वरुण ने खुले शब्द पर अंगूठा रख दिया।
मोहन ने देखा क्योंकि पंजीकरण फॉर्मों के नीचे पोस्टर का बाकी हिस्सा दिख रहा था।
“जगह भर गई।”
“नोटिस में शुक्रवार है।”
“जगह भर जाए तो तारीख से क्या होता है?”
मोहन ने सुबह भरा फॉर्म बढ़ाया। तस्वीर लगी थी। जरूरी कागज पारदर्शी आवरण में थे। प्रकाशित प्रवेश शुल्क भी लाया था।
वरुण ने नहीं लिया।
पीछे से किसी ने कर्मचारी को नाम लेकर बुलाया।
हल्की नीली कमीज वाला आदमी कतार से आगे आया। फोन के कवर में मुड़ा फॉर्म था।
वरुण ने अंगूठा हटाया।
“यहाँ रख दो।”
मोहन मेज पर रुका रहा।
“अभी मुझे भरा हुआ कहा।”
कर्मचारी ने आस्तीन पर केतली का निशान देखा।
“यह अलग है। वह खिलाड़ी है।”
तेईस साल से मोहन ग्राहकों को कल पैसे देने की बात कहते सुनता आया था।
पहली बार इतनी स्पष्ट तरह से कहा गया था कि कल नाम की जगह दूसरों के लिए आरक्षित है।
* * *
चाय का ठेला इंदौर के मनोरंजन भवन के सामने था।
खिलाड़ी अभ्यास से पहले और बाद में आते। इतने छोटे कपों पर इंडियन रमी की बहस होती कि लंबी बहस के लिए दूसरी चाय जरूरी थी।
मोहन पसंद जानता था।
सूरज के लिए कम चीनी। उस आदमी के लिए बिना अदरक जो कहता था अदरक से ध्यान बिगड़ता है। सेवानिवृत्त पर्यवेक्षक के लिए कड़क, जो हर बार ज्यादा कड़क होने की शिकायत करता।
वे उसे याद रखने वाला आदमी जानते थे।
नहीं जानते थे कि वर्षों से वयस्क मोहल्ला समूह में खेलता है।
बताने की कोशिश की थी।
सूरज हँसा था कि रिश्तेदारों के साथ सब खेलते हैं।
एक बार स्थानीय आयोजन के विवादित फैसले पर चर्चा हुई तो फिर बोला। पूछा कि उस समय खिलाड़ी के पास क्या जानकारी थी?
सूरज ने खाली गिलास बढ़ाया।
“पहले इसे भरो। फिर तुम्हारी चैंपियनशिप देखेंगे।”
लोग हँसे।
मोहन ने गिलास भरा।
लौटा तो बात उसके बिना आगे जा चुकी थी।
* * *
वह पैंतालीस का था। पत्नी किरण के साथ ठेले का मालिक था।
यह कोई अस्थायी शर्म नहीं थी जिससे भागना चाहता था। अच्छी चाय बनाना पसंद था। जानता था कौन दूध में पानी मिलाता है और किस नियमित ग्राहक को कठिन सप्ताह में उधार चाहिए।
नापसंद था यह मानना कि केतली से उसके बारे में सब पता चल जाता है।
किरण इतनी बातचीत सुन चुकी थी कि घर आने पर चेहरा पहचान लेती।
“फिर राय देने की कोशिश की?”
“हाँ।”
“उनके लिए बुरा हुआ।”
अगली सुबह के पोहे के लिए प्याज काट रही थी।
मोहन पास बैठा।
खुली प्रतियोगिता का नोटिस मेज पर था। चौंसठ वयस्क स्थान। अंतिम तारीख। मुख्य चरण से पहले चयन दौर।
भवन के बाहर और आयोजक की घोषणा में वही पोस्टर देखा था।
किरण ने पढ़ा।
“आवेदन करो।”
“कहेंगे पैसे बरबाद कर रहा हूँ।”
“दे रहे हैं क्या?”
“नहीं।”
“तो खर्च देखकर तय करो।”
उसने देखा।
प्रवेश और यात्रा मनोरंजन के लिए रखी रकम में थे। चौबीस साल का भतीजा सलीम आयोजन के दिनों में किरण के साथ सामान्य भुगतान पर काम सँभालने को मान गया।
मोहन ने फॉर्म ध्यान से भरा।
* * *
पंजीकरण मेज पर लंबी बहस नहीं की।
पूछा कि लिखकर देंगे कि आवेदन लाने पर मना किया गया?
वरुण ने कहा, ऐसा कोई फॉर्म नहीं है।
मोहन ने बाहर खड़े-खड़े घोषणा वाले संपर्क पर लिखा। भरा आवेदन जोड़ा और पूछा कि प्रकाशित पात्रता की कौन सी शर्त पूरी नहीं करता?
जो हुआ, बताया। नीली कमीज वाले को दोषी नहीं ठहराया।
हो सकता था उसका प्रवेश पहले तय हो।
जानना चाहता था।
अपने आप आए उत्तर में समय दर्ज हो गया।
ठेले पर सूरज ने गंभीर चेहरा देखकर पूछा।
मोहन ने बताया।
सूरज मुस्कुराया।
“ऐसी जगहों के नियमित लोग होते हैं। चाय की ट्रे लेकर जाकर बराबरी नहीं मिलती।”
“फॉर्म लेकर गया था।”
“मतलब समझते हो।”
मोहन समझता था।
यही समस्या थी।
चाय दी और बिल में सही रकम रखी।
* * *
अगले दिन आयोजक का उत्तर आया।
निधि नाम की महिला ने आवेदन विवरण और मेज पर आने का लगभग समय पूछा। स्थानीय काउंटर वरुण चलाता था, पर प्रतियोगिता प्रवेश की जिम्मेदारी उसकी थी।
मोहन ने जानकारी भेजी।
यह भी पूछा कि खुला शब्द का कोई दूसरा अर्थ है क्या?
निधि ने जाँचने को कहा।
चार दिन और जानकारी नहीं आई।
ग्राहकों के बीच उत्तर खोलता। दूध उठता तो फोन रख देता।
किरण ने कहा कि हर बीस मिनट देखने की जरूरत नहीं।
बोला, नहीं देख रहा।
उसने केतली के पास फोन रखने का सूखता निशान दिखाया।
मोहन ने शेल्फ पर रख दिया।
दोपहर एक ग्राहक ने पूछा कि चाय वाले चैंपियन को विशेष अनुमति मिली क्या?
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पीछे ग्राहक था, इसलिए मोहन मुस्कुराया।
बाद में खाली गिलासों के बीच अकेले उस मुस्कान से नफरत हुई।
उसने अपमान को ऐसी चीज बना दिया था जिसका दोनों आनंद ले रहे हों।
* * *
जाँच में मिला कि कुछ स्थान परिचित खिलाड़ियों के लिए अनौपचारिक रूप से रखे थे।
घोषणा में ऐसी प्राथमिकता नहीं थी।
नीली कमीज वाला उन्हीं अपेक्षित आवेदकों में था। उसने खुद मोहन को मना करने को नहीं कहा था।
निधि ने लिखकर बताया।
माना कि मोहन का आवेदन विचार के लिए लिया जाना चाहिए था।
दूसरे आवेदकों ने भी ऐसी शिकायत की थी।
चुपचाप एक माफी वाली जगह जोड़ने के बजाय आयोजकों ने प्रभावित आवेदनों को दर्ज जमा क्रम से देखा। सुधरी स्थिति सूची प्रकाशित की।
मोहन को उसी प्रक्रिया से जगह मिली।
तय शुल्क देना था। पहचान जाँच पूरी करनी थी। बाकी लोगों जैसे चयन से गुजरना था।
सीधा मुख्य चरण का निमंत्रण नहीं मिला।
यही पसंद था।
दूसरी बार वरुण ने पुरानी बात किए बिना कागज जाँचे।
मोहन ने रसीद माँगी।
मिल गई।
उस पर अपना नाम था।
खाली हिस्से से एक तह की और बटुए में रख ली।
* * *
पुष्टि के बाद पहला अभ्यास निराशाजनक था।
मोहन ने सोचा था कि जगह पाने की मेहनत से ध्यान मजबूत होगा।
इसके बजाय वरुण को गलत साबित करने के बारे में सोचता रहा।
दोस्त अजीत ने जल्दी फैसला लेते देखा।
“मेरे खिलाफ खेल रहे हो या पंजीकरण मेज के?”
मोहन हँसा। माना कि ध्यान नहीं था।
समीक्षा फिर शुरू की।
खेल जानता था। बड़े आयोजन का हर दबाव नहीं जानता था। कार्यक्रम पढ़ने, अस्पष्ट निर्देश पर अधिकारी से पूछने और हर हार को पेशे का फैसला बनाए बिना अपने खेल को देखने का अभ्यास किया।
किरण ने नई कमीज पूछी।
उसने साफ नीली पर्याप्त बताई।
खुद को महँगी कमीज सोचते पकड़ा था। जैसे सही कॉलर मेज वाली बहस खत्म कर देगा।
इससे कर्मचारी के शब्दों से ज्यादा डर लगा।
प्रतियोगिता में जाना चाहता था।
प्रवेश लेने वाले आदमी को छिपाने में सप्ताह नहीं खर्चना चाहता था।
* * *
अगले सत्र के बाद अजीत को चाय पर बुलाया और पैसे लेने से मना करने लगा।
“समय दिया है।”
“साथ अभ्यास किया।”
“समझाया था।”
“तुमने भी।”
मोहन ने अपने योगदान को किसी के लौटने की वजह नहीं माना था। आधे घंटे की एक बहस याद आई जिसके बाद पता चला कि अजीत ने परिणाम गलत लिखा था।
शायद दोस्त को चुनौती मिलना भी पसंद था।
अजीत ने सामान्य दाम गिलास के पास रखे।
मोहन ने पैसे डिब्बे में डाले।
अगले रविवार वह रिकॉर्ड ले गया जो अजीत देखना चाहता था। पूरे समूह के लिए चाय नहीं ले गया।
कोई निराश नहीं लगा।
कुर्सी खिसकाकर बैठने दिया। पूछा कि समीक्षा कहाँ से शुरू होनी चाहिए।
मोहन ने कॉपी खोली। पहली बार बातचीत में आने की कीमत कोई छोटी सेवा नहीं थी। जो सोचता था, वह उपयोगी हो सकता था।
इस बात को मानने में उसे दूसरों से ज्यादा समय लग रहा था।
* * *
चयन के दिन सलीम जल्दी ठेले पर आया।
अदरक की मात्रा पूछी।
मोहन ने बताई। फिर लिखे निर्देश दोहराने लगा।
किरण ने सूची ले ली।
“हम भी यहाँ चाय बेचते हैं।”
मोहन रुक गया।
सही थी।
दूसरों से अपनी क्षमता पहचानने को कहता था, उनकी क्षमता पर भरोसा करना कठिन हो रहा था।
नीली कमीज पहनी और चला गया।
स्थान पर कुछ देर गलत कतार में खड़ा हुआ। स्वयंसेवक ने दूसरी बताई। कोई विपत्ति नहीं हुई।
कागज जाँचे गए।
जगह पक्की हुई।
मेज पर खिलाड़ी ने काम पूछा।
“चाय का ठेला है।”
“भवन के पास?”
“हाँ।”
“शायद आया हूँ।”
अधिकारी बोलने लगा तो बातचीत खत्म हो गई।
मजाक नहीं हुआ।
मोहन को ऐसे प्रश्न के लिए अजीब आभार हुआ जो फैसला नहीं बना था।
फिर पत्ते देखे।
* * *
चयन असमान रहा।
शुरुआत अच्छी थी। फिर अंतर घटा। एक विराम यह सोचते बिताया कि कहीं स्थानीय अनुभव को क्षमता तो नहीं समझ लिया।
अजीत भी खेल रहा था। पूछा कि पिछले सत्र पर बात करना चाहता है क्या?
मोहन ने पहले पाँच मिनट निराश रहने को कहा।
अजीत ने पाँच दिए।
फिर आयोजन की सीमा में खेल के बाहर अनुमत बात की समीक्षा की।
अंतिम चयन सत्र तक मोहन ने कमरे में ऐसे चेहरे खोजना छोड़ दिया जो ठेले से पहचान लें।
अपनी मेज पर पर्याप्त काम था।
मुख्य चरण में पहुँच गया।
परिणाम पर चाय वाला नहीं लिखा था।
विशेष मामला भी नहीं।
नाम और स्थान था।
तस्वीर घर भेजी।
किरण ने खाली दूध के बर्तनों की तस्वीर भेजी। बहुत व्यस्त सुबह सँभाल ली थी।
मोहन ने बधाई दी।
फिर पूछा कि सलीम को भुगतान मिला?
मिल गया, उसने लिखा।
फोन रख दिया।
घर में लोग भी अपना काम अच्छा कर रहे थे।
* * *
सूरज दूसरे समूह से आगे आया।
मुख्य आयोजन में ऐसे गर्मजोशी से मिला जैसे अचानक याद आया हो कि वर्षों से जानते हैं।
“अपना आदमी!” कहकर कंधे पर बाँह रखी।
मोहन थोड़ा हटा। बिना तमाशे बाँह उतर गई।
सूरज ने विराम में खिलाड़ियों को चाय देने को पूछा।
“नहीं। खेल रहा हूँ।”
“मजाक था।”
“जानता हूँ।”
उत्तर से बात आगे ले जाना कठिन हुआ।
बाद में एक ही समूह मिला।
मोहन को उसे हराने का खतरनाक आनंद हुआ।
फिर सूरज ने मजबूत सत्र खेला।
अच्छा मानना पड़ा।
व्यवहार नापसंद करके भी कौशल नकारना जरूरी नहीं था।
इस स्वीकार से ध्यान स्थिर हुआ।
प्रतियोगिता साथ लाई बहस से दिलचस्प हुई।
बाकी खिलाड़ी भी दिखने लगे। शांत महिला जो स्पष्टीकरण में नहीं भागती थी। सेवानिवृत्त तकनीशियन जो हार धैर्य से देखता था। घबराहट से बेहतर खेलता युवा वयस्क।
कमरे में सिर्फ ठेले पर हँसने वाले नहीं थे।
* * *
अंतिम चरण से पहले घर फोन किया।
किरण और सलीम एक दिन और सँभाल सकेंगे, जानना था।
किरण ने पूछा कि सच्चा जवाब चाहिए या चिंता की अनुमति?
“सच्चा।”
“सँभाल लेंगे। सुबह मदद होगी। दूसरे शहर से व्यवस्था बदलना रोक सकते हो।”
मोहन हँसा।
फोन के बाद अंतिम सत्र का समय लिखा।
जीतने का वादा नहीं लिखा।
आखिरी चरण में स्थिति बार-बार बदली। ऐसी गलती हुई जो पेशा किसी को न मालूम होता तब भी शर्मिंदा करती। आगे के फैसलों में जो ठीक कर सकता था, किया।
सूरज पीछे हुआ।
दूसरा खिलाड़ी आगे था।
मोहन इतना करीब रहा कि मौका रहे।
अंतिम परिणाम जाँचने पर अंतर छोटा, पर पर्याप्त था।
उसका नाम पहला था।
कई सेकंड छपी पंक्ति देखता रहा।
फिर खड़ा होना याद आया।
बढ़े हाथ मिलाए। सूरज का भी।
* * *
संचालक ने जीत का अर्थ पूछा।
मोहन ने खुशी बताई। अभ्यास करने और ठेला सँभालने वालों को धन्यवाद दिया।
फिर कहा कि प्रवेश की समस्या की समीक्षा होने से भी खुश है।
संचालक असमंजस में लगा।
मोहन ने कर्मचारी का नाम नहीं लिया। पूरे कमरे ने रोकने की कोशिश की, ऐसा नहीं कहा।
समझाया कि खुली घोषणा के बावजूद पहला आवेदन मना हुआ था। रिकॉर्ड देखकर आयोजकों ने प्रक्रिया सुधारी।
मंच के पास निधि ने सिर हिलाया।
बाद में कहा कि अगले आयोजन में प्रवेश स्थिति स्पष्ट होगी। हर मेज पर एक ही घोषित प्रक्रिया चलेगी।
मोहन ने उम्मीद की।
आवेदन क्यों ठुकरा, पूछने के लिए अगले व्यक्ति को विजेता होना जरूरी नहीं होना चाहिए था।
तस्वीर में किसी ने पुरस्कार के साथ केतली रखने को कहा।
मोहन ने वजह पूछी।
“कहानी बताती है।”
“काम कहानी का हिस्सा है। दूसरे दिन ठेले पर तस्वीर ले सकते हैं। आज प्रतियोगिता की चाहिए।”
वही तस्वीर ली गई।
* * *
इंदौर में मंगलवार किरण के साथ ठेला खोला।
दूध देर से आया।
बर्नर साफ करना था।
ग्राहक ने दस मिनट अनदेखा किए कप को पकड़कर चाय कम गरम बताई।
जीतने से कारोबार का हर हिस्सा अच्छा नहीं हो गया।
मोहन को परिचित सुबह अच्छी लगी।
पुरस्कार ऊँची शेल्फ पर रखा जहाँ भाप न पहुँचे। परिणाम की तस्वीर कीमत सूची के पास लगी।
उस सप्ताह आयोजन के फोटोग्राफर ने फोन किया। अब भी ठेले पर तस्वीर चाहता था, अगर मोहन तैयार हो।
सुबह की भीड़ के बाद समय रखा।
वह आया तो मोहन काउंटर साफ कर रहा था। किरण दूध की खेप जाँच रही थी। फोटोग्राफर ने पूछा कि केतली के साथ अकेला खड़ा हो सकता है क्या?
“दोनों की भी लेना,” मोहन ने कहा।
किरण ने ऊपर देखा।
“प्रतियोगिता मेरी नहीं है।”
“ठेला तुम्हारा है।”
साथ खड़े होने से पहले उसने दूध पूरा जाँचा।
फोटोग्राफर ने इस्तेमाल किए गिलास हटाने का सुझाव दिया। किरण ने कहा कि धुलने तक रुक सकता है या तस्वीर में रख सकता है। लोगों को चाय देने के बाद ठेला ऐसा ही दिखता है।
उसने काम करते हुए कुछ तस्वीरें लीं।
मोहन को एक पसंद आई जिसमें पुरस्कार शेल्फ पर दिख रहा था, लेकिन दोनों उसे नहीं देख रहे थे। किरण साफ गिलास दे रही थी। मोहन लेने को हाथ बढ़ा रहा था।
वर्षों ग्राहकों ने काम को ऐसी वजह माना था जिसके कारण उसकी दूसरी रुचि नहीं हो सकती। कुछ समय वह भी प्रतियोगिता को ऐसी वजह बनाने लगा था कि अब काम से अलग दिखना चाहिए।
तस्वीर की सुबह दोनों बातों से नहीं बनती थी।
उसने प्रति खरीदकर ठेले के अंदर लगाई, जहाँ किरण भी देख सके।
किरण ने कहा कि उसकी आँखें आधी बंद हैं।
“दूसरी चुन लो।”
“नहीं। यह हिस्सा सही है।”
वह हँसी और हिसाब की कॉपी खोल ली। मोहन ने तस्वीर दोबारा देखी। पुरस्कार पीछे छोटा था। सामने वे दोनों रोज की तरह काम कर रहे थे। किसी को छोटा करके दूसरे को सफल नहीं दिखाया गया था। दीवार पर उस तस्वीर की जगह बनाना आसान निकला। मन में ऐसी जगह बनाने में ज्यादा समय लगा था।
दोपहर तक कई खिलाड़ी आए।
कुछ ने सीधी बधाई दी। दूसरे बोले, हमेशा जानते थे खेल समझता है।
हर याद नहीं सुधारी।
सूरज आया तो सामान्य चाय मँगाई। भीड़ कम होने तक रुका।
फिर अंतिम दौर के मुश्किल बिंदु पर पूछा।
मोहन गिलास धो रहा था।
सूरज स्थिति बताने लगा। वह काउंटर के पीछे खड़ा था।
वर्षों बात ऐसी हुई थी। एक बैठता, दूसरा काम के बीच सुनता।
मोहन ने हाथ सुखाए।
“यह खत्म कर लूँ। रुको।”
सूरज रुका।
* * *
किरण ने कुछ मिनट काउंटर लिया।
मोहन दो कप दीवार की छोटी मेज पर लाया।
“बैठो।”
सूरज बैठा।
इस बार मोहन भी बैठा।
सूरज ने खेल शुरू किया, फिर कप देखे।
“विशेष अनुमति वाली बात नहीं कहनी चाहिए थी।”
“नहीं।”
“गलत था।”
मोहन ने सिर हिलाया।
भाषण पर जोर नहीं दिया।
अंतिम दौर पर चर्चा हुई। मोहन ने माना कि अपना फैसला कहाँ अनिश्चित था। सूरज ने उस समय की सोच बताई।
असहमति थी।
उन बातों से बेहतर थी जिनमें मोहन को सिर्फ चाय डालनी होती थी।
चाय खत्म हुई तो सूरज कप काउंटर ले गया।
“कितना?”
सामान्य कीमत बताई।
चैंपियन का अतिरिक्त शुल्क नहीं।
सम्मान खरीदने के लिए मुफ्त चाय नहीं।
सूरज ने दिया और चला गया।
मोहन चूल्हे पर लौटा। नए ग्राहक ने पूछा कि दीवार की तस्वीर उसकी है क्या?
“हाँ।”
“खेलते हैं?”
“हाँ।”
आदमी ने चाय मँगाई।
मोहन ने अच्छी बनाई।