1. IND SLOTS — जहाँ बोर्ड था, वहाँ खाली जगह
बहन के जवाब से पहले वाणी जान गई कि बोर्ड चला गया है। स्टोर की दीवार पर चौकोर निशान आसपास के रंग से साफ था। कपड़े का कवर फर्श पर तह पड़ा था। “बेच दिया?” राधिका माँ की कुर्सी के पास बिल छाँट रही थी। “जो चुकाना जरूरी था, चुकाया।”
परिवार की प्रिंटिंग वर्कशॉप सात महीने पहले बंद हुई थी। तैंतालीस साल की वाणी ने अहमदाबाद में काम लिया और हर तनख्वाह से घर पैसे भेजे। सात साल बड़ी राधिका राजकोट में रही। माँ की देखभाल और बंद दुकान पर आते लेनदारों को सँभाला। दोनों को लगता था कि बेधन्यवाद वाला हिस्सा उसी के पास छोड़ा गया।
कैरम बोर्ड वाणी का था। पहले अच्छे टूर्नामेंट परिणाम के बाद खरीदा था। दस साल से अधिक अभ्यास किया था। राधिका ने पूछे बिना बेचा। दो रिश्तेदारों के सामने कारण माँगा तो ऐसा जवाब मिला कि कमरा चुप हो गया। “तुम मिलने आने को देखभाल कहती हो। रात को कौन जागा, मुझे पता है।”
वाणी ने फोन पर ट्रांसफर दिखाए। राधिका ने नहीं देखे। माँ ने बोलना चाहा, मगर दोनों पुराने झगड़ों का जवाब दे रही थीं। वाणी खाली कवर लेकर निकल गई। अगले दो साल परिवार की खबरें दूसरे लोगों से मिलीं। फिर कैरम के ड्रॉ में दोनों का नाम एक शहर की चैंपियनशिप के विपरीत हिस्सों में आया। वाणी ने सूची पढ़कर फोन रखा और अलमारी से अपना स्ट्राइकर निकाला। कवर अब भी उसके नीचे तह था।
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2. राधिका की अधूरी रातें
राधिका मोहल्ले की लीग में खेलती रही, हालांकि अभ्यास नियमित नहीं था। कई शाम कामों के बाद हॉल पहुँचती तो गुस्सा कलाई में रहता। जरूरत से अधिक जोर लगाती और धीमे बोर्ड को दोष देती। नियमित प्रतिद्वंद्वी ज़रीना ने दिलासा देना छोड़कर वास्तविक स्थितियाँ दर्ज करनी शुरू कीं। एक कॉपी में क्वीन का चूका कवर तीन बार आया। हर बार राधिका ने पहले आसान अपनी गोटी हटा दी थी और बाद में कठिन कवर बचा था।
उसने क्वीन से पहले आखिरी तीन गोटियों की योजना बनाई। काम धीमा और कभी शर्मिंदा करने वाला था। छोटे खिलाड़ी बोर्ड साफ करते और वह दो बार गलत पढ़ी साधारण स्थिति दोबारा लगाती। वह रुकी।
घर में सप्लायर का नंबर खोजते वाणी के पुराने ट्रांसफर संदेश मिले। पैसा वर्कशॉप खाते में आया था और कर्ज में गया था। बंद होने से पहले दोनों ने यही तय किया था। राधिका ऐसे बोलती रही थी जैसे पैसा आया ही नहीं। उसने संदेश बंद किए, मिटाए नहीं।
चैंपियनशिप सूची में वाणी का नाम देखा। ज़रीना ने पूछा ध्यान भटकेगा क्या। बहुत जल्दी नहीं कहा। अगले अभ्यास में कवर देखे बिना क्वीन पर गई और बोर्ड हार गई। ज़रीना ने लाल गोटी बीच में लौटाई और उसकी नजर बाकी सफेद पर जाने का इंतज़ार किया। राधिका ने इस बार पहले आसान पॉट नहीं चुना। उसने पूछा कि वही स्थिति दूसरी ओर से रखकर देख सकते हैं क्या। ज़रीना ने हाँ कहा और पिछला बोर्ड समाप्त होने के बाद जगह बदली।
3. वाणी दूसरी सीट सीखती है
अहमदाबाद में वाणी श्रमिक मनोरंजन हॉल में अभ्यास करती थी। नियमित सत्र की फीस दे सकती थी, अपना बोर्ड नहीं खरीद पाई थी। स्ट्राइकर रखते समय अलमारी का खाली कवर फिर चुभता। उसे राधिका धैर्य वाली रक्षक याद थी, जो छोटे खिलाड़ियों के जल्दी करने का इंतज़ार करती। चैंपियनशिप की तैयारी में उसने कठिन स्थितियाँ दोनों तरफ से बनाईं। पूरा अभ्यास बोर्ड समाप्त होने या अभ्यास को फिर लगाने के बाद ही सीट बदलती। चलती प्रतियोगिता में नहीं।
उल्टी तरफ से आकर्षक क्वीन शॉट कभी जाल लगता। अपनी निर्दोष दिखती गोटी सबसे आसान कवर रोक सकती थी। पहले दूसरी अपनी गोटी साफ करने से कठिन शॉट सरल बन सकता था। साथी भावेश डाकघर में क्लर्क था। उसने हर अभ्यास से पहले इच्छित शॉटों का क्रम बोलने को कहा। पहले स्ट्रोक से स्थिति बदलती तो पुराने बोले क्रम पर अंधा चलने के बजाय नई स्थिति देखनी थी।
वाणी बार बार असफल हुई। एक बार रुकावट खूबसूरती से हटाई, मगर कवर खराब कोण पर खिसका दिया। दूसरे में क्वीन उतारी और कवर पॉकेट के होंठ पर रह गया। उसने ताकत और संपर्क लिखा, केवल असफलता नहीं।
जब तीन जुड़े शॉट बीच में जल्दी किए बिना पूरे हुए, भावेश ने थोड़ा बदला जमाव दिया। नया कोण उसे हरा गया। वह फिर प्रयास करने रुकी। आखिरी बस का समय देखकर अगला पूरा अभ्यास तय किया। लौटते समय कॉपी में उसी बदली हुई जगह का निशान था। अब केवल सफल मूल स्थिति याद नहीं रखनी थी।
4. दो नामों के बीच माँ
माँ को चैंपियनशिप पड़ोसी से पता चली। दोनों बेटियों से अलग पूछा कि खेलेंगी क्या। दोनों ने हाँ कहा। किसी से नाम वापस नहीं करवाया। वाणी छोटा बैग लेकर राजकोट आई और दोस्त के घर रही। संपर्क फॉर्म पर पता देखकर राधिका की पुरानी शिकायत उठी। शहर आई, घर नहीं। वाणी ने राधिका को माँ को दर्शक जगह तक पहुँचाते देखा और पुराना आरोप महसूस किया। हर मुलाकात देखभाल की परीक्षा बन जाएगी।
शुरुआती दौर ने विचार पालने का अधिक समय नहीं दिया। राधिका ने तेज बोर्ड के अनुसार बदलकर कठिन मैच तीन गेम में जीता। वाणी दूसरे मैच का पहला गेम हारी। फिर हर बोर्ड के अंतिम हिस्से से पहले कठिन अपनी गोटियाँ निकालकर संभली। माँ दोनों को देखती रहीं। दौरों के बीच स्वयंसेवक से अलग प्रतीक्षा जगहों पर चाय भेजी। किसी कप में समझौते का संदेश नहीं था।
वाणी ने सेमीफाइनल का निर्णायक गेम नियंत्रित ढंग से 25–18 जीता। राधिका ने 25–22 जीता। अंत में वही कवर किया जिसका ज़रीना के साथ अभ्यास किया था। अधिकारी ने फाइनल के लिए दोनों नाम बुलाए।
वे हॉल के विपरीत सिरों से आईं। खेल शुरू होने से पहले राधिका ने बैठने को कुर्सी थोड़ा ठीक की। वाणी ने वर्षों पुरानी हरकत पहचानी। उसने स्ट्राइकर रखा और अंपायर का इंतज़ार किया। माँ पीछे बैठ गई थीं। किसी ने दोनों को साथ तस्वीर के लिए नहीं रोका। पहले मैच खेलना था।
5. जिसे राधिका ने बेहतर पढ़ा
फाइनल तीन में दो गेम का था। हर गेम पच्चीस अंक या आठ बोर्ड पर खत्म होता। जरूरत हो तो प्रकाशित बराबरी प्रक्रिया। पहला गेम राधिका ने 25–16 जीता। तेज हड़बड़ी से नहीं। वाणी के लिए कठिन आखिरी गोटियाँ छोड़ीं। क्वीन तभी चुनी जब कवर पहुँच में रहा। वाणी दूसरों से सुनी आक्रामक गलतियों की प्रतीक्षा करती रही। सामने की बहन उन पर काम कर चुकी थी।
गेम के बाद पानी पिया और अंतिम दो बोर्ड देखे। उसने आसान सफेद जल्दी निकाल दी थीं। फिर कठिन बची गोटियाँ ऐसे देखी थीं जैसे अचानक आई हों। राधिका की बढ़त समाप्ति से कई स्ट्रोक पहले बनी थी।
दूसरे गेम में वाणी ने क्रम बदला। पॉकेट के पास आसान गोटी होने पर भी पहले बाधा वाली कठिन सफेद निकाली। बाद का क्वीन कवर सीधा हुआ। राधिका ने अपने मजबूत बोर्ड से जवाब दिया। साफ किया तो वाणी की तीन बाकी थीं। गेम करीब रहा, फिर वाणी के बोर्ड जीतने से पच्चीस हुए। राधिका बीस पर रही। एक एक गेम।
उस दोपहर पहली बार राधिका ने बहन को पुराना घरेलू झगड़ा बीच में रखे बिना देखा। वाणी ने गेमों के बीच खेल बदला था। उसने निर्णायक गेम से पहले अपनी योजना बदली। दोनों पुरानी याद वाली बहन को हराकर नहीं जीत सकती थीं।
वाणी ने पानी का ढक्कन लगाया और बैठ गई। राधिका ने अंपायर से अगला ब्रेक पक्का किया। बातचीत छोटी थी, लेकिन उसमें एक दूसरे के खेल को कम बताने वाला वाक्य नहीं था।
6. सात बोर्ड
निर्णायक गेम में लंबी आसान दौड़ नहीं थी। पहला बोर्ड राधिका ने जीता। अगले दो वाणी ने। फिर संकरी चूक से वाणी की कई गोटियाँ बचीं और राधिका ने लाभ को अच्छी बढ़त बनाया। निर्धारित तरफ बदलने पर वाणी उस जगह बैठी जहाँ बहन थी। उसने दोनों दिशाओं से देखा था, मगर असली बोर्ड अलग लगा। पहले के स्ट्रोक से गति जाँची और दूर की उस पॉकेट पर ध्यान दिया जिसने एक कट बाहर रखा था।
आठवें से पहले राधिका इक्कीस पहुँची। वाणी सत्रह पर थी। सात बोर्ड पूरे थे। आखिरी बोर्ड गेम तय कर सकता था, भले कोई पच्चीस न पहुँचे। बराबरी न हुई तो उसके बाद आगे वाला जीतेगा। वाणी को छोटी सफाई से अधिक चाहिए था। राधिका जानती थी। छोटी बहन को क्वीन का जल्दी पीछा करवाकर अधूरे कवर की प्रतीक्षा कर सकती थी।
माँ दर्शक सीमा के पीछे स्थिर बैठी थीं। ज़रीना और भावेश अलग पंक्तियों में चुप थे। अब अभ्यास की कोई सलाह बोर्ड में नहीं आ सकती थी। वाणी ने सफेद से आठवाँ ब्रेक किया। राधिका काली थी। दोनों ने उपलब्ध गोटियाँ उतारीं। फिर स्थिति संकरी हुई।
आखिर क्वीन के साथ तीन सफेद और दो काली बचीं। एक सफेद दूसरी सफेद के साफ रास्ते में थी। वही दूसरी गोटी भरोसेमंद क्वीन कवर बन सकती थी। वाणी ने पहले लाल देखी। फिर जानबूझकर उससे नजर हटाई। उसे आखिरी स्कोर तक पहुँचने के लिए पहला शॉट दूसरी जगह करना था।
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7. लाल से पहले सफेद
क्वीन पर सीधा प्रयास संभव था, मगर कठिन कवर छोड़ता। पास की सफेद दूसरी तक जाने का आसान रास्ता रोकती थी। पुराने खेल में वाणी क्वीन पर जाती, किसी तरह कवर मिलने का भरोसा करती और न मिलने पर बोर्ड को दोष देती। उसने पहले बाधा वाली सफेद चुनी। उसकी पॉकेट सबसे आसान नहीं थी। नपा कट चाहिए था, ताकि इच्छित कवर न खिसके। राधिका ने नजर से रास्ता देखा और समझ गई।
पहली सफेद गिर गई। स्ट्राइकर सुरक्षित सतह पर रहा। दूसरी दो सफेद जरूरी जगहों पर रहीं। कवर का रास्ता खुल गया। अपनी गोटी सही उतरी थी, इसलिए बारी जारी थी। अब वाणी ने वास्तविक उपलब्ध रास्ते से क्वीन ली। ऐसा संयोजन नहीं गढ़ा जो स्थिति नहीं देती थी। लाल गिर गई। दो अपनी सफेद बाकी थीं। अगला स्ट्रोक सही कवर होना था।
वाणी ने वैध बेसलाइन जगह पर स्ट्राइकर रखा और तय सफेद देखी। बाधा जा चुकी थी। पॉकेट का मुँह दिखता था। छोटा कट लगाया। तुरंत अगले स्ट्रोक में सफेद पॉकेट हुई। क्वीन कवर थी।
एक सफेद बाकी थी। राधिका की दोनों काली बोर्ड पर थीं। वाणी का मौजूदा स्कोर सत्रह था। बोर्ड जीतती तो क्वीन के तीन अंक मान्य थे। पूरी योजना को परिणाम बनाने के लिए आखिरी सफेद चाहिए थी। उसने पहली दो गोटियों की खाली जगह नहीं देखी। अंतिम लक्ष्य का रास्ता देखा। अब वही हिस्सा बचा था जिसके लिए उसने पहले बाधा हटाने का कठिन चुनाव किया था।
8. बाईस से इक्कीस
आखिरी सफेद दूर के कुशन के पास थी। कोने तक साफ, मगर संकरा रास्ता था। वाणी ने उसे अंत तक इसलिए छोड़ा था कि वर्तमान तरफ से रास्ता नियंत्रित था, निकटतम होने के कारण नहीं। अनुमत समय में हाथ स्थिर किया। राधिका थोड़ा पीछे बैठी ताकि अंपायर साफ देख सके। वाणी को वह बड़ी बहन याद आई जो पहले टूर्नामेंट फॉर्म में छूटी बातें देखती थी। उसने याद को निशाने से बाहर रखा।
स्ट्राइकर गया, सफेद से लगा और बोर्ड पर रहा। सफेद बाधा वाली काली को छुए बिना पॉकेट में गई। सारी अपनी गोटियाँ खत्म थीं। राधिका की दो काली बचीं। उनके दो अंक और वैध कवर की क्वीन के तीन मिलाकर पाँच। सत्रह से बाईस। राधिका इक्कीस। आठ बोर्ड पूरे। सीमा पर वाणी आगे थी। निर्णायक गेम 22–21 और मैच दो एक से उसका हुआ।
अंपायर ने दर्शकों को दो बार स्कोर बताया और आठवें बोर्ड की सीमा समझाई। इस परिणाम के लिए पच्चीस पहुँचना जरूरी नहीं था। राधिका ने पहली बाधा वाली सफेद की खाली जगह देखी। “पहले क्वीन पर नहीं गई।”
“नहीं।”
राधिका ने हाथ बढ़ाया। वाणी ने लिया। छोड़ने से पहले बहन की पकड़ एक बार कसी। चारों ओर तालियाँ बढ़ीं और दोनों अब भी बोर्ड देख रही थीं। वाणी ने घड़ी या दर्शक की ओर जल्दी नहीं की। अधिकारी ने परिणाम पर हस्ताक्षर माँगे तो स्ट्राइकर केस बंद किया। राधिका ने पेन आगे बढ़ाया। इस बार उसने बिना झिझक लिया।
9. रसीदों के दो ढेर
सम्मान के समय वाणी ने फोटो के लिए अंतिम बोर्ड फिर लगवाया। सफाई शुरू होने से पहले तीन सफेद वाली स्थिति चाहिए थी। राधिका ने सही जगह रखने में मदद की। दोनों के हाथ एक ही सफेद की तरफ बढ़े। रुके। फिर एक ने दूसरे को जगह दी। बाद में माँ ने साथ घर आने को कहा। वाणी मानी। राधिका ने दोस्त के पते पर टिप्पणी नहीं की।
वर्कशॉप के कागज़ दो कपड़े के बंडलों में थे। इस बार वाणी ने बगल में ट्रांसफर रिकॉर्ड खोले। पैसा आया था। वर्कशॉप की देनदारियों में गया था। राधिका ने माँ और घर के अपने चुकाए अलग बिल रखे। रकम रिश्तेदारों के संस्करणों में चलने के बजाय एक मेज़ पर थी।
वाणी ने बेचे बोर्ड के बारे में पूछा। राधिका ने तारीख, खरीदने वाले और उस रकम से हुए भुगतान बताए। फिर कहा कि पहले पूछना चाहिए था। वाणी ने खाली कवर मेज़ पर रखा। अहमदाबाद से बिना कारण समझे लाई थी। राधिका ने तह का किनारा छुआ, फिर हाथ पीछे किया।
माँ ने पानी माँगा। दोनों उठीं, रुकीं और एक दूसरे को देखा। राधिका बैठी। वाणी पानी लाई। लौटी तो रिकॉर्ड खुले थे। वे तब तक देखती रहीं जब तक हर बेटी दूसरी का उठाया हिस्सा दिखा सके।
मेज़ पर चाय ठंडी हो गई थी। वाणी ने दो कप रसोई में रखे। वापस आई तो राधिका ने एक नई पंक्ति खोली थी। उसमें अगला खर्च और किसे बताना है, दोनों के लिए जगह थी। वाणी उसके पास बैठ गई।
10. दोनों के बीच फ्रेम
एक सप्ताह बाद राधिका ने पुरानी वर्कशॉप के खराब बोर्ड के लिए फोन किया। वह खोया बोर्ड नहीं था। फ्रेम ढीला था, एक पॉकेट का जाल फटा। उसने पूछा कि अभ्यास के लिए ठीक करने में साथ देगी क्या। वाणी शनिवार दोस्त की दुकान से उधार क्लैंप लाई। राधिका ने वर्कबेंच खाली की थी। माँ दरवाज़े के पास बैठीं, जहाँ औजारों से दूर सब देख सकें।
सतह देखी, फ्रेम कसा और जाल बदला। वाणी एक कोना पकड़ती, राधिका पेंच लगाती। लकड़ी हिली तो रुकीं। एक दूसरे की पकड़ पर दोष देने के बजाय क्लैंप बदला। राधिका ने अगली सीजन के डबल्स की बात की। वाणी ने पूछा कौन किस तरफ खेलेगा। दोनों साथ जवाब देने लगीं, फिर साथ हँसीं।
“अभ्यास में पता कर सकते हैं,” राधिका ने कहा।
देखभाल की व्यवस्था और वाणी की यात्रा शिफ्ट जाँचकर तारीख रखी। ठीक बोर्ड को इस्तेमाल से पहले स्थिर होना था। काम खत्म होने से पहले किसी ने परिणाम दावा नहीं किया।
वाणी क्लैंप समेट रही थी। राधिका ने पुराना कपड़े का कवर उठाया। सुधरे बोर्ड पर फिट आता था। वह हाथ में लिए रुकी, जब तक वाणी ने विपरीत किनारा नहीं पकड़ा। दोनों ने साथ फ्रेम पर नीचे किया। हर एक वह तरफ थामे थी जहाँ दूसरे का हाथ नहीं पहुँचता था। माँ ने कहा कि एक किनारा मुड़ रहा है। वाणी ने सीधा किया और राधिका ने अपना हिस्सा थोड़ा छोड़ा। अब पूरा बोर्ड ढका था।
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