदारियाँ भी लिखी थीं।

उसने काम के घंटे पढ़े थे। यात्रा के बारे में भी पूछा था।

अभ्यास में मदद करने वालों से जुड़े रहने के लिए अनुमति माँगनी पड़ेगी, यह नहीं सोचा था।

* * *

रितेश ने कहा कि बात छवि की है।

बाजार वाला कमरा अस्तव्यस्त दिखता है।

ढंग का रिसेप्शन तक नहीं है।

वहाँ की तस्वीरें मेरिडियन की बनाई नई छवि से मेल नहीं खाएँगी।

आदिल ने पूछा, “सीधे बताइए, मुझे क्या नहीं करना होगा?”

“सार्वजनिक संबंध नहीं। दूसरी जगह प्रशिक्षण नहीं। पुराने समूह को अपना अभ्यास केंद्र बताकर जोड़ना नहीं।”

“जा सकता हूँ?”

“निजी तौर पर शायद। लेकिन क्या दिखता है, सोचना पड़ेगा।”

सुनने में छूट थी। लेकिन वहाँ जाकर किसी तस्वीर में आ गया तो क्या होगा, यह साफ नहीं था।

रितेश अगले पन्ने पर गया।

आदिल नहीं गया।

पूरा प्रस्ताव पढ़ने के लिए समय माँगा।

अगले हफ्ते के शुक्रवार तक समय मिला।

* * *

पुराना कमरा शटर ठीक करने वाली दुकान के ऊपर था।

औपचारिक नाम मार्केट रिक्रिएशन रूम था।

ज्यादातर ऊपर वाला कमरा कहते थे।

सालों से वहाँ वयस्कों के शाम के कार्यक्रम होते आए थे।

रमी अभ्यास के लिए दो शाम तय थीं। बाकी समय दूसरे समूह लेते।

थॉमस बुकिंग देखते और चाबी रखते।

चौंसठ साल के थे। लोगों को लगता था कि कमरे की तरह उनका समय भी हमेशा उपलब्ध रहेगा। इससे थक चुके थे।

आदिल पहली बार तब आया था जब बोर्ड पेंट करने के एक काम में नुकसान हुआ था। कई ग्राहकों से भुगतान बाकी था। बैग में बिल थे, जेब में पैसे कम थे।

थॉमस ने खाली सीट बता दी।

थॉमस ने पूछा था कि उस शाम के सत्र में बैठेगा क्या। आदिल रंग लगे बैग को रख रहा था तो उन्होंने उसका इंतजार किया था।

आदिल को याद था।

यह भी याद था कि कितनी बार आखिर में अकेला मेजें उठाता रहा।

उस स्वागत के साथ वह शामें भी याद थीं जब मेजें समेटते हुए बस छूट जाती थी। एहसान मानने से घर का रास्ता छोटा नहीं हो जाता था।

* * *

ट्रॉफी लेकर लौटा तो सबको फोटो चाहिए थी।

उन्हीं मेजों के पास भीड़ लगी जिनकी शिकायत करते थे।

किसी ने कहा, उसकी सफलता से कमरे का नाम होगा।

किसी ने पूछा कि क्या अब प्रायोजक नई कुर्सियाँ दिलवा देंगे।

आदिल चेहरा दुखने तक मुस्कराया।

सबके बाद दो मेजों के नीचे कागज के कप मिले।

थॉमस भारी फोल्डिंग बोर्ड रखने की कोशिश कर रहे थे।

आदिल ने दूसरा सिरा लिया।

ट्रॉफी सफाई की बाल्टी के पास थी।

थॉमस ने फिर बधाई दी।

फिर पूछा, दस मिनट और रुकेगा?

रुका।

दस मिनट के तीस हो गए। आखिर ट्रॉफी उठाई तो उसकी तली के नीचे बाल्टी से गिरा पानी जमा था।

* * *

दो दिन बाद किराए का सवाल आया।

मालिक नई अवधि में ज्यादा किराया और नई जमा रकम चाहता था।

कमरे के जमा पैसे कुछ खर्च उठा सकते थे, पूरा नहीं।

थॉमस फिर अपनी जेब से अंतर नहीं भरना चाहते थे।

समय कम था।

चलने लायक योजना की जिम्मेदारी कोई नहीं लेगा तो वह महीने के अंत में कार्यक्रम बंद कर देंगे। जिस समूह का जो सामान है, लौटा दिया जाएगा।

अगले अभ्यास से पहले आदिल को बताया।

उसने कमरा देखा।

घड़ी छह मिनट पीछे थी।

पंखा खड़खड़ाता था।

एक कुर्सी की मरम्मत अलग रंग की धातु की पट्टी लगाकर हुई थी।

अक्सर जगह बेहतर होने की इच्छा की थी।

पूरी तरह गायब होने की कल्पना नहीं की थी।

* * *

उस रात मेरिडियन का प्रस्ताव अलग लगा।

महीने के चालीस हजार।

मेजें कोई और लगाएगा।

ऐसी जगह नहीं जिसे बंद होने से बचाना पड़े।

छोटे भाई समीर को बताया।

समीर मोटरसाइकिल ठीक करता था।

ऐसी सलाह पसंद नहीं थी जो मानने की कीमत भूल जाए।

“काम अच्छा कर सकते हो?”

“हाँ।”

“काम चाहिए?”

“कुछ हिस्सा।”

“क्या नहीं चाहिए?”

आदिल ने प्रतिबंध बताया।

समीर ने सुना। फिर पूछा, पुराने कमरे को वास्तव में क्या चाहिए?

“पैसा।”

“सिर्फ पैसा?”

आदिल को मेजों के नीचे कप याद आए।

“नहीं।”

भाई ने सिर हिलाया।

“पूरा कमरा अपने सिर मत उठा लेना।”

* * *

आदिल ने रितेश से पुराने समूह पर लगी रोक हटाने को कहा।

उसने सुझाव दिया कि काम के घंटे और मेरिडियन का नाम इस्तेमाल करने की शर्तें तय रहें। बाकी समय वह पुराने समूह में जा सके।

रितेश ने कहा कि क्लब चाहता है कि आदिल सिर्फ उसी से जुड़ा दिखे।

आदिल ने पूछा, पुराने कमरे ने कुछ गलत किया है?

“नहीं। बस जहाँ जा रहे हो, उससे मेल नहीं खाता।”

थका था। लगभग मान लेता।

पैसा और काम दोनों सामने थे। मना कर देने से उतने ही पैसे का दूसरा काम मिलना तय नहीं था।

आदिल ने लिखित जवाब माँगा। जवाब में रोक बनी रही।

गुरुवार शाम ऊपर गया तो बत्तियाँ जल रही थीं।

थॉमस बंद होने पर लौटाए जाने वाले सामान की सूची बना रहे थे।

* * *

आदिल ने पूछा, मेजें किसकी हैं?

कुछ कमरे की।

कुछ दान की।

दो दूसरे समूह से ली थीं।

थॉमस ने हर चीज के सामने लिखा था कि कहाँ जाएगी। उधार की एक कुर्सी आदिल की पसंदीदा थी। अगले महीने वह किसी और के कमरे में हो सकती थी। यह देखकर बंद होने की बात पहली बार इतनी ठोस लगी।

आदिल ने पूछा कि जिम्मेदारियाँ बाँटकर कोई समिति काम सँभाले तो कार्यक्रम चल सकता है क्या।

थॉमस ने कहा, “व्यवस्था सच में निभे तो।”

“ग्रुप में बीस नाम और सारी चाबियाँ एक आदमी के पास—फिर वही नहीं चाहिए।”

आदिल बिना खुशी के हँसा।

वह पहले हो चुका था।

इस बार नामों के साथ काम चाहिए थे।

* * *

अगली बैठक उत्सव नहीं थी।

आदिल ने नई अवधि का पूरा खर्च बड़े पन्ने पर लिखा ताकि सब पढ़ सकें।

जमा अठारह हजार।

पहले महीने का किराया नौ हजार।

नई अवधि शुरू करने को सत्ताईस हजार चाहिए।

बचत में सात हजार पाँच सौ थे।

आदिल पुरस्कार से छह हजार दे सकता था।

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बाकी अपने तय खर्च और बचत के लिए रख रहा था।

उसने अपनी सीमा साफ बताई।

बचे तेरह हजार पाँच सौ दूसरों से चाहिए थे।

फोटो के लिए उत्साही कई लोग चुप हो गए।

एक ने पूछा, चैंपियन पूरा नहीं दे सकता?

आदिल ने देखा।

“छह हजार दे सकता हूँ।”

रकम स्वीकार करवाने के लिए घर का पूरा बजट नहीं समझाया।

* * *

नौ पुराने सदस्यों ने पंद्रह-पंद्रह सौ देने का वादा किया।

कुछ तुरंत दे सकते थे।

कुछ को तय तारीख तक समय चाहिए था।

वादा की गई रकम दर्ज हुई। खाते में आने से पहले उसे खर्च करने लायक नहीं माना गया। सबका भुगतान आ जाता तो शुरुआती सत्ताईस हजार पूरे हो जाते। आदिल ने नीचे दूसरा सवाल घेर दिया—अगले महीने क्या होगा?

किराया और अनुमानित बिजली-पानी लगभग दस हजार पाँच सौ मासिक थे।

अलग-अलग निर्धारित समूहों के छत्तीस वयस्क सदस्य चार सौ रुपये महीना देने को तैयार हुए।

सब दें तो चौदह हजार चार सौ।

बाकी सामग्री, छोटी मरम्मत और बचत के लिए।

वास्तविक रकम नियमित देखने पर सहमति हुई।

हर वादा हमेशा रहेगा, नहीं मान लिया।

थॉमस ने पूछा कि कई लोगों के पैसे देर से आए तो क्या होगा। मासिक समीक्षा तय हुई। खर्च बढ़ने या रकम घटने पर कब बुकिंग और खर्च कम करने होंगे, यह भी लिखा गया। थॉमस ने देखा कि इस बार कमी भरने के सामने उनका नाम नहीं लिखा था।

* * *

पैसों की योजना बनी तो अगली बहस शुरू हुई।

खोलेगा कौन?

बंद कौन करेगा?

सफाई कौन?

एक सदस्य ने कहा कि आदिल पहले महीने देख ले। कमरा सबसे अच्छा जानता है।

आदिल ने कहा, हफ्ते में एक बंद करने की पाली लेगा।

सारी नहीं।

किसी ने कहा, सफलता से बदल गया।

“हाँ,” आदिल बोला। “अब सबको लगता है कि मेरा पूरा समय खाली है।”

थॉमस ने मुस्कान छिपाने को खाँसा।

बात जारी रही।

आखिर हर दिन के सामने जिम्मेदार व्यक्ति का नाम लिखा गया।

एक सदस्य सप्ताह के बीच की तय पाली नहीं ले सकता था। उसकी जगह सप्ताहांत की जिम्मेदारी दी गई, जो नौकरी के समय से नहीं टकराती थी।

नौकरी होने पर किसी को बेवफा नहीं कहा गया।

* * *

दूसरा काम एक सहकारी संस्था से मिला, जो स्थानीय जगहों पर वयस्कों के लिए मनोरंजन और अभ्यास के सत्र चलाती थी।

मेरिडियन से छोटा था।

तय तीन महीने के काम के अट्ठाईस हजार मासिक।

आगे बढ़ाने से पहले समीक्षा।

तय सत्र, तैयारी और रिपोर्ट काम में थे।

आदिल ने ध्यान से पढ़ा।

उन जिम्मेदारियों से बाहर पुराने कमरे जाने पर रोक नहीं थी।

यात्रा खर्च पूछा।

अनुपस्थित कर्मचारी की जगह कौन आएगा, पूछा।

आदिल ने बताए गए घंटे पहले से लिए हुए बोर्ड पेंटिंग के ऑर्डरों के पास लिखे। आखिरी समय पर आने वाले कुछ काम लेना बंद करे तो नया काम निभा सकता था।

प्रस्ताव घर ले गया।

समीर ने देखी।

“इतने में खर्च चल जाएगा?”

आदिल ने फिर जाँचा।

“हाँ।”

* * *

अगली सुबह हार्डवेयर दुकान का बोर्ड पूरा किया।

मालिक बड़े बोर्ड के पैसे दिए बिना अक्षर बड़े करवाना चाहता था।

आदिल ने जगह समझाई।

चॉक की रेखा मिटाई। दूसरा ढंग दिखाया।

बीस मिनट बात हुई।

बाद में उँगलियों से रंग धोते हुए दोनों प्रस्ताव सोचे।

बारह हजार का फर्क अनदेखा करना आसान नहीं था।

ऑर्डर कम हों तो उतना कमाने की मेहनत जानता था।

सहकारी संस्था को फिर फोन किया।

पहले भुगतान की तारीख पक्की की।

पूछा कि तैयारी के घंटे बताए काम में शामिल हैं या नहीं।

थे।

अतिरिक्त सत्र के लिए अलग सहमति चाहिए थी।

जवाब प्रस्ताव के पास लिखे।

शाम को समीर ने अब भी देखते पाया।

“कम पैसे वाला हर तरह से बेहतर है, यह दिखावा जरूरी नहीं।”

“पता है।”

“सच?”

आदिल कुछ देर पन्ना देखता रहा।

फिर अपनी लिखी बात काट दी कि असली फर्क नहीं है।

फर्क था।

बिना खुद से झूठ बोले चुन सकता था।

उसने ब्रश साफ करके सुखाने रखे। नया काम मिलने से पुराने ग्राहकों को बिना बताए छोड़ नहीं सकता था। दो दुकानों को फोन किया। समय बताया। एक ने इंतजार मान लिया, दूसरी ने किसी और को काम दिया। छोटी हानि भी हिसाब में आई। फिर भी शाम तक उसका निर्णय वही था।

* * *

मेरिडियन को मना किया।

रितेश का फोन आया।

कहा, भावनात्मक निर्णय है।

आदिल ने कहा कि उन जिम्मेदारियों और रोक के साथ काम स्वीकार नहीं कर सकता।

रितेश ने वेतन का फर्क याद दिलाया।

“दोनों रकम पढ़ी हैं।”

“ऐसे प्रस्ताव हमेशा नहीं मिलेंगे।”

“पता है।”

जवाब से रितेश कुछ देर रुका।

घर के खर्च का हिसाब सामने था। उसकी उँगली उस पंक्ति पर थी जिसे दो बार काटकर बजट बराबर किया था।

प्रस्ताव का धन्यवाद दिया। फोन रखा।

बाकी शाम बेचैनी रही।

फैसला अपने लिए ठीक हो सकता था और बारह हजार मासिक कम भी पड़ सकते थे।

* * *

तय रकम आने और कागज पूरे होने के बाद ही किराया नई अवधि के लिए हुआ।

आखिरी योगदान समय-सीमा से दो दिन पहले आया। खाते की जिम्मेदारी सँभालने वाले सदस्य के साथ आदिल ने रकम मिलाई। उसके बाद थॉमस ने मकान मालिक को फोन किया।

थॉमस ने नई समिति को संबंधित कागज दिए।

अपनी तय जिम्मेदारी की एक चाबी रखी। बाकी नामित लोगों को दीं।

चाबियाँ बाँटते समय एक लेबल गिर गया। थॉमस आदतन उसे उठाने लगे। मगर बंद करने की नई जिम्मेदारी लेने वाले सदस्य ने कलम निकालकर दूसरा लेबल लिख दिया। थॉमस का हाथ वहीं रुक गया।

उस शाम आखिरी समूह खत्म होने से पहले घर गया।

उसकी बंद करने की पाली नहीं थी।

सीढ़ियों पर लगभग वापस मुड़ा।

फिर नीचे चला गया।

* * *

नई अवधि के सत्र शनिवार से शुरू हुए।

मेरिडियन जैसी नहीं दिखती थी।

दीवारें साफ थीं।

सबसे खराब कुर्सी बदली।

नल की मरम्मत हो गई थी। अब बंद करने के लिए हैंडल वापस मोड़ना नहीं पड़ता था।

पुराने सदस्य लौटे।

कुछ बस मिलने आए।

कुछ ने नियमित सत्रों में आने का वादा किया था।

आदिल ने हर व्यक्ति को आभार साबित करने का काम दिए बिना स्वागत किया।

तय मददगार अपना काम जानते थे।

कोई और हाजिरी देख रहा था। थॉमस चाय लेकर बैठ गए।

पाँच मिनट असहज लगे।

फिर गर्म रहते पी ली।

* * *

स्थानीय कार्यक्रमों की खबरें देने वाले पेज का फोटोग्राफर आया।

आदिल को ट्रॉफी के साथ कमरे के सामने अकेला खड़े होने को कहा।

एक तस्वीर के लिए मान गया।

फिर जगह चलाने वाले लोगों के साथ दूसरी माँगी।

फोटोग्राफर बोला, भीड़ हो जाएगी।

“भीड़ है,” आदिल ने कहा।

दो कुर्सियाँ हटाकर जगह बनाई।

तस्वीर में एक व्यक्ति दूसरी तरफ देख रहा था।

थॉमस का कप ज्यादा ऊपर था।

फोटोग्राफर ने तस्वीरें भेजीं तो आदिल ने यही भीड़ वाली तस्वीर चुनी।

सहकारी संस्था ने अगले हफ्ते का समय पूछा तो प्रति भेज दी।

संयोजक ने कार्यक्रम पक्का किया।

पुराने कमरे का जिक्र हटाने को किसी ने नहीं कहा।

* * *

नए अनुबंध का पहला भुगतान वाला सत्र उम्मीद से कठिन था।

खुद क्या करता है, समझाना आसान था।

दूसरे खिलाड़ी की उलझन पकड़कर उसे समझाना कठिन था।

एक प्रतिभागी ने धीमा करने को कहा।

आदिल धीमा हुआ।

बाद में संयोजक ने अगले हफ्ते की अधिक साफ योजना माँगी।

घर जाकर उस पर काम किया।

संयोजक ने योजना के दो हिस्सों पर अस्पष्ट लिखा था। आदिल ने एक शाम उदाहरण बदलने में लगाई। पुराना कमरा बचा लेने से यह काम अपने आप नहीं हो गया था।

अगली बार पहले तैयारी की।

पुराने कमरे की शाम तय घंटों के भीतर रखी।

अगली अभ्यास वाली शाम वह बताए हुए समय पर निकल आया। सीढ़ियों से मेजों पर चलती बातचीत सुनाई दे रही थी। उसके बिना भी चलती रही।

अगले सत्र के बाद वही प्रतिभागी रुका। कहा कि इस बार एक कठिन बात समझ आई है। आदिल ने पूछा कौन-सी। उसने बताया। प्रशंसा छोटी थी, मगर काम की थी। घर लौटते हुए आदिल ने अगले पाठ में वही उदाहरण रखने का नोट बनाया। उस शाम उसे न ट्रॉफी दिखानी पड़ी, न अपने निर्णय का बचाव करना पड़ा।

* * *

नई व्यवस्था में जल्दी समस्याएँ आईं।

एक सदस्य बंद करने की पाली भूला।

दूसरे का भुगतान देर हुआ।

उधार की मेज जल्दी लौटानी पड़ी।

आदिल को फिर लगा कि किसी और से कहने के बजाय खुद सब निपटा दे।

जिसकी पाली छूटी थी, उसे फोन किया।

विकल्प मिला। सूची ठीक की।

देर के भुगतान पर खाते वाले सदस्य ने बात की।

मेज लौटाई। दूसरी आने तक जगह बदली।

खाते वाला सदस्य भुगतान के लिए बात कर रहा था। इस दौरान आदिल का फोन शांत रहा। उसने दुकान का वह बोर्ड पूरा किया जिसे पहले कमरे की समस्या सुनकर अधूरा छोड़ देता।

उस शाम खिलाड़ी की तरह अभ्यास गया।

खराब खेला।

किसी ने नहीं पूछा कि इसलिए कमरा बंद हो जाना चाहिए था क्या।

* * *

एक महीने बाद सहकारी संस्था का भुगतान वाला सत्र पूरा करके थका आया।

उसकी बंद करने की बारी थी।

एक पल जीत के बाद वाला पुराना दृश्य लगा।

कप।

हिली कुर्सियाँ।

दरवाजे पर बात करते लोग।

मेज मोड़ना शुरू किया।

किसी ने दूसरा सिरा पकड़ा।

दूसरे ने कप उठाए।

तीसरे ने खिड़कियाँ देखीं।

मदद का प्रदर्शन नहीं हुआ।

जिस बात पर सहमति हुई थी, वही कर रहे थे।

थॉमस शुभरात्रि कहकर निकल गए।

आदिल ने स्नेह और राहत के अजीब मिश्रण से जाते देखा।

दरवाजे पर थॉमस ने एक बार देखा कि चाबी किसी और के पास है। फिर किसी के नया छोटा काम बताने से पहले सीढ़ियाँ उतर गए।

* * *

आखिरी मेज जगह पर आई तो आदिल ने कमरा देखा।

ट्रॉफी साझा सामग्री के डिब्बे के पास शेल्फ पर थी।

किसी ने उसकी तली साफ कर दी थी। आदिल ने ट्रॉफी सीधी रखी और अपना बैग उठा लिया।

बाहर दूसरे इंतजार कर रहे थे।

उसने स्विच देखा।

“आ रहे हो?” किसी ने पूछा।

“हाँ।”

लाइट बंद की।

कमरा अँधेरा हो गया।

इस बार उनके साथ निकला जिन्होंने काम पूरा करने में मदद की थी।

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