IS7 Game: तीसरे बोर्ड की बुआ ने टीम फाइनल तय किया
IS7 Game

IS7 Game: तीसरे बोर्ड की बुआ ने टीम फाइनल तय किया

काल्पनिक कहानी · पात्र और घटनाएँ कहानी का हिस्सा हैं।

IS7 Game की मौलिक शतरंज कथा: मीना भतीजे की परछाईं से निकलती है, हार का अध्ययन करती है और वजीर वाले अंत में सटीक फैसलों से टीम को जिताती है।

1. IS7 Game कथा: तीसरे बोर्ड पर बुआ

परिवार की तस्वीर में अखिल अपना पहला शतरंज प्रमाणपत्र पकड़े था। किनारे पर मीना का हाथ उसकी कॉलर ठीक करता दिखता था। तस्वीर बड़ी करवाते समय उसका चेहरा काट दिया गया था। उन्नीस साल बाद भी वही तस्वीर भाई के बैठक कमरे में टंगी थी।

अब अखिल अट्ठाईस का था। मीना सैंतीस की, उसके पिता की बहुत छोटी बहन। अखिल की मां की मृत्यु के बाद उसने उसे पालने में मदद की थी। भाई काम के लिए यात्रा करता था। घर के कैलेंडर से मीना की अपनी प्रतियोगिताएं एक एक करके गायब हुई थीं।

परिवार के क्लब में टीम चुनते समय भाई ने उसका परिचय उस व्यक्ति के रूप में दिया जो हमेशा अखिल की चीजें संभालती रही।

“बैग देख लेगी। बोर्ड पर प्रतिस्पर्धी खिलाड़ी चाहिए।”

अखिल असहज दिखा, लेकिन सुधारा नहीं। मीना ने प्रवेश पत्र मेज पर रखा। एक साल स्वतंत्र खेलकर प्रतियोगिता के लिए जरूरी रेटिंग और पात्रता हासिल कर चुकी थी। आयोजक ने रिकॉर्ड देखकर तीन खिलाड़ियों वाली टीम का तीसरा बोर्ड दिया।

भाई हंसा। “कम से कम लड़के पर पास से नजर रख पाएगी।”

मीना ने बिना जवाब अपनी जगह ली। पहले बोर्ड पर अखिल, दूसरे पर नीरज, तीसरे पर उसका अपना प्रतिद्वंद्वी होना था। शाम को अखिल ने पूछा कि उससे नाराज है क्या।

“कल अभ्यास में अपनी घड़ी लाना,” उसने कहा। फिर अपने पंजीकरण की प्रति फाइल में रख दी। इस बार घर के काम वाली सूची के बीच नहीं रखी।

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2. पाठ जिन्हें अब धीरे नहीं कहती

मीना ने एक साल पहले प्रतियोगिता में वापसी की थी। उसे समझ आया था कि अखिल की हारी बाजियां जितने ध्यान से समझाती है, अपनी इच्छा को उतना नहीं देखती। हफ्ते की दो शाम तय कीं। परिवार ने शुरू में उन्हें लचीला माना। कभी पार्सल, कभी खाना, कभी भूला कागज ढूंढ़ना। वह देर से बोर्ड पर लौटती और खराब खेलती।

फिर रसोई के कैलेंडर पर अभ्यास समय लिखा। उस दौरान सामान्य फोन उठाना बंद किया। अखिल एक दिन अपना ओपनिंग दिखाने आया। उसने उसे वजीर वाले अंत में विरोधी के मोहरे दे दिए। अखिल शह देता रहा। अतिरिक्त प्यादे के बावजूद उसे बराबरी स्वीकार करनी पड़ी।

“फिर,” उसने कहा।

दोनों ने राजा का आश्रय, शह की दिशा और ज्यादा प्यादे होने तथा शहों से निकल सकने वाले राजा का अंतर पढ़ा। कभी महत्वहीन प्यादा छोड़ने से राजा और वजीर जोड़ने का समय मिलता था।

अखिल शुरू में हर चाल ऐसे समझाता जैसे उसे सिखा रहा हो। फिर मीना ने दिखाया कि उसकी आकर्षक शह वजीर बदलकर हारा प्यादा अंत देती है। वह बीच वाक्य में रुक गया और गणना करने लगा।

अगला अभ्यास शांत हुआ। दोनों ने गलत आंकी स्थितियां लिखीं। बचपन के बाद पहली बार अखिल बिसात अलमारी में रखने गया जबकि मीना अपना विश्लेषण पूरा कर रही थी। वापस आया तो उसने वही कठिन शह फिर रखी। इस बार उत्तर सुनने के लिए बैठा।

3. पहला दौर: परिवार को अपना प्रमाण मिलता है

प्रतियोगिता तीन टीमों के समूह से शुरू हुई। हर टीम बाकी दोनों से खेलती। शीर्ष दो फाइनल में जातीं। समूह में मैच नतीजे बराबर होने पर बोर्ड अंक अंतर करते।

पहला मैच दो एक से हार गए। अखिल जीता। नीरज हारा। मीना कठिन वजीर अंत में अतिरिक्त प्यादा ज्यादा देर बचाने के कारण मजबूर करने वाले आक्रमण में फंसकर हारी।

भाई को वही सुनाई दिया जिसकी उम्मीद थी।

“लड़के ने अपना काम किया।”

उसने निकास के पास कहा। दूसरे खिलाड़ी सुन सकते थे। मीना चाल पर्ची मोड़ रही थी। अखिल ने बोलने को मुंह खोला, फिर हिचका। बोलने तक पिता मुड़ चुके थे।

मीना अकेली विश्लेषण कमरे में गई। हारी स्थिति बिसात पर रखी। वह चाल खोजी जहां लालच ने गणना की जगह ली। किनारे का अतिरिक्त प्यादा छोड़ा जा सकता था। बचाने से वजीर उन खानों से हट गया था जो राजा को आश्रय देते।

पास से गुजरते वयस्क प्रतिद्वंद्वी ने स्थिति पहचानी और मदद करने बैठ गया। दोनों ने प्यादा छोड़ने को कई शहों के रास्तों के सामने जांचा। आधे घंटे बाद अखिल उन्हें मिला।

“बैठ सकता हूं?”

मीना ने पैर से कुर्सी खिसकाई। “आक्रमण वाली तरफ लो।”

वह बैठ गया। उसने बाहर क्या कहना चाहा था, यह समझाने को नहीं पूछा। बोर्ड पर सवाल था जिसका जवाब चाल से दिया जा सकता था। अखिल ने पहला वजीर चेक चुना। मीना ने पर्ची खोलकर उसके सामने रख दी।

4. दौरों के बीच: हार कौन उठाता है

अगला समूह मैच दो दिन बाद था। मीना ने बीच का समय वही अंत अलग शहों के खिलाफ दोहराने में लगाया। सुधार ऐसी गणना नहीं रहना चाहिए था जो केवल किसी के दिखाने के बाद समझ आए।

ओपनिंग भी देखी। अंत कठिन इसलिए हुआ था कि बीच खेल में उपयोगी रक्षक बहुत आसानी से बदल दिया था। अखिल अपनी हारी अभ्यास बाजियां लाया। एक में वही अधीरता थी जिसकी वह मीना में आलोचना करता था।

उसने चाल चुनने से पहले खतरा बताने को कहा। उसने वह बताया जिससे डरता था। मीना ने पूछा क्या वह सच में संभव है। नहीं था। पिन में बंधा मोहरा वह चाल चलता तो अपना राजा खुल जाता।

अखिल खुद पर हंसा, फिर गंभीर हुआ।

“पापा को कुछ कहना चाहिए था।”

“हां।”

“सोचा बाद में समझा दूंगा।”

“अगली बार साफ बोल सकते हो।”

उसने बातचीत को उसकी अच्छी नीयत के सांत्वना पाठ में नहीं बदला। दोनों स्थिति पर लौटे और बेहतर चाल खोजी। घर के काम छोटे व्यावहारिक ढंग से बदले। अखिल बिना फोन किए सामान ले आया। भाई को अतिरिक्त चाबी पूछकर समयबद्ध बाजी खत्म होने तक इंतजार करना पड़ा।

दूसरे दौर की सुबह मीना अपना बोर्ड बैग लेकर निकली। अखिल अपना बैग लेकर पीछे आया। किसी ने उसकी कॉलर ठीक करने के लिए मीना का हाथ नहीं खोजा। रास्ते में अखिल ने एक स्थिति पूछी। उसने कहा कि पहले खुद दो विकल्प लिखे, फिर मैदान पहुंचकर देखेंगे।

5. दूसरा दौर: साढ़े तीन अंक

दूसरे दौर का विरोधी जल्दी सरल बनाना चाहता था। मान लिया था कि तीसरे बोर्ड की खिलाड़ी बराबरी से संतुष्ट होगी। मीना ने किसी अदला बदली से पहले बचने वाले प्यादों की संरचना जांची। एक बदलाव कमजोर प्यादा छोड़ता जिस पर हाथी से हमला कर सकती थी। दूसरा सक्रिय मोहरा बिना लाभ हटा देता। उसने पहला अवसर लिया, दूसरा नहीं।

दबाव धीरे बढ़ा। विरोधी एक कमजोरी बचाता तो दूसरे के लिए बिसात पार करनी पड़ती। मीना ने निर्णायक प्यादा बढ़ाने से पहले राजा अंत में पहुंचाया। वह जीती। अखिल भी जीता। नीरज ने कठिन बराबरी पकड़ी।

टीम ने ढाई के मुकाबले आधा अंक से मैच लिया। समूह में उनके साढ़े तीन बोर्ड अंक हुए। दूसरे परिणाम ने जीत हार का चक्र बनाया था। बोर्ड अंकों से मीना की टीम पहली और पहली बार हराने वाली टीम दूसरी रही। फाइनल में फिर सामना होना था।

बाहर भाई अखिल की निरंतरता की तारीफ करने लगा। इस बार अखिल ने बीच में कहा।

“मीना भी जीती है। उससे हाथी वाला अंत पूछिए।”

पिता ने स्कोर देखा, फिर बहन को। उसने दो वाक्यों में जरूरी अदला बदली समझाई। अखिल बिना अपना संस्करण जोड़े सुनता रहा।

बाद में उसने पूछा कि फाइनल से पहले फिर वजीर का अभ्यास कर सकते हैं क्या। मीना ने हां कहा। उसे मोहरे लगाने को कहा जबकि वह पहला नोट लिखेगी। अखिल ने काले मोहरे अपनी तरफ रखे और घड़ी चालू करने से पहले पूछा कि किस स्थिति से शुरू करना है।

6. फाइनल परिवार का इंतजार नहीं करता

अगली दोपहर फाइनल था। मीना के सामने वही महिला थी जिसने शुरुआती मैच में हराया था। देविका इकतालीस की, ढीली राजा स्थिति की सजा देने वाली सटीक खिलाड़ी।

उसे पहला अंत याद था। वह फिर तीखे मध्य खेल की ओर बढ़ी। मीना ने इरादा पहचाना, लेकिन यह नहीं माना कि वही स्थिति लौटेगी। इस बार उपयोगी रक्षक बचाया। ऐसी केंद्रीय अदला बदली चुनी जिससे वजीर सक्रिय रहा। देविका को किनारे का प्यादा मिला। मीना को जुड़े केंद्रीय प्यादे और राजा का रास्ता।

पहले बोर्ड पर अखिल लंबी लड़ाई के बाद बराबर रहा। दूसरे पर नीरज भी। दोनों टीमों के एक एक अंक। मीना की बाजी में विजेता निकलता तो खिताब तय होता।

अखिल बोर्ड छोड़कर दर्शक सीमा के पीछे खड़ा हुआ। सलाह नहीं दे सकता था। मदद करने की असमर्थता में पहली बार साफ दिखा कि वह अकेली कितना काम कर रही है।

देविका ने बगल से वजीर शह दी। मीना राजा को तैयार किए आश्रय की तरफ लाई। अगली शह दूसरी दिशा से आई। किनारे का प्यादा अब खुला था। बचाने पर वजीर केंद्रीय प्यादों से दूर जाता और पुरानी परेशान करने वाली शहों का क्रम लौटता।

उसने छोड़ दिया। देविका ने शह के साथ प्यादा लिया। मीना ने जवाब दिया। वजीर राजा के पास रहा और केंद्रीय प्यादे जुड़े रहे। अखिल ने बिसात पर बची रेखा देखी। उसे घर के अभ्यास की कई शामें याद आईं।

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7. पीछे छोड़ा एक प्यादा

दर्शकों ने मीना का एक और प्यादा जाते देखा और समझा कि वह फिसल रही है। अखिल स्थिति का अर्थ बेहतर पहचानता था। पूरे हफ्ते मिलते जुलते अंत में आक्रमण वाला पक्ष खेला था।

मारा गया प्यादा देविका के वजीर को सबसे उपयोगी शहों के जाल से दूर ले गया था। मीना ने अगली गति से अपना वजीर सुधारा और राजा को सुरक्षित रास्ता दिया। देविका ने पीछे से शह कोशिश की। मीना ने दोनों केंद्रीय प्यादे छोड़े बिना रेखा रोकी।

दूसरी शह से लाभ वाला वजीर बदलाव मिलता, इसलिए देविका ने दिशा बदली। मीना ने राजा और वजीर के सहारे नजदीकी प्यादा एक घर बढ़ाया। दोनों को साथ धकेलकर दोहरे हमले के लिए नहीं छोड़ा।

देविका ने पीछे वाले प्यादे पर हमला किया। मीना ने ऐसे खाने से रक्षा की जो राजा की शहें भी सीमित करता था। चालों के कई काम थे। मोहरा छूने से पहले हर काम जांचा। पांच मिनट से कम समय रह गया।

महीनों पहले भाई ने कहा था कि वह दूसरों की चीजें संभालने में अच्छी है। अब राजा, वजीर और दो आगे बढ़ते प्यादे संभाल रही थी। पूरा मैच फैसलों का इंतजार कर रहा था।

देविका ने पहला वजीर बदलने का प्रस्ताव छोड़ा। समझती थी कि प्यादों के अंत में मीना का राजा पहले केंद्र पहुंचेगा। खेल जारी रहा। मीना को दूसरा अवसर बनाना था। उसने अगले प्यादा धक्के से पहले राजा के लिए बेहतर खाना देखा।

8. वह अदला बदली जिसका हिसाब है

प्यादा फिर बढ़ाने से पहले मीना राजा एक घर करीब लाई। देविका की उपलब्ध शहें कम उपयोगी हुईं। सामने से शह वजीर बदलने देती। बगल से शह राजा को अपने प्यादों के आश्रय में लाती। देविका ने बगल वाली शह चुनी और लड़ती रही।

मीना आश्रय में गई। उसका वजीर आगे वाले प्यादे की रक्षा और अगली शह की रेखा रोक सकता था। दूसरा प्यादा अब सहारे के साथ बढ़ने की धमकी दे रहा था।

बचाव की पसंद कठिन होती गई। पीछे हटकर जुड़े प्यादे और आगे आने दे, या वजीर बदलकर ऐसा कठिन अंत चुने जिसमें जीत के लिए सामने वाले को सटीक खेलना पड़े। देविका ने दूसरा चुना। प्यादे आने का निष्क्रिय इंतजार करने के बजाय अंतिम गणना का सवाल रखा।

मीना ने राजा से वापस मारा। प्रस्ताव देने से पहले प्यादों की दौड़ गिनी थी। दूर का पासर डरावना दिखता था, लेकिन समय पर रोका जा सकता था। उसके जुड़े केंद्रीय प्यादे विरोधी राजा को सीमित रखते। जरूरी चाल पहले राजा को पार लाना थी, जल्दबाजी में प्यादा बढ़ाकर सहारा खोना नहीं।

उसने वही किया। देविका ने कई चाल तक दौड़ जांची, फिर राजा के प्रवेश की अंतिम कोशिश की। मीना ने जुड़े प्यादों से खाना रोका। प्रतिक्रिया मजबूर होने पर ही आगे बढ़ी।

नया वजीर आने से पहले देविका ने हार मानी। टीम स्कोर दो एक हुआ। अखिल ने इतनी देर से रोकी सांस छोड़ी कि पास खड़े नीरज ने सुन ली।

9. सवाल खिलाड़ी के पास जाता है

हाथ मिलाने के बाद मीना से पहले देविका बोली।

“राजा का रास्ता सुधारा।”

“उससे पहले की अदला बदली भी।”

दोनों ने पुरानी स्थिति साथ देखी। देविका ने एक शह दिखाई जिस पर मीना ने भी विचार किया था। दोनों ने खोजा कि नया वजीर स्थान उसे कैसे रोकता है।

भाई अखिल के पास खड़ा था। जेब से निकाला टीम बैज हाथ में था। पत्रकार आया तो वह बताने लगा कि मीना ने परिवार को हमेशा कितना सहारा दिया। अखिल आधा कदम किनारे हुआ। सीधे उसके पास रास्ता खुल गया।

“निर्णायक बाजी उसने खेली। उसी से पूछिए।”

पत्रकार ने पूछा। मीना ने समझाया कि किनारे का प्यादा क्यों छोड़ा, केंद्रीय प्यादे कैसे जुड़े रखे और राजा सुधारने के बाद ही वजीर बदलना क्यों सही हुआ। भाई ऐसा जवाब सुन रहा था जिसे उसके परिचय की जरूरत नहीं थी।

तस्वीर में अखिल किनारे खड़ा हुआ। बीच में मीना थी। टीम कप के पास देविका के हस्ताक्षर वाला परिणाम था। नीरज भी शामिल हुआ। बाद में भाई ने कहा उसे हमेशा पता था कि वह खेल समझती है।

मीना ने उसे देखा।

“तुमने कहा था मैं बैग संभाल सकती हूं।”

उसने अपने हाथ में पकड़ा उसका बैग देखा। नजर नीचे गई।

“हां। कहा था।”

वाक्य पूरा होने के बाद मीना ने बैग लिया। फिर नीरज से अगली प्रतियोगिता की तारीख पूछी। अखिल ने फोन निकालकर समय देखा। भाई कुछ देर वहीं खड़ा रहा, फिर पीछे चल पड़ा।

10. पूरी तस्वीर

एक हफ्ते बाद अखिल नया प्रिंट लाया। मीना अंतिम बोर्ड पर थी। हाथ घड़ी के पास, सामने देविका स्थिति देख रही थी। उसने पहले प्रमाणपत्र की पुरानी बड़ी तस्वीर के पास रख दिया।

मीना ने देखा पुरानी तस्वीर भी बदली थी। इस प्रति में उसका चेहरा और कॉलर ठीक करता हाथ दोनों थे।

“मूल फोटो मिल गई,” अखिल ने कहा।

वह कुछ देर दोनों को देखती रही। फिर पूछा कि तय वजीर वाला अंत लाया है या नहीं। लाया था। अपने पिछले विश्लेषण का सुधार भी था।

दोनों ने मेज पर बिसात लगाई। भाई चाय लाया और पूछा कप कहां रखे। मीना ने स्थिति से नजर हटाए बिना बगल की मेज दिखाई। अखिल ने आक्रमण वाले मोहरे लिए। उसी शह से शुरू किया जिसने कभी उसे सबसे ज्यादा परेशान किया था।

उसने विकल्प देखे, वजीर चलाया और अभ्यास घड़ी दबाई। अखिल आगे झुका। परिवार की पुरानी भूमिकाएं अभी रखे सवाल का जवाब नहीं दे सकती थीं। गणना करनी थी।

बाहर से फोन आया कि मीना तुरंत पार्सल लेने आ सकती है क्या। भाई ने कहा वह खेल रही है, सत्र के बाद फोन करेगी। अखिल ने जवाबी चाल चली। मीना ने चित्र के पास छोटा नोट लिखा और खेल पर लौट गई।

बैठक की दीवार पर दोनों तस्वीरें अपनी पूरी जगह घेरे थीं। मेज पर घड़ी अखिल की ओर चल रही थी। उसने पहली पसंद छोड़ी, दूसरी जांची और इस बार बोलने से पहले पूरा हिसाब किया।

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