1. INR Rummy: बेटी जीत गई
पहले चयन सत्र में मीरा अपनी बेटी से हार गई। निशा ने घोषणा जाँची, अधिकारी की पुष्टि का इंतजार किया और माँ की तरफ हाथ बढ़ाया। मीरा ने मिलाया। छोटी खिलाड़ी ने बेहतर खेला था।
दर्शक सीमा के पीछे हरेंद्र धीरे धीरे ताली बजाने लगा। “अब शायद रिटायरमेंट उलटी होती है। बच्चे पुराने चैंपियनों को सिखाते हैं।”
मीरा उनचास साल की थी। पति की लंबी बीमारी में आठ साल अधिकांश क्लब शामें छूटी थीं। उसने गोलियाँ, डॉक्टर की तारीखें और कमरे से सड़क तक सीढ़ियाँ गिनी थीं। हरेंद्र ने बिना रुकावट रम्मी के सीजन गिने थे। वापसी पर उसने लोगों से कहा मीरा खेल भूल गई है। बेटी की जीत अब उसके लिए सुविधाजनक उदाहरण थी।
विराम में उसने कागज़ की प्लेटें थमा दीं। “आजकल खेल की जगह रसोई ज्यादा जानती हो।”
निशा बोलने लगी। बेटी बचाव करे, उससे पहले मीरा ने प्लेटें खाली मेज़ पर रख दीं। शौचालय जाकर दरवाज़ा बंद किया। आईने में चेहरे का पाउडर मुँह के पास की लकीरों में जम गया था। उसने गीला कपड़ा लगाया, जब तक पानी साफ नहीं हुआ।
फिर अगले चयन सत्र के लिए लौट गई। बेटी ने हराया था। उस परिणाम से सीख सकती थी। हरेंद्र की खुशी अपने आप कोई परिणाम नहीं थी। अगली डील के लिए उसने हाथ मेज़ पर रखे और अधिकारी की आवाज़ पर ध्यान दिया।
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2. INR Rummy कथा: रजिस्टर से गायब साल
पति की बीमारी से पहले मीरा काल्पनिक अशोका रीडिंग क्लब की रम्मी कप्तान थी। हरेंद्र सबसे मजबूत साथी और सबसे लगातार प्रतिद्वंद्वी था। दोनों लगभग हर नज़दीकी फैसले पर बहस करते, फिर चाय पीते।
उसकी अनुपस्थिति में हरेंद्र कप्तान बना। पहले फोन करके परिणाम बताता। बाद में सिर्फ पुराने फॉर्म पर हस्ताक्षर चाहिए तो बुलाता। आखिर वे फोन भी बंद हुए।
मीरा ने नियमित अभ्यास में लौटना चाहा तो उसने कहा मजबूत समूह पूरा है। किनारे से देख सकती है। पत्ते लाने की जरूरत नहीं। पति अब सीमित सहायता से रोज के काम संभाल सकता था। मीरा ने नौकरी का समय बदला, क्लब पहुँची और मजबूत समूह के कमरे के बाहर बैठी, क्योंकि हरेंद्र ने हर काम का सत्र बुक कर रखा था।
एक शाम उसने मेहमान से कहते सुना कि उसकी पुरानी जीत धीमे दौर की थी। दीवार की तस्वीरों में वह अब भी ट्रॉफी लिए थी। क्लब के नए इतिहास में मगर उसकी कप्तानी एक वाक्य में थी। हरेंद्र के साल तीन पन्नों में थे।
उसने खुले चयन की तारीखें फोन में लिखीं। क्लब की लिखित प्रक्रिया रास्ता देती थी जिसे अभ्यास कमरे की चाबी से बंद नहीं किया जा सकता था।
घर में खाने की मेज़ का एक सिरा साफ किया। वर्षों बाद वह जगह दवाइयों के लिए आरक्षित नहीं थी। उसने पुरानी ताश निकाली और नए अभ्यास का पहला पन्ना खोला।
3. दो गड्डियाँ और कठिन सवाल
निशा छब्बीस साल की थी। जब मीरा घर चलाने में व्यस्त थी, उसने अपना खेल विकसित किया था। दोनों हफ्ते में दो बार अभ्यास करने लगीं। किसी ने छोटी खिलाड़ी के अनुभव को परिवार से विश्वासघात नहीं माना।
चयन में हुई मुलाकात के बाद निशा ने माँ का सबसे महँगा हाथ फिर लगाया। “जोकर ऐसे रखा जैसे हर समस्या हल कर देगा।”
मीरा के पास कई उपयोगी दिखते समूह थे, मगर सुरक्षित प्योर सीक्वेंस नहीं था। उसने जोकर की लचक की तारीफ की थी, बाकी हाथ की जरूरत नहीं पूछी थी।
उन्होंने तेरह पत्तों की घोषणा ध्यान से देखी। कम से कम दो सीक्वेंस, एक प्योर, बाकी पत्तों के पूरे सही समूह। जोकर उचित समूह में मदद कर सकता था। केवल मूल्यवान होने से अधूरा हाथ पूरा नहीं होता।
मीरा ने हर पत्ते को एक समय एक काम देना सीखा। वैकल्पिक व्यवस्थाएँ अलग लिखीं। एक पत्ते से दो काल्पनिक समूह पूरे नहीं करने दिए।
फिर निशा बिना चेतावनी हाथ बदलती। मजबूत शुरुआत कमजोर हो जाती। दूसरी संरचना ज्यादा रास्ते देती तो पहले अच्छा दिखता जोड़ छोड़ना पड़ता।
जिसकी स्कूल की वर्दी इस्त्री करना अब भी याद था, उससे सुधार सुनना मीरा को बुरा लगता। हारना ज्यादा बुरा लगता। तीसरे सत्र तक उसने उपयोगी आलोचना के जवाब में बेटी के जन्म से पहले जीती ट्रॉफियों की कहानी सुनाना बंद कर दिया। अब वह हाथ पर लौटकर पूछती, बेहतर विकल्प कौन सा था?
4. कुर्सी वह खुद लाई
नगरपालिका केंद्र में सप्ताह की दोपहर मेज़ मिली। उपलब्ध कुर्सियों से पीठ दुखती थी, इसलिए मीरा मुड़ने वाली कुर्सी लाई। इसे मजबूरी नहीं कहा। यह वह कुर्सी थी जिसमें ठीक अभ्यास कर सकती थी।
छोटा वयस्क समूह जुड़ा। कुछ मजबूत, कुछ नए। किसी को उसकी पुरानी प्रतिष्ठा बचाने की जरूरत नहीं थी। वे प्रकाशित चयन प्रारूप खेलते और दंड ईमानदारी से लिखते।
मीरा को अलग ऊँचे पत्तों की कीमत दिखने लगी। अच्छे कारण से उपयोगी जोड़ रखना ठीक था। महँगा पत्ता सिर्फ इसलिए रखना कि कई बारी से हाथ में था, कारण नहीं था।
दो सीक्वेंस रास्तों में चुनाव, सुधार न होने पर जोखिम कम करना और घोषित ड्रॉप विकल्प को अपमान न मानना अभ्यास का हिस्सा बना।
सीखते हुए कई सत्र हारी। एक दोपहर इतना गुस्सा था कि दाल में नमक ज्यादा पड़ गया। पति ने चखा, कुछ नहीं कहा और दूसरा चम्मच लिया। वह भोजन को त्याग का प्रदर्शन बनाता, उससे पहले मीरा हँस दी।
अगले चयन में वह हरेंद्र के कथित भरे मजबूत समूह के तीन खिलाड़ियों से आगे रही। उसने अनुकूल दोपहर कहा। अगले दौर में फिर वही हुआ। अधिकारियों ने परिणाम जोड़े। बार बार आने वाली दोपहरें उसकी राय से ज्यादा जगह लेने लगीं।
मीरा ने कुर्सी मोड़ी और अगली तारीख लिखी। अब उसे कमरे के बाहर बैठने से अपनी तैयारी रुकती हुई नहीं लगती थी। दूसरी जगह उसका काम बढ़ रहा था।
5. दोनों ने जगह कमाई
मीरा चयन अंकों से आगे पहुँची। निशा अंतिम सत्र के भारी नुकसान के कारण थोड़े अंतर से फाइनल स्थान चूक गई। वह निराश थी और माँ के लिए छुपाने का नाटक नहीं किया।
मीरा ने शाम तक इंतजार करके साथ समीक्षा पूछी। “कल,” निशा बोली। “कल।”
एक की प्रगति से दूसरी को बराबर खुश अंत नहीं मिला था। फिर भी सम्मान बचा रहा।
कप्तानी का अंतिम मुकाबला मीरा और हरेंद्र के बीच नौ डील का था। चयन से पहले घोषित कुल दंड वाला प्रारूप लागू था। कम कुल वाला जीतता। बराबरी, घोषणा और स्कोर सुधार की अलग स्पष्ट प्रक्रिया थी।
अगला कप्तान अभ्यास समय और तैयारी संभालता। टीम की जगह प्रकाशित चयन परिणाम से ही तय होती। हरेंद्र ने कभी नियम का समर्थन इसलिए किया था कि हारने की कल्पना नहीं की थी।
फाइनल से पहले उसने समिति से कहा कि मीरा की वापसी भावुक और अस्थायी है। बैठक के विवरण में भविष्यवाणी पर्याप्त साफ दर्ज हो गई।
मीरा खिलाड़ी कार्ड और अपनी कुर्सी लेकर आई। अधिकारी ने कार्यालय की आरामदेह कुर्सी दी। उसने स्वीकार की और अपनी मोड़कर दीवार के पास रखी।
सामने हरेंद्र साधारण काम को ऐसे देख रहा था जैसे उसने उसकी चीज़ ले ली हो। मीरा ने सीट जाँची, कार्ड मेज़ पर रखा और नियम वाली शीट फिर पढ़ी। इस बार कमरे में उसका स्थान किसी की निजी अनुमति से नहीं आया था।
6. पुरानी बहस लौटी
पहली तीन डील ने पुरानी प्रतिद्वंद्विता लौटा दी। शुरुआती हरेंद्र जीता। दूसरी मीरा ने सही व्यवस्था से पूरी की, जिसे हरेंद्र ने अधिकारी जितनी सावधानी से देखा। तीसरी में उसने ऊँचा पत्ता ज्यादा देर रखा, जबकि अब उससे पर्याप्त संभावना नहीं बनती थी। दंड ने पीछे कर दिया।
हरेंद्र ने पर्ची थपथपाई। “आधुनिक खेल से यही मतलब था।”
मीरा को उसकी पंद्रह साल पुरानी लगभग ऐसी ही गलती याद आई। कमरे को सुना सकती थी। इसके बजाय देखा कि खुद अभी क्यों की।
चौथी में कमजोर जोड़ मिले। कुछ और होने का नाटक करने का आधार नहीं था। उसने लिखित प्रारूप का शुरुआती ड्रॉप चुना। हरेंद्र मुस्कुराया, मगर तय दंड उस नुकसान से कम था जो अभ्यास में बार बार खुद करती थी।
पाँचवीं तक काम की लय लौट आई। पहले प्योर सीक्वेंस जाँचा। फिर बाकी पत्तों को बिना दोहरी गिनती लगाने के रास्ते देखे। उपयोगी पत्ता आया तो हर समूह देखने से पहले घोषणा की जल्दी रोकी। अधिकारी ने पूर्णता की पुष्टि की।
हरेंद्र के बाकी पत्तों की कीमत उम्मीद से अधिक हुई। बढ़त कम हुई। अब वह केवल अपनी जीत के बाद नहीं, हर डील के बाद कुल पूछने लगा।
मीरा ने पानी लिया और अगली फेंटाई का इंतजार किया। उसे उसका चेहरा पढ़ने की जरूरत नहीं थी। स्कोर शीट बता रही थी कि मुकाबला खत्म नहीं हुआ। आगे की डीलें अपने फैसले माँगने वाली थीं।
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7. जोकर की जगह बदली
छठी में मीरा के पास जोकर के दो उपयोग थे। एक तुरंत सुंदर सेट बनाता, लेकिन बाकी पत्तों को बहुत संकरे सीक्वेंस पर निर्भर छोड़ता। दूसरा सीक्वेंस संभालता और अधूरी रैंक व्यवस्थित करने के कई वास्तविक रास्ते रखता। उसने दूसरा चुना।
हरेंद्र ने खुला पत्ता उठाया। उससे संभावना का आकलन बदला, पूरा हाथ नहीं दिखा। उसने राय बदली, मगर एक अनिश्चित अनुमान के जवाब में पूरा समूह नहीं तोड़ा।
वह डील हारी। दंड उस पहली व्यवस्था से कम था जिसमें हाथ खत्म होता। परिणाम चमकदार नहीं था, लेकिन मुकाबला करीब रहा।
सातवीं में हरेंद्र तेज हाथ चलाकर और बार बार अधिकारी की तरफ देखकर जल्दी करवाना चाहता था। अनुमति वाला निर्णय समय वही था। मीरा ने इस्तेमाल किया। आखिरी जाँच के बाद घोषणा की। सही निकली।
आठवीं उसके खिलाफ गई। हरेंद्र कुशल खेला। कमरे के बाहर ज्यादा सहने से उसका परिणाम नहीं मिट सकता था।
नौवीं से पहले मीरा के एक सौ तीन दंड अंक थे। हरेंद्र के अट्ठासी। वह पंद्रह आगे था।
निशा पीछे खड़ी थी। माँ के लिए एक पत्ता भी नहीं खेल सकती थी। मीरा ने एक बार उसे देखा, फिर उस खाली जगह पर लौटी जहाँ अंतिम हाथ आने वाला था। दोनों महिलाओं के बीच मदद की इच्छा थी, लेकिन मेज़ पर अपना फैसला खुद करने की सीमा भी स्पष्ट थी। मीरा ने हाथ ढीले छोड़े।
8. तेरह जगहें
आखिरी हाथ ने ईंट के चार, पाँच और छह का प्योर सीक्वेंस दिया। चिड़ी के आठ और नौ में दस की जगह जोकर लगाकर दूसरा बनाया। अलग सूट के तीन दो का सेट था। तीन बेगमें दूसरा सेट देती थीं, मगर तेरहवाँ पत्ता अलग बादशाह था। हरेंद्र से पहले सही तेरह पत्तों की व्यवस्था और अंतिम डिस्कार्ड पूरा करना जरूरी था।
खुली गड्डी में अवसर दिखा। लेने से दूसरी व्यवस्था करनी पड़ती और पहले से पूरे समूह की निश्चितता टूटती। मीरा ने विकल्प गिने। नया रास्ता जितना पहले लगा था उससे संकरा था।
उसने खुला पत्ता छोड़ा और बंद गड्डी से लिया। मदद नहीं मिली।
हरेंद्र पत्ते कसकर समूहों में रखने लगा। वह नहीं जान सकती थी कि पूरे हैं या नहीं। खुले डिस्कार्ड देखे और अनजान जगहों को सबसे डरावनी कल्पना से भरने से रोका।
अगली बारी ईंट की बेगम आई। उसे पान, चिड़ी और हुकुम की बेगमों में जोड़ा। अलग बादशाह छोड़ा और समूह गिने। तीन, तीन, तीन और चार।
प्योर सीक्वेंस फिर जाँचा। जोकर का एक तय काम था। कोई पत्ता दो बार नहीं गिना गया। फिर घोषणा की।
आवाज़ ऊँची नहीं थी, मगर पास खड़े अधिकारी ने साफ सुनी। उसने हाथ फैलाया। अब हर समूह सबके सामने अपनी सही जगह पर था। महीनों का अभ्यास इसी जाँच में उपस्थित था।
9. पंद्रह अंक टिक नहीं पाए
अधिकारी ने हाथ जाँचा और शर्तें पूरी होने की पुष्टि की। हरेंद्र ने जोकर वाला सीक्वेंस देखने को कहा। अधिकारी ने साफ दिखाया। कुछ गायब नहीं था। उसके अधूरे हाथ में छब्बीस दंड जुड़े। अट्ठासी एक सौ चौदह बने। मीरा एक सौ तीन पर रही। नौ डील का मुकाबला ग्यारह अंकों से जीत गई।
क्षण भर हरेंद्र संख्याएँ ऐसे देखता रहा जैसे जोड़ का अर्थ बदल दिया हो। फिर हस्ताक्षर किए। अधिकारी ने प्रमाणित पर्ची समिति के सामने रखी।
घोषणा पर मीरा रसोई दरवाज़े के पास कागज़ की प्लेटें देखे बिना उठी। शाम भर दूसरों के दिए परिचय काफी ढो चुकी थी।
समिति अध्यक्ष ने परिणाम और अगले सीजन की कप्तानी घोषित की। हरेंद्र चयन स्कोर से कमाया टीम स्थान रखता, मगर अभ्यास समय नियंत्रित नहीं करेगा।
औपचारिकता के बाद निशा आई। माँ को प्रेरणा नहीं कहा। आखिरी हाथ दिखाकर पूछा कि बेगम आने से पहले खुले पत्ते को लेने पर विचार किया था?
“हाँ। फिर गिना कि उससे क्या टूटेगा।”
निशा मुस्कुराई। आखिर ऐसी बातचीत पहुँची थीं जिसमें उम्र या परिवार का प्रेम फैसले की गुणवत्ता छुपाने के काम नहीं आता था।
मीरा ने अंतिम पर्ची मोड़ी। अगली बार अभ्यास में वही हाथ फिर लगाएगी। जीत का सबसे उपयोगी हिस्सा अब उसके समझाने योग्य निर्णय में था, और उसका सबसे सुखद हिस्सा सामने खड़े प्रतिद्वंद्वी को सही स्कोर स्वीकार करते देखना था।
10. मेज़ पर चाबी
पहली टीम समीक्षा में सचिव ने पिछली बैठक के बाकी विषय पढ़े। एक हरेंद्र की भविष्यवाणी थी कि मीरा की वापसी अस्थायी और कप्तानी के लिए अनुपयुक्त है। कमरा उसके स्पष्टीकरण का इंतजार करता रहा।
“उसके वर्तमान स्तर के बारे में मैं गलत था,” उसने आखिर कहा।
मीरा ने मूल वक्तव्य के साथ सुधार दर्ज करने को कहा। फिर अभ्यास समय पर आई। हर योग्य खिलाड़ी मजबूत समूह में आ सकेगा। उपलब्धता फॉर्म की जरूरतों के अनुसार अतिरिक्त सत्र होंगे।
हरेंद्र ने चाबी मेज़ पर रखी। मीरा ने केंद्र प्रशासक को दी। प्रवेश प्रकाशित बुकिंग से चलेगा। अगले व्यक्ति का अवसर कप्तान की निजी कृपा पर नहीं होगा।
शाम को मीरा अपनी मुड़ने वाली कुर्सी घर लाई। पति ने पूछा, क्या उसे लाना बंद करने का अधिकार जीत गई?
“चुनने का अधिकार जीती हूँ।”
निशा प्रकाशित बुकिंग सूची लाई। हरेंद्र ने मजबूत समूह का पुराना समय माँगा था; उसी प्रणाली से मीरा पहले बुक कर चुकी थी। प्रशासक ने उसे दूसरा समय दिया था।
मीरा ने कागज मोड़कर कुर्सी के कवर में रखा। वर्षों तक हरेंद्र कमरा अपना कहकर बहस खत्म कर देता था। अब समय, प्रवेश और चाबी का हिसाब दूसरी जगह था। उसे भी बाकी लोगों की तरह कैलेंडर के समय पर आना होगा।
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