Jaiho Slots — जिस पर्दे के पीछे वह नहीं छिपी
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Jaiho Slots — जिस पर्दे के पीछे वह नहीं छिपी

काल्पनिक कहानी · पात्र और घटनाएँ कहानी का हिस्सा हैं।

ग्राहक ने पहले फटे पर्दे के बारे में पूछा, तलाक के बारे में बाद में। ऋतु को यही क्रम बेहतर लगा। कम-से-कम तीन मिनट तक उससे उसके काम की बात हुई थी। उसने कपड़ा…

ग्राहक ने पहले फटे पर्दे के बारे में पूछा, तलाक के बारे में बाद में। ऋतु को यही क्रम बेहतर लगा। कम-से-कम तीन मिनट तक उससे उसके काम की बात हुई थी।

उसने कपड़ा मेज पर फैलाकर बताया कि अस्तर कहाँ कमजोर पड़ गया है। मिसेज बत्रा सुनती रहीं, फिर अपना बैग ठीक उसी हिस्से पर रख दिया जिसे छूने से ऋतु ने अभी मना किया था।

“मेरे पति तरुण को जानते हैं।”

ऋतु ने बैग उठाकर कुर्सी पर रख दिया।

“कह रहा था, तुमने शादी से ज्यादा ताश को जरूरी समझा।”

“आपको पर्दा शुक्रवार तक चाहिए?”

“मैं तो पूछ रही थी। इतना बुरा मानने की क्या बात है?”

ऋतु ने ऑर्डर की पर्ची पर शुक्रवार लिखा। आखिरी अक्षर पर हाथ काँप गया। वह छत्तीस साल की थी। तलाक के बाद लोगों को लगने लगा था कि जिस जिंदगी का खर्च वह खुद उठा रही है, उसका हिसाब उन्हें देना भी उसका काम है।

* * *

भोपाल में हार्डवेयर की एक दुकान के ऊपर उनकी कार्यशाला थी। मीरा उसे चलाती थीं। ऋतु घरेलू पर्दों की मरम्मत करती और उनके साथ पुराने कपड़ों को सँभालने का काम सीखते-सीखते अब बड़े काम भी लेने लगी थी।

बड़े ऑर्डर कम आते थे। बीच में किनारी, फटे अस्तर और ऐसे ग्राहक आते जिन्हें लगता था कि टाँके छोटे हैं तो मेहनताना भी छोटा होना चाहिए।

ऋतु के अनुबंध में चार महीने बचे थे। मीरा ज्यादा समय के लिए रखना चाहती थीं, मगर चाहने से वेतन का इंतजाम नहीं होता था। तभी शहर के पुराने सभागार के पर्दे ठीक करने का काम आया। दोबारा खुलने से पहले उसकी मरम्मत हो रही थी।

ऋतु ने दो दिन पर्दों की जाँच की। कमजोर जगहें चिह्नित कीं, उन्हें टाँगने वाले पुर्जों की तस्वीरें लीं और नमूने तैयार किए। ठेकेदारों की सूची में तरुण का नाम देखा तो मीरा से पूछा कि वहाँ की बैठकों में कौन जाएगा।

“तुम और मैं।”

ऋतु ने कागज समेटे। “तो सारी बात लिखित में रखेंगे।”

* * *

पहली बैठक में तरुण ने मिसेज बत्रा के लिए कुर्सी खींची। वह सभागार की समिति में थीं। ऋतु पहले से नमूनों की मेज के पास खड़ी थी।

तरुण ने उसकी कैंची, फीते और बाँह पर रखे कपड़े को देखा।

“अभी भी छोटी-मोटी सिलाई चल रही है?”

मीरा ने अनुमान खोला। “यह पूरी जाँच ऋतु ने की है।”

तरुण ऐसे मुसकराया जैसे वही उसका हौसला बढ़ा रहा हो। ऋतु ने समझाया कि पर्दे लगाने से पहले खराब पुर्जे बदलने होंगे। तरुण ने कागज पर उँगली रख दी।

“कपड़े की बात हो रही है। लगाने का काम समझने वालों पर छोड़ो।”

“उन्हीं पुर्जों से कपड़ा फटा है।”

“हर बात में बहस जरूरी है?”

मिसेज बत्रा ने आँखें झुका लीं। घर की बैठकों में भी यही वाक्य चलता था। यहाँ दो शाम लगाकर तैयार किए गए अनुमान के सामने चल गया। ऋतु ने बात पूरी की। किसी ने कुछ नहीं पूछा। फिर तरुण उद्घाटन के फूलों की बात करने लगा तो तीन लोगों ने नोट बनाए।

* * *

दो दिन बाद मीरा को ईमेल आया। आगे की बैठकों में किसी और कर्मचारी को भेजने का अनुरोध था। माहौल असहज होने की चिंता थी। समिति नहीं चाहती थी कि निजी मामले सार्वजनिक कार्यक्रम पर असर डालें।

मीरा ने ईमेल पढ़कर सुनाया। ऋतु खिड़की के शीशे से टकराती मक्खी को देखती रही।

“उसने शिकायत की?”

“किसी का नाम नहीं लिखा।”

“मेरी कौन-सी गलती लिखी है?”

मीरा ने स्क्रीन घुमा दी। गलती भी नहीं लिखी थी। उन्होंने सचिव को फोन किया। ऋतु उनकी तरफ की बात सुनती रही—योग्यता, काम की निरंतरता, कोई तकनीकी शिकायत नहीं। आखिर मीरा ने कहा कि व्यवस्था करके बताएँगी।

फोन रखने के बाद थकी हुई लग रही थीं। “यह ऑर्डर खोना मुश्किल पड़ेगा।”

ऋतु ने सिर हिलाया। उसे समझ आ रहा था, और यही सबसे बुरा था। किराया भी चुकाना न होता तो ऐसी माँग ठुकराना कितना आसान होता।

मीरा उसे मरम्मत पर रखकर खुद बैठकों में जाने लगीं। ऋतु के नोट साथ जाते थे। ऋतु नहीं।

* * *

घर पर बहन कुसुम आई तो ऋतु एक ही प्लेट तीसरी बार धो रही थी।

“अब उसे रख भी दे।”

ऋतु ने बात बताई। कुसुम बोली कि सबको बता देना चाहिए, शादी में तरुण ने क्या-क्या किया था।

“फिर उसका जवाब सुनेंगे,” ऋतु ने कहा।

“सुन लें।”

“फिर मुझसे उसके जवाब का जवाब माँगेंगे।”

कुसुम चुप हो गई। प्लेट पोंछकर अलमारी में रख दी। मेज पर इंडियन रमी की प्रतियोगिता का प्रवेश पत्र था। ऋतु ने कई हफ्ते पहले फीस भरी थी। शादी से पहले भी इस स्थानीय प्रतियोगिता शृंखला में खेलती आई थी।

उसने पत्र मोड़कर बैग में रख लिया।

“अब भी जाएगी?”

“हाँ।”

जवाब देते हुए कोई बहादुरी महसूस नहीं हुई। इतनी थकी थी कि मना कर सकती थी। लेकिन हर बार इसी थकान के कारण अपनी चीज छोड़ देने से भी थक गई थी।

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* * *

अभ्यास का पहला सत्र बुरी तरह हारी। साथी अंजलि ने पूछा कि क्या हुआ। ऋतु समिति की बैठक बताने लगी, फिर बीच में रुक गई। अंजलि तो मेज पर लिए उसके एक फैसले के बारे में पूछ रही थी।

दोनों ने खेल दोबारा समझा। ऋतु जल्दी खत्म करना चाहती थी, इसलिए जल्दबाजी की। बाकी समय उसी गलती पर अपने से नाराज रही।

“अगली बार बोल देना कि रुकना है,” अंजलि ने कहा।

“रुक जाती?”

“पाँच मिनट के लिए? क्यों नहीं?”

ऋतु पीछे टिक गई। काम पर ज्यादा समय माँगना मुश्किल स्वभाव की निशानी बन गया था। घर में बहस खत्म करने के लिए कह देती थी कि ठीक है। दोनों आदतें यहाँ ले आई थी।

अगला सत्र तरुण की चर्चा के बिना खेला। फिर हारी, लेकिन इस बार पता था कि क्या बदलना है।

* * *

पहला पर्दा गुरुवार को तैयार हुआ। मीरा ने ऋतु के साथ जाँच की, रिकॉर्ड पर हस्ताक्षर किए और लगाने के लिखित निर्देशों के साथ भिजवा दिया।

अगले दिन तस्वीर आई। ऊपर से नीचे तक नया चीरा था। सचिव ने सबको ईमेल भेजा था—मरम्मत नाकाम रही। तुरंत जवाब चाहिए।

तरुण ने सबसे पहले लिखा। उसने पहले ही कहा था कि जिसका ध्यान दूसरी जगह हो, उस पर भरोसा नहीं करना चाहिए।

ऋतु ने पंक्ति दो बार पढ़ी। उसके नीचे मिसेज बत्रा का सवाल था कि कार्यशाला पैसे कब लौटाएगी। किसी ने फोन करके नहीं पूछा था कि पर्दा लगाते समय हुआ क्या था।

ऋतु जवाब लिखने लगी तो मीरा ने फोन उसके हाथ से ले लिया।

“पहले देखेंगे।”

ग्यारह मिनट की बातचीत के बाद अगली सुबह आने की अनुमति मिली। मीरा ने ऋतु को साथ लाने पर जोर दिया। सचिव ने कहा कि इस बार शायद जरूरी होगा। उस ‘इस बार’ पर ऋतु ने मुट्ठी भींच ली।

* * *

पहुँचे तो पर्दा उतार दिया गया था। तरुण पास में हाथ बाँधे खड़ा था। ऋतु ने अपना ठीक किया हुआ हिस्सा तुरंत पहचान लिया। वह सुरक्षित था। नया चीरा उससे ऊपर, पुराने पुर्जे से शुरू हुआ था।

“किसने लगाया?”

“काम करने वालों ने,” तरुण बोला।

“कौन-सी टीम?”

“अब दोष ढूँढ़ेंगे?”

मीरा ने लगाने का रिकॉर्ड माँगा। कोई रिकॉर्ड नहीं था। निर्देश दफ्तर के फोल्डर में पड़े थे। काम करने वालों ने देखे ही नहीं थे।

ऋतु ने नुकसान की तस्वीरें लीं। खराब पुर्जे पर्दे के साथ रखने को कहा। तरुण ने एक उठाया।

“इसे फेंकिएगा मत।”

उसने मेज पर पटक दिया। आवाज से सचिव चौंक गया। मिसेज बत्रा ईमेल का प्रिंट लेकर आईं और कपड़े की तरफ देखने लगीं।

“अब ठीक कर सकती हो या नहीं?”

ऋतु ने साँस ली। “मरम्मत का अंदाजा लगा सकती हूँ। पुराने पुर्जे दोबारा नहीं फाड़ेंगे, यह नहीं कह सकती।”

* * *

कार्यशाला में मीरा ने पहली जाँच की तस्वीरें नई तस्वीरों के पास रखीं। खराब पुर्जा दोनों में था। उसे बदलने की सलाह काम शुरू होने से पहले लिखी गई थी।

ऋतु ने छोटी रिपोर्ट तैयार की। पहले की मरम्मत और बाद के नुकसान को अलग-अलग समझाया। भेजने से पहले तैयार पर्दे की ली गई तस्वीर भी लगाई। मीरा ने उन्हीं सब लोगों को भेजी जिन्होंने आरोप पढ़ा था।

सचिव ने अलग से फोन किया। बात समझ आ गई थी। अब क्या कार्यशाला चुपचाप मदद कर सकती थी? उद्घाटन पास था। कोई बदनामी नहीं चाहता था।

मीरा ने ऋतु की तरफ देखा।

“सुधार भी सबको भेजिए,” ऋतु ने कहा।

सचिव ने बताया कि समिति के लोग व्यस्त हैं।

“मुझे काम नहीं आता, यह पढ़ने का समय था उनके पास।”

अब मीरा का फोन उसके हाथ में था। आवाज काँप रही थी, पर उसने फोन मुँह से दूर नहीं किया। लंबी चुप्पी के बाद सचिव ने कहा कि मसौदा भेजेगा।

ऋतु ने कहा, आगे का काम मानने से पहले उसे देखना होगा।

* * *

पहले मसौदे में ‘दुर्भाग्यपूर्ण गलतफहमी’ लिखा था। ऋतु ने लौटा दिया।

दूसरे में साफ था कि कार्यशाला की मरम्मत जाँच में सही पाई गई और अभी भी सुरक्षित थी। नया नुकसान उस पुराने पुर्जे के इस्तेमाल से जुड़ा था जिसे बदला नहीं गया। पहले काम के पैसे लौटाने की माँग वापस ली गई।

मीरा ने रिपोर्ट से मिलाकर भाषा देखी। तब आगे बात हुई। अतिरिक्त काम का अलग अनुमान बना। सही कर्मचारी से खराब पुर्जे बदलवाने, दोबारा टाँगने से पहले जाँच और कार्यशाला के लोगों के अतिरिक्त घंटों के भुगतान की शर्त थी।

शाम को तरुण ने ऋतु को फोन किया। “अब दो बार पैसे लोगी?”

“पहला काम पूरा हुआ था।”

“समझ रही हो मैं क्या कह रहा हूँ।”

“हाँ।”

वह कुछ पल चुप हुआ। पीछे सड़क का शोर आ रहा था। फिर बोला, “कभी तो ढंग से पेश आओ।”

ऋतु ने उँगली पर सुई का निशान देखा। जिस रिपोर्ट को भूलने को कहा जा रहा था, उसे बनाने में उसने खाना भी देर से खाया था।

“अनुमान के सवाल मीरा को भेजिए।” उसने फोन रख दिया।

* * *

अगली दोपहर शर्तें मान ली गईं। मौके पर कपड़े की जाँच ऋतु के जिम्मे थी। उसका नाम प्रवेश सूची में आया। नए इंस्टॉलर को उसकी रिपोर्ट भेजी गई। इस बार उसकी मौजूदगी को निजी परेशानी नहीं कहा गया।

फिर भी वह दिन पूरी तरह खुशी का नहीं था। मीरा ने पहले उसे बैठक से हटाने की बात मान लेने के लिए माफी माँगी।

“मेरे नोट भेज दिए थे, मुझे नहीं,” ऋतु ने कहा।

“हाँ।”

“मेरी जानकारी चाहिए थी। मुझे देखना नहीं था।”

मीरा ने हाथ जोड़कर मेज पर रखे। किराया या दूसरे कर्मचारियों के वेतन का हवाला नहीं दिया। वह हिसाब दोनों पहले से जानती थीं।

“आगे जिसकी जिम्मेदारी होगी, तकनीकी बैठक में वही जाएगा। हमारी शर्तों में लिखूँगी।”

ऋतु अच्छा-सा जवाब देना चाहती थी। मगर उसने सिर्फ इतना कहा कि तैयार होने पर नई शर्तें पढ़ेगी। मीरा ने हाँ कहा।

* * *

अगले दो हफ्ते बहुत व्यस्त रहे। अतिरिक्त नुकसान की मरम्मत में समय चाहिए था। दोष तय हो जाने से अंतिम तारीख दूर नहीं हो गई थी।

ऋतु का बनाया एक नमूना मीरा ने अस्वीकार किया। दूसरा बनाना पड़ा। कम अनुभवी सहकर्मी ने उसके माप में गलती पकड़ी। एक मिनट बहस करने का मन हुआ, फिर उसने धन्यवाद कहा।

अभ्यास में अंजलि ने बताया कि फिर जल्दी कर रही है। इस बार ऋतु ने ताश रख दिए और पाँच मिनट का विराम लिया।

पिछले आयोजनों के कुल अंकों से फाइनल में जगह मिली। हर प्रतियोगिता जीती नहीं थी। चयन सूची में नाम इतना नीचे था कि नियम दो बार पढ़ा। कुसुम ने तस्वीर माँगी तो ऋतु ने पूरा पन्ना भेजा।

“तुझसे ऊपर वाले भी दिखेंगे?”

“हाँ। मुझे पता है यहाँ पहुँचना कितना मुश्किल है।”

फाइनल में जाना अब किसी रिश्तेदार की अनुमति पर नहीं था। फिर भी प्रवेश पत्र बैग में रखते समय उसने तारीख और समय दोबारा देखा, जैसे अपने फैसले पर भरोसा करना भी अभ्यास माँगता हो।

* * *

फाइनल से तीन दिन पहले तरुण का संदेश आया। वह सब पीछे छोड़ने को तैयार था। अगले संदेश में बताया कि उसकी मौसी ने रात का खाना रखा है। ऋतु बिना बहस किए आ जाए तो अच्छा होगा।

उसी शाम फाइनल था। उसने लिखा कि नहीं आ सकेगी। तरुण ने पूछा कि फिर खेल को चुन रही है क्या।

ऋतु उस समय माल आने का इंतजार कर रही थी। ड्राइवर कपड़े के रोल पर्ची से मिला रहा था। पहले वह इस सवाल पर लंबा हिसाब देती—कितने बिल चुकाए, कितनी यात्राएँ छोड़ीं, कितनी रात इंतजार करके सुबह काम पर गई।

अब लिखा, खाने के बारे में जवाब दे दिया है। फिर कपड़ा ऊपर पहुँचाने में मदद की।

संदेश दुखा फिर भी। घर पहुँचकर दोबारा पढ़ा। बेहतर सफाई नहीं भेजी। कुसुम ने पूछा भी नहीं कि क्या लिख रही है। पास बैठकर अपना काम करती रही। उस शाम ऋतु को उतना साथ काफी लगा।

* * *

फाइनल में ऋतु चौथे स्थान पर रही।

नतीजा देखकर कुछ पल अंजलि का खुश चेहरा भी बर्दाश्त नहीं हुआ। पहला स्थान चाहती थी। सोच लिया था कि ट्रॉफी मिलने पर कितने लोगों को कितना साफ जवाब मिल जाएगा।

अंजलि ने निराश होने दिया। दोनों बाहर सीढ़ियों पर बैठीं। ऋतु आखिरी दौर के बारे में बात करती तो हर वाक्य ‘अगर’ से शुरू होता। थोड़ी देर बाद खेल की असली बात कर पाई।

“अब उस खाने पर जाएगी?” अंजलि ने पूछा।

“नहीं।”

नतीजा पता चलने से पहले मना किया था। हारने से निमंत्रण का मतलब नहीं बदल गया।

कुसुम छाता लेकर पहुँची, जिसकी जरूरत नहीं पड़ी। चौथा स्थान सुनकर बोली कि अच्छा है। फिर मान लिया कि उसे कुल खिलाड़ियों की संख्या ही नहीं पता। उस शाम ऋतु पहली बार हँसी।

सोमवार को पर्दे लगवाने थे। उसे सोना था। वापस जाते हुए उसने फाइनल का नतीजा छिपाने के लिए कोई बहाना नहीं बनाया। जो हुआ था, बहन को वही बता दिया।

* * *

नए इंस्टॉलर ने ऋतु की बात ध्यान से सुनी। कुछ सवालों के जवाब उसने दिए। एक मीरा से पूछकर बताया। पर्दे ऊपर जाने से पहले पुर्जे जाँचे गए।

बीच में तरुण आया और एक कर्मचारी को दूसरे काम पर भेजने लगा। ऋतु ने निरीक्षण खत्म होने तक रुकने को कहा।

“पहले ही देर है।”

पास खड़े सचिव ने कहा, “तो इन्हें दोबारा यही काम न करना पड़े।”

तरुण ने उसे देखा। कर्मचारी वहीं रहा। ऋतु ने जाँच जारी रखी। चालीस मिनट लगे। किसी ने उन मिनटों को उसका गुस्सा, बहस या आगे न बढ़ पाने की आदत नहीं बताया।

पहली बार पर्दा बिना अटके चला तो कंधे ढीले पड़े। ऋतु ने फिर चलाने को कहा। फटा हुआ किनारा दोबारा देखा। उसके बाद ही काम पूरा होने के कागज पर हस्ताक्षर किए।

* * *

उद्घाटन पर ऋतु बाकी कर्मचारियों के साथ पीछे खड़ी थी। अतिरिक्त बिल का भुगतान हो चुका था। मीरा ने नई शर्तों की प्रति सबको दी थी। तकनीकी बैठकों वाली बात उसमें थी।

भाषणों से पहले मिसेज बत्रा आईं।

“मुझे काम के बारे में पूछना चाहिए था।”

ऋतु रुकी रही। महिला ने मंच की तरफ देखा, फिर उसकी तरफ।

“उसकी बात दोहराने से पहले।”

“हाँ।”

मिसेज बत्रा ने असहज होकर सिर हिलाया। ऐसा कोई अच्छा-सा जवाब नहीं था जिससे पहली बातचीत मिट जाए। ऋतु ने उन्हें वह राहत नहीं दी।

सचिव ने माइक पर मरम्मत और लगाने में हुई गलती ठीक-ठीक बताई। ऋतु का नाम लेकर कहा कि उसने समस्या पकड़ी और कपड़े का काम सँभाला।

तरुण आगे खड़ा था। समिति के दो लोग उसकी तरफ मुड़े। इस बार बात दबाने को कोई निजी बातचीत नहीं थी। किसी नाराज औरत का लहजा बहाना नहीं बन सकता था।

सचिव के पीछे पर्दा बिना अटके खुल गया।

* * *

बाद में तरुण नमूनों के पास आया। “जो चाहती थी, मिल गया।”

ऋतु ने शीशे के नीचे रखा ठीक किया हुआ कपड़ा देखा। लोग रुककर टाँके देख रहे थे। एक घंटे से उससे ऐसे सवाल पूछे जा रहे थे जिनके जवाब वह देना चाहती थी।

“हाँ,” उसने कहा।

तरुण जैसे इनकार की उम्मीद कर रहा था। तभी मीरा ने बुलाया। अगला काम मंजूर हो गया था। मंगलवार को लंबे अनुबंध पर बात करनी थी। समय तय करके ऋतु नमूनों के पास लौट आई।

एक महिला अपनी बेटी के साथ इंतजार कर रही थी। बेटी डिजाइन पढ़ती थी। उसने पूछा कि सहारे का कपड़ा कैसे चुना गया। ऋतु समझाने लगी। किनारे से तरुण दिख रहा था, जैसे बोलने की जगह ढूँढ़ रहा हो।

लड़की ने अगला सवाल पूछ लिया। ऋतु ने नमूना उसकी तरफ घुमा दिया। फिर सिर उठाया तो तरुण जा चुका था।

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