IND9: चैंपियन जिसने उसका नाम मिटाया
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IND9: चैंपियन जिसने उसका नाम मिटाया

काल्पनिक कहानी · पात्र और घटनाएँ कहानी का हिस्सा हैं।

IND9 की मौलिक शतरंज कहानी: अभ्यास साथी का श्रेय छीनने वाला चैंपियन छह कठिन बाजियों में उसके खेल और अपनी हार का सामना करता है।

1. IND9: मेरे नाम के सामने खाली जगह

आखिरी स्कोरशीट पर मैंने दो बार हस्ताक्षर किए। पहली बार हाथ इतना काँपा कि आयोजक ने पूछा, यह निशान मेरा ही है न। अरुणा तब तक बैठी रही जब तक मैंने उस हार के नीचे अपना नाम दोबारा नहीं लिख दिया, जिसने उसे मैच की विजेता बना दिया था।

छह बाजियाँ। साढ़े तीन अंक बनाम ढाई अंक।

छह बाजियों की शर्त मेरी थी। मैंने कहा था कि एक दोपहर कोई भी अच्छा खेल सकता है, असली स्तर लंबे मुकाबले में सामने आता है। अब वही लोग मेरी तरफ देख रहे थे, क्योंकि विजेता की तस्वीर लेने के लिए मुझे कुर्सी से उठना था।

मेरा नाम मलव सूरी है। उम्र तैंतालीस साल थी। मैं तीन बार शहर का चैंपियन बन चुका था। मुझे मालूम था कि ऐसे प्रतिद्वंद्वी को हराना कितना मुश्किल होता है जो आपकी हर योजना का उद्देश्य समझता हो।

अरुणा समझती थी।

सात साल उसने मेरी बाजियों का विश्लेषण किया था। मेरी नजर से छूटे बचाव खोजे थे। जिन अंतखेलों को मैं उबाऊ कहकर छोड़ देता था, उनके पीछे की बात समझाई थी। जब मेरी सफलता इतनी बढ़ी कि उसके काम के सामने पद लिखना जरूरी लगने लगा, मैंने उसे अभ्यास साथी कहना बंद कर दिया।

फिर उसने विरोध किया। मैंने उसे बुलाना बंद कर दिया।

छठी बाजी के नीचे मेरे हस्ताक्षर ने उसका पुराना काम वापस नहीं दिलाया। लिखित प्रमाण पहले ही बता चुके थे कि टिप्पणियाँ किसकी थीं। उस हस्ताक्षर ने दूसरी बात दर्ज की, जिसे सहना मेरे लिए ज्यादा कठिन था।

जिस इंसान को मैंने आसानी से बदला जा सकने वाला बताया था, वह मेरे सामने बैठकर मुझे हरा चुकी थी।

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2. कूड़ेदान में पड़े पन्ने

सब कुछ एक विश्लेषण बैठक के बाद शुरू हुआ। अरुणा ने पूछा कि हमारी बाजियों की पुस्तिका पर केवल मेरा नाम क्यों है। हाथियों के सक्रिय बचाव वाला पूरा अध्याय उसने लिखा था। उसके हाथ से बनाए चित्र अब भी प्रिंटर के पास पड़े थे।

मैंने कहा कि उसने तैयारी में मदद की थी।

उसने एक कठिन स्थिति दिखाई और कहा कि मैं उसके पन्ने देखे बिना बचाव की मुख्य चाल समझा दूँ।

लोग पहले हँसे। फिर उन्हें समझ आया कि मैं सचमुच जवाब नहीं दे पा रहा हूँ।

मैंने चित्र उठाकर कूड़ेदान में डाल दिए। कहा, “इतना कीमती काम है तो खुद छपवा लो।”

वह छियालीस साल की थी। उसी महीने स्कूल में उसका अध्यापन अनुबंध खत्म हुआ था। विश्लेषण के बदले मिलने वाली थोड़ी रकम अब उसके लिए जरूरी थी। मुझे यह बात पता थी। मुझे यह भी पता था कि वह अपनी बकाया फीस दो बार माँग चुकी थी।

अगले हफ्ते मैंने समूह में कहा कि वह कंप्यूटर का विश्लेषण देखने के बाद पुराने काम पर अपना नाम लगा रही है। मेरे पास सबूत नहीं था। सुनने वाले लोग थे, जिन्हें इस्तेमाल करना आसान लगा।

संपादक ने उसकी तारीख वाले मसौदे और हमारे पुराने संदेश देखे। पुस्तिका में उसका नाम जोड़ा। मुझसे आरोप वापस लेने को कहा। मैंने छोटे से अनुच्छेद में वापस लिया, जिसे शायद ही किसी ने पढ़ा हो।

बाद में मुझे पता चला कि कूड़ेदान वाले पन्नों के एक कोने पर चाय गिर गई थी। उसने फिर भी उन्हें रखा। स्कूल का कमरा छूटने के बाद किराए की छोटी जगह में शब्दकोश के नीचे दबाकर वे पन्ने सीधे किए थे।

3. उसने मेरे बिना क्या सीखा

शुरुआत में मुझे लगा कि वह मेरे पसंदीदा उद्घाटनों में कोई जाल खोज रही होगी। कई हफ्ते मैंने उसी काल्पनिक अरुणा के खिलाफ तैयारी की। असली अरुणा कहीं अधिक परेशान करने वाला काम कर रही थी।

वह साप्ताहिक विश्लेषण समूह में जुड़ गई थी। वहाँ जिस स्थिति में एक खिलाड़ी हमला करना चाहता, दूसरे को उसका सबसे मजबूत बचाव खोजना पड़ता था। समूह का सबसे अनुभवी सदस्य साठ साल का परिवहन पर्यवेक्षक था। उसे ऐसे सुंदर संयोजन पसंद नहीं थे जो प्रतिद्वंद्वी के सहयोग से ही पूरे होते हों।

वह हर बार पूछता, “दूसरा खिलाड़ी बचाव क्यों नहीं करेगा?”

अरुणा राजा की सुरक्षा, हाथी की सक्रियता और उस सही क्षण पर काम कर रही थी जब मोहरों की अदला-बदली राजा को आगे आने का अवसर देती है। उसकी कॉपियों में कई आकर्षक चालें काटी हुई थीं। वजह यह नहीं थी कि वे साधारण दिखती थीं। वजह यह थी कि सामने वाले के पास बेहतर उत्तर था।

मैंने वे पन्ने बहुत बाद में देखे। उस समय बस इतना सुना था कि वह अभ्यास में कई बाजियाँ हार रही है। मुझे सुनकर खुशी हुई थी।

एक हार में उसने प्यादा देकर सक्रियता ली। फिर तुरंत जीत खोजते हुए समय गंवाया और ऐसा अंतखेल मिला जिसमें दिया हुआ प्यादा बस कम था। समूह ने वही स्थिति दोबारा रखी, फिर रंग बदले। चौथी कोशिश में उसने शांत चाल चुनी और ऐसा दबाव बनाया जो एक अच्छे बचाव के बाद भी खत्म नहीं हुआ।

उसका सुधार कोई रहस्य नहीं था। वह सीख रही थी कि बिना दर्शकों की तालियों और बिना मेरी मंजूरी के भी दबाव बनाए रखा जा सकता है।

4. छह बाजियों की चुनौती

पुस्तिका में सुधार के बाद क्लब ने हम दोनों को सार्वजनिक विश्लेषण शाम में बुलाया। मैंने बातचीत की जगह मैच का सुझाव दिया। सुनने में उदार लगता था। भीतर मुझे अपनी जीत का पूरा भरोसा था।

अरुणा ने बराबर शर्तें माँगीं। कार्यक्रम लिखित हो। रंग बदलते रहें। हर बाजी में समय नियंत्रण एक जैसा हो। आयोजक मान गया। दो सप्ताहांतों में छह बाजियाँ खेली जानी थीं। अंक बराबर रहने पर मैच बराबर ही माना जाता।

मैंने वह भी स्वीकार कर लिया। मुझे बराबरी की चिंता नहीं थी।

एक पत्रकार ने पूछा कि क्या मैं उसे गंभीर प्रतिद्वंद्वी मानता हूँ। मैंने पहले कहा कि हर खिलाड़ी सम्मान का हकदार है। फिर तीन मिनट समझाया कि विश्लेषण करना और प्रतियोगिता खेलना अलग बात है।

अरुणा बिना टोके सुनती रही। पत्रकार ने उससे पूछा कि जवाब देना चाहेगी।

“छह बाजियों में,” उसने कहा।

मैंने उसके छोटे उत्तर को घबराहट समझा।

मेरी तैयारी खराब नहीं थी। यह स्वीकार करना चाहिए। मैंने उसकी हाल की बाजियाँ देखीं। वे संरचनाएँ चुनीं जिनमें वह पहले निर्णय लेने में झिझकी थी। पहली बाजी के लिए तीखा रास्ता तैयार किया। मेरा अहंकार मुझे आलसी नहीं बना रहा था। वह मुझे केवल अपनी सुविधा के प्रमाण देखने दे रहा था।

प्रमाण कह रहे थे कि वह बेहतर हुई है। मैंने उनका अर्थ निकाला कि मुकाबला कुछ देर दिलचस्प रह सकता है। पहली शाम वह साधारण कॉपी लेकर आई, उसे खेल क्षेत्र के बाहर रखा और मोहरे जाँचे। मैं दो लोगों के साथ आया था जो मेरे प्रवेश का वीडियो बनाना चाहते थे।

5. वह बाजी जो मैं जीता

पहली बाजी में सफेद मोहरे मेरे थे। मुझे तैयारी वाली स्थिति मिली। बीच में प्यादा आगे बढ़ाकर रास्ता खोला और मेरे मोहरे सक्रिय हो गए। अरुणा ने कुछ समय ठीक बचाव किया, फिर गलत हल्के मोहरे की अदला-बदली करके मेरे हाथी को अंदर आने दिया।

मैंने बढ़त को जीत में बदला। उसने बीस चाल और मेहनत कराई, लेकिन दूसरा प्यादा गिरने के बाद परिणाम पर गंभीर संदेह नहीं था।

एक-शून्य।

साक्षात्कार में मैंने इसे व्यावहारिक खेल का उपयोगी सबक बताया। अरुणा ने कहा कि खुद समीक्षा करने के बाद ही बाजी पर बोलेगी। मैं संतुष्ट होकर घर गया। वह विश्लेषण कमरे में रुकी और परिवहन पर्यवेक्षक के साथ वही स्थिति मेरे रंग से खेली।

दूसरी बाजी में उसने मुझे सुविधाजनक फैसले कम दिए। सधा हुआ उद्घाटन चुना। जल्दबाजी के बिना विकास किया। मेरी पहल लेने की कोशिश का सटीक अदला-बदली से उत्तर दिया। मेरा हाथी अधिक सक्रिय था, लेकिन जीत तक पहुँचने का रास्ता नहीं था।

फिर भी मैंने दबाव बढ़ाया। दूसरी जीत मिल जाती तो मैच लगभग समाप्त दिखता।

उसने खतरे की जाँच की, राजा सुरक्षित रखा और मुझे बराबरी वाला अंतखेल मानने पर मजबूर किया। प्यादों की दौड़ में उतरना कोई वास्तविक लाभ नहीं देता था। बस अपनी पसंद की कहानी के लिए जोखिम उठाना होता।

डेढ़ अंक बनाम आधा अंक।

मैंने पत्रकार से कहा कि उसने अच्छा बचाव किया। मेरे लहजे में ऐसा था जैसे मैं उसे अपने खेल से प्रसन्न होने की अनुमति दे रहा हूँ। उसने मेरी तरफ देखने के बजाय आयोजक से तीसरी बाजी का समय पूछा।

6. वह प्यादा जिसे मैं रख नहीं सका

तीसरी बाजी ने पहली बार मुझे चौंकाया। अरुणा काले मोहरों से खेल रही थी। मैंने रास्ते खोलने के लिए प्यादा देने का प्रस्ताव रखा। तैयारी में सोचा था कि वह उसे तुरंत ठुकराएगी या लेने के बाद निष्क्रिय बचाव करेगी।

उसने दोनों में से कुछ नहीं किया।

पहले खतरनाक हमलावर मोहरे की अदला-बदली की। उसके बाद प्यादा लिया, जब बाकी खतरों का जवाब मौजूद था। मेरे पास सक्रियता थी। स्थिति कठिन बनाने के लिए पर्याप्त, अपनी जीत निश्चित मानने के लिए नहीं।

अगले एक घंटे उसने हर धमकी को चालों से साबित करने पर मजबूर किया। मैं प्यादा वापस लेने बढ़ा तो उसने उसे ऐसी शर्त पर लौटाया जिससे उसका राजा सुधरा और हाथी को खुली लाइन मिली। सामग्री बराबर हो गई। मेरी स्थिति खराब हो गई।

तभी समझ आया कि उसने प्यादा संग्रह करने के लिए नहीं लिया था। उसने अदला-बदली के क्रम से बोर्ड के सवाल बदल दिए थे।

मैंने जिद से बचाव किया। दो बार उसने आकर्षक रास्ता छोड़ा क्योंकि मेरे पास बीच में शह देने का संसाधन था। तीसरी बार उसने अपना एक प्यादा पीछे रखा, मेरी उपयोगी प्रतीक्षा चाल छीन ली और मुझे नई कमजोरी स्वीकार करनी पड़ी।

एक और प्यादा गिरने के बाद वह अंतखेल बचने योग्य नहीं रहा। मैंने हार मान ली।

डेढ़-डेढ़ अंक।

अरुणा ने दर्शकों की तरफ देखने से पहले स्कोरशीट पर हस्ताक्षर किए। तालियों से ज्यादा वह बात चुभी। उसने काम पूरा कर लिया था। उसे यह देखने की जरूरत नहीं थी कि मैं आखिर उसकी बात समझा या नहीं।

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7. दो बराबरियाँ जिन्हें कमाना पड़ा

चौथी बाजी की लड़ाई मुझे आज भी गर्व से याद है। मैंने ऐसा बचाव खोजा जिसमें उसकी पहल स्थायी होने से पहले सही मोहरों की अदला-बदली हो गई। उसके बाद बने अंतखेल में उसने मेरा छोटा जाल देख लिया। हम दोनों ने जीत की कोशिश की और बाजी बराबर रही।

पाँचवीं बाजी अलग थी। उसमें मैंने जरूरत से ज्यादा जोर लगाया। आखिरी बाजी से पहले बढ़त चाहिए थी। बराबर अंक लेकर उसमें जाना अब मुझे डराने लगा था।

मैंने हमला बचाए रखने के लिए प्यादा धकेला, जबकि हमले के पीछे पर्याप्त ताकत बची ही नहीं थी। अरुणा ने बीच का रास्ता खोला। मेरे राजा के आसपास खाली हुए खाने अचानक मेरे खिलाफ सवाल पूछने लगे।

लगभग एक घंटा खराब स्थिति बचाता रहा। हाथी सक्रिय करने के लिए प्यादा छोड़ा। किनारे से शहें दीं। आखिर ऐसी स्थिति मिली जिसे तोड़ने के लिए अरुणा को बड़ा जोखिम लेना पड़ता।

जब बोर्ड ने बराबरी का कारण दिया, उसने बराबरी स्वीकार की।

ढाई-ढाई अंक।

हॉल के बाहर मेरे एक दोस्त ने कहा कि वह मुझे खत्म करने से डर गई। मैं लगभग सहमत हो गया था। फिर वह बचाव याद आया जिसने वास्तव में बाजी बचाई थी। उसे खोजने में मैंने चौदह मिनट लगाए थे।

“उसने बचाव देख लिया था,” मैंने कहा।

दोस्त ने आश्चर्य से देखा। मुझे भी अपना उत्तर अजीब लगा। उसके खेल के बारे में यह पहला ईमानदार वाक्य था जो मैंने ऐसे अवसर पर कहा था जब कोई मुझसे उदार दिखने की अपेक्षा नहीं कर रहा था।

8. वह अदला-बदली जिसका उसने इंतजार किया

छठी बाजी में अरुणा के सफेद मोहरे थे। मैंने मजबूत बचाव चुना। उसके किसी तैयार उद्घाटन विचार से हारना नहीं चाहता था।

मध्यखेल में उसे जल्दी रानियाँ बदलने का मौका मिला। उसने मना किया। उस समय ऐसा करने से मेरे फँसे मोहरे मुक्त हो जाते और उसे उपयोगी लक्ष्य नहीं मिलता। उसने घोड़े की जगह सुधारी और तनाव रहने दिया।

मैंने हाथी के लिए लाइन खोलने की कोशिश की। उसने प्यादे की बढ़त का सटीक उत्तर दिया। उससे बनी कमजोरी ने मेरे ऊँट को एक ऐसे प्यादे का पहरेदार बना दिया जिसे छोड़ना संभव नहीं था।

अब उसने खुद रानियों की अदला-बदली का प्रस्ताव रखा।

बड़े प्रदर्शन बोर्ड पर फर्क छोटा दिखता था। मेरी कुर्सी से बहुत बड़ा था। मेरे एक मोहरे को स्थायी काम मिल चुका था। उसका राजा दूसरी तरफ पहुँचने के लिए समय पा सकता था।

मैं मना कर सकता था, लेकिन बाकी रास्तों में मेरी रानी बचाव करती रहती और उसकी सक्रिय रहती। मैंने अदला-बदली स्वीकार की। अंतखेल हल करने लगा।

उसने दूसरे प्यादे पर दबाव बनाया। मैं हाथी उधर ले गया तो उसका राजा पहली कमजोरी की तरफ बढ़ा। राजा को रोका तो उसने हाथी की जगह बदली। कोई धमाकेदार चाल नहीं हुई। हर समझदार बचाव के बाद मेरी सुविधा एक खाना और कम हो जाती थी।

मैंने एक बार दर्शकों की तरफ देखा। सब बोर्ड देख रहे थे। वर्षों से मैं उनका ध्यान अपने नियंत्रण का प्रमाण मानता था। छठी बाजी ने दोनों का फर्क ऐसी भाषा में समझाया जिसे बीच में रोका नहीं जा सकता था।

9. आखिरी उपयोगी शह

स्थिति सरल करने की मेरी कोशिशों में बचे हुए हल्के मोहरे भी बदल गए, लेकिन प्यादों की कमजोरियाँ बनी रहीं। तभी मुझे शहों का एक क्रम मिला जो शायद बचाव दे सकता था। अरुणा राजा को छिपा सकती थी, मगर बहुत जल्दी ऐसा करती तो अपना ही हाथी बंद कर देती। तब मेरे हाथी को सक्रिय करने वाला प्यादा छूट जाता।

उसने स्वाभाविक दिखने वाली चाल चलने से पहले रुककर जाँच की। फिर पहले हाथी हटाया।

स्थिति मेरे लिए समझाना कठिन और उसके लिए खेलना आसान हो गई। उसके राजा के पास शहों से निकलने का रास्ता बचा रहा। मेरा हाथी पीछे का कमजोर प्यादा छोड़े बिना लगातार हमला नहीं कर सकता था।

मैंने एक और शह दी। उसने तैयार खाना इस्तेमाल किया। मैंने प्यादे पर हमला किया। उसने दूसरा प्यादा आगे बढ़ा दिया।

अब भी विकल्प थे। कोई भी दस चाल पहले वाली स्थिति वापस नहीं देता था। मैंने बचे हुए हाथी बदल दिए, इस उम्मीद में कि प्यादों की दौड़ में कोई बचाव निकल आए। उसने अदला-बदली स्वीकार करने से पहले वह दौड़ गिन ली थी।

उसका राजा जरूरी खाने पर पहले पहुँचा। मेरे आखिरी प्यादे की चाल ने नया मोहरा बनने में केवल एक चाल की देर की। परिणाम नहीं बदला।

मैंने घड़ी रोक दी। अरुणा ने हाथ नहीं उठाए। मेरा हाथ मिलाया और परिणाम लिखने लगी। मेरे हस्ताक्षर के बीच पेन बंद हो गया था, इसलिए आयोजक दूसरा पेन लेकर आया।

यहीं से यह कहानी शुरू हुई थी। वह मेरे दोबारा हस्ताक्षर करने तक बैठी रही। उसके नाम के सामने लिखा अंक क्या कह रहा था, यह किसी को मुझे समझाना नहीं पड़ा।

10. वह विवरण जिसे छोटा नहीं कर पाया

संपादक ने मैच रिपोर्ट के लिए मुझसे एक बाजी पर टिप्पणी माँगी। मैंने पहली बाजी सुझाई, जो मैं जीता था। उसने छठी माँगी।

अरुणा ने कहा कि वह सभी छह बाजियों पर टिप्पणी करेगी। मैं चाहूँ तो अपने उत्तर उसके साथ छपवा सकता हूँ। उसने अपने काम पर साझा नाम देने का प्रस्ताव नहीं रखा। उसने अपनी चालों के सामने मेरी चालों की व्याख्या के लिए जगह दी।

मैंने स्वीकार किया।

रिपोर्ट में उसकी पहली हार भी थी। पाँचवीं बाजी में मेरा वास्तविक बचाव भी था। आखिरी अंतखेल में हाथी की वह चाल भी थी जो मैं नहीं देख पाया था। मेरी टिप्पणियाँ मेरे नाम से छपीं। उसकी टिप्पणियाँ उसके नाम से।

पुरस्कार देते समय किसी ने कहना शुरू किया कि मेरी पूर्व सहायक ने अच्छी तरह सीख लिया है। अरुणा को बोलना पड़ता, उससे पहले मैंने उसे रोक दिया।

“वह मेरी अभ्यास साथी थी,” मैंने कहा। “अपने फायदे के लिए मैंने उसका परिचय बदला था।”

इस स्वीकारोक्ति पर तालियाँ नहीं बजीं। अच्छा हुआ। वह मेरे लिए दूसरा मंच नहीं बनना चाहिए था।

अरुणा ट्रॉफी लेकर उन लोगों के साथ चली गई जिन्होंने उसकी तैयारी में मदद की थी। उनकी तस्वीर में मुझे नहीं बुलाया गया। मैंने बुलाने को भी नहीं कहा।

एक महीने बाद क्लब में मैंने छठी बाजी की स्थिति लगाई और सदस्यों से अपना सबसे मजबूत बचाव खोजने को कहा। कई ने मेरी सोची चालें खोजीं। जिस जगह से स्थिति रखी थी, उसके बाद कोई अंतखेल नहीं बचा पाया।

इस बार हार समझाते समय मैंने बोर्ड के ऊपर उसका नाम दिखाई देने दिया।

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