1. Jaiho Rummy कहानी: मेरा नाम पेंसिल से लिखा जाता था
अठारह साल तक मैंने पति के रमी स्कोर नीली बही में लिखे। सबसे ऊपर रजत का नाम स्याही से होता। मेरा नाम चाय, कुर्सियों की संख्या या किसी दूसरे इंतज़ाम के पास पेंसिल से लिखा जाता।
शादी खत्म हुई तो क्लब के सामान के साथ बही उसने रख ली। दोस्तों से कहा कि मुझे खेल में कभी दिलचस्पी नहीं थी।
किराए के कमरे में जाने के तीन महीने बाद वार्षिक भोजन में मैंने उसे फिर यही कहते सुना।
“मीरा को पता होता है कौन जीता, क्योंकि कॉलम जोड़ती है। उसे खेलना मत समझ लेना।”
लोग हँसे। एक महिला ने पूछा कि मैं मेज़ के पास खड़ी ही हूँ तो शाम के स्कोर जाँच दूँगी क्या। मेरे पूर्व पति ने नज़र उठाए बिना पेन मेरी तरफ सरका दिया।
मैंने वापस धकेल दिया।
उसके बाद की चुप्पी हँसी से अधिक खराब लगी। जैसे मैंने छोटा काम मना करने के बजाय मेज़ पलट दी हो।
उसके पीछे बोर्ड पर काल्पनिक गुलमोहर बारह-बाज़ी लीग की घोषणा थी। एक मेज़ पर चार वयस्क खिलाड़ी। तीन शामों में बारह बाज़ियाँ। कुल दंड अंक सबसे कम रखने वाला उस मेज़ का खिताब जीतता।
मैंने पंजीकरण फॉर्म लिया। रजत ने आखिर सिर उठाया।
“सारी बारह खेलनी पड़ेंगी,” उसने कहा।
“इतना गिन सकती हूँ,” मैंने जवाब दिया।
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2. वे हिस्से जो उसने कभी देखे नहीं
शादी से पहले मैं खेलती थी। बाद में सबके घर चले जाने के बाद बहन के साथ देर रात खेलती। रजत शायद ही कभी वे बाज़ियाँ देखता। उसे लगता था कि उसके मेज़ से उठने के बाद कोई महत्वपूर्ण चीज़ नहीं होती।
इसका अर्थ यह नहीं था कि मैं लीग के लिए तैयार थी।
पंजीकरण के बाद पहले गंभीर अभ्यास में मैंने तीन अलग पड़े बड़े पत्ते पकड़े रखे। उन्हें छोड़ना किसी अच्छे भविष्य को छोड़ने जैसा लग रहा था। दूसरे खिलाड़ी की घोषणा तक वे भविष्य तीस दंड अंक बन चुके थे।
आदत मैंने तुरंत पहचान ली। फिर भी अगली शाम वही गलती हुई।
इसलिए केवल स्कोर लिखने के बजाय निर्णय लिखने लगी। कौन-सा पत्ता रखा? वह किस समूह में काम आ सकता था? उस समूह के उपयोगी होने से पहले कितने और पत्ते आने चाहिए थे?
बयालीस साल की उम्र में मैं स्कूल के लेखा कार्यालय में काम करती थी। कॉलम समझती थी। अब उनसे फैसला सुनाने के बजाय सवाल पूछवाने लगी।
फोन में अभ्यास के हाथों की तस्वीरें रखती। उनके पास हर निर्णय पर अपने लिखे नोट होते। दूसरों के छिपे पत्तों को निश्चित रूप से जान लेने वाले दावे सहेजना बन्द किया। मुझे उपयोगी सम्भावना और ऐसी उम्मीद में फर्क करना था जिसे बचाए रखने की कीमत स्कोर में चुकाती थी।
अपने लिए खरीदी नई बही लाल थी। उसमें हर खिलाड़ी का नाम स्याही से लिखा।
3. चार सीटें, शादी के नियम नहीं
लीग के ड्रॉ में मेरी मेज़ पर रजत, लीला और सुमित आए। लीला जाँच केंद्र चलाती थी। सुमित दुकानों के बोर्ड डिजाइन करता था। हमारे तलाक में दोनों शामिल नहीं थे और इस मेज़ पर सहायक पात्र बनने का उनका इरादा भी नहीं था।
आयोजक ने फिर स्कोर समझाया। सही घोषणा के लिए तेरहों पत्ते मान्य समूहों में होने चाहिए थे। कम से कम दो सीक्वेंस, जिनमें एक शुद्ध हो। कोई घोषणा करता तो बाकी खिलाड़ियों के पात्र असम्बद्ध पत्ते आयोजन के प्रकाशित नियमों के अनुसार गिने जाते। कुल दंड अंक कम होना बेहतर था।
मैंने हर पंक्ति पढ़कर हस्ताक्षर किए।
रजत ने लीला को बताया कि मैं शुद्ध सीक्वेंस बाईं तरफ रखती हूँ। उसने इसे मामूली निजी याद की तरह कहा—ऐसी जानकारी जो पूर्व पत्नी को परिचित वस्तु बना देती है।
मैंने तुरंत पत्ते नहीं बदले। ऐसा करती तो मेरा पहला निर्णय उसकी टिप्पणी के आसपास घूमता। मैंने छँटाई पूरी की, अपना हाथ देखा और खेल शुरू किया।
पहली बाज़ी ने गलती की कीमत ली। छोड़ा हुआ मेरा पत्ता सुमित की सही घोषणा में काम आया। दूसरी ने अलग तरह से हराया। मैंने बिखरे पत्ते बहुत देर रखे और लीला के खत्म करने से पहले नुकसान कम नहीं कर पाई।
स्कोर बढ़ते समय रजत मुस्करा रहा था।
पहली शाम के अंत में मेरे 104 थे। उसके 42।
उसने पूछा कि क्या वह मेरा जोड़ जाँच दे।
4. वह पन्ना जिसे मैंने नहीं फाड़ा
घर जाकर लाल बही फर्श पर खोली। कमरे में ठीक मेज़ नहीं थी। दस मिनट तक पन्ना फाड़ने का मन हुआ।
इसके बजाय चारों बाज़ियाँ जितना याद था, उतनी सही लिखीं। जो जानकारी याद नहीं थी, उसे साफ चिन्हित किया। झूठा पूरा रिकॉर्ड बनाती तो ऐसी बाज़ी की शानदार व्याख्या मिलती जो मैंने खेली ही नहीं थी।
मेरे सबसे खराब निर्णय रजत के बोलने के बाद आए थे। उसकी आवाज़ में मज़ा होता तो मैं जल्दी करती। वह मुझे डरपोक कहने लगता तो बड़ी उम्मीद वाले समूह पकड़े रहती। बरसों में उसने सीख लिया था कि मुझसे सवाल के बजाय लहजे का जवाब कैसे दिलवाना है।
अगले अभ्यास में मैंने समूह से कहा कि मेरे खेलने के दौरान सामान्य बातचीत जारी रखें। कोई नाटक नहीं, उसकी नकल नहीं। मुझे ध्यान भटकना पहचानना था, अपनी बारी उसके हवाले नहीं करनी थी।
फिर मैंने हारती बाज़ियों में कम दंड अंक रखना सीखा। मेरे भीतर का एक हिस्सा इससे नाराज़ था। उसे हर पन्ने पर अपनी घोषणा चाहिए थी। लेकिन बारह बाज़ियाँ यह नहीं पूछतीं कि मैं एक शानदार तस्वीर बना सकती हूँ क्या। वे पूछती हैं कि अच्छे-बुरे पत्ते गुजर जाने के बाद मेरी कुल स्थिति क्या बचती है।
मैंने 104 वाला पन्ना रखा।
अगली लीग शाम तक उस संख्या को पूर्व पति की आवाज़ सुने बिना देख सकती थी।
5. दूसरा कॉलम बढ़ने लगा
पाँचवीं बाज़ी में लीला ने खुले ढेर से क्लब का आठ लिया। बाद में दस। नौ मेरे पास था, लेकिन अपने हाथ की उपयोगी सीक्वेंस में भी काम आ रहा था।
मैंने उसे रखा। इसलिए नहीं कि उसका पूरा हाथ जानती थी—नहीं जानती थी। अपने हाथ की बनावट और उसके खुले चुनाव, दोनों मुझे उसे हल्के में न छोड़ने का कारण दे रहे थे।
हम दोनों के समाप्त करने से पहले सुमित ने घोषणा कर दी। मेरा नुकसान छोटा था। रजत का नहीं।
छठी बाज़ी में मेरा सही हाथ पूरा हुआ। रजत ने समूह दो बार देखे, फिर पूछा कि क्या मैंने जोकर गलत लगाया है। आयोजक ने शुद्ध सीक्वेंस और बाकी समूह जाँचे। घोषणा सही रही।
मैंने आरोप का उत्तर भाषण से नहीं दिया। अगली बाज़ी की प्रतीक्षा की।
सातवीं शुरुआत से खराब थी। अकेले बड़े पत्ते जल्दी कम किए और स्वीकार किया कि दूसरे समाप्ति के करीब हैं। आठवीं में अच्छे पत्तों ने मौका दिया। मैंने आखिरी जमावट में जल्दबाज़ी किए बिना उनका उपयोग किया।
शाम के अंत में मेरा कुल 136 था। रजत का 147।
चार बाज़ियों में मेरे बत्तीस अंक जुड़े थे। उसके एक सौ पाँच।
इस बार उसने जोड़ खुद जाँचा। उसका पेन कॉलम के नीचे काफी देर रुका।
मैंने बही बन्द करने से पहले सारे स्कोर फिर देखे। अभी चार बाज़ियाँ बाकी थीं। बढ़त मिलना उसे सँभाल लेने के बराबर नहीं था, और मैं पहली शाम जैसा दूसरा पन्ना लिखने का जोखिम समझती थी।
6. सीढ़ियों के पास का सवाल
दूसरे सत्र के बाद रजत ने सीढ़ियों के पास रोक लिया।
“तुम्हें सिखा कौन रहा है?”
वही सवाल नया कपड़ा पहनकर आया था। मैंने उसकी अपेक्षा से अलग कुछ किया, तो किसी और ने दिया होगा।
“दूसरी बाज़ी में लीला ने कुछ सिखाया,” मैंने कहा। “पाँचवीं में सुमित ने। पहली चार में तुमने काफी सिखाया।”
उसके माथे पर बल आए। समझ नहीं पा रहा था कि मज़ाक कर रही हूँ क्या।
नहीं कर रही थी। हर प्रतिद्वंद्वी ने मेरे कमजोर निर्णय दिखाए थे। फर्क इतना था कि उसकी राय को उत्तर-पुस्तिका मानना मैंने छोड़ दिया था।
उसने पूछा कि व्यावहारिक बातें करने पुराने फ्लैट पर आऊँगी क्या। मैंने कहा उस बातचीत का समय पहले से तय है, उसी पर आएँगे। लीग सामान का बँटवारा, बिल या वे साल तय नहीं करेगी जिन्हें हम दोनों ठीक से बयान नहीं कर पाते थे।
फिर उसने लाल बही देखी।
“तुम सब लिखती तो हमेशा थीं।”
“हाँ,” मैंने कहा। “तुम्हें थोड़ा ध्यान से पढ़ना चाहिए था।”
घर जाकर आखिरी चार बाज़ियों की तैयारी की। लीला कितनी जल्दी योजना बदलती है और सुमित कैसे अकेले बड़े पत्ते छोड़ता है, ये बातें देखीं। रजत अब भी वह प्रतिद्वंद्वी था जिसे सबसे अधिक हराना चाहती थी। लेकिन मुझे हराने की क्षमता केवल उसी के पास नहीं थी।
अंतिम शाम से पहले यह याद रखना उपयोगी था।
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7. तीन बाज़ियाँ और जाती हुई बढ़त
नौवीं बाज़ी में रजत उस ध्यान से खेला जो सामान्यतः सम्मान वाले प्रतिद्वंद्वियों के लिए रखता था। उसने मेरे हाथ की हरकतों पर टिप्पणी बन्द की। खुले ढेर पर नज़र रखी।
वह बाज़ी जीता। दसवीं में सुमित ने पहले घोषणा की और रजत ने अपना दंड कम रखा। मेरे पास शुद्ध सीक्वेंस थी, लेकिन समाप्ति से पहले बाकी हाथ पर्याप्त नहीं सँभाल पाई।
मेरी बढ़त चली गई।
ग्यारहवीं ने सबसे अधिक डराया। शुरुआत में दो सीक्वेंस बनाने का अवसर था, लेकिन आकर्षक सेट मुझे जोकर कम उपयोगी जगह पर रखने को उकसा रहा था। मैंने उसे बदला, जमावट जाँची और लालच के गलती बनने से पहले योजना बदली।
फिर भी लीला पहले समाप्त हुई। मेरा नुकसान जितना हो सकता था उससे कम हुआ। रजत का उससे भी कम।
आखिरी बाज़ी से पहले स्कोर था: रजत 153, मीरा 165, सुमित 188, लीला 190।
मैं बारह अंक पीछे थी। दूसरे दो खिलाड़ी भी पूरी तरह दौड़ में थे। दोनों आगे वालों का बहुत खराब अंत होता तो क्रम फिर बदल सकता था।
रजत ने स्कोर देखा, फिर मुझे। वह मुस्कराया नहीं।
इसके लिए मैं आभारी थी, हालाँकि उससे कभी नहीं कहती। बरसों बाद वह हमारे बीच अनिश्चितता को दिखाई देने दे रहा था। अब उसे अगला परिणाम मालूम होने का अभिनय नहीं करना था। मुझे भी अपनी सम्भावना उसके चेहरे से नहीं पढ़नी थी।
8. वे क्वीन जिन्हें मैंने छोड़ दिया
आखिरी बाज़ी में हार्ट की चार पत्तों वाली शुद्ध सीक्वेंस बनाई: चार, पाँच, छह, सात। क्लब में नौ, दस, जैक बने। अलग-अलग सूट के तीन किंग से सही सेट बना।
इससे दस पत्ते व्यवस्थित हुए। बाकी तीन में दो क्वीन और स्पेड का तीन था।
क्वीन आकर्षक रास्ता थीं। ठीक जोकर या तीसरे सूट की क्वीन मिलती तो सेट बन जाता, फिर अकेला तीन छोड़कर घोषणा होती। लेकिन किसी और के पहले समाप्त करने पर दोनों क्वीन बीस अंक भी थीं।
मैंने डायमंड का दो खींचा। हाथ में चौदह पत्ते थे। एक जाना था। मैंने एक क्वीन छोड़ दी।
ऐसा लगा जैसे महीनों से तैयार किया भाषण नीचे रख दिया हो।
अगली बारी में डायमंड का तीन आया। मैंने बची क्वीन छोड़ दी। मेरे बने समूह सुरक्षित रहे। अब अकेले पत्ते थे डायमंड का दो, स्पेड का तीन और डायमंड का तीन। कुल आठ अंक।
जिस नाटकीय समाप्ति की कल्पना की थी, उससे मैं दूर हो गई थी। लेकिन दोबारा सुधारने का मौका आने से पहले बाज़ी खत्म होती तो नुकसान कम था।
रजत खेलता रहा। सुमित ने खुले ढेर में पत्ता छोड़ा। लीला ने बंद गड्डी से उठाया, हाथ देखा और घोषणा कर दी।
एक अजीब पल पुरानी निराशा हुई। बाज़ी किसी और ने जीत ली थी।
फिर याद आया कि ऐसी कुल बारह बाज़ियाँ थीं।
9. आखिरी जोड़ पढ़िए
लीला की घोषणा सही थी। मेरी दोनों सीक्वेंस और सेट भी मान्य थे। आठ अंक के असम्बद्ध पत्ते बचे। आयोजक ने उन्हें मेरे नाम के आगे लिखा।
165 बढ़कर 173 हुआ।
रजत ने पत्ते दो बार जमाए। आखिरी बाज़ी जीतने की कोशिश में उसने महत्वाकांक्षी अधूरा समूह पकड़े रखा था। उसके गिने जाने वाले असम्बद्ध पत्ते तीस अंक थे।
153 बढ़कर 183 हुआ।
सुमित का अंतिम कुल 202 था। लीला 190 पर रही। मैंने चारों कॉलम देखे, फिर किसी से कहे बिना खुद दोबारा जोड़ जाँचा।
आखिरी बाज़ी मैं हारी थी। लीग की मेज़ दस अंक से जीती थी।
रजत ने सभी कुल ज़ोर से पढ़ने को कहा। आयोजक ने वही किया। कोई एक हाथ नहीं था जिसे वह संयोग की छोटी रुकावट कह देता। ऐसी छोटी कहानी भी नहीं बन सकती थी जिसमें मैं केवल एक अच्छे पत्ते के लिए आई थी। कागज़ पर बारह बाज़ियाँ थीं।
सबसे पहले लीला ने हाथ मिलाया। फिर सुमित ने, मुस्कराते हुए। आखिरी नतीजे ने कमरे की अपेक्षा पलट दी थी।
वार्षिक भोजन में मुझसे स्कोर जाँचने को कहने वाली महिला दर्शकों के पीछे थी। हमारे पुराने समूह में सबसे पहले उसी ने ताली बजाई।
रजत ने लाल बही देखी।
“तुमने आठ रखे,” उसने धीरे कहा।
“और बीस छोड़ दिए,” मैंने उत्तर दिया।
पहली बार उसने मेरी बात मुझे वापस समझाए बिना समझ ली।
10. वह पन्ना जो अपना था
आयोजक ने मेज़ की असली स्कोरशीट मुझे रखने की पेशकश की। मैंने प्रति माँगी। आधिकारिक रिकॉर्ड आयोजन के रिकॉर्ड में रहना चाहिए था। बाद में कोई यह न कहे कि नतीजा मेरे हैंडबैग में गायब हो गया।
समारोह में विजेता के कार्ड पर नाम छपा था: मीरा राव। पेंसिल नहीं। किसकी पत्नी रही थी, उसका उल्लेख नहीं।
रजत ने बधाई दी। तस्वीर में पास खड़े होने को नहीं कहा। उस छोटे संयम में शादी के दौरान उसके कई भाषणों से अधिक सम्मान लगा।
हफ्ते बाद बाकी व्यावहारिक व्यवस्थाओं पर मिले। बैठक कठिन थी। रमी की लीग जीतने से उसका स्वभाव नहीं बदला और कागज़ अपने आप पूरे नहीं हो गए। मैंने अपने नोट लिए और तय समय समाप्त होने पर चली आई।
उस शाम लीला और सुमित के साथ खेली। दसवीं बाज़ी में क्या पहले नुकसान कम किया जा सकता था, इस पर बहस हुई। मुझे लगा हाँ। लीला सहमत नहीं थी। बहस बधाइयों से अधिक चली।
पत्ते समेटते समय लीला ने पूछा कि किस पल जीत महसूस हुई।
मैंने ट्रॉफी, आठ अंक और स्कोरशीट के आखिरी जोड़ के बारे में सोचा।
फिर वार्षिक भोजन याद आया। मेरी तरफ सरकता पेन। उसे वापस धकेलता मेरा हाथ।
लीग ने उस हरकत को स्कोर दिया था। मैंने वह हरकत जीतने का परिणाम जानने से पहले की थी।
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