हरीश ने परिणाम का कागज दो बार फाड़ा।
एक बार बीच से। एक बार आड़ा।
आदि ने अपना नाम प्रशिक्षक की मुट्ठी में गायब होते देखा।
“अब बताओ, कौन से स्थान पर आए?”
बाकी खिलाड़ी प्रशिक्षण कक्ष की दीवार के पास खड़े थे। कोई नहीं हिला।
दूसरा।
चौबीस साल का आदि वयस्क इंडियन रमी चयन में दूसरे स्थान पर था। चार खिलाड़ियों को संस्था के क्षेत्रीय आयोजन में जगह मिलनी थी। संख्या इतनी साफ छपी थी कि सब पढ़ सकते थे।
विक्रांत पाँचवें पर था।
प्रशिक्षक के पीछे लटकी कमीजों का खर्च उसके पिता की कंपनी देती थी।
आदि ने कमीजें देखीं, फिर सबसे अच्छा दोस्त देखा।
देव ने नजर हटा ली।
हरीश ने टुकड़े कूड़ेदान में फेंके और दूसरा कागज रखा।
बयान था।
खिलाड़ियों को पुष्टि करनी थी कि तीसरे दौर में आदि ने फोन से मदद ली।
“हस्ताक्षर करो। या बताओ कि बेईमानी बचाना क्यों चाहते हो।”
आदि बोलने लगा।
हरीश ने दरवाजा दिखाया।
“इस हिस्से में तुम्हारा काम नहीं है।”
* * *
आदि बिजली का काम सीखते हुए कमाता था।
साथ में खेल और मनोरंजन की छोटी संस्था के वयस्क प्रशिक्षण कार्यक्रम में था। चुने खिलाड़ियों को अभ्यास स्थान, यात्रा सहायता और थोड़ा प्रशिक्षण अनुदान मिलता था।
माँ निर्मला आवासीय बाजार के बाहर फूल बेचती थी।
अनुदान स्वीकृत हुआ तो पत्र सँभालने के लिए फोल्डर खरीदा था।
संस्था प्रचार में छात्रवृत्ति कहती थी। घर में मतलब था कि हर बस के किराए के लिए माँ से पैसे नहीं माँगने पड़ेंगे।
खुले मूल्यांकन से आदि का चयन हुआ था।
कई महीने हरीश होनहार कहता रहा।
फिर कुछ अभ्यास मेजों से हटने को कहने लगा ताकि विक्रांत को ज्यादा अवसर मिले।
आदि दो बार माना।
तीसरी बार पूछा कि खिलाड़ियों का क्रम पहले साझा हो सकता है क्या?
हरीश मुस्कुराया।
“निष्पक्षता में बहुत दिलचस्पी होने लगी है।”
आदि ने समझा कि इस पर बात होगी।
इसके बजाय उसके रवैये पर सवाल शुरू हुए।
* * *
चयन के दिन सत्र शुरू होने से पहले फोन जमा किया।
उपकरण का नियम स्पष्ट था। नंबर वाला टोकन मिला। बैग में रख दिया।
नियुक्त अधिकारी अंक दर्ज करते थे। आगे जाने से पहले खिलाड़ी प्रविष्टि देखते थे।
आखिरी दौर के बाद अस्थायी संयुक्त परिणाम छपा। आदि ने दूसरे स्थान पर अपना नाम पढ़ा और दर्ज अंकों की पुष्टि में हस्ताक्षर किया।
सूची पक्की होने से पहले सवाल उठाने का थोड़ा समय था।
उसी दौरान हरीश ने कमरे में बुलाया।
आरोप बिना चेतावनी आया।
कथित तौर पर किसी ने तीसरे दौर में गलियारे में फोन देखते पाया था।
आदि ने समय पूछा।
हरीश बोला कि रिपोर्ट में है।
“दिखाइए।”
प्रशिक्षक ने परिणाम पर उँगली रखी।
“आभारी होना चाहिए कि अंदर ही देख रहे हैं।”
फिर फाड़ दिया।
बाद में गलियारे में खड़े आदि को बयान पर चलते पेन सुनाई दे रहे थे।
देव की छोटी, घबराई हँसी पहचानी।
फिर कमरा शांत हो गया।
* * *
निर्मला की बाँह पर फूलों की धूल थी।
आदि ने बुलाया था क्योंकि अब समझदारी से बोल पाने पर भरोसा नहीं था।
उसने हरीश से पूछा कि हुआ क्या है।
प्रशिक्षक धीरे समझाने लगा। उस स्वर में जिससे लोग जताते थे कि उसे कम पढ़ी मानते हैं।
बेटे ने कार्यक्रम की प्रतिष्ठा खराब की। संस्था छात्रवृत्ति वापस माँग सकती है। पहले दिए आठ हजार रुपये खतरे में थे।
निर्मला ने हैंडबैग खोला।
आदि ने बाँह छुई।
“नहीं।”
वह रुक गई। प्रशिक्षक हरकत देख चुका था।
“यही होता है जब परिवार ऐसे अवसरों के पीछे भागते हैं जिनके लिए तैयार नहीं हैं।”
अपने बारे में पूरे दिन अपमान सुना था।
इस वाक्य ने आदि को आगे कर दिया।
निर्मला ने कलाई थामी।
चुप कराने के लिए नहीं। पास रखने के लिए।
“शिकायत और पैसे वापस माँगने की बात लिखकर दीजिए।”
हरीश ने कहा, कार्यालय संपर्क करेगा।
फिर बाकी माता-पिता आने से पहले जाने को कहा।
निर्मला ने बैग कंधे पर लिया।
बाहर पूछा कि फोन इस्तेमाल किया था क्या?
“नहीं।”
“तो वहीं से शुरू करेंगे।”
* * *
मामला लंबित रहते प्रशिक्षण बंद हुआ।
अनुदान रुका। क्षेत्रीय नामांकन उसके बिना आगे गया।
लोगों ने अपनी कहानी चुनने के लिए निर्णय का इंतजार नहीं किया।
एक पूर्व साथी ने अभ्यास समूह से हटा दिया। दूसरे ने लिखा कि उम्मीद है इससे सीखेगा।
काम पर दोपहर में भी फोन उलटा रखता था।
देव को तीन बार फोन किया।
पहला बजता रहा। दूसरा काट दिया गया। तीसरे पर संदेश आया।
और मुश्किल मत करो। मेरे पास विकल्प नहीं था।
आदि ने लिखा, पेन था।
भेजा नहीं।
देव के पिता कार्यक्रम के बारे में पूछेंगे, यह सोच सकता था। यात्रा खर्च और छूटे काम की वही चिंता। डर समझ सकता था।
समझने से हस्ताक्षर नहीं मिटा।
शाम माँ के स्टॉल पर गया। वह ऐसी रोशनी में फूल पिरो रही थी जो पड़ोसी फ्रिज चालू होने पर झिलमिलाती थी।
आदि पास बैठकर ढीली डंडियाँ बाँधने लगा।
आठ हजार की बात नहीं की।
दोनों सोच रहे थे।
* * *
दो दिन बाद सुषमा वहीं मिली।
संस्था के कमरे शाम को साफ करती थी। बाजार से निर्मला को जानती थी।
बैग से अखबार निकाला। उसमें कागज के चार टुकड़े थे।
“लगा, तुम्हारे पास होने चाहिए।”
नाम देखने से पहले छपाई पहचान ली।
टकराव के बाद कूड़ेदान खाली किया था। बाकी कचरे के ऊपर टुकड़े साथ पड़े थे। आदि को परिणाम माँगते सुना था, इसलिए रख लिए।
तीसरा दौर उसने नहीं देखा था।
यह स्पष्ट कहा।
“कमरे में क्या सुना, जानती हूँ। मेजों पर क्या हुआ, नहीं जानती।”
फर्क बताने का आदि ने धन्यवाद किया।
घर में टुकड़े साथ रखे। तस्वीर ली। फिर पारदर्शी आवरण में सुरक्षित किए।
कागज पर दर्ज अंक और उसकी पुष्टि थी।
हर नियम मानने का प्रमाण नहीं था।
इतना प्रमाण था कि आरोप से पहले परिणाम मौजूद था।
दो दिन में पहली बार ऐसा कुछ था जिसके बारे में हरीश की राय के अलावा भी पूछा जा सकता था।
* * *
संस्था की प्रशिक्षण टीम से अलग समीक्षा समिति थी।
आदि ने घोषित प्रक्रिया से अनुरोध दिया।
परिणाम की तस्वीर, अपने दिन का विवरण और नंबर वाला उपकरण टोकन जोड़ा।
मूल अंक रिकॉर्ड, फोन जमा रजिस्टर और आरोप के समर्थन वाले खास बयान मँगाने को कहा।
जल्दी में तारीख न छूटे, इसलिए निर्मला ने जोर से पढ़ने में मदद की।
सुषमा से उसके जाने से ज्यादा कहने को नहीं कहा।
समिति ने अनुरोध मिलने की पुष्टि की।
फिर इंतजार हुआ।
आदि काम करता रहा। निर्मला सुबह ग्राहकों से पहले स्टॉल खोलती रही।
पहली जानकारी में नौ दिन लगे।
उस दौरान निर्मला ने शाम के ग्राहकों के लिए अतिरिक्त फूल खरीदना बंद किया। अनुदान रुका था। बिकेंगे या नहीं, ऐसे माल में पैसे रोकने से डर रही थी।
आदि ने छोटे गट्ठर देखे।
माँ ने कहा कि बाजार धीमा है।
झूठ का आरोप नहीं लगाया। काम की अतिरिक्त पाली ली। जितना अलग कर सकता था, दिया।
निर्मला ने मदद स्वीकार की। यह नाटक नहीं किया कि लेने से क्षमता कम हो जाती है।
अगली शाम कुछ अतिरिक्त फूल बिके। कुछ नहीं।
बची डंडियाँ दोनों ने साथ छाँटीं।
निष्पक्ष फैसले का इंतजार भी खर्च ले रहा था। जब आता, हर चिंता वाला घंटा वापस नहीं देता।
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* * *
शिकायत में तीसरे दौर के दौरान चार बजकर बारह मिनट पर गलियारे में फोन देखने की बात थी।
समूह के दो बयानों में वही समय था। दूसरे सिर्फ विराम कहते थे।
आदि ने रखी हुई कार्यक्रम प्रति देखी।
तीसरे दौर का विराम बाद में था।
यह अंतर सवाल था।
उसे तुरंत यह घोषित करने से खुद को रोकना पड़ा कि सारे जवाब मिल गए हैं।
मूल रिकॉर्ड से सवाल हटाना कठिन हुआ।
मेज अधिकारी की अंक और उपस्थिति प्रविष्टियाँ संबंधित अवधि में आदि को खेल वाली जगह पर रखती थीं।
उपकरण रजिस्टर में फोन खेल से पहले जमा था और चयन के बाद वापस लिया गया था।
समिति ने अधिकारियों से अलग बात की।
दूसरा उपकरण पहचाना नहीं गया। फोन इस्तेमाल की तस्वीर नहीं थी। कई हस्ताक्षरकर्ताओं ने माना कि बयान वाली घटना खुद नहीं देखी थी।
प्रशिक्षक ने जो रखा, हस्ताक्षर कर दिया।
फटा परिणाम सुरक्षित मूल अंकों से मेल खाता था।
वह अकेला प्रमाण नहीं था। उससे समझ आया कि कौन सा परिणाम कब रोका गया।
हरीश ने कार्यक्रम की रक्षा का तर्क दिया।
समिति ने पूछा कि घटना उसी समय सामान्य प्रक्रिया से क्यों नहीं उठाई गई। अंक के बाद सामूहिक बयान क्यों लिखवाया गया?
आदि हर चर्चा में नहीं था।
लिखित जानकारी मिली। बात न समझे तो पूछा।
इस बार रिकॉर्ड माँगना खराब रवैया नहीं था।
* * *
चयन के छह सप्ताह बाद समीक्षा में बेईमानी के आरोप के लिए पर्याप्त समर्थन नहीं मिला।
आदि की पात्रता और दर्ज परिणाम बहाल हुआ।
प्रारंभिक सूचना पाने वालों को संस्था ने सुधार भेजा। क्षेत्रीय आयोजन की बची नामांकन अवधि में उसकी जगह की व्यवस्था हुई।
रुका अनुदान बहाल होना था।
हरीश के व्यवहार की जाँच अलग जारी रही। तब तक चयन की जिम्मेदारी से हटाया गया।
आदि ने फैसला स्टॉल पर पढ़ा।
निर्मला ने फोन लेकर अक्षर बड़े किए।
धीरे पढ़ा। फिर अनुदान वाले वाक्य पर लौटी।
कोई बैग खोलने को नहीं कह रहा था।
फोन लौटाया।
“प्रति मुझे भेजो।”
आदि ने भेजी।
शाम उसने फोल्डर के लिए नया पारदर्शी आवरण खरीदा।
आदि जोर से खुश होना चाहता था। सोना भी चाहता था।
घर में खाया। दोनों इच्छाओं को सच रहने दिया।
खाते समय आदि ने हरीश के कमरे वाली दोपहर की माफी माँगी।
“किस बात की?” निर्मला ने पूछा।
“आपको लगा कि उसके पैसे देने पड़ेंगे।”
माँ ने चम्मच रखा।
“पैसे नहीं निकाल रही थी।”
आदि ने देखा।
“पेन ढूँढ़ रही थी। कार्यालय का नाम और पैसे माँगने वाले का नाम लिखना था।”
उसे खुलता बैग याद आया। अपनी बाँह रोकने वाली हरकत याद आई। प्रशिक्षक का संतोष भी।
माँ के लिए इतना डरा हुआ था कि उसकी हरकत का मतलब भी गलत समझा।
“बताया क्यों नहीं?”
“गुस्से में थे। फिर दूसरे काम करने थे।”
निर्मला ने अब बैग खोला। छोटा पेन निकाला। पकड़ वाली जगह टूट गई थी, इसलिए धागा लिपटा था। आदि पहचानता था। बाजार के ऑर्डर उसी से लिखती थी।
“उसमें आठ हजार थे भी नहीं। अगले दिन फूल खरीदने के पैसे थे।”
आदि हँसा। फिर रुक गया क्योंकि गले में दर्द जैसा हुआ।
माँ ने पानी दिया।
उस दिन वह डरी हुई थी। आदि जानता था। लेकिन डर ने उसे वह असहाय व्यक्ति नहीं बना दिया था जिससे हरीश बात कर रहा था। वह माँ को प्रशिक्षक की नजर से याद करते नहीं रहना चाहता था।
खाने के बाद अगले आयोजन के दस्तावेजों की सूची जाँचने को दी।
निर्मला ने छूटी हुई एक चीज बताई।
आदि ने बिना बहस जोड़ी। सूची उसके हाथ में कुछ और देर रहने दी।
अगले दिन अस्थायी नए प्रशिक्षक के साथ अभ्यास लौटा।
पहला सत्र खराब था।
नाम साफ होने से छह सप्ताह का ध्यान एक साथ नहीं लौट आया।
* * *
नए प्रशिक्षक कविंदर ने आभार नहीं माँगा।
पूछा कि अभ्यास के कौन से हिस्से भरोसेमंद नहीं रहे।
आदि ने कहा कि हर गलती प्रमाण बनाई जाएगी, ऐसा लगता है।
कविंदर ने रिकॉर्ड देखा।
“यह गलती जल्दी करने का प्रमाण है। बस।”
उन्होंने समीक्षा की।
पहले आदि बार-बार पुष्टि चाहता था कि गलत कुछ नहीं कर रहा। कविंदर जरूरी उत्तर देता, लेकिन उसे अपने फैसले भी जाँचने देता। खुद को स्थायी गवाह नहीं बनाया।
धीरे कठिन सत्र भी अच्छे लगने लगे।
एक शाम इमारत में सुषमा मिली। खाने को पूछा।
आदि ने टुकड़ों का फिर धन्यवाद किया।
उसने हाथ हिलाया।
“अगली बार पूरा कागज मत खोना।”
दोनों हँसे।
फिर आदि ने पूछा कि समीक्षा की बात में उसकी सहायता का नाम ले सकता है क्या?
उसने कहा कि सार्वजनिक बहस में नहीं आना चाहती।
आदि ने सम्मान किया।
किसी की मदद से उसकी पूरी कहानी हर जगह बताने का अधिकार नहीं मिल जाता था।
* * *
क्षेत्रीय अंतिम चरण से दो दिन पहले देव आया।
पहले की तरह अंदर आने के बजाय अभ्यास कक्ष के बाहर रुका।
आदि ने सामान पूरा रखा।
देव ने कहा कि समिति के पास बयान ठीक कर दिया। पुराने टीम समूह में भी लिखा है कि आदि को फोन इस्तेमाल करते नहीं देखा था।
संदेश दिखाया।
उसमें भ्रम को दोष नहीं दिया था।
कहा था कि अपनी जगह खोने के डर से हस्ताक्षर किया।
आदि ने पढ़कर फोन लौटाया।
“अच्छा।”
देव का चेहरा थोड़ा उतरा।
“जानता हूँ इससे सब ठीक—”
“तो मुझसे ठीक कहने को मत कहो।”
जूते रखने की जगह के पास खड़े थे।
वर्षों वहीं अभ्यास की शिकायत करते, खाना बाँटते और बस तय करते थे।
देव ने प्रतियोगिता देखने को पूछा।
“दर्शकों के लिए खुली है।”
माँ के पास सीट नहीं दी।
देव गया तो आदि कुछ मिनट बैठा रहा।
आसान माफी न देना शक्तिशाली नहीं लगा।
परिचित दरवाजा बंद रखने जैसा लगा, अंदर की पुरानी गर्माहट याद करते हुए।
* * *
क्षेत्रीय आयोजन में विक्रांत प्रतीक्षा वाले हिस्से में मिला।
असहज था।
उसके नामांकन की अलग समीक्षा चल रही थी। उस दिन परिवार के साथ आया था, आदि के अंतिम चरण में खेल नहीं रहा था।
आदि नहीं जानता था कि उसे क्या बताया गया था या उसने क्या बढ़ावा दिया था। समिति ने यह तय करने को आदि से नहीं कहा था।
विक्रांत बोला, “फाड़ने को मैंने नहीं कहा।”
आदि ने उत्तर दिया, “तो जो जानते थे, समीक्षकों को बताओ।”
अपनी मेज पर गया।
प्रतियोगिता को गुस्से से ज्यादा ध्यान चाहिए था।
असमान खेला। सँभला। फिर ऐसा हिस्सा निकाला जिसमें लगा कि मौका खत्म है।
सत्रों के बीच कविंदर ने रिकॉर्ड पर सामान्य सवाल किए।
निर्दोष साबित करने का भाषण नहीं था।
वह प्रमाण से तय हुआ था।
यह खेल था जिसमें अब भी हार सकता था।
फर्क समझने से स्थिर हुआ।
अंतिम परिणाम जाँचा गया। पहला स्थान पक्का हुआ।
आदि ने दरवाजा देखा।
निर्मला फोल्डर सीने से लगाए खड़ी थी।
अंदर बुलाया।
* * *
प्रस्तुति से पहले वाले सप्ताह में संस्था की व्यवहार समीक्षा पूरी हो चुकी थी।
हरीश को प्रशिक्षण भूमिका से हटाया गया। विक्रांत की जगह सहित प्रभावित नामांकन तय चयन प्रक्रिया से फिर देखे जा रहे थे।
संस्था ने लंबित अनुदान की पुष्टि और भुगतान रिकॉर्ड भी तैयार किए थे।
समारोह से पहले आदि ने पूछा कि माँ उसके साथ वे दस्तावेज ले सकती है क्या?
निर्मला निश्चित नहीं थी।
“तुम्हारा है।”
“जानता हूँ। वहाँ चाहूँगा।”
प्रस्तुति मेज पर आदि ने चैंपियनशिप पुरस्कार लिया।
फिर निर्मला ने सही अनुदान रिकॉर्ड और रुका भुगतान उसके बेटे के खाते में जारी होने की पुष्टि वाला फोल्डर लिया।
हाथ स्थिर था।
फोटोग्राफर ने तस्वीर को कहा तो हरीश दर्शकों वाली जगह से बढ़ा।
आयोजक सामने आ गया।
“यह तस्वीर खिलाड़ी, उसके बुलाए परिवार और वर्तमान कार्यक्रम प्रतिनिधि की है।”
हरीश रुक गया।
निर्मला ने जगह बनाने के लिए कैमरे से नजर नहीं हटाई।
इस बार उसके माँगने से पहले किसी और ने सीमा लागू कर दी।
* * *
घर में आदि ने नए परिणाम के पास चार टुकड़े रखे।
माँ ने सपाट रखे थे। मुट्ठी में दबने के निशान किनारों पर थे।
फेंक सकता था।
इसके बजाय समीक्षा फाइल में रखे। रिकॉर्ड में रहने चाहिए थे। खाने की मेज के ऊपर नहीं, जिसे रोज सुबह फिर जीना पड़े।
देव ने बधाई भेजी।
आदि ने धन्यवाद लिखा।
भाई नहीं जोड़ा।
यह भी तय नहीं किया कि कभी नहीं जोड़ेगा।
निर्मला ने सही अनुदान फोल्डर खोला। रकम भुगतान पुष्टि से मिलाई। जरूरी कागजों वाली शेल्फ पर रख दिया।
“कल नाश्ता जल्दी। फूलों का बड़ा ऑर्डर है।”
आदि ने सिर हिलाया।
काम से पहले मदद करेगा।
पुरस्कार मेज पर रहा जबकि दोनों गट्ठरों की संख्या तय कर रहे थे।
किसी ने योजना नहीं फाड़ी।
किसी ने माँ को बाकी माता-पिता आने से पहले जाने को नहीं कहा।
उसने पेन माँगा तो आदि ने दिया।
मात्राएँ वह खुद लिखती रही।