1. Jaiho Arcade: पति की कुर्सी
अंतिम संस्कार के तीन हफ्ते बाद परोमिता पति का ब्रिज वाला बैग लेकर कोलकाता के उनके क्लब पहुँची। अंदर ताश की दो गड्डियाँ, स्कोर लिखने की कॉपी और वह छोटी पेंसिल थी जिसे खो देने का इल्जाम पति हमेशा उसी पर लगाते थे।
क्लब के कप्तान समर ने बैग लिया। फिर रसोई की ओर इशारा किया।
“नाश्ता लगाने के लिए किसी की जरूरत है।”
“मैं खेलने आई हूँ।”
पास की मेज़ वाले लोग हँस पड़े। फिर समझ आया कि वह गंभीर थी। ग्यारह साल वह पति के साथ यहाँ आई थी। किसी का साथी न आता तो उसकी जगह खेली थी। हर मुकाबले के बाद चालें समझी थीं। पति की टीम की तस्वीरों के नीचे उसका नाम कभी नहीं आया था।
समर ने सदस्यता की किताब उठाई। उसका नाम पति की सदस्यता के साथ जुड़ा था।
“तुम्हारी अपनी खेलने की जगह नहीं है।”
परोमिता ने पति की कुर्सी देखी। समर के नए साथी की जैकेट उस पर रखी थी।
“तुम डमी बनकर ही ज्यादा सहज रहती थीं,” समर बोला।
ब्रिज में डमी वाला साथी अपना हाथ खोलकर रखता है। उसका साझेदार निर्देश देकर वे पत्ते चलवाता है। लेकिन समर का मतलब उससे कहीं अपमानजनक था। सब समझ गए।
परोमिता ने बैग वापस माँगा। समर पेंसिल निकाल चुका था। उसने मेज़ पर लुढ़काकर वापस की, जैसे एहसान कर रहा हो।
बाहर पहली बस छूट गई। वह इतना रो रही थी कि नंबर नहीं पढ़ पाई। घर पर शादीशुदा बेटे ने बाकी गैरजरूरी चीज़ों के साथ ताश भी बेच देने को कहा। उसने बैग पलंग के नीचे रख दिया।
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2. Jaiho Arcade कहानी: एक और औरत जिसका साथी नहीं था
परोमिता बावन साल की थी। स्कूल के दफ्तर में काम करती थी। पति का नाम साथ लिखे बिना कभी टूर्नामेंट में नहीं उतरी थी। शोक में परिचित कमरे भी अँधेरे लगते। अपमान ने उस खेल से दूर कर दिया था जो अब भी उन कमरों को पति से जोड़ता था।
तभी लीना का फोन आया।
वह हाल में समर से अलग हुई थी। उसी क्लब में उसकी योग्यता को पति की बातें सुन लेने का परिणाम बताया जाता था। वह समर से अच्छा खेलती तो किस्मत अच्छी थी। गलती करती तो समर पूरे कमरे को उसकी गलती समझाता था।
“साथी चाहिए,” लीना ने कहा।
परोमिता लगभग मना कर देती। एक और ठुकराई हुई औरत के साथ खेलना अपनी हार घोषित करना लग रहा था।
पहला अभ्यास पुस्तकालय के समूह में हुआ। उनका स्थान लगभग आखिरी था। लीना जरूरत से अधिक ऊँची बोलियाँ लगाती। परोमिता उसे निराश करने से इतना डरती कि अच्छे हाथ पर भी उपयोगी बोली नहीं लगाती थी।
बाद में चाय की दुकान पर बहस हुई।
“अपने ही साथी से अपना हाथ छिपाकर मेरी रक्षा नहीं कर सकतीं,” लीना बोली।
परोमिता उठकर जा सकती थी। उसने कॉपी खोली। पूछा कि पहले कौन-सी बोली पर बात करें।
दुकानदार उनके आसपास स्टूल समेटने लगा। वे अब भी पहली बोली पर बात कर रही थीं। जिस असफलता को समझा ही नहीं, उसके लिए एक और सभ्य बहाना लेकर कोई घर नहीं जाना चाहता था। परोमिता ने दो चाय और मँगाईं और नया पन्ना खोला।
3. स्याही में लिखे समझौते
शुरुआत इस बात से हुई कि उनकी अलग-अलग बोलियों का मतलब क्या होगा। कोई आकर्षक तरीका बेकार था अगर सिर्फ एक को याद रहे। उन्होंने सरल प्रणाली लिखी, कठिन स्थितियों पर बात की और सुनिश्चित किया कि जरूरत पर विरोधियों को उनके आपसी अर्थ सही बताए जा सकें।
सोमवार को बोली का अभ्यास होता। गुरुवार को बचाव का। साथी की एक गलती को उसके पूरे चरित्र पर भाषण बनाने की अनुमति किसी को नहीं थी।
परोमिता को बचाव कठिन लगता था। बरसों उसने पति के हाथ को ऐसे देखा था जैसे योजना बनाने का अधिकार सिर्फ उसी के पास हो। अब उसे निकल चुके पत्ते गिनने थे। सोचना था कि साथी के पास क्या बचा हो सकता है।
एक अभ्यास में उसने जीतने वाला पत्ता सिर्फ इसलिए चला दिया क्योंकि वह उसके पास था। उससे सामने वाले को लंबा सूट तैयार करने का समय मिल गया। लीना ने पत्ते फिर जमाए और वही स्थिति दूसरी तरफ से खेलने को कहा।
तब परोमिता को दिखा कि उसने क्या दे दिया था।
गलतियों पर चर्चा हाथ खत्म होने के बाद होती। चलते खेल में लंबी साँस या अर्थपूर्ण नज़र कानूनी बोली और पत्ते का विकल्प नहीं थी।
कभी लीना का पुराना अधीरपन लौट आता। कभी परोमिता चुप हो जाती। उन्होंने पहले सत्र खत्म करना, फिर बात करना सीखा।
चौथे महीने तक कॉपी में शिकायतें कम और पत्तों के चित्र अधिक थे। पेंसिल इतनी छोटी हो गई थी कि पकड़ना कठिन था। परोमिता ने उसे फिर से छील लिया।
4. नौ बाजियाँ जो सिर्फ कागज़ पर थीं
सबसे महँगा सबक तीन नो-ट्रम्प के एक कॉन्ट्रैक्ट में मिला। परोमिता नौ संभावित बाजियाँ गिन सकती थी, लेकिन ले सिर्फ सात पाई।
खुले हाथ में एक लंबे सूट के जीतने वाले पत्ते थे। उसने उस हाथ तक पहुँचने वाला इकलौता भरोसेमंद पत्ता पहले ही इस्तेमाल कर लिया। बाद में जब उन विजेता पत्तों की जरूरत पड़ी, वहाँ पहुँचने का रास्ता नहीं बचा था।
सत्र के बाद लीना ने पत्ते फिर बिछाए।
“कौन-सा पुल खुद तोड़ा?”
परोमिता ने उस इक्के की ओर इशारा किया जिसे बिना सोचे पहले चला दिया था।
कई हफ्ते हर अभ्यास में एक हाथ से दूसरे हाथ तक पहुँचने की समस्या शामिल हुई। विजेता पत्ते गिनना शुरुआत थी। दोनों हाथों के बीच रास्ता बनाना था। देखना था कि किस विरोधी को चाल मिल सकती है। सूट ठीक से न बँटा हो तो क्या होगा।
एक शाम परोमिता ने समस्या सही हल की। वही पत्ते दूसरे सूट में रखे गए तो गलती हो गई। उसे तस्वीर याद हुई थी, कारण समझ नहीं आया था।
उसने सिर्फ सही आखिरी चालें लिखना बंद किया। नोट्स में छोड़ा गया विकल्प और उसके विफल होने का कारण भी आने लगा।
हर प्रतियोगिता में लगातार ऊपर नहीं चढ़ीं। कुछ हफ्ते बहुत खराब नतीजे आए। अच्छी जोड़ी को भी सहनशक्ति, अनुशासन और यात्रा तथा प्रवेश के पैसे चाहिए थे।
परोमिता घर से खाना ले जाती। लीना ने एक गैरजरूरी यात्रा घटाई ताकि एक और अभ्यास हो सके।
पुस्तकालय की टीम प्रतियोगिता आई तो घबराहट थी। लेकिन अब अपने फैसलों का कारण बताने के लिए केवल खराब किस्मत कहना जरूरी नहीं था।
5. फॉर्म पर चार बराबर नाम
दो नियमित खिलाड़ियों, अनवर और बिमल, ने साथ टीम बनाने को कहा। प्रतियोगिता में एक जैसे सौदे अलग-अलग मेज़ों पर खेले जाते थे। दोनों टीमों के नतीजे बाद में मिलाए जाते।
पहले मैच से पहले अनवर ने इसका जरूरी मतलब समझाया। एक मेज़ का शानदार खेल दूसरी मेज़ की बड़ी गलती से बराबर हो सकता था। कोई अकेला पूरी टीम नहीं उठा सकता था।
पहला मैच वे हार गए। परोमिता और लीना ने अच्छा बचाव किया था, लेकिन दूसरी मेज़ पर साथी जरूरत से ऊँचा कॉन्ट्रैक्ट बोल गए थे। नतीजे मिलाते समय बिमल शिकायत सुनने को तैयार था।
परोमिता ने उससे बोली का क्रम दिखाने को कहा।
यह नरमी गलती छिपाने के लिए नहीं थी। उन्होंने चूक समझी। कोई तरीका छिपकर नहीं बदला। अगला मैच उन्हीं स्पष्ट समझौतों के साथ खेला।
कई महीने बाद शहर की क्लब टीम प्रतियोगिता में जगह मिली। प्रवेश फॉर्म पर हर खिलाड़ी का नाम बराबर की एक पंक्ति में था।
समर ने सूची देखकर लीना को संदेश भेजा: इस स्तर पर सहानुभूति से काम नहीं चलेगा।
उसने परोमिता को एक बार दिखाया। फिर फोन रख दिया।
“आज क्या अभ्यास करेंगे?”
“एक हाथ से दूसरे तक पहुँचने का,” परोमिता बोली।
अब यह सिर्फ कठिन तकनीकी विषय नहीं रहा था। उपयोगी चीज़ पास होने और जरूरत पर उसका उपयोग कर पाने के बीच अंतर था। वह अंतर अपने खेल में महसूस करने लगी थी, बाकी जिंदगी में समझाने से बहुत पहले।
6. समर के सामने की कुर्सी
क्लबों की नॉकआउट प्रतियोगिता के फाइनल में समर की टीम सामने थी। एक मेज़ पर परोमिता और लीना उसके तथा उसके नियमित साथी के खिलाफ खेलतीं। दूसरी मेज़ पर अनवर और बिमल दूसरी जोड़ी से खेलते।
शुरू होने से पहले समर ने जानबूझकर कोमल आवाज़ में कहा, “आराम से खेलना। घबराने की जरूरत नहीं।”
लीना ने उनके तरीकों की जानकारी वाला कार्ड सामने रख दिया। “शुरू करें?”
पहला हिस्सा कठिन था। समर ने अच्छा बचाव किया और जरूरत से ऊँचा कॉन्ट्रैक्ट गिराया। दूसरे हाथ में लीना की शुरुआती चाल से परोमिता को मौका मिला कि सामने वाला अपना हारने वाला पत्ता हटाए, उससे पहले बचाव की बाजी तैयार कर ले।
परोमिता ने मौका लिया। दिखता हुआ विजेता पत्ता जल्दी चलाकर फिर समय नहीं गँवाया।
विराम तक उनकी टीम पीछे थी। अनवर का चेहरा सख्त था। बिमल ने सैंडविच लगभग छुआ नहीं था।
उन्होंने स्कोर की तुलना की, लेकिन उसे आरोप लगाने की बैठक नहीं बनने दिया। अंतर भरा जा सकता था। एक-दूसरे को दोष देने से नहीं भरता।
वापस मेज़ पर समर ने आस्तीन ठीक की।
“तुम्हारे पति को ऐसी दोपहर बहुत पसंद थीं।”
परोमिता ने पत्ते सीधे किए। एक क्षण शोक इतनी तेजी से आया कि भूल गई कौन-सा बोर्ड चल रहा है।
फिर उसने बोर्ड का नंबर देखा, डीलर की जाँच की और बोली का इंतज़ार किया। समर एक याद को चोट बनाने के लिए मेज़ पर लाया था। उसे फिर भी सामने का हाथ ही खेलना था।
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7. वह इक्का जिसे नहीं छुआ
मैच के अंतिम हिस्से में परोमिता तीन नो-ट्रम्प की डिक्लेयरर बनी। उसे नौ बाजियाँ लेनी थीं। समर ने पहली चाल चली। लीना ने अपने पत्ते सबके सामने खोल दिए।
खुले हाथ में चिड़ी के पाँच पत्ते थे: बेगम, गुलाम, दस, नौ और आठ। परोमिता के अपने हाथ में चिड़ी के सिर्फ इक्का और बादशाह थे। खुले हाथ तक दोबारा पहुँचने का भरोसेमंद बाहरी रास्ता ईंट का इक्का था।
परोमिता के हाथ में हुकुम की दो पक्की बाजियाँ थीं। पान का इक्का था। ईंट का इक्का था। चिड़ी सही खेली जाए तो वहाँ पाँच बाजियाँ थीं। कुल नौ।
उसने पान की पहली चाल इक्के से जीती और रुक गई।
ईंट का इक्का पहले चला देने में कोई नुकसान नहीं दिखता था। सामने रखा विजेता पत्ता था। कुछ महीने पहले वह काम शुरू करने के लिए उसे तुरंत खेल देती।
लेकिन चिड़ी के दो बड़े पत्ते निकलने के बाद उसी इक्के से खुले हाथ में लौटना था। अभी इस्तेमाल करती तो चिड़ी की बेगम, गुलाम और दस सुंदर लेकिन पहुँच से बाहर पत्ते बन जाते।
उसने पहले चिड़ी का इक्का चलाया। खुले हाथ से छोटा पत्ता डलवाया। फिर बादशाह चलाया और फिर छोटा पत्ता डलवाया। दोनों विरोधियों ने दोनों बार चिड़ी ही दी।
अब अपने हाथ से ईंट चलाकर खुले हाथ के इक्के से जीता।
सामने समर की उँगलियाँ पत्तों के किनारे थपथपाना बंद कर चुकी थीं।
लीना का चेहरा नहीं बदला। डमी के रूप में उसने निर्देश माने, मदद नहीं दी। फैसला परोमिता का था। बचाकर रखा गया रास्ता भी उसी का था।
8. एक छोटा पत्ता, फिर दूसरा
खुले हाथ से परोमिता ने चिड़ी की बेगम, गुलाम और दस की बाजियाँ लीं। विरोधियों की बची चिड़ियाँ उन्हें नहीं हरा सकती थीं। उसने अपने हाथ के बड़े पत्ते पहले निकाल दिए थे और दूसरे हाथ तक पहुँचने का रास्ता सही समय तक बचाया था।
खुले हाथ में हुकुम का छोटा पत्ता अब भी था। उसने वह चलाकर अपने हाथ के इक्के से जीता, फिर बादशाह चलाया। इन दो हुकुम की बाजियों से कुल नौ पूरी हुईं। कॉन्ट्रैक्ट ऐसी साधारण दिखने वाली चालों से बना था जिन्हें वह कभी समझ नहीं पाई थी।
समर ने बिना टिप्पणी किए नतीजा लिखा।
अभी खेल बाकी था। सबसे खतरनाक इच्छा यही थी कि जिस क्षण खुद को सही साबित होते महसूस किया, उसी क्षण मैच खत्म मान ले।
अगले सौदे में कम ऊँचाई वाले कॉन्ट्रैक्ट का बचाव करना था। सूट बदलने का आकर्षण था। उसने निकल चुके पत्ते गिने, साथी की पहले की चाल पर सोचा और वह बचाव जारी रखा जिसमें अभी मौका था। लीना को चाल मिली। उसने कॉन्ट्रैक्ट गिराने वाली बाजी ले ली।
आखिरी बोर्ड में समर ने सावधानी से खेलकर अपना कॉन्ट्रैक्ट बना लिया। परोमिता ने स्वीकार किया। वह अब भी अच्छा खिलाड़ी था। उसे हराने के लिए उसकी गलतियों का उपयोग करने के साथ उसके अच्छे खेल को भी सहना था।
आखिरी पत्ता अपनी जगह वापस रखने के बाद वह जल्दी उठी। कुर्सी पकड़कर सँभलना पड़ा।
समर बोला, “अब देखें तुम्हारे साथियों ने क्या किया।”
इस बार उसके आत्मविश्वास में सवाल था।
नतीजे मिलाने वाले कमरे में अनवर दोनों हाथों से स्कोर शीट दबाए इंतज़ार कर रहा था।
9. दूसरे कमरे का नतीजा
उन्होंने क्रम से बोर्ड मिलाए। छोटी बढ़त छोटी हार में खत्म हो जाती। बिमल हर बोर्ड का कॉन्ट्रैक्ट, डिक्लेयरर और नतीजा पढ़ता। लीना जोड़ जाँचती।
फिर परोमिता का तीन नो-ट्रम्प वाला बोर्ड आया।
“बन गया,” उसने कहा।
अनवर ने सिर उठाया। दूसरी मेज़ पर विरोधियों ने यही कॉन्ट्रैक्ट लिया था और हार गए थे। डिक्लेयरर ने ईंट वाला रास्ता जल्दी खर्च कर दिया था। जब लंबे चिड़ी के पत्ते पहुँच से बाहर हो गए, अनवर और बिमल ने मौका लिया था।
परोमिता एक जैसे बोर्ड नंबर देखती रही। जिस गलती को कभी लिखते हुए शर्म आती थी, वही अब दोनों मेज़ों का अंतर बनी थी।
वह अकेला अच्छा बोर्ड नहीं था। लीना की शुरुआती चाल, आखिरी हिस्से का धैर्य वाला बचाव और दूसरी मेज़ पर साथियों की वापसी भी जरूरी थी। पूरी तुलना हुई तो उनकी टीम जीत चुकी थी।
समर ने खुद नतीजा जाँचा। तीन नो-ट्रम्प का स्कोर फिर माँगा। परोमिता ने शीट उसकी तरफ कर दी।
ठीक करने को कुछ नहीं था।
तस्वीर के लिए किसी ने परोमिता को पुरुषों के पीछे खड़ा करना चाहा। अनवर तुरंत हटा और बीच की जगह दोनों महिलाओं के लिए छोड़ दी।
कुछ दूर समर अपना खाली ब्रिज बैग लिए खड़ा था।
लीना ने एक बार उसकी तरफ देखा। फिर कैमरे की तरफ मुड़ गई।
परोमिता की कॉपी उसकी बाँह के नीचे थी। पति की छोटी पेंसिल अंदर रखी थी। पहली बार वह अपनी चीज़ लगी, ऐसी चीज़ नहीं जिसे सिर्फ सँभालकर उठाने की जिम्मेदारी दी गई हो।
10. वह साथी जिसे वह नहीं बदल सका
पुराने क्लब ने विजेता टीम को स्वागत समारोह में बुलाया। परोमिता और लीना अपने ब्रिज केस लेकर साथ आईं। समर ने परिचय दिवंगत मित्र की पत्नी कहकर शुरू किया।
“परोमिता सेन,” उन्होंने अगले मेहमान से कहा। “लीना मेरी पार्टनर है।”
मेहमान ने निर्णायक बोर्ड पूछा। परोमिता ने दिखाया कि डायमंड इक्के से उस पार जाने से पहले अपने दो बड़े क्लब निकालना क्यों जरूरी था। लीना ने अगला पत्ता बताया। आखिरी ट्रिक तक कई लोग पास आ गए थे।
समर ने बात अपने पुराने प्रशिक्षण समूह की ओर मोड़नी चाही। मेहमान ने हस्ताक्षर वाली मैचशीट देखी।
“आप दूसरी टीम में थे?”
“हाँ,” समर ने कहा।
मेहमान ने शीट परोमिता को लौटाकर एंट्री एक बार फिर समझाने को कहा।
बाद में उनका बेटा आया। उसने माँ को जवाब देते देखा। समर घेरे के बाहर खड़ा वह परिचय पूरा नहीं कर पा रहा था जिसकी किसी को जरूरत नहीं थी। लोग हटे तो बेटे ने कहा कि उन्हें पत्ते बेचने को नहीं कहना चाहिए था।
“नहीं,” उन्होंने कहा। “नहीं कहना चाहिए था।”
उसने केस उठाकर घर ले चलने की पेशकश की। उन्होंने उसकी जगह फ्रेम वाला परिणाम दिया।
दरवाज़े पर समर ने अगली टीम में आने को पूछा। परोमिता ने बाहर इंतज़ार करती लीना की ओर देखा।
“मेरी पार्टनर जा रही है,” उन्होंने कहा और उससे मिलने निकल गईं।
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