Jaiho 777 — भाई के पास भी एक प्रवेश फॉर्म था
Jaiho 777

Jaiho 777 — भाई के पास भी एक प्रवेश फॉर्म था

काल्पनिक कहानी · पात्र और घटनाएँ कहानी का हिस्सा हैं।

“मनीष को दे दो। उबाऊ काम वही देखता है।” अखिल ने फोटो से नजर उठाए बिना कहा। आयोजक ने मनीष को फोल्डर दिया। यात्रा कार्यक्रम, रसीदें और हस्ताक्षर वाला फॉर्म…

“मनीष को दे दो। उबाऊ काम वही देखता है।”

अखिल ने फोटो से नजर उठाए बिना कहा।

आयोजक ने मनीष को फोल्डर दिया। यात्रा कार्यक्रम, रसीदें और हस्ताक्षर वाला फॉर्म था।

मनीष ने ले लिया।

बारह मिनट से चाय पकड़े था। ठंडी हो चुकी थी।

किसी ने पूछा, अखिल के स्टाफ में है?

“कुछ ऐसा ही,” अखिल बोला।

लोग हँसे।

मनीष ने इंतजार किया कि भाई और कुछ कहेगा।

दोनों भाई हैं।

आयोजक यात्रा करवाने लगे, उससे पहले पैसे उसने दिए थे।

एक बार अतिरिक्त देर की पालियाँ की थीं ताकि अखिल बिना उधार प्रतियोगिता जा सके।

अखिल फिर फोटो देख रहा था।

मनीष ने चाय पास की मेज पर रख दी।

* * *

मनीष पैंतीस साल का था। रायपुर के स्थानीय ठेकेदार के लिए पानी के मीटर पढ़ता था।

पैदल चलना, रीडिंग पर बहस, बंद फाटक और ऐसे कुत्ते जिनके मालिक कहते थे काटते नहीं—काम में सब था।

अखिल अट्ठाईस का था।

बाईस साल की उम्र से वयस्कों की आयोजित भारतीय रमी प्रतियोगिताओं में जा रहा था।

शुरुआती वर्षों में काम नियमित नहीं था। यात्रा और प्रवेश के लिए मदद चाहिए थी।

मनीष ने की।

शुरू में साझा रोमांच लगता था।

बस के समय देखते। बच सकने वाले पैसे गिनते।

आयोजन के बाद अखिल फोन करता। खाने तक की बात बताता।

मनीष को वे फोन अच्छे लगते थे।

छोटे भाई को इतनी बड़ी दुनिया खोजते सुनना अच्छा था जिसमें उसकी जगह हो।

कब फोन बातचीत से निर्देश बन गए, ध्यान नहीं गया।

* * *

यह बुक कर दो।

वह छाप दो।

कमरा पक्का है, पूछ लो।

एक बार काम के बीच फोन करके दर्जी से कमीज़ लेने को कहा।

मनीष ने बताया, शहर के दूसरे हिस्से में है।

“बाहर तो रहते ही हो।”

काम के बाद गया।

दर्जी बंद कर चुका था।

अगली सुबह अखिल ने शिकायत की कि अब भरोसेमंद मदद चाहिए।

मनीष खाली कपड़े का थैला पकड़े खड़ा था।

भरोसेमंद।

पिछले महीने अखिल की गलत तारीख की टिकट बदलवाने के लिए भुगतान वाला एक दिन छोड़ा था।

शब्द धीरे से अंदर आया और रह गया।

* * *

माँ लता को कुछ हिस्से दिखते थे।

जानती थीं मनीष मदद करता है।

जानती थीं अखिल अच्छा कर रहा है।

मनीष थका दिखे तो कारण पूछतीं।

ज्यादातर काम कहता।

उत्तर में काफी सच था। इतना छूटा भी था कि घर सहज रहे।

अखिल के नतीजे बेहतर हुए।

कुछ आयोजनों के लिए औपचारिक यात्रा सहायता मिलने लगी।

साक्षात्कार थे। फोटो थीं। मौके खोजने में मदद कर सकने वाले लोग थे।

छपाई अब भी मनीष को भेजता।

होटल फोन करने को अब भी कहता।

मनीष ने कार्यक्रम ध्यान से देखने को कहा तो बोला कि प्रतियोगिता की बातें समझने वालों पर छोड़ दे।

मनीष ने खेल पर टिप्पणी नहीं की थी।

कहा था कि आखिरी सत्र से पहले वापसी की बस निकलती है।

* * *

रविवार को झगड़ा हुआ।

मनीष ने सुबह माँ की अलमारी का कब्जा ठीक किया था।

बैठना चाहता था।

अखिल तीन फॉर्म लेकर आया। भरने को कहा।

“तुम्हारी जानकारी फोन में है,” मनीष बोला।

“सब जानते हो।”

“तुम भी जानते हो।”

अखिल हँसा। समझा मजाक है।

मनीष ने कागज नहीं लिए।

कुछ देर बाद भाई का चेहरा बदला।

“आजकल परेशानी क्या है?”

मनीष ने कहा कि हर खाली दिन उसकी व्यवस्था करते नहीं बिताना चाहता।

“हर समय कोच बने रहते हो।”

“अपना नाम भरने को कह रहा हूँ।”

“जिंदगी में ठीक से कोई आयोजन खेला नहीं है।”

वाक्य का संबंध नहीं था।

चोट फिर भी लगी।

* * *

मनीष ने फॉर्म देखे।

एक खाना प्रतिभागी के लिए था।

नीचे संपर्क व्यक्ति का।

दूसरे में अपना नंबर इतनी बार भरा था कि हाथ लगभग खुद लिख सकता था।

उसने कागज वापस किए।

“सही है। नहीं खेला।”

अखिल आधे क्षण खुश दिखा। लगा स्वीकार करने से बहस खत्म होगी।

मनीष उठा।

“तो सलाह नहीं चाहिए होगी।”

“यह नहीं कहा।”

वह मतलब समझाने लगा।

मनीष हाथों की धूल धोने चला गया।

रसोई से माँ ने चाय बताई।

उसने कहा, बाद में पिएगा।

* * *

भाई से प्यार बंद नहीं हुआ।

यही कठिन हिस्सा था।

अगले हफ्ते अखिल गया तो मनीष को अब भी चिंता थी कि खाया होगा या नहीं।

सार्वजनिक नतीजा आया तो देखा।

बस बुकिंग नहीं की।

अखिल सस्ता किराया चूक गया। शिकायत की।

मनीष ने कहा, यात्रा अच्छी रहे।

भाई ने छिपा गुस्सा कहा।

एक शाम मनीष सोचता रहा कि ऐसा है क्या।

फिर अपने संदेश देखे।

साफ बताया था कि व्यवस्था नहीं कर पाएगा।

माँगी संपर्क जानकारी दी थी।

यात्रा अच्छी होने की असली इच्छा थी।

छिपी पहेली नहीं थी।

एक सेवा मुफ्त रहना बंद हुई थी।

* * *

अगले खाली रविवार स्थानीय वयस्क अभ्यास बैठक में गया।

सालों से सामान्य तौर पर खेलता था।

औपचारिक आयोजन की तैयारी अलग थी।

फर्क तुरंत समझ आ गया।

कविता नाम की महिला ने एक निर्णय का कारण पूछा।

उसने ऐसी व्याख्या दी जो दूसरा सवाल आने तक प्रभावशाली थी।

फिर मानना पड़ा, नहीं जानता।

उन्होंने सिर हिलाया। समीक्षा जारी रखी।

किसी ने नहीं कहा कि भाई जानता होता।

एक घंटे अखिल का नाम नहीं आया।

मनीष अलग ढंग से थका लौटा।

अगले हफ्ते फिर गया।

* * *

समूह वाचन केंद्र के पीछे कमरा इस्तेमाल करता था।

ज्यादातर काम करते थे। कई नियमित नहीं आ सकते थे।

बस चालक वर्दी में आया।

दुकान का सहायक खाना लाया।

कविता बहीखाते की कक्षाएँ पढ़ाती थीं। मेज के पार से टालता जवाब पहचान सकती थीं।

मनीष को लोग अच्छे लगे।

कमजोर खिलाड़ियों में होना अच्छा नहीं लगा।

सालों से यात्रा, नींद और तैयारी पर समझदार सलाह देता आया था।

अब पता चला, जल्दी लगे तो समझदार सलाह मूर्ख निर्णय से नहीं बचाती।

घर में कमरा, शोर या कठिन दिन को दोष देना चाहता था।

इसके बजाय जो हुआ, लिख दिया।

उस शाम कम संतोष मिला।

अगले हफ्ते ज्यादा काम आया।

* * *

कविता ने जिला आयोजन बताया। पहले औपचारिक सीजन वाले वयस्कों की श्रेणी थी।

मनीष ने पात्रता ध्यान से पढ़ी।

सामान्य खेलने से बाहर नहीं होता था। पहले औपचारिक सीजन में हिस्सा नहीं लिया था।

आवेदन कर सकता था।

फॉर्म घर लाया।

अखिल ने मेज पर देखा और अपना समझा।

“यह मेरा आयोजन नहीं है।”

“नहीं,” मनीष बोला।

भाई ने ऊपर नाम देखा।

“तुम खेलोगे?”

“हाँ।”

अखिल मुस्कराया।

“मजा आएगा। ज्यादा गंभीर मत लेना।”

मनीष ने वह स्वर सुना था। रिश्तेदार नया शौक शुरू करे और सब मानें कि जल्दी छूट जाएगा।

उसने फॉर्म फोल्डर में रखा।

“कितना गंभीर लेना है, मैं तय करूँगा।”

* * *

प्रवेश शुल्क अपने तय खर्च से दिया।

घर के लिए पहले से वादा किए पैसे नहीं लिए।

एक खरीद अगले महीने की। किराया देखा। आवेदन किया।

माँ ने पूछा, नई कमीज़ चाहिए?

नीली ठीक है, कहा।

उन्होंने कॉलर घिसा बताया।

छोटी बातचीत थी।

मनीष को ऐसी बातचीत की कमी महसूस हुई थी जिसमें उसकी जरूरत हो।

अखिल ने अपनी पुरानी प्रतियोगिता की कमीज़ देने को कहा।

उस पर अखिल का नाम था।

मनीष ने धन्यवाद दिया। मना किया।

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“मेरे पास है।”

भाई अपनी उस पेशकश के मना होने से नाराज लगा जो किसी ने माँगी नहीं थी।

* * *

पहला चयन सामान्य असुविधाओं का पाठ था।

मनीष बहुत जल्दी पहुँचा।

नाश्ता बहुत जल्दी खाया।

पंजीकरण पर उपनाम पहचानकर किसी ने पूछा, अखिल से संबंध है?

“हाँ।”

“साथ आए हैं?”

“नहीं। खेल रहा हूँ।”

अधिकारी ने फॉर्म देखा। सही डेस्क बताया।

बात वहीं खत्म हुई।

अधिकारी के लिए जितनी रही होगी, मनीष के लिए उससे बड़ी थी।

जगह खोजी।

दोपहर तक इतनी गलतियाँ हो गईं कि समझ आया, गंभीरता से लिया जाने की तीखी इच्छा प्रतियोगी कौशल नहीं है।

खेलता रहा।

आगे जाने वाले स्थानों से बाहर रहा।

* * *

वापसी की बस से पहले घर फोन किया।

माँ ने उठाया।

“कैसा रहा?”

“चयन नहीं हुआ।”

“अच्छा।”

शब्द चुनती सुनाई दे रही थीं।

“खाया?”

हाँ कहा।

आने का समय पूछा।

पैसा बर्बाद करने का भाषण नहीं था।

घर पर अखिल ने नतीजा पूछा।

बताया।

“जाने से पहले पूछ लेते।”

मनीष ने बैग रखा।

“क्या पूछता?”

“तैयारी कैसे करनी है।”

“की थी।”

अखिल ने कंधे उचका दिए।

मनीष कमरे में गया। नोट खोले। काम करने लायक गलती मिली।

निराश था।

प्रतिभागी भी अब तक था।

* * *

सीजन में आगे दूसरा मौका था।

बीच में नौकरी चलती रही।

बंद फाटक के कारण एक बार अभ्यास में देर हुई।

बारिश में कॉपी का किनारा भीगा।

माँ को घर की मरम्मत में मदद चाहिए थी तो बैठक छूटी।

इन बातों से कोशिश महान नहीं हो गई।

योजना जरूरी हो गई।

कविता ने समझने में मदद की कि कौन-सी बैठक छूट सकती है और लौटने से पहले कौन-सा काम करना होगा।

सुधार बराबर नहीं हुआ।

एक शाम इतना अच्छा किया कि दूसरों ने हर चीज समझाना बंद कर दिया।

अगले हफ्ते फिर व्याख्या चाहिए थी।

बदलता संतुलन अच्छा लगने लगा।

सब कुछ जाने बिना भी कुछ जानने की जगह थी।

* * *

उसी समय अखिल का कार्यक्रम व्यस्त हो गया।

राज्य स्तर की श्रृंखला में गया। उसकी अलग शर्तें और तारीखें थीं।

आखिरी चरण उसी सप्ताहांत था जब मनीष का जिला आयोजन था।

अखिल ने यात्रा विवरण भेजा।

मनीष ने बताया कि वह भी बाहर होगा।

फोन आ गया।

“होटल कौन देखेगा?”

“पुष्टि तुम्हारे पास है।”

“कुछ गलत हुआ तो?”

“होटल को फोन करना।”

चुप्पी हुई।

फिर अखिल बोला, “बात साबित करने के लिए कर रहे हो।”

मनीष ने अपने निकलने का समय देखा।

“क्योंकि जाना चाहता हूँ, इसलिए कर रहा हूँ।”

भाई के पास तैयार जवाब नहीं था।

* * *

जिला आयोजन से पहले मनीष ने काम का एक चक्कर बदलने को कहा।

सहकर्मी जगदीश ने तारीखें देखीं।

“फिर भाई का?”

“नहीं। मेरा।”

जगदीश ने पन्ना नीचे रखा।

मनीष श्रेणी समझाने लगा। पिछली असफलता बताई। यह सप्ताहांत क्यों जरूरी है, बताने लगा।

बोलते हुए महसूस हुआ कि अखिल के लिए छुट्टी लेते समय जितना बताता था, उससे बहुत ज्यादा सफाई दे रहा है।

जगदीश ने रोका।

“बस यह जानना है कि मेरा बुधवार ले सकते हो?”

ले सकता था।

दोनों ने पर्यवेक्षक से पूछा और बदलाव दर्ज करा दिया।

एहसान नहीं था जिसके लिए अपनी कीमत का पूरा हिसाब देना पड़े।

घर में अखिल ने उसे जूते साफ करते देखा।

“इतना बड़ा अवसर बनाने की जरूरत नहीं है।”

मनीष ब्रश करता रहा।

अखिल के पहले आयोजनों के लिए साफ कमीजें थीं। जाँची टिकटें थीं। सावधानी से पैक किए बैग थे।

सबमें मदद करना याद था।

अपने जूते देखे। आराम के थे। तले अभी मजबूत थे।

“साफ चाहिए।”

अखिल कुछ देर दरवाजे से टिका रहा। फिर चला गया।

मनीष ने एक जूता पूरा किया। फिर दूसरा उठाया।

किसी ने उसे अपने लिए ध्यान से कुछ करते देख लिया था, इसलिए ब्रश नहीं रखा।

शाम को जगदीश से पाली बदलने की पुष्टि की। धन्यवाद दिया।

जगदीश ने बुधवार याद दिलाया।

मनीष ने प्रतियोगिता की तारीख के पास लिखा।

दोनों जिम्मेदारियों के लिए उसी कैलेंडर में जगह थी।

उसने पन्ना दीवार पर लगाया। सामने खड़े होकर एक बार फिर समय पढ़ा। इस बार अपना नाम देखकर उसे फॉर्म किसी और को देने का मन नहीं हुआ।

* * *

माँ ने पूछा, दोनों में किसी का समय बदल सकता है?

नहीं।

किस बेटे को देखने जाएँ, चुनना नहीं चाहती थीं।

मनीष ने कहा, घर रहकर दोनों के फोन का इंतजार कर सकती हैं।

अखिल बोला, उसका आयोजन ज्यादा जरूरी है।

लता ने देखा।

“किसके लिए?”

वह स्तर, खिलाड़ी और अवसर समझाने लगा।

उन्होंने पूरा होने दिया।

फिर कहा, दूसरा सवाल पूछा था।

कमरा शांत हुआ।

मनीष को कल्पना जितना आनंद नहीं आया।

अपने ऊपर भाई का कम ध्यान चाहिए था।

उसे छोटा होते देखने का मौका नहीं।

अपना बैग देखने चला गया।

* * *

जिला आयोजन में अखिल के बारे में पूछने वाले अधिकारी ने पहचान लिया।

“फिर आए?”

“हाँ।”

“अच्छा। यह डेस्क।”

इस बार उपनाम की व्याख्या नहीं चाहिए थी।

शुरुआत में मनीष कम हड़बड़ाया।

पूरी तरह शांत नहीं, मगर दिमाग दौड़ने लगे तो देख पा रहा था।

खाने के बाद कठिन हिस्सा आया।

विराम लिया। जितना देख सकता था देखा। लौटा।

पहले चरण के बाद आगे था।

माँ को फोन किया।

बात हो रही थी तभी अखिल का संदेश आया कि अपने आयोजन में वह भी आगे गया है।

लता ने पढ़कर सुनाया।

इस बार घर में दो नतीजे थे।

किसी ने दूसरे की जगह नहीं ली।

* * *

आखिरी दिन दोनों भाइयों का कठिन था।

मनीष को खेलते समय नहीं पता था।

सामने के काम के साथ बने रहने में व्यस्त था।

विराम में अखिल का संदेश देखा। लगभग तुरंत फोन किया।

फिर देखा, अगला सत्र शुरू हो रहा है।

छोटा जवाब दिया कि कब खाली होगा।

छत नहीं गिरी।

वहाँ किसी को नहीं पता था कि घर की छोटी आदत बदली है।

उन्हें मेज पर चाहिए था।

चला गया।

* * *

पहले सीजन की श्रेणी में ऊपर के तीन खिलाड़ियों को ट्रॉफी मिलती थी।

मनीष तीसरा रहा।

ध्यान से नतीजा पढ़ा।

दो नाम ऊपर थे।

देख सकता था कि मजबूत सत्र कहाँ फर्क करता।

बाद में और जानना था।

अभी पहली ट्रॉफी मिली थी।

नाम बुला तो पुरस्कार की जगह का गलत रास्ता लेने लगा।

आखिरी हिस्सा देखने आई कविता ने खुला रास्ता दिखाया।

अपने पर हँसा। उधर गया।

ट्रॉफी इतनी छोटी थी कि बैग में आ जाए।

साथ के प्रमाणपत्र पर अपना नाम था।

वर्तनी दो बार देखी।

* * *

आखिरी तस्वीरें हो रही थीं जब अखिल पहुँचा।

उसका आयोजन इच्छा से पहले खत्म हो गया था।

बाहर हो गया था। मनीष का संदेश देखकर शहर पार करके आया।

मनीष ने दरवाजे पर देखा।

सालों सोचा था कि भाई उसे देखेगा तो कैसा लगेगा।

पसीने, थकान और पानी की बोतल के खोए ढक्कन की कल्पना नहीं की थी।

अखिल पास आया।

मुँह खोला।

मनीष को लगभग परिचित सवाल सुनाई दिया। लौटने की व्यवस्था की है?

इसके बजाय अखिल ने पूछा, “कैसा खेले?”

मनीष ने देखा।

“पिछली बार से बेहतर।”

“बताओ।”

उसने बताया।

* * *

पहले अच्छे सत्र की बात की।

फिर कठिन की।

बताया कहाँ सुधरा। कहाँ अब भी अनिश्चित है।

अखिल सलाह देने लगा। रुका। पूछा, चाहिए?

“बाद में,” मनीष बोला। “अभी बता रहा हूँ।”

भाई ने सिर हिलाया।

सुना।

कविता आईं। पूछा, साथ लौट रहे हैं?

मनीष ने कहा, अपनी वापसी बुक की है।

अखिल ने अपना इंतजाम करने को फोन देखा।

छोटे काम से मनीष को नजर हटाने का मन हुआ।

इतना भावुक नहीं लगना चाहिए था।

लगा।

* * *

वापसी में अखिल ने अपना आयोजन बताया।

अंत में खराब खेला था।

मनीष ने यात्रा संयोजक या बिना पैसे का कोच बने बिना सुना।

भाइयों की तरह नतीजे पर बात हुई।

कुछ देर बाद अखिल बोला, “स्टाफ नहीं कहना चाहिए था।”

मनीष ने खिड़की से देखा।

“नहीं।”

“सोचा नहीं।”

“आदत हो गई थी।”

अखिल ने सुधार पर बहस नहीं की।

बस भीड़ वाले चौराहे पर रुकी।

पीछे किसी ने अगले स्टॉप के बारे में पूछा।

एक मिनट कोई भाई नहीं बोला।

फिर अखिल ने पूछा, पहुँचकर चाय चाहिए?

मनीष ने हाँ कहा।

* * *

घर में लता ने शेल्फ पर जगह बनाई।

अखिल ने अपनी एक फोटो हटाई ताकि छोटी ट्रॉफी दीवार से लगे बिना खड़ी रहे।

मनीष ने कहा, कहीं और आ जाएगी।

“यहाँ आती है,” अखिल बोला।

माँ ने प्रमाणपत्र पढ़कर सुनाया।

फिर दोनों को खाने से पहले हाथ-मुँह धोने को कहा।

बाद में मनीष ने अगला अभ्यास कैलेंडर में लिखा।

अखिल मेज पर अपना फॉर्म भर रहा था।

एक खाने के बारे में पूछा।

मनीष ने जवाब दिया।

कलम नहीं ली।

अगले रविवार वाचन केंद्र के लिए निकला तो भाई अपनी यात्रा देख रहा था।

मनीष कॉपी बाँह के नीचे लेकर बस स्टॉप तक चला।

जल्दी था।

इस बार अतिरिक्त मिनट उसके थे।

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